ब्रज के भक्त भाग 3 · अध्याय 87
श्रीसन्तदास काठियाबाबा
श्रीसन्तदास काठियाबाबा की प्रेरक हिंदी कथा। जानिए उनके जीवन, भक्ति और साधना से जुड़े महत्वपूर्ण प्रसंग।

श्रीसन्तदास काठियाबाबा का यह भक्त-चरित्र ब्रज की साधना, श्रद्धा और जीवन से जुड़े प्रसंगों को सामने लाता है। नीचे कथा को अलग-अलग विषयों में व्यवस्थित किया गया है।
जन्म, परिवार और प्रारम्भिक जीवन
दो दिन बाद गुरुदेवके परलोक गमनका संवाद प्राप्त कर सन्तदासजी वृन्दावन पहुंचे। उन्होंने देखा कि काठियाबाबाके अदर्शनके कारण आश्रमकी गायें निरन्तर अधु बहा रही हैं और आश्रमके श्रीविग्रह श्रीराधिकाजीके कपोलोंसे भी टप टप गिर रहा है उनका नयन-जल ।
प्रथानुसार तेरहवें दिन बाबाका भण्डारा किया गया। उस दिन तक बराबर राधिकाजीके नेत्रोंसे अश्रुधार प्रवाहित होती रही और दोनों श्रीमूर्तियोंका मुख मलिन दीखता रहा। भण्डारेके पश्चात् राधाजीके अश्रु बन्द हुए और दोनों मूर्तियोंके मुखका मलिन भाव भी जाता रहा। कई दिन लगातार अश्रुधार बहते रहनेसे राधाजीके नेत्र कुछ विरूप हो गये। उन्हें बदलना पड़ा ।
[ वृन्दावन ]
सन् १९१५ का अगस्त मास था। कलकत्ता हाईकोर्टकी बार लायब्रेरीमें छोटे-बड़े सभी वकील उपस्थित हैं। आज ताराकिशोर बाबूकी बिदा है। ताराकिशोर रासबिहारी घोषके पश्चात् कलकत्ता हाईकोर्टके सबसे बड़े वकील हैं। रासबिहारी बाबू बहुत वृद्ध होनेके कारण अब प्रैक्टिस छोड़नेवाले हैं। उनके पश्चात् ताराकिशोर बाबूको ही कलकत्ता हाईकोर्टके सबसे बड़े वकीलका स्थान ग्रहण करना है। पर ताराकिशोर बाबूकी उधर दृष्टि बिलकुल नहीं है। धन-सम्पति, मान-सम्मान और भोग-विलासका अब उनके लिए मूल्य कुछ भी नहीं रहा है। वृन्दावन जाकर सदाके लिए श्रीगुरुदेवके चरणोंमें आत्मविसर्जन करनेके लिए वे दृढ़संकल्प हैं। मुखपर एक अपूर्व स्मितकी आभा लिये वे लायब्रेरीमें विद्यमान हैं। सहयोगी वकीलों द्वारा अभिवादन और आलिंगनका दौर चल रहा है।
सबके हृदयमें एक अपूर्व आलोड़न है। सबके नेत्र सजल हैं।
वकीलोंकी भीड़ चीरते हुए श्रीरासबिहारी घोष आये और नीचे झुककर ताराकिशोर बाबूकी चरण-धूलि लेनेको हुए। उसी समय ताराकिशोर बाबूने उनके हाथ पकड़ लिये और व्याकुल कण्ठसे वे बोले- 'यह क्या कर रहे हैं आप ? वयोवृद्ध और सर्वसम्मानित होते हुए भी...।'
'ना, ना, ताराकिशोर रोको नहीं, वयोवृद्ध होते हुए भी विवेक और बुद्धिमे में तुमसे बहुत छोटा है। सत्य-असत्य वस्तु अवस्तुका ज्ञान मुझे अभी तक नहीं है। तुम्हें है, तभी न तुम भावी जीवनकी उन सारी सम्भावनाओंको ठुकराकर, जिनसे मे अभी तक विपका हुआ हूँ, वृन्दावनकी ओर अग्रसर हो रहे हो।'
