ब्रज के भक्त भाग 3 · अध्याय 77

श्रीरामकृष्णदास बाबाजी

श्रीरामकृष्णदास बाबाजी की प्रेरक हिंदी कथा। जानिए उनके जीवन, भक्ति और साधना से जुड़े महत्वपूर्ण प्रसंग।

श्रीरामकृष्णदास बाबाजी
श्रीरामकृष्णदास बाबाजी — ब्रज के भक्त भाग 3

श्रीरामकृष्णदास बाबाजी का यह भक्त-चरित्र ब्रज की साधना, श्रद्धा और जीवन से जुड़े प्रसंगों को सामने लाता है। नीचे कथा को अलग-अलग विषयों में व्यवस्थित किया गया है।

जन्म, परिवार और प्रारम्भिक जीवन

[ मघेरा ]

"आपकी जानकारीमें क्या कोई सिद्ध महात्मा व्रजमें आजकल है ?" मैने राल ग्रामके श्रीविश्वरूपदास बाबाजीसे पूछा।

'हैं', उन्होंने उत्तर दिया।

"कौन है वे ?"

"कौन हैं बताऊँ, तो आप कहेंगे, दर्शन कराइये। दर्शन कराना मुश्किल है। वे हर समय भजनमें लीन रहते हैं। कोई नया व्यक्ति उनके पास पहुँच जाय, तो उससे दो बातें करनी होती हैं। इससे उनके भजनमें विघ्न होता है। एक और बात यह है कि उनके दैन्यकी सीमा नहीं है। वे सिद्ध होते हुए भी अपनेको अति तुच्छ और पतित मानते हैं। कोई उनके दर्शन करने जाता है तो सोचते हैं यह मुझे महात्मा मानता है, तभी न मेरे दर्शन करने आया है। इससे उन्हें आन्तरिक कष्ट होता है।"

"तो क्या कोई उपाय नहीं है उनके दर्शन करनेका ?"

विश्वरूपदास बाबा चुप रहे। थोड़ी देरमें बोले- "आप एक काम कीजिये। अपनी लिखी 'चरित-सुधा' की एक प्रति मुझे दीजिये। मैं उसे बाबाके सेवकको दूँगा। वह उन्हें पढ़कर सुनायेगा। उसे सुन शायद उनकी कृपा आपपर हो जाय, क्योंकि जिनका वह चरित्र है, बाबा उन्हींके प्रशिष्य हैं।

'चरित-सुधा' बँगला भाषामें छः खण्डोंमें प्रकाशित श्रीधामपुरीके श्रीश्रीराधारमणचरणदास बाबा (बड़े बाबा) का एक विलक्षण चरित-ग्रन्थ है। मैं उससे विशेष रूपसे प्रभावित था, इसलिये मैने उसका हिन्दी अनुवाद किया था। उसकी एक प्रति मैने बाबाको दे दी।

तीन महीने बाद विश्वरूपदास बाबाने मुझसे कहा- "चरित-सुधा' आदिसे अन्त तक बाबाने बड़े प्रेमसे सुनी। सुनकर बहुत प्रसन्न हुए। आपके बारेमें दो-एक बातें भी पूछीं। अब मैं किसी दिन आपको उनके पास ले चलूँगा।"

बाबा छटीकरासे चार-पाँच मील बाई ओर आगे जाकर एक छोटे-से ग्राम मघेरामें रहते थे। उनका नाम था श्रीरामकृष्णदास, पर वे सूरदास बाबाके नामसे जाने जाते थे। क्योंकि वे अंधे थे। लोग कहते हैं कि वे राधा-कृष्णकी यादमें रोते-रोते अपनी दृष्टि-शक्ति खो बैठे थे।

विश्वरूपदास बाबा मुझे उनके पास ले गये। मैने देखा कि निर्जन स्थानमें एक छोटी-सी कुटियामें दरवाजेके निकट कृशकाय बाबा ध्यानमग्न बैठे नाम-जप कर रहे हैं। उनका मुखारविन्द एक दिव्य आभासे दीप्तिमान है, नेत्रोंसे अश्रुधार बह रही है। उन्हें देखते ही मेरे नेत्र भी डबडबा आये। शरीरमें सिहरन छोड़ गयी। मैं और विश्वरूप बाबा उन्हें दण्डवत् कर उनके सम्मुख बरामदेमें चुपचाप बैठ गये। थोड़ी देर बाद विश्वरूप बाबाने बनावटी खाँसीका शब्द किया। पर, बाबा वैसे ही बाह्यज्ञान शून्य अवस्थामें निश्चेष्ट बैठे रहे। थोड़ा और समय बीतनेपर बाबाने एक लम्बी साँस खींचा। यह देख विश्वरूप बाबाने उच्च स्वरसे कहा- 'जय निताई !'

