ब्रज के भक्त भाग 3 · अध्याय 100

श्रीशचीनन्दनदास बाबा

श्रीशचीनन्दनदास बाबा की प्रेरक हिंदी कथा। जानिए उनके जीवन, भक्ति और साधना से जुड़े महत्वपूर्ण प्रसंग।

श्रीशचीनन्दनदास बाबा
श्रीशचीनन्दनदास बाबा — ब्रज के भक्त भाग 3

श्रीशचीनन्दनदास बाबा का यह भक्त-चरित्र ब्रज की साधना, श्रद्धा और जीवन से जुड़े प्रसंगों को सामने लाता है। नीचे कथा को अलग-अलग विषयों में व्यवस्थित किया गया है।

दिव्य अनुभूति और कृपा के प्रसंग

( बरसाना)

सन् १९७२ का माघ मास था, जब मैं बरसानेके श्रीरामजीवनदास बाबाको साथ लेकर श्रीशचीनन्दनदास वाबाके दर्शन करने गया। उस समय श्रीशचीनन्दनदास जाबाकी आयु ११० वर्षसे भी अधिक थी। वजके सबसे प्राचीन सिद्ध महात्माके रूपके उनकी ख्याति थी। बरसानेमें आये तीर्थयात्रियोंके आकर्षणके वे प्रमुख केन्द्र थे। दूर-दूरसे आये तीर्थयात्री, जो उनके विषयमें कुछ नहीं भी जानते, उन्हें पण्डे उनके पास ले जाया करतेः क्योंकि वे जो कुछ उन्हें भेंटकर जाते उसे आगे-पीछे वे ही ले लेते। बाबाको न उसका पता होता, न उसकी आवश्यकता हो होती। वे अधिकतर एक मूर्तिक समान ध्यानस्थ बैठे रहते। लोग जैसे मन्दिरमें मूर्तिको दण्डवत्कर पैसे-कौडी चढ़ाकर वापस चले जाते हैं, वैसे ही उनके भी दर्शनकर और उनके सामने रुपये-पैसे या फल-फूल आदि रखकर चले जाते।

श्रीशचीनन्दनदाप बाबा वरसानेके भानुखर (भानुसरोवर) के तटपर श्मशान भूमिमें एक प्राचीन जीर्ण-शीर्ण छतरीमें रहते थे। हम जब छतरीपर गये, तो साँकल बाहरसे लगी थी। दरवाजा खोलकर जैसे ही हमने भीतर प्रवेश किया, देखा कि बाबा दीवारके सहारे ध्यानस्थ बैठे हैं। उनके ओष्ठ ईषत् हिल रहे हैं और कण्ठसे 'राई, राई' (राधे, राधे) शब्दका निरन्तर उच्चारण हो रहा है। बिलकुल नहीं लग रहा है कि उन्हें बाह्यज्ञान है, 'राई, राई' का उच्चारण अभ्यासवश अपने-आप होता प्रतीत हो रहा है।

बाबा दृष्टि-शक्ति खो चुके थे। पर उनकी श्रवणशक्तिमें कोई अन्तर नहीं पड़ा था। फिर भी हमारे दरवाजा खोलकर भीर आनेका आभास उन्हें हुआ था। उस समय सन्ध्या हो आयी थी। छतरीमें प्रकाश बहुत कम था। मध्यमें किसी दम्पतिकी समाधियोंके चिह्न अस्पष्ट से दीख रहे थे। ऊबड़-खाबड़ फर्शपर एक तरफ पानीका घड़ा और रजका करुआ थाली रखे थे। एक टाटका आसन था, जिसपर बाबा बैठे थे। एक गुदड़ी थी, जिसका आधा हिस्सा फर्शपर लोट रहा था और आधा उनके

बाम अंगपर टंगा हुआ था। इसके सिवा छतरीमें और कुछ नहीं था। पासमें कोई सेवक भी नहीं था।

ऐसा नहीं कि उनका कोई शिष्य था नहीं। उन्होंने शिष्य बनाए थे, पर केवल चार ही। बड़ी मुश्किलसे ही वे किसीको दीक्षा देते थे। जिन्हें दीक्षा दी थी, उन्हें भी प्रायः अपने पास नहीं रखते थे। व्रजवासी उन्हें रोटी दे जाया करते थे और बाहरसे साँकल लगाकर चले जाया करते थे. जिससे कोई जानवर भीतर न जा सके।