सन् १८५९ को १० जूनको ताराकिशोरने बंगालके श्रीहदट जिलेके वामै ग्राममें धर्मनिष्ठ जमींदार श्रीहरकिशोर चौधरीके पुत्ररूपमें जन्म लिया था। धनी घरानेके धार्मिक और आचारनिष्ठ परिवेशमें उनका लालन-पालन हुआ। क्रमश करने लगे। धीरे-धीरे कलकत्ता हाईकोर्टके वकीलोंकी प्रथम श्रेणीमें उन्होंने अपना एम.ए. पास कर अध्यापक बने। फिर कानूनकी परीक्षा पास की और वकालत विशिष्ट स्थान बना लिया।
पर, वे केवल वकीलोंमें ही अग्रगण्य नहीं थे। बँगालके सामाजिक जीवन, राजनीति, जनकल्याण-साधन, ब्रह्मसमाज-आन्दोलन, कुसंस्कार-विरोधी संग्राम आदि सभी क्षेत्रोंमें उनका स्थान सबसे आगेकी श्रेणीमें था।
इतना सब होते हुए भी उनमें संसारसे अपने-आपको पृथक् रखनेकी विलक्षण शक्ति थी। उनका भजन-साधन अबाध गतिसे चलता रहता था। भजन-साधन ही उनके जीवनका मुख्य अंग था। उनका वकालती पेशा और गार्हस्थ्य दोनों ही उनकी साधनाके आलोकसे उद्भासित थे। वकालतको भी वे भगवत्-सेवाका एक क्षेत्र मानते थे। झूठे मुकदमें कभी हाथमें नहीं लेते थे। जिन मुकदमोंको लेते थे, उनमें उनकी जीत प्रायः निश्चित होती थी। अकसर विपक्षके वकीलोंको अपने मुअक्किलोंसे कहते सुना जाता था- 'तुम्हारा केस तो जोरदार है, गवाह भी सब ठीक हैं, जीतना अवश्य चाहिये। पर उस ओर ताराकिशोर बाबू हैं और उनका आध्यात्मिक मनोबल। इसलिए निश्चित रूपसे कुछ नहीं कहा जा सकता।'
उनका घर जैसे बन्धु-बान्धवों और समाजकी सेवाका एक स्थायी केन्द्र था। कितने अनाथ और असहाय लोगोंके अन्धकारमय जीवनके वे आलोक थे। कितने भूखे-नंगे और समाज द्वारा अवहेलित लोगोंके वे एकमात्र आश्रय थे। उनकी कमाईका बहुत बड़ा भाग सेवा-कार्योंमें ही खर्च होता था। वे एक हाथसे कमाते थे, दूसरेसे खर्च करते थे। संचय करना तो जानते ही न थे।
वे योग-साधना करते थे। योग साधनामें उन्होंने असाधारण उन्नति की थी। इससे उन्हें जो शक्ति प्राप्त हुई थी, उसके सम्बन्धमें उन्होंने स्वयं लिखा है- 'उस शक्तिके माध्यमसे मैंने केवल अपने दृष्टिपातसे किसी-किसी रोगीको रोगमुक्त कर श्रीसन्तदास काठियाबावा
बहुत-से लोग दिया। किसी-किसी हिस्टीरियाके रोगीका रोग केवल मेरा दर्शन करनेसे जाता रहा। लोग तो मेरा स्पर्श कर भावाविष्ट हो गये, मूच्छित तक हो गये। परन्तु इस शक्तिसे आत्मज्ञान या ब्रह्मदर्शनका मार्ग उद्घाटित नहीं हुआ। मैंने जान लिया कि इस मार्गसे मेरी अभीष्ट सिद्धि न होगी। इसके लिए मुझे एक यथार्थ बड़ा गुरुको खोज करनी होगी। इसलिए सद्गुरु प्राप्त करनेकी चिंतासे मैं व्याकुल हो उठा।'
ताराकिशोर नित्य गंगा स्नान करने जाया करते। गंगा-तटपर बैठकर बहुत देर तक ध्यान-जपादि किया करते। उस दिन गंगाको सम्बोधन कर वे बडे दुःखसे बार-बार कहने लगे 'त्रितापनाशिनी, कलुषहारिणी माँ। क्या मैं इतना बड़ा पापी हूँ कि तुम्हारी त्रिलोक-पावनी धारा भी मुझे शुद्ध करनेमें असमर्थ हैं ?"