आवाज पहचानकर बाबाने कहा- 'विश्वरूप ?'

"हाँ बाबा, ये कपूरजी आये हैं" विश्वरूप बाबाने कुछ काँपते हुए स्वरमें कहा।

सुनते ही बाबाने ऐसी चीख मारी जैसे उनके मर्मस्थलपर किसीने आघात किया है। थोड़ी देरमें असह्य वेदनाके स्वरमें बोले- "हाय! मुझ कीटके दर्शन करने ये इतनी दूरसे आये हैं। विश्वरूप, तुमने अवश्य मेरे सम्बन्धमें इनसे कुछ कहा होगा। मैं क्या दर्शन करने योग्य हूँ ? मोरीका कीड़ा भी मुझसे अच्छा है। वह जैसा है, वैसा है, अपने कपट-व्यवहारसे किसीको धोखा तो नहीं देता। मैं दिन-रात भजनका नाटककर लोगोंको धोखा देता रहता हूँ, अपने-आपको धोखा देता रहता हूँ और जिसका भजन करता हूँ, उसे धोखा देता रहता हूँ। न जाने मेरी क्या गति होगी।

बाबा देर तक इस प्रकारकी दैन्योक्ति करते रहे। वे कहते जा रहे थे और लगता था कि जैसे उनका हृदय फटा जा रहा है। उनकी दैन्योक्ति सुन मेरा भी हृदय फटने लगा। तब भावमें परिवर्तन लानेके लिए मैंने कहा- "बाबा, मैं श्रीश्रीगौरांगदास बाबाजी महाराजका कुछ प्रसाद लाया हूँ।"

गौरांगदास बाबाजीका चरित्र हम पहले लिख चुके हैं। वे बाबाके बड़े गुरु-भाई थे। उनके प्रति उनकी अपार श्रद्धा थी। उनके प्रसादकी बात सुनते ही उनका मुखारविन्द खिल गया। बड़े प्रेमसे उन्होंने प्रसाद ग्रहण किया। उसे माथेसे लगाकर कणिका तुरन्त मुखमें दे लिया। उसके बाद वे प्रसन्न मुद्रामें देर तक श्रीगौरांगदास बाबाजीका गुण-गान करते रहे। मेरे प्रति भी उनका प्रसाद लानेके लिए और उनकी स्मृति हृदयमें जगा देनेके लिए बार-बार आभार प्रकट किया।

उस दिन इतने सत्संगके बाद मैं बाबाको दण्डवत् प्रणाम कर लौट आया। विश्वरूप बाबाने कहा - "बाबा आपसे प्रसन्न हैं। अब आपका रास्ता खुल गया। आप जब चाहें उनके दर्शन कर सकते हैं।" मैं यदा-कदा उनके पास जाता रहा। उनका स्नेह मेरे प्रति बढ़ता गया, यहाँ तक कि अपने भजनकी गोपनीय बातें भी वे मुझसे कहने लगे।

बाबाका जन्म सन् १९११ में पूर्व बँगालके जैसोर (जशोहर) के निकट किसी ग्राममें एक भक्त परिवारमें हुआ था। माता-पिता निताईगौरके उपासक थे। बचपनमें ही उनके भक्तिभावका प्रभाव बाबापर पड़ा। उन्हें अपना लक्ष्य निर्धारित करनेमें देर न लगी और वे तीरकी तरह उसकी ओर छूट पड़े। इण्टरकी परीक्षा पास करनेके पश्चात् ही उन्होंने घर छोड़ दिया। कलकत्ता जाकर पाटबाड़ीके प्रसिद्ध संत श्रीरामदास बाबाजी महाराजसे दीक्षा ली और उनके आश्रममें रहकर उनकी सेवा करने लगे। कुछ दिन बाद उनकी आज्ञासे संस्कृत पढ़नेके लिए काशी चले गये। वहाँ श्रीहरिनामामृत व्याकरण, व्याकरण कौमुदी, श्रीमद्भागवत, भक्ति रासामृत-सिन्धु, उज्ज्वल नीलमणि, षट्सन्दर्भ आदि अनेक भक्ति-ग्रन्थोंका अध्ययन किया। अध्ययन समाप्त कर वृन्दावन पहुँचे।