हम लोग बाबाके सान्निध्यमें बहुत देर चुपचाप बैठे रहे इस प्रतीक्षामें कि उनके शरीरमें बाह्य-ज्ञानका कोई चिह्न दीखे तो कुछ बातें करें।

उस समय छतरीके बाहर और भीतरका वातावरण शान्त और स्तब्ध था, पर नीरवता पल-पलपर मुखरित हो जैसे कुछ कह रही थी। हमारे बगैर कुछ कहें-सुने ही हमारी बहुत-सी शंकाओंका समाधान कर रही थी। हमारे बहत-से प्रश्नकि उत्तरमें बाबाकी ओर इंगित करती जान पड़ रही थी। उन्हें देख हमारे सभी प्रश्न कुण्ठित हो रहे थे। श्मशान भूमिकी उस छतरीमें शान्त और प्रसन्न मुद्रामें अकेले अन्तरमना बैठे बाबा मायाके संसारको चुनौती देते लग रहे थे। वे प्रभुके चरणप्रान्तमें अपनी जीवननैया-का लंगर डालकर निश्चिन्त थे। संसार-समुद्रकी प्रचण्ड लहरें और झंझावात उन्हें अपने स्थानसे विच्युतकर उनके साथ खिलबाड़ करनेमें असमर्थ थे। वे सदा प्रभुके चरणोंकी छायामें रहकर उनके मधुर चिन्तनमें तल्लीन रहते थे। बाहरके जगत्‌की खबर भी नहीं रखते थे।

उस जगत्‌की किसी वस्तु या उसके किसी व्यक्तिकी उन्हें अपेक्षा ही न थी। भगवान् स्वयं उनके योग-क्षेमका भार वहन करते।

प्रभुकी कृपासे माया-निर्मित इस देहमें रहते हुए भी मायापर क्या कोई पूर्ण विजय प्राप्त कर सकता है? केवल प्रभुकी कृपापर निर्भर रहकर, जीवन-यापनके लिए कुछ भी न करते हुए, क्या सचमुच कोई सुखसे जीवित रह सकता है? क्या सचमुच भगवान् उसका योग-क्षेम वहन करते हैं? - इन सभी प्रश्नोंके वे उत्तर-स्वरूप लग रहे थे।

उनके दिव्य सानिध्यमें बैठे-बैठे काफी समय बीत गया, तब रामजीवन बाबाने उच्न स्वरमें कहा-'राधे, राधे!'

'कौन?" मन्द और गंभीर स्वरमें बाबा बोले, जैसे वे बहुत दूर कहींसे बोल

रहे हों।

'मैं रामजीवन' रामजीवन बाबाने उत्तर दिया। साथ ही मेरा परिचय देते 'यह वृन्दावनसे आपके दर्शन करने आये हैं । इनपर कुछ कृपा कीजिये।'

भक्तों के साथ मिलन और सत्संग

बाबा चुप रहे। कुछ क्षण पश्चात् वे गाने लगे गोधूलिकी उस वेलाके अनुकूल एक गीत, जिसमें गोचारणके पश्चात् श्रीकृष्ण-बलरामके ग्वाल-बाल सहित घर होटनेका सुन्दर वर्णन है-

गो-खर-धूलि उछलि भरु अम्बर धनहुँ हाम्बा-रव हई-हई राव ।

वेण-विषाण-निसान समाकुल: सगे रंगे सब सहचर धाव ।।

बन सजे गिरिवर-घर घर आवत; जलद हेरि जनु हरषित चातकी ।

व्रजरमणीगण मंगल गाबत ।।

(आकाशमण्डल गोखरोंसे उड़ती धूल, गायोंके 'हम्वा-हम्वा' रव और ग्वाल-स्लोंकी 'हई-हई' ध्वनिसे व्याप्त है। वेण और श्रृंगा बजाते, निशानादि लिये सखागण तरह-तरहके रंग करते चले आ रहे हैं। वन-प्रान्तसे गिरिधारीको घर आते देख बजरमणियाँ उसी प्रकार आनन्द-विभोर हो मंगल-गीत गा रहीं हैं, जिस प्रकार बदलोंको देख चातकी आनन्द-विभोर हो नाचने लगती है।

