ब्रज के भक्त भाग 3 · अध्याय 78

श्रीराधारमण दास बाबा जी

श्रीराधारमण दास बाबा जी की प्रेरक हिंदी कथा। जानिए उनके जीवन, भक्ति और साधना से जुड़े महत्वपूर्ण प्रसंग।

श्रीराधारमण दास बाबा जी
श्रीराधारमण दास बाबा जी — ब्रज के भक्त भाग 3

श्रीराधारमण दास बाबा जी का यह भक्त-चरित्र ब्रज की साधना, श्रद्धा और जीवन से जुड़े प्रसंगों को सामने लाता है। नीचे कथा को अलग-अलग विषयों में व्यवस्थित किया गया है।

जन्म, परिवार और प्रारम्भिक जीवन

[ वृन्दावन ]

शास्त्रों ने भूलोक पर स्थित वृन्दावन की महिमा वैकुण्ठ से भी अधिक बतायी है। तुलसीदासजीने दोनों को तराजू पर तौलकर देखा भी है। तराजू पर वृन्दावन भारी होने के कारण नीचे पृथ्वी पर रह गया, वैकुण्ठ आकाश पर चढ़ गया-

वृन्दावन वैकुण्ठ कों, तोल्यों तुलसीदास । गरुऔ हौ सो थिर रह्यौ हलकौ गयौ आकास ।।

साधकों के लिए विशेष रूप से वृन्दावन की महिमा इसलिये अधिक है कि वृन्दावन साधक के गुण-दोष का विचार नहीं करता। साधक भला-बुरा जैसा भी हो, यदि श्रद्धापूर्वक वृन्दावन में आकर पड़ जाए, तो वृन्दावन उसे अपने ही गुण से उसी प्रकार आत्मसात कर सद्गति प्रदान करता है, जिस प्रकार अपने धूल से सने बालक को माँ स्वयं झाड़-पोंछकर गोद में भर लेती है-

वृन्दाविपिन प्रभाव सुन अपनो ही गुन देत। जैसे बालक मलिन को, मात गोद भर लेत ।।

- श्री ध्रुवदासजी

कोई कैसा भी हो, यदि वृन्दावन की शरण ग्रहण कर यहाँ केवल प्राण ही

त्याग करे तो वृन्दावन इतने से ही दयापरवश हो उसे परमपद की प्राप्ति करा देता है-

प्राणत्यागं च ये मर्त्यास्तत्वज्ञास्तत्व दर्शिनः ।

कुर्वन्ति च वने पुण्ये प्रप्नुवन्ति पदं शुभम् ।।

- सनत्कु. सें. ३२ पटल, श्लो. ५

इसीलिये स्वामी रसिकदेवजी ने कहा है-

दुखी-सुखी वृन्दावनमें मरै, जैसे सूर न रण ते टरै ।।

पर, वृन्दावन में मरण भी उसी का होता है, जिसपर श्रीराधा की कृपा होती है, क्योंकि वे ही तो यहाँ की अधीश्वरी हैं. यहाँ उन्हीं का राज है। व्रज के मुकुटमणि श्यामसुन्दर भी उन्हीं के अधीन हैं-

हमारे भाई श्यामा जू को राज ।

जा के आधीन सदाई सांवरो या व्रज को सिरताज ।।

स्वामी श्री वीठल विपुलदेवजी

जिसपर व्रजेश्वरी श्रीराधा की कृपा नहीं होती, उसे वे मरण के समय किसी-न-किसी बहाने व्रज से बाहर ठेल देती हैं। कई बार ऐसा देखा गया है कि एक व्यक्ति, जो जन्म से ही वृन्दावन में रहा, उसका मरण वृन्दावन के बाहर हुआ। इसके विपरीत जिसपर उनकी कृपा होती है, वह यदि व्रज के बाहर भी हो, तो उसे राधा मरण के समय वृन्दावन बुला लेती है।