अपने ज्येष्ठ गुरुभाई गोविन्दकुण्डके श्रीमद्दाबा रजनीदासजीसे संन्यास वेष ग्रहण किया और मघेरा ग्राममें जाकर पं० खूबीरामजीकी बगीचीमें एक कुटियामें एकान्त-वास करते हुए भजन-साधनमें जुट गये।

भजन-साधना और नाम-स्मरण के प्रसंग

पिछले कुछ वर्षोंमें जो उनकी दिनचर्या मैने देखी, वह इस प्रकार थी। वे प्रातः ३.३० बजे शैय्या त्यागकर हाथ-मुँह धोकर खड़े-खड़े प्रभाती कीर्तन करते। उनके

प्रभाती-कीर्तनकी आवाज दूर-दूरतक गाँवमें सुनायी पड़ता। कीर्तन करते-करते कभी 'हा निताई!' कह ऐसी हुँकार भरते कि आकाश गूँज जाता और वे पछाड़ खाकर पृथ्वीपर गिर पड़ते। कीर्तनके पश्चात् जप करने बैठ जाते। तत्पश्चात शौच-स्नानादिसे निवृत हो गिरधारीकी सेवा करते। सैकड़ों बार न जाने किस-किसका ध्यान कर भूमिष्ट हो प्रणाम करते। फिर जपके साथ मानसिक स्मरण करते। यह सब करते-करते मध्याह्न हो जाता। मध्याह्न-कीर्तन कर मधुकरीके लिए निकल जाते। तीन-चार घरोंसे ही जो मिल जाता, गिरधारीका भोग लगाकर उसे पा लेते। कभी ऐसा भी होता कि मधुकरी न मिलती तो उपवासी ही रह जाते। पर तीन-चार घरोंसे अधिक मधुकरी माँगने न जाते। उनके पास इतना समय ही कहाँ था जो मधुकरी माँगनेमें लगाते ?

भोजनके तुरन्त बाद वे फिर भजनमें बैठ जाते और सूर्यास्ततक बैठे रहते। संध्या समय स्नानादि कर आरती-कीर्तनके लिए प्रस्तुत होते। कीर्तनके पूर्व कुछ देर समुद्रकी-सी शान्त और गम्भीर मुद्रामें कुटियाके दरवाजेके सहारे खड़े रहते। इसके पश्चात् भावाविष्ट अवस्थामें तुलसी-परिक्रमा करते हुए आरती-कीर्तन करते। कीर्तनके पश्चात् गिरधारीकी सेवा कर उन्हें शयन

कराते। स्वयं रोटीका चौथाई टुकड़ा खाकर जल पी लेते। रात १० बजे अभिसार-कीर्तनके पश्चात् भजनमें बैठ जाते जो लगभग २.३० बजेतक चलता रहता। उसके पश्चात् केवल एक घण्टा विश्रामकर ३.३० बजे उठ बैठते।

इस प्रकार बाबाका भजन लगभग चौबीसों घण्टे अबाधगतिसे चलता रहता। सोते वे नाममात्रको ही। साधारणरूपसे पाँच-छः घण्टेकी नींद मनुष्यके स्वास्थ्यके लिए अत्यन्त आवश्यक है। पर साधकका भजनमें आवेश जितना बढ़ता जाता है, उतना ही उसका देहाध्यास घटना जाता है और अन्तमें वह निद्रादिपर पूर्ण विजय प्राप्त कर लेता है। वास्तवमें सिद्धपुरुष न सोते, न जागते हैं, क्योंकि वे भौतिक जगत् और उसके नियमोंसे ऊपर उठे होते हैं।

कृच्छ साधनामय बाबाका जीवन इस बातका प्रमाण था कि उनका देहाभिनिवेश बिलकुल जाता रहा था। यदि उनका देहमें थोड़ा भी अभिनिवेश होता तो जिस प्रकारका कठोर तपस्यामय जीवन उन्होंने व्यतीत किया वह असम्भव होता। निद्रापर तो उन्होंने विजय प्राप्त की ही, आलस्य भी उन्हें छूकर नहीं गया। उनका एक क्षण भी भजन बिना नहीं बीतता था। यदि कभी आलस्य आता भी तो उसे दूर करनेका उनके पास एक अच्छा उपाय था। वे कुटियाके पास थालेमें लगी तुलसीकी की प्ररिक्रमा करते हुए या उसके पास खड़े रहकर भजन करने लगते।