उसी समय दृष्टिके सामने आया एक अलौकिक दृश्य। उसके सम्बन्धमें उन्होंने इस प्रकार लिखा है- 'मेरे समक्ष प्रकाशित हुआ मूल गङ्गोत्रीका वह गोमुखी स्थान, जहाँसे गङ्गा निकली हैं। उस स्थानमें मैंने बैठे देखा श्रीउमा और महेश्वरको । में विस्मयपूर्वक उन्हें देखता रहा। महेश्वर देवने मुझे एक एकाक्षरी बीजमन्त्र प्रदान
गुरु-सान्निध्य और आध्यात्मिक शिक्षा
किया और कहा- 'इस मन्त्रके जपसे तुम्हें यथार्थ सद्गुरुकी प्राप्ति होगी।'
ताराकिशोर बाबू उस मन्त्रका जप करते रहे। तीन वर्षके भीतर उन्हें सद्गुरु की प्राप्ति हुई। एक दिन आषाढ़ मासकी रात्रिमें साधन-भजन कर चुकनेके पश्चात् वे छतपर सो रहे थे। हठात् नींद उचट गयी। वे शैय्यापर उठकर बैठ गये। सामने देखा कि आकाश मार्गसे श्रीरामदास काठियाबाबाकी ज्योतिर्मय मूर्ति धीरे-धीरे उनकी ओर अग्रसर हो रही है। उनके सामने आकर बाबाने उनके प्रति स्नेह-भरे आश्वास-वचन कहे और उनके कानमें एक मन्त्र प्रदान कर आकाश पथसे कहीं चले गये।
ताराकिशोर बाबू इसके पूर्व कई बार वृन्दावन जाकर काठियाबाबाके दर्शन कर चुके थे, पर उनके मनमें उनके सम्बन्धमें नाना प्रकारके संदेह बने हुए थे। इस बार उनके अन्तर्धानके पश्चात् उन्होंने अनुभव किया कि उनका प्रदत्त दीक्षा-बीज उनके अन्तरके प्रत्येक स्तरमें अनुप्रविष्ट हो गया है और उनके सम्बन्धमें सारे सन्देह विनष्ट हो गये हैं।
श्रावण मासमें वे वृन्दावन गये। उन्होंने और उनकी पत्नी अनुष्ठानिक रीतिसे उनसे प्राप्त किया वही मन्त्र, जो उन्होंने अलौकिक रीतिसे उन्हें दिया था।
इसके पश्चात् कलकत्तेमें रहते हुए भी वृन्दावनवासी गुरुदेवकी कृपा उनके ऊपर समय-समयपर अलौकिक रीतिसे बरसरकर उन्हें भजन-साधनके
विषय सतर्क करती रही और नाना प्रकार की विपदाओंसे उनकी रक्षा करती
रहो। गुरुदेवने उन्हें शेषरात्रिमे जागकर भजन करनेके आज्ञा दी थी। एक बार वे शेषरात्रिमें पड़े सो रहे थे। गुरुदेव सूक्ष्म देहसे उनके पास पहुंचे और धीरेसे टूट मारकर उन्हें जगा दिया। तबसे फिर उन्होंने प्रातः कालीन भजनमें आलस्य नहीं
किया। तुलाराम नामका ताराकिशोरका नौकर एक दिन धूप-दीपकी व्यवस्था करने पूजा-परमें गया। हठात् हांफता-हांफता बाहर आया और उनकी पत्नीसे कहा- 'मौजी, देखिये मैं जब धूप जलाने जा रहा था, गुरुदेवकी फोटो जैसी छीनकर भाग गया। जाते समय रोषमें भरकर कहता गया- 'क्यों र, तुम लोग आकृतिका एक जटाजूटधारी बाबा न जाने कहाँसे आया और मेरे हाथसे धूपदानी नित्य मेरी फोटोके सामने आरती नहीं करते ?