अभी कुछ ही दिन हुए वृन्दावनवासी एक महात्मा बहुत दिन से जयपुर रह रहे थे। २६ नवम्बर सन् १९८७ को उन्हें स्वप्न में या ध्यानमें व्रजेश्वरी का आदेश प्राप्त हुआ। उन्होंने शीघ्र वृन्दावन चले आने को कहा। दूसरे दिन प्रातः महात्मा ने अपने शिष्य श्रीबलदेवरामजी गुप्ता से कहा- "मुझे राधारानी ने वृन्दावन बुलाया है। शीघ्र ले चलो।" बलदेवरामजी उन्हें लेकर मोटरगाड़ी से वृन्दावन जाने लगे। जाते समय महात्मा ने अपने प्रेमी जनों को बुलाकर उनसे अंतिम बिदा ली। यह देख बलदेवरामजी के मन में एक गंभीर शंका जागी। पर उन्होंने समझा कि शायद वे दीर्घकाल के लिए या सदा के लिए वृन्दावन जा रहे हैं, इसलिए सब से इस प्रकार बिदा हो रहे हैं।

वे क्या जानते थे कि राधारानी ने उन्हें नित्य वृन्दावन में अपने नित्य-निकुञ्ज में ले जाने को बुलाया है। वे उन्हें लेकर वृन्दावन पहुँच गये।

महात्मा के साथ ज्ञानगुदडी में उनके भक्त श्री आत्माराम शर्मा के घर ठहर गये। संध्या समय महात्मा उन्हें लेकर लोई बाजार गये। वहाँ एक छोटा चित्र राधा-कृष्ण और निताइ-गौर का खरीदा। बलदेवरामसे कहा- "तुम घर जाओ। मैं मुरारीलाल के घर होता हुआ कुछ देर बाद आ जाऊँगा।" बलदेवराम आत्माराम के घर चले गये। देर रात तक महात्मा आत्माराम के घर नहीं पहुँचे। बलदेवराम मुरारीलाल के घर गये। पता चला महात्मा वहाँ गये ही नहीं। दूसरे दिन और तीसरे दिन बलदेवराम, आत्माराम और मुरारीलाल ने सारा वृन्दावन खोज डाला। महात्मा का कहीं पता न चला। उनके संबंध में भक्तों को चिंता होने लगी। शंका जागी कहीं राधारानी उन्हें सदा के लिये अपने नित्य धाम तो नहीं ले गयीं ?

शंका की पुष्टि हई जब दो दिन बाद 'अमर उजाला' अखबार में खबर छपी कि एक महात्मा का शव पड़ा मिला है निधिवन में राधारानी के रंग महल के नीचे गुफा में। भक्तगण टोडे निधिवन गये तो देखा कि वह उन महात्मा का ही शव था। राधारानी अपनी सहचरी रूप में उन्हें ले गयी थीं निज निकुञ्ज में और उनका पार्थिव शरीर वहाँ पड़ा रह गया था।

महात्मा थे कलकत्ता पाठबाड़ी के सिद्ध श्री रामदास बाबाजी महाराज के शिष्य श्री राधारमण दासजी। श्री राधारमण दास बाबाजी का जन्म १४ अप्रैल, सन् १९३२ को बँगाल के जिला २४ परगना के अन्तर्गत मुलटी ग्राम में एक धर्मपरायण वैष्णव एवं सम्भ्रान्त ब्राह्मण परिवार में हुआ हुआ था। इनके पिता श्रीविनय कृष्ण एक जमींदार और कलकत्ता हाईकोर्ट के प्रसिद्ध वकील थे। माता श्रीमती मेनकादेवी परम साध्वी, विनम्र और उदारमना थीं। वे पाँच वर्ष की थीं तभी उनके पिता ने उन्हें कलकत्ता पाठबाड़ी के सिद्ध संत श्री रामदास बाबाजी महाराज से गुरुमंत्र दिलवा दिया था। माँ ने राधारमण दास को भी अल्पावस्था में ही रामदास बबाजी महाराज से दीक्षित करवा दिया।

राधारमणदास जी की आदि गुरु तो उनकी माँ ही थीं। भक्ति का संचार उनके हृदय में माँ के भक्तिमय जीवन और उनके उपदेशों के प्रभाव से पहले ही हो चुका प। पर जब से उन्होंने श्रीरामदास बाबाजी महाराज से दीक्षा ली, उनकी अवस्था कुछ और हो गयी। उनके हृदय में निताइ-गौर और राधा-कृष्ण की मधुर स्मृति सदा मी रहती, नेत्र डबडबाये रहते। वे अक्सर एकान्त में जाकर घंटों ध्यानमग्न बैठे ते। ऐसी स्थिति में ही उनका सारा जीवन व्यतीत हुआ। रामदास बाबाजी पराज द्वारा दीक्षित होने के बाद से उनके नेत्रों से जो आँसू बहना प्रारम्भ हुए, वे तक बहते रहे।