हरिप्रिया तुलसीके सान्निध्य मात्रसे उनका भजनमें इतना अभिनिवेश हो जाता कि वे घण्टों उसी अवस्थामें खड़े-खड़े अश्रू विसर्जन करते रहते और बीच-बीचमें भावाविष्ट हो चीख पड़ते।

जिस अवस्थामें बाबा कुटियामें रहते. उसे देखकर भी लगता कि उनका देह-दैहिककादिकी ओर तनिक भी ध्यान नहीं है। कुटिया इतनी छोटी थी कि उसमें एक आदमी टाँग फैलाकर सो भर सकता। कुटियाके चारों ओर इतनी नीची जमीन थी कि बरसातके दिनोंमें उसमें कमरतक पानी भर जाता। मच्छरोंका प्रकोप इतना बढ़ जाता कि वहाँ थोडी देर बैठना भी मुश्किल हो जाता। पर, बाबा उस अवस्थामें भी उस कुटियामें ही रहकर भजन करते रहते। भक्तोंके आग्रह करनेपर भी अन्यत्र जानेको तैयार न होते। वरन् इस अवस्थाको वे अपने भजनके लिए और भी अनुकूल मानते, क्योंकि ऐसी अवस्थामें किसीका उनके निकट जाकर उनके भजनमें विघ्न डालना सम्भव न होता। केवल प्राणगौरांगदास बाबा उनके निकट एक दूसरी कुटियामें रहकर उनकी सेवा किया करते।

इस कुटियामें भजन करते-करते बाबा अन्धे हो गये। इसे भी उन्होंने अपने भजनके अनुकूल माना और प्रभुकी अपने ऊपर विशेष कृपा समझा। वे नहीं चाहते थे कि वे प्रभुको छोड़कर और किसीको देखें। जिन चक्षुओंसे प्रभुको देखा जाता है, वे तो उनके पास थे ही, दूसरे चक्षुओंकी उन्हें आवश्यकता ही क्या थी ? उन चक्षुओंसे वे प्रभुको देखते थे और उनसे बातें करते थे, ऐसा कई बार देखनेमें आया। एक बार अन्धे होनेके बाद वे वृन्दावनमें गोविन्ददेवके मन्दिरमें गोविन्ददेवके दर्शन करने गये। उस समय श्रीमदनमोहनदास बाबा उनकी सेवामें थे। वे उन्हें ले गये। गोविन्ददेवके मन्दिरके प्रांगणमें पहुँचते ही गोविन्ददेवको देख 'हा गोविन्द !' कह मूच्छित हो वे पृथ्वीपर गिर पड़े।

बाह्य दृष्टि खो देनेके बाद ही बाबाको मघेरेमें निताई-गौर और राधागोविन्दके प्रथम दर्शन हुए थे।

बाबाका जब देह-दैहिकादिसे सम्बन्ध नहीं था तो उनका वैराग्य भी उसके अनुरूप होना स्वाभाविक था। उनकी सम्पत्तिमें करुआ, कौपीन, बहिर्वास और गुदड़ीके सिवा और कुछ नहीं था। पैसा वे हाथसे स्पर्श भी नहीं करते थे। अपने सेवकको भी नहीं स्पर्श करने देते थे। भगवत्सेवाके लिए या शरीर-रक्षाके लिए यदि किसी वस्तुकी आवश्यकता होती थी तो वह भी हर किसीसे ग्रहण नहीं करते थे। व्रजके बाहरकी किसी वस्तुको ग्रहण करनेका तो कोई प्रश्न ही नहीं था। यदि बाहरकी कोई वस्तु या व्रजके बाहर रहनेवाले किसी व्यक्तिके पैसेसे खरीदी गयी वस्तु उनकी सेवामें पहुँच जाती थी, तो उन्हें इसका आभास हो जाता था। एक बार