बहुत चेष्टा करनेपर भी उस साधुका कहीं पता न लगा। धूपदानी पानीको टंकीके एक कोनेमें पड़ी मिली। तबसे ताराकिशोर बाबूके घर नियमित रूपसे गुरुदेवकी फोटोके सामने सन्ध्या समय आरती और स्तवगान होने लगा।
ताराकिशोर बाबू श्रीहट्ट-अञ्चलमें भ्रमण करते समय हाथीपर बैठे कच्चे रास्तेसे ससुराल जा रहे थे। हाथी ने एकदमसे दौड़ लगायी। सामने एक वृक्षकी डाल इस प्रकार झुक रही थी कि एक क्षणमें उससे टकराकर वे चकनाचूर हो जाते। पर, न जाने कैसे हाथी महावत समेत उस डालको पार कर गया और किसीकी कोई क्षति न हुई। थोड़े दिन बाद ताराकिशोर बाबू वृन्दावन गये। सन्ध्या समय गुरुदेवके निकट चुपचाप बैठे थे। एकाएक वे बोल पड़े- 'पेड़की डाल तुम्हारा क्या करती ? भगवान् जो हर समय तुम्हारे साथ रहकर तुम्हारी रक्षा करते हैं।'
एक दिन रातमें शयनघरमें प्रवेश करते ही ताराकिशोरने देखा कि श्रीकृष्णकी दिव्य ज्योतिर्मण्डित मूर्ति उनके सामने दण्डायमान है। उनकी मधुर हँसीके स्वर्गीय आलोकसे सारा घर उद्भाषित है। ताराकिशोरके हृदयमें एक अनिर्वचनीय आनन्दका स्रोत बह निकला। सारा जगत् आनन्दमय प्रतीत होने लगा। अश्रुपूर्ण नेत्रोंसे उन्होंने साष्टांग दण्डवत् किया। उठे तो देखा कि वे अन्तर्धान हो गये हैं।
दूसरी बार जब वे वृन्दावन गये तो इस अप्राकृत दर्शनकी बात काठियाबाबासे कही। उन्होंने शिष्यको सतर्क करते हुए कहा- 'यह दर्शन बड़े भाग्यसे मिलता है। परन्तु यह दर्शन छाया दर्शन है। इसके पीछे और भी दर्शन हैं।'
गुरुदेवके अप्रकट्यके पश्चात् ताराकिशोरका मन सब छोड-छाड़कर स्थायी से वृन्दावनमें बास करनेके लिए छटपटाने लगा। उन्होंने निश्चय किया कि वे काल वैष्णवके रूपमें गुरुदेवके आश्रममें रहेंगे और आश्रमके ठाकुर राधाबिहारी के लिए भिक्षान्त्र संग्रह कर उनकी सेवामें आत्मनियोग करेंगे।
उस दिन जब वे सदाके लिए हाईकोर्टसे विदा होकर घरपर आये तो उनके सामने एक समस्या थी जो लोग उनके सहारे जीवन-यापन करते हैं. वे उनके क्यावन चले जानेके पश्चात् क्या करेंगे? उन्हें देनेके लिए तो उनके पास विशेष यथा नहीं। उन्होंने तुरन्त कुछ हल सोच लिया। घरमें जितना भी कीमती सामान था. सब बेचकर थोड़ा-थोडा रुपया सबको दे दिया। जो सामान बचा वह भी उनमें कुछ था बाँट दिया।
अब उनके पास वृन्दावनके लिए टिकट खरीदनेको भी पैसे न रहे। एक अन्तरङ्ग बन्धुने टिकट खरीद दिये। पत्नी सहित वे वृन्दावन जा पहुँचे। वृन्दावन पवकर ताराकिशोर बाबू अब ताराकिशोर बाबू न रहे। गुरुआश्रममें वे एक सधारण आश्रमिककी तरह रहने लगे। सारा दिन एकनिष्ठ हो साधन-भजन करते। साथ-साथ करते राधाबिहारीकी नियमित सेवा। उनकी रसोई बनाना, बरतन माँजना, देवा-पूजा और शृङ्गारादि सब कुछ अपने हाथसे करते। अधिकतर मौन अवलम्बन कर रहते। प्रायः सारी रात ध्यान और जपमें व्यतीत करते। शेषरात्रिमें थोड़ा विश्राम करते। अन्तर्जीवनकी इस फेर-बदलके परिणामस्वरूप उनके चेहरेमें भी इतना झीवर्तन हो गया कि उन्हें पहचानना मुश्किल हो गया। इसी समय उनके पूर्व परंचित एक सज्जन वृन्दावन आये।
व्रजभूमि और तीर्थ से जुड़ी घटनाएँ
निम्बार्क आश्रममें जाकर उन्हींसे पूछने हो- 'कलकत्तेके ताराकिशोर चौधरी संसार त्यागकर यहाँ आये हैं। वे किधर ले言?”