दिव्य अनुभूति और कृपा के प्रसंग

ऐसी स्थिति में ही उन्होंने विद्याध्ययन किया। कॉलेज में पढते समय वे सदा उदास और अंतर्मना रहते। न किसी से बात करते, न खेल-कूद में भाग लेते, न पढने-लिखने में ही अधिक समय व्यतीत करते। उनका अधिकांश समय एकान्त में नाम-जप में व्यतीत होता। तिसपर भी मेधावी होने के कारण उन्होंने कलकत्ता विश्वविद्यालय से एम०ए० की परीक्षा प्रथम श्रेणी में पास कर ली और स्वर्णपदक से सम्मानित हुए।

माता-पिता को अब विवाह की चिंता हुई। उन्होंने विवाह के लिए एक परमसुन्दरी बी०ए० पास लड़की खोज ली। राधारमणजी विवाह नहीं करना चाहते थे। उनकी उत्कट इच्छा थी, वृन्दावन जाकर भजन करने की। पर विवाह की बात तेजी से चल रही थी। राधारमणजी अपने-आप को जीवन-यात्रा के एक ऐसे मोड़ पर खड़ा पा रहे थे, जहाँ उन्हें अपने भावी जीवन की दिशा के बारे में अंतिम और महत्त्वपूर्ण निर्णय लेना था। उनके सामने एक ओर थी सुख-समृद्धिपूर्ण सांसारिक जीवन की संभावना, दूसरी ओर थी त्याग-तितिक्षा, वैराग्यमय और भजनशील जीवन की आकांक्षा। इसी समय एक दिन उन्हें स्वप्न में नित्यानन्द प्रभु के संन्यास वेष में दर्शन हुए। इसे उन्होंने वैराग्य वेष ग्रहण कर भजनशील जीवन व्यतीत करने का नित्यानन्द महाप्रभुका संकेत माना।

दूसरे दिन ही वे माता-पिता के मोह और सांसारिक सुख-सुविधाओं का तिलाञ्जलि दे वृन्दावन की ओर चल पड़े।

वृन्दावन जाकर श्री रजनीदास बाबाजी महाराज के आश्रम में श्रीमाधवदास बाबाजी से संन्यास-दीक्षा ली। कुछ दिन गुरुदेव की सेवा में रह कर श्री रजनीदास बाबाजी और श्री गैरांगदास बाबाजी महाराज का दिव्य संग किया। फिर मघेरा ग्राम जाकर अपने बड़े गुरुभाई सिद्ध श्री महाराज का दिव्य संग किया। उनसे श्री मद्भागवत, श्री चैतन्य-चरितामृत और श्री चैतन्य-भागवतादि ग्रन्थों का अध्ययन किया। इसके पश्चात् वे राल ग्राम के निकट विहार वन में रहकर भजन करने लगे। विहार वन में बाबा ने बहुत दिन तक कृच्छ साधना की। वे टाट लपेट कर रहते। मधुकरी माँग कर खाते। दिन-रात भजनावेश में इतना डूबे रहते कि कई-कई दिन तक मधुकरी को भी न जा पाते। मधुकरी की रोटियाँ सुखा कर रख लेते। उन्हीं को पानी में भिंगो कर खा लेते।

परिणामस्वरूप उनके पेट में गैस्ट्रिक अलसर हो गया। पेट की पीड़ा से बहुत बेचैन रहने लगे। चिकित्सा के लिए कलकत्ता जाना पड़ा। वहाँ अस्पताल में भरती हो गये। ४५ दिन तक चिकित्सा चलती रही। उनके छोटे भाई शची दुलाल और भतीजी कुमारी नन्दिनी उनकी सेवा में रहे, पर उनकी

अवस्था बिगडती गयी। खाना-पीना बन्द हो गया। नलियों के द्वारा नाक से पेट में दूध पहुंचाया जाने लगा। एक दिन संध्या समय उनके पेट में बहुत दर्द हो रहा था। चार डॉक्टर उनके निकट खड़े उनके सम्बंध में धीरे-धीरे बातें कर रहे थे। एक ने कही- 'संभव है इन्हें आज रात्रि में खून की उल्टी हो और मृत्यु हो जाय" । बाबा ने सुन लिया। उन्हें मृत्यु का भय नहीं था, पर चिंता इस बात की थी कि उनकी मृत्यु वृन्दावन से बाहर कलकत्ते के अस्पताल में होगी। वे कातर स्वर से राधारानी से प्रार्थना करने लगे- "हे स्वामिनी! हे दयामयी! मुझे क्यों वृन्दावन से बाहर निकाल दिया, यहाँ कुत्ते की मौत करनेको। लगता है कि मैने तुम्हारे चरणों में अपराध किया है। अब तक तुम्हारा भजन नहीं भजन का ढोंग किया है. नहीं तो तुम क्या ऐसा करतीं ?