बाबा एक उच्च कोटिके गायक और वादक थे। उनका कण्ठ-स्वर अब भी मुरीला और तड़पीला था। उनके गानसे लग रहा था जैसे लीला-जगत्‌की कोई इनाङ्गना दिन भरके बाद कृष्णको सखाओं सहित घर लौटते देख आत्मविभोग हो एनके माध्यमसे उनके चरणोंमें अपने विगलित प्राणोंका अर्घ्य उड़ेल रही है।

गाना समाप्त करने ही बाबा फिर अन्तरमना हो गये। उसी अवस्थामें उन्हें श्रीकृष्णकी रूपमाधुरीका प्राण-चसकसे जी भरके पान करते छोड़ हम चुपकेसे छतरीके बाहर हो गये। रामजीवन बाबाने दरवाजा बन्दकर साँकल बाहरसे लगा दी।

बाबाका बँगाली शरीर था। वे बंगालमें कहाँ रहते थे और व्रजमें कब आये, इस सम्बन्ध में कुछ नहीं पता। पर, अब उन्हें बरसानेके भानुकुण्डके तटपर इस छतरीमें रहते ८० वर्ष हो गये थे। अपने प्रधान शिष्य श्रीअनुरागी बाबासे उन्होंने एक बर कहा था- 'मुझे बचपनसे ही कथा-कीर्तनका नशा था। यदि घरसे कहीं दस मौल दूर रातमें भी कथा-कीर्तन होनेका संवाद पाता तो उस स्थानको चल पड़ता। एत वहीं व्यतीत कर दूसरे दिन घर लौटता। घरके लोग लोग डाँटते-डपटते, भरते-पीटते, तो उसे सहन करते हुए भगवान्से प्रार्थना करता उस प्रतिकूल उत्तारणसे मुक्ति दिलानेकी। एक बार मैं श्रीम‌द्भागवत् महापुराण की कथा सुन रहा

(भा ९।४।१८) था। राजा अम्बरीषका गुणानुवाद हो रहा था। 'से वै मनः कृष्णपदारविन्दयों' श्लोक १८) की व्याख्या में सुना कि उन्होंने अपने मनको श्रीकृष्णचन्द्रके चरणारविन्द युगलमें, वाणीको भगवद्गुणगानमें, हाथोंको श्रीमन्दिरके मार्जन-सेवन अपनी सवेन्द्रियोंको श्रीभगवानमें लगा रखनेका निश्चय किया। घरपर रहते यह और कानोंको उनकी मंगलमयी कथाके श्रवणमें लगा रखा था। उसी समय मैंने पी तुलसीका पौधा लटकाये दो वर्ष तक भारतके विभिन्न तीथोंमें भ्रमण करता सम्भव न था, इसलिए घरसे निकल पड़ा। गलेमें एक छोटेसे मिट्टीके पात्रमे

रहा। दो वर्ष पश्चात् बाबाने वजमें प्रवेश किया। दीक्षा शायद उन्होंने पूर्वाश्रममें ने श्रीरामहरिदास बाबासे वेष ग्रहण किया। कुछ दिन वजके विभिन्न क्षेत्रोंमें भ्रमण करते किसीसे ले रखी थी। वजमें आकर सिद्ध श्रीजगन्नाथदास बाबाके शिष्य सिद्ध रहे। फिर स्थायी रूपसे इस छतरीमें आसन जमाकर भजन करने लगे।

राधारानीमें उनकी अटूट निष्ठा थी। उनकी तरह-तरहसे सेवा किया करते। होली के दिनोंमें सुबहसे शाम तक भानुखर छतरीसे लेकर श्रीजीके मन्दिर तकके मार्गमें झाड़ लगाया करते। श्रीजीके श्रृंगारके लिए फूल-चयन किया करते। जब-कभी बरसानेमें फूलोंका नितान्त अभाव हो जाता, तब वे रात-रात भर पैदल चलकर वृन्दावन चले जाते। वहाँसे फूल लाकर प्रातःकाल माला गूँथकर श्रीजीको अर्पण करते।