जब बाबा अस्वस्थ हो गये, उन्हें वृन्दावनमें उनके गुरु-आश्रम गोविन्द‌कुण्ड ले जाया गया। बाबा अपने वैराग्यके कारण कृशकाय तो सदासे थे ही, उस समय उनका शरीर अस्थियोंका पिंजरमात्र हो गया था। उनके विशेष कृपापात्र वृन्दावनके कुछ भक्तोंने उनसे आग्रह किया कि वे कम-से-कम जब तक स्वस्थ न हो लें, केवल मधुकरीके टुकड़ोंपर न रहकर थोड़ा दूध भी ले लिया करें। बड़ी मुश्किलसे बाबाने इसे स्वीकार किया। भक्तोंने उसकी व्यवस्था कर दी। कुछ दिन वे दूध लेते रहे। उसी समय आये कलकत्तेके श्रीहरिराम सिंघानिया, जो बहुत दिनोंसे बाबाकी कुछ सेवा करनेकी चेष्टा कर रहे थे। उन्होंने भक्तोंसे आग्रह किया कि दूधकी सेवा उनकी ओरसे कर दी जाय। सिंघानियाजी बड़े भजनशील व्यक्ति थे। बाबाके प्रति उनका विशेष भक्तिभाव था।

जीवन के अंतिम प्रसंग और स्मृतियाँ

भक्तगण उनका आग्रह न टाल सके। बाबाके लिए दूध उनके पैसेसे आना आरम्भ हुआ। बाबासे इसके सम्बन्धमें किसीने कुछ नहीं कहा, पर दूसरे ही दिन वे बोले मदनमोहन बाबासे- "मैं यहाँ नहीं रहूँगा। मुझे मघेरा ले चलो।"

मदनमोहन बाबाने कहा - "बाबा ! यहाँ आपकी चिकित्सा ठीकसे हो रही है, स्वास्थ्य कुछ सुधर रहा है। कुछ दिन और यहाँ रहें। पूर्ण स्वस्थ हो जानेपर ही मघेरा जायें।"

"नहीं, नहीं, यहाँ परापेक्षा है। मैं यहाँ नहीं रहूँगा। इसी समय ताँगा लाओ और मुझे ले चलो।” बाबाने दृढ़तासे ऊँचे स्वरमें कहा।

उसी समय ताँगा लाकर मदनमोहन बाबाको उन्हें मघेरा पहुँचाना पड़ा।

बाबा अपने दैनिक कार्यक्रम और भजनके नियमोंका दृढ़तासे पालन करते। पर, कभी-कभी भावमें इतना डूब जाते कि सारे नियम रखे रह जाते। उस समय जैसे वे इस लोकमें ही न होते। घण्टों संज्ञाहीन अवस्थामें पृथ्वीपर पड़े रहते। अश्रु, कम्प, पुलकादि भाव उनके सारे शरीरमें छाये होते।

एक बार घटी एक विचित्र घटना। श्रीश्रीमद् राधारमण चरणदास देव (बड़े बाबा) की तिरोभाव तिथि थी। श्रीगौरांगदास बाबाजी और श्रीरजनीदास बाबाजीने उस उपलक्ष्यमें वृन्दावनमें महाप्रभुके मन्दिरमें नवरात्रि-कीर्तनका आयोजन किया था। रामकृष्णदास बाबा भी उसमें सम्मिलित होने वृन्दावन गये। एक दिन संध्या समय जब उद्दाम नृत्य-कीर्तन हो रहा था और बाबा भी उद्दाम-नृत्य कर रहे थे, नृत्य करते-करते वे एकाएक अदृश्य हो गये। किसीने न जाना कि वे कहाँ चले एये। दूसरे दिन सुबह नौ बजे यमुना-तटपर अर्धचेतन अवस्थामें पड़े मिले।

राल ग्रामके किसान इण्टर कॉलेजके प्रवक्ता श्रीशिवचरण वाष्र्णेय उन्हें राल ले गये मार्च १९८२ में बाबा कुछ अधिक अस्वस्थ हो गये। उनके विशेष कृपापात्र और वहाँ 'बसन्तीकी बगीची' में एक कुटियामें उन्हें ठहरा दिया। निकट ही बाबा विश्वरूपदासजीकी कुटिया थी। बाबा विश्वरूदास और वाष्र्णेयजी तन-मनसे उनकी सेवामें जुट गये। मदन बाबा भी उस समय उनकी सेवामें थे।