उदासीन भावसे और सहज कण्ठसे उन्होंने उत्तर दिया- 'मॅशाय, तिनि तो नरा गिये छेन'। (महाशय, वे तो मर चुके हैं।) सचमुच पूर्व जीवनके ताराकिशोर बबूका अब कुछ भी तो अवशिष्ट नहीं रहा था। उनकी स्मृति तकको वे पूर्णरूपसे भुला चुके थे।
वृन्दावनके व्रजविदेही महन्त श्रीविष्णुदासजी उस समय महन्त पदको त्यागना चाहते थे। वैष्णव साधु-समाजको उनकी जगह किसी उपयुक्त साधुकी खोज थी। सबने स्थिर किया कि ताराकिशोरजी ही सब प्रकारसे इसके उपयुक्त हैं, यदि वे वैराग्य-आश्रम ग्रहणकर लें। पर, ताराकिशोर इस गुरुतर दायित्वको ग्रहण करनेको। उनके भक
तैयार थे।उने निश्चय कर लिया था कि झूलन पूर्णिमाके दूसरे दिन इथ इसको लेकर जो सभा होनेको थी उसमें वे इसका डटकर विरोध करेंगे।
पर पूर्णिमाको रात्रिको जब ताराकिशोर ध्यानमें बैठे थे, हठात् उनके सामने विदे काठियाबाबाकी मूर्ति उद्भासित हो उठी। उन्होंने कहा- 'बेटा, जो कुछ कर्तव्य कर्म तुम करोगे, यह न समझना कि उसे तुम कर रहे हो। तुम्हार सारे कचोंका भार मेरे ऊपर है। यही सार है। इसे न भूलना।'
गुरु महाराजका इंगित प्राप्तकर उन्होंने महन्ताईके प्रस्तावका विरोध करनेका ग्रहकर उन्होंने इस पदको सुशोभित किया। वैराग्यआश्रमका नाम हुआ विचार त्याग दिया। सर्वसम्मत्तिसे वे इस पदके लिए चुन लिये गये। वैराग्य-आश्रम श्रीसन्तदास।
हरिद्वारके कुम्भ मेलेके दो मास पूर्व वृन्दावनमें एक अर्धकुम्भ मेला होता है। भारतके विभिन्न स्थानोंसे सहस्र-सहस्र वैष्णव-साधु पवित्र यमुनापुलिनपर डेरा डालते है। इस बार मेलेमें पञ्चकोसी परिक्रमाके दिन सन्तदास बाबाजी महाराज बड़ी विपदमें पड़ गये। वैष्णव साधु-महन्त आज अपने नेता श्रीसन्तदास बाबाजीको साडम्बर हाथोंपर बैठाकर आगे-आगे परिक्रमापर ले जायेंगे। सुन्दर हस्ती, उसपर कौमखाबमण्डित सुन्दर हौदा और छत्रादि लेकर सब उपस्थित।
अब सबके आग्रहकी अवहेलना कैसे करें ? पर, उन्होंने इसकी तनिक भी चिंता न की। इष्टदेव राधाबिहारीजी जिस धाममें साक्षात विराजमान है, उसमें हाथीकी पौठपर सवार होकर परिक्रमा करनेके लिए वे राजी न हुए। उस दिनको यात्रा पैदल ही की गयी। अन्यान्य वैष्णव महन्तोंको भी हस्तीपृष्ठ त्यागकर पैदल परिक्रमा करनी पड़ी।
सन्तदास बाबाजी महाराज द्वारा परिचालित निम्बार्क-आश्रमकी मर्यादा भी धीरे-धीरे बहुत बढ़ गयी। नया आश्रम तो उनके प्रयाससे पहले ही बनकर तैयार हो चुका था। अतिथि और साधु-संन्यासियोंकी भीड़ वहाँ लगी ही रहती। उनके भोजनादिकी व्यवस्था वे उदारतापूर्वक एकनिष्ठताके साथ सदा करते रहते। आश्रमकी कोई स्थायी आमदनी तो थी नहीं। जब जैसी साधु-वैष्णव-सेवाको आवश्यकता होती, तब उसके अनुरूप धन राधा-बिहारी-जीको कृपासे अपने-आप आ जाता। पर, कभी-कभी काम इतना बढ़ जाता कि आश्रमवासियोंको उत्साहित करनेके लिए बाबाको स्वयं ठाकुर-सेवासे लेकर बर्तन माँजने तक का। भक्त श्रीभोलानाथजी (भोरीसखी)