एक बार कोसीके निकट किसी बगीचेमें उन्हें सुन्दर-सुन्दर फूल लगे दीखे। इच्छा हुई उनकी माला गूँथकर श्रीजीको पहनानेकी। बगीचेके मालिकसे फूल तोड़नेकी अनुमति माँगी तो उसने मना कर दिया। उस दिन रातको वे उस बगीचेके निकट एक तिबारीमें सो गये। रात १२ बजे कुछ चोर तिबारीके निकट कहीं चोरी करनेकी योजना बना रहे थे । बाबाको देख उनके सरदारने हिला-डुलाकर उन्हें जगाया। पूछा-'तू कौन है, रे?'

"मैं चोर हूँ।'

बाबाने कहा 'इस बगीचेमें।'

'चोर ? कहाँ चोरी करेगा?'

'बगीचमें क्या रखा है?'

'बड़े सुन्दर-सुन्दर फूल खिले हैं।'

'क्या फूलोंकी चोरीसे तेरा पेट भरेगा ?'

'हाँ भरेगा।'

कैसे? इन्हें बेचकर तुझे क्या मिलेगा?'

जायेगी।' 'बेचेंगा नहीं। फूलोंकी माला गूंथकर श्रीजीको धारण कराऊँगा। श्रीजी प्रसन्न देगी। उनकी प्रसन्नतासे मेरा भवरोग छूट जायेगा। मेरी जन्म-जन्मान्तरकी भूख मिट

सेवा, प्रसाद और समर्पण की घटनाएँ

तुम्हारा साथ देंगे।' चोर बाबासे बहुत प्रभावित हुए। बोले- 'बाबा, चलो इस चोरीमें हम भी

उनकी सहायतासे फूलोंकी चोरीकर बाबाने अपनी मनोवाञ्छा पूर्ण की।

बाबाके क्षणभरके संगके प्रभावसे, या श्रीजीके लिए एक बार चोरी करनेके फलस्वरूप चोर अपने लिए चोरी करना भूल गये। वे बाबाके पास उनकी छतरीपर हीच-बीच में आते रहे। उनके व्यक्तित्वमें असाधारण परिवर्तन हुआ। वे चोरसे भक्त बन गये।

बाबा दिनभर छतरीमें भजन करते रहते। सन्ध्या समय एक बार मधुकरीको जाते। मधुकरीमें प्राप्त रोटियाँ कभी अधिक मिल जातीं तो उन्हें सुखाकर रख लेते। कसी दिन भजनावेशके कारण मधुकरीको जानेकी इच्छा न होती, तो उन्हें चबाकर रह जाते। वृद्धावस्थामें जब दाँत नहीं रहे, उन रोटियोंका चूराकर थोड़ा नमक और पानी मिलाकर उनकी, गोलियाँ बना लेते और पानीके साथ उन्हें निगल जाते। विह्वाको स्वाद लेनेकी इच्छा होती, तो 'राई, राई (राधा-राधा) नाम रटने लगते। इसमें उन्हें इतना स्वाद मिलता कि भूख-प्यास सब भूल जाते। उन्हें अक्सर गाते सुना जाता-

घूरि खेला आर खेलिबो ना, हरिनामे मन मेंजे छे।

मायेर काछे आर जावो ना, क्षुधा पेले आर खाबो ना ।।

राई राई आमार क्षुधा तृष्णा सब हरे छे।।

'(सांसारिक विषयरूपी) धूलसे अब मैं नहीं खेलूँगा, क्योंकि मेरा मन हरिनामामृत-समुद्रमें डूब गया है। अब मैं न तो माँके पास जाऊँगा और न ही और भूख लगनेपर कुछ खाऊँगा, क्योंकि राधा-नामने मेरी क्षुधा-तृषा सब हर ली है।'

राधा-कृष्णकी अष्टकालीन लीला-चिन्तनमें बाबा सब समय डूबे रहते। उनके कण्ठसे 'राई-राई' की ध्वनि होती रहतीं। रात्रिमें चिन्तनमें राधारानीको शयन कराकर अपने-आप भी विश्राम करते। पर, एक-डेढ घण्टा विश्राम करनेके पश्चात् उठे