बाबा अस्वस्थ थे तो भी एक अपार्थिव आनन्दकी लहर उनके अंतरमें खेलती रहती। उनकी वृत्ति सदा अन्तरमुखी रहती। वे भाव जगत्में डूबे रहते और न जाने क्या देखकर उन्मादग्रस्तकी तरह कभी हँसने कभी रोने कभी हंकारने लगते। एक दिन रात्रि १ बजेके लगभग वे 'जय निताई! जय निताई!' कहकर चीख पड़े। विश्वरूप बाबा दौड़े आये, क्योंकि बाबाको कभी किसीको बुलाना होता तो 'जय निताई' कहकर बुलाते। पर, इस समय उन्हें किसीको बुलाना तो था नहीं। सम्भवतः नित्यानन्द प्रभुके दर्शन कर वे प्रेमोन्मादमें चीख पड़े थे। विश्वरूप बाबाने पूछा- "क्या लघुशंकाको जाना है ?" बाबाने कोई उत्तर नहीं दिया। वे एक दिव्यानुभूतिमें खोये हुए थे, पर विश्वरूप बाबाको आशंका हुई, कहीं 'जय निताई' कहकर बाबाने शरीर तो नहीं छोड़ दिया। उन्होंने उनकी नब्ज देखना चाहा।

जैसे ही बाबाको उनके हाथका स्पर्श हुआ, उन्होंने एक जोरकी हुंकार की। विश्वरूप बाबाको बिजलीकी करेंटलगने का समान धक्का लगा और वे चार-पाँच हाथ दूर जाकर गिर पड़े।

दूसरे दिन एकादशी थी। रात्रि एक बजेके लगभग, जब बाबा बैठे भजन कर रहे थे, उन्हें एक विशेष अनुभूति हुई। उन्होंने देखा कि उनके गुरुदेव श्रीरामदास बाबाजी, परमगुरुदेव श्रीराधारमणचरणदास बाबाजी (बड़े बाबा) और कई महात्माओंने खोल, करताल और झाँझके साथ उद्दाम नृत्य-कीर्तन करते हुए उनके सामने बगीचीमें प्रवेश किया और उनसे कहा- "हम वृन्दावन जा रहे हैं। तुम भी वृन्दावन चलो।" इतना कहकर वे सब अदृश्य हो गये और बाबा मूच्छित हो भूमिपर लोट गये।

त्रयोदशीके दिन, १३ मई १९८४ को दोपहरके समय बाबाने मदन द्वारा शिवचरन वाष्र्णेयको बुलाया। वे जब आये तो बाबा कुटियामें बैठे भजन कर रहे थे और एक हाथसे पंखा झल रहे थे। उन्हें एकादशीकी रात्रिकी घटनाका हाल सुनाते हुए उन्होंने कहा- "मुझे अभी वृन्दावन पहुँचा दो।" वाष्र्णेयजीने ताँगा मँगवाया। जैसे ही बाबाको अपनी गोदमें लेकर ताँगेपर चढ़ाया, वैसे ही एक विद्युत्-लहर श्रीराधारमण दास बाबा जी

बाबाके शरीरसे निकलकर वार्ष्णेयजीके शरीरमें प्रवेश कर गयी। ताँगेपर मदन बाबा और प्रेमानन्द भी बैठे। लगभग २०३० बजे ताँगा वृन्दावनमें बाबाके गुरुस्थान पहुँचा। गुरुस्थानपर लगभग ३० वर्षोंसे अखण्ड हरिनाम संकीर्तन चल रहा है। बाबाने कहा- "मुझे कीर्तनके स्थानपर ले चलो।" संकीर्तनके स्थानपर बाबा पद्मासनसे बैठकर ध्यानमग्न हो गये। थोड़ी देर यूँ ही बैठे रहे, शायद नसिंह चतुर्दशीकी प्रतीक्षामें, जो कुछ देरमें लगनेवाली थी। नृसिंह चतुर्दशीकी पावन तिथिके प्रारम्भ होते ही बाबाने 'जय निताई! जय राधे!' कहकर एक हुंकार भरी और राधाकृष्णकी नित्य-लीलामें प्रवेश कर गये।

नाम-स्मरण और एकाग्रता — जीवन-संदेश

नाम-स्मरण, भजन और एकाग्रता के प्रसंग साधना की निरंतरता की याद दिलाते हैं। यहाँ वर्णित जीवन-अनुभवों से पाठक अपनी साधना के लिए प्रेरणा ले सकते हैं।

कथा का सार

श्रीरामकृष्णदास बाबाजी की कथा भक्ति, विनम्रता और साधना पर मनन करने का अवसर देती है। इस संग्रह में अन्य भक्तों के जीवन-प्रसंग भी पढ़ें।