अपने-आप करना पड़ता। आश्रमवासियोंमें जब साधु-सेवाके प्रति कुछ विरक्ति मिलता है। भगवत-सेवा और साधु-सेवासे चित्त निर्मल होता है, भजन-साधनका देखते तो वे उन्हें समझाकर कहते- 'भाई। बडे भाग्यसे साधु-सेवाका सुयोग अधिकार प्राप्त होता है। सेवानिष्ठा छोड भजनमें बैठनेसे चित्त एकाग्र नहीं होता।'
सन्तदास बाबाका देश-विदेश भ्रमणकर लोगोंको उपदेश करने और उन्हें दीक्षितकर सत्-पथपर आरूढ करनेका अभियान भी अब तीव गतिसे चलने लगा। उस बार शिष्यों और भक्तोंके अनुरोधसे वे गौहाटी गये। स्थानीय हरिसभामें उनसे भारतके सर्वद्रष्टा ऋषियोंकी महिमाके सम्बन्धमें कुछ कहनेका अनुरोध किया गया। उन्होंने अनुरोध मान लिया। नेत्र बन्दकर भावतन्मय अवस्थामें कुछ कहनेका प्रयास किया, पर ऋषियोंका स्मरणकर महापुरुष अबोध बालकके समान बराबर कुन्दन ही करते रहे। उनके मुखसे एक शब्द भी न निकला। श्रोता एक स्वरसे कहने सगे- 'आपको अब और कुछ कहनेकी आवश्यकता नहीं। आपके अनुओंने जितना कुछ कहा है, शब्दोंकी सामर्थ्य कहाँ जो वह कह सकें।'
शेष बार सन्तदासजी कलकत्ते गये। उनके पुराने घनिष्ट मित्र श्रीव्रजलाल शास्त्री उन्हें देखने आये। उन्होंने उनसे कहा- 'मैं जिस दिन संसार छोड़कर वृन्दावन जा रहा था, उस दिन मेरी सहायताकर तुमने प्रकृत बन्धुका कार्य किया था। आज भी उसी प्रकार कृपाकर मुझे वृन्दावनकी गाड़ीपर चढ़ा दो। मेरा शरीर अब नहीं रहेगा। गुरुदेवके आश्रमके प्रति मुझे अभूतपूर्व आकर्षण हो रहा है।'
सन् १९३६, कार्तिक मासकी सप्तमीका दिन- सन्तदास बाबा शिष्यमण्डली सहित वृन्दावन जानेके लिए गाड़ीमें सवार हुए। गाड़ी वृन्दावनके निकट पहुँचे, उसके पूर्व ही वे नित्यधाम वृन्दावन पहुँच गये। उनका पार्थिव शरीर रह गया वृन्दावनके अगणित भक्तोंको दर्शन देनेके लिए। यमुनाजीके युगल घाटपर. महासमारोहके साथ उसका अग्निसंस्कार सम्पन्न हुआ।
गुरु और साधना — जीवन-संदेश
गुरु के प्रति श्रद्धा और साधना में निरंतरता भक्ति-परंपरा के प्रमुख विषय हैं। इस चरित्र को पढ़ते समय यह देखना उपयोगी है कि सीख और आचरण किस तरह एक-दूसरे से जुड़ते हैं।
कथा का सार
श्रीसन्तदास काठियाबाबा की कथा भक्ति, विनम्रता और साधना पर मनन करने का अवसर देती है। इस संग्रह में अन्य भक्तों के जीवन-प्रसंग भी पढ़ें।