बैठते और आसनपर बैठे 'राई-राई' रटा करते। उनके नेत्रोंसे अश्रुधार प्रवाहित होती रहती।

उनके पास जिस समय भी कोई व्यक्ति आता, उस समयको लोलावे सम्बन्धित कोई पद गाकर उसे सुनाते। उससे उसकी राशि का नाम पूछते। उनकी किसी एकका नाम लेकर कहते- 'आजसे तुम्हारा यही नाम है। फिर उस राशिके अनुसार राधारानीकी सखी-मञ्जरी, ललिता, विशाखा, रंगदेवी अदिमें में सखीके रूप-रंग, वेशभूषा आदिका वर्णनकर उसकी सेवाका वर्णन करने लगते। उसे और कुछ कहने-सुननेका अवकाश न देते। यदि वह उनकी बात काटकर अपने सांसारिक नौकरी-चाकरी या सन्तानादिकी कोई बात पूछने लगता, तो उसे डॉट-फटकारकर छतरीसे निकाल देते।

आलाप-संलाप तो जैसे यन्त्रवत् अपने-आप चलते रहते। शौचादिको जाते तो भी बाबा जिस समय जिस भावमें डूब जाते, उसीमें डूबे रहते। बाहरकी क्रिया, वही स्थिति रहती। तीन-तीन घण्टे वहाँ बैठे रह जाते। आँखकी पुतलियाँ ऊपर चढ़ी रहकर उनकी ध्यानस्थ अवस्थाका परिचय देती होतीं। पर 'राई-राई' की ध्वनि उस समय भी चलती रहती।

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बहुत दिनोंसे बाबाने मधुकरीको जाना बन्दकर रखा था। उन्हें इसके लिए अवकाश ही कहाँ था ? उनके शिष्य, सेवक और व्रजवासी उन्हें प्रसाद पहुँचा दिया करते थे। एक बार वर्षा ऋतुमें बाढ़के कारण बाबाकी छतरी चारों ओर पानीसे घिर गयी। उन तक किसीका पहुँचना बहुत मुश्किल हो गया। बाबा फिर भी छतरी छोड़नेको तैयार न हुए। उस समय अनुरागी बाबा उनके पास रहकर उनकी सेवा कर रहे थे। एक दिन रातमें वर्षा जोर की हो रही थी। उसी समय बाबाकी ऊँगलीमें बिच्छूने डंक मारा। असह्य यन्त्रणा ! अनुरागी बाबाने तत्काल ऊँगलीको सुतलीसे कसकर बाँध दिया। फिर चिन्ता करने लगे और क्या उपचार करें ऐसे पानीमें कैसे कहाँ जायें। बाबाने कहा- 'बेटा, कहीं मत जा। थोड़ी देरमें मैं लीलाओं डूब जाऊँगा। तक कुछ भी न करना। सबेरे तक अपने-आप ठीक हो जायेगा।'

ऐसा ही हुआ। देखते-देखते बाबा ध्यान-मग्न हो गये। प्रातःकाल मुख-प्रक्षालनके पश्चात् अनुरागी बाबाने पूछा- 'बाबाका दर्द कैसा है?"

'कैसा दर्द ?'

'कल जो बिच्छूने काटा था?'

श्रीप्रियाशरण बाबाजी

'कहाँ ?'

'ऊँगलीमें' कहते हुए उँगलीका बन्धन खोला, तो बाबा बोले- 'हाँ, थोड़ी-सी टपकन तो है।'

सन् १९७४ वैशाख मासके कृष्णपक्षकी दशमीके दिन बाबाने नित्य-लीलामें प्रवेश किया।

प्रेम और भक्ति — जीवन-संदेश

ईश्वर-प्रेम की अनुभूति भक्त-साहित्य का एक महत्त्वपूर्ण विषय है। इन प्रसंगों को श्रद्धा, संवेदनशीलता और समर्पण के संदर्भ में पढ़ा जा सकता है।

कथा का सार

श्रीशचीनन्दनदास बाबा की कथा भक्ति, विनम्रता और साधना पर मनन करने का अवसर देती है। इस संग्रह में अन्य भक्तों के जीवन-प्रसंग भी पढ़ें।