मुझे दर्शन न देती, अपने चरणों की सेवा में अंगीकार न करतीं, पर वृन्दावन में मृत्यु तो देतीं। तुमने मुझे इसके योग्य भी न समझा। न समझातो न सही। मैं योग्य-अयोग्य जैसा भी हूँ, हूँ तो तुम्हारा ही। मैंने ढोंग किया है तो भी ढोंग तुम्हारे भजन का किया है, तुम्हारा नाम रटने का किया है। क्या उस ढोंग का इतना भी मूल्य नहीं कि तुम मुझे वृन्दावन की रज देतीं ? तुम तो परम उदार हो स्वामिनी। तुम्हारा एक बार धोखे से भी जिसने नाम लिया, उसे तुमने परमगति प्रदान की। मेरी ही ऐसी दुर्गति क्यों की स्वामिनी ? दया करो स्वामिनी, दया करो!" कहते-कहते उनके हृदय से एक वेदनाभरी चीख निकली और वे मूच्छित हो गये। भक्तवत्सला स्वामिनी क्या बाबा की चीख सुन स्थिर रह सकती थीं ? वे काँप गयीं और भागी आयीं।

श्रीकृष्ण भी उनके साथ आये और मूर्च्छा की अवस्था में बाबा को दर्शन दिये। बाबा ने देखा कि स्वामिनी अपना दाहिना हाथ उठा कर उन्हें अभय दानकर रही हैं और श्रीकृष्ण उनके उदर पर हाथ फेरते हुए पूछ रहे हैं- "तुम्हें कहाँ दर्द हो रहा है वत्स ?" बाबा क्या बताते दर्द कहाँ हो रहा है और किसको बताते ? दर्द तो उनके हाथ का स्पर्श होते ही दूर हो गया था और उसके साथ ही राधा और कृष्ण दोनों अंतर्धान हो गये थे।

दूसरे दिन डॉक्टरों के आश्चर्य की सीमा न रही, जब उन्होंने देखा कि जिस रोगी के कल रात मृत्यु के लक्षण दीख रहे थे, जो निरन्तर बिस्तरे पर पड़ा-पड़ा चीखता-कराहता रहता था, जिसे जबरदस्ती नाक के रास्ते से आहार पहुँचाया जाता था, वह स्वेच्छा से उठ-बैठ रहा है और बार-बार खाने को माँग रहा है।

बाबा स्वस्थ हो वृन्दावन लौट गये और अपनी भजन-स्थली विहारवन में जाकर रहने लगे। बाबा स्वस्थ तो हो गये थे। उनका उदर रोग बिलकुल जाता रहा

था, पर प्रेम-रोग और बढ़ गया था। जब से राधा-कृष्ण ने उनके ऊपर कृपा की थी. उनकी विरहाग्नि और अधिक प्रज्वलित हो गयी थी। राधा-कृष्ण उनकी पुकार सुनते ही आ गये थे। श्रीकृष्ण ने उन से प्यार से उनकी पीडा के बारे में पूछकर और उन्हें उससे मुक्तकर और राधा ने उन्हें अभय प्रदान कर इस बात का परिचय दिया था कि वे कितने उनके अपने हैं। तभी से राधारमण बाबा को उनके प्रति ऐसा ममत्व हो गया था, जैसा पहले कभी नहीं था। जो इतना अपना हो जितना और कोई नहीं और इतना अपना होते हुए अपने-से इतनी दूर हो जितना कोई नहीं, तो उसकी दूरी का हृदय को सालते रहना, उसके लिए प्राण छटपट करते रहना, स्वाभाविक है। बाबा के प्राण अब उनके लिए सदा छटपटाया करते कभी-कभी वेदना इतनी बढ़ जाती कि मूर्च्छा आ जाती।

भजन-साधना और नाम-स्मरण के प्रसंग

अश्रु-कम्पादि सात्विक भाव तो क्षण पर होते ही रहते।

बहुत दिन विहारवन में रह चुकने के बाद बाबा गोवर्द्धन के अंतर्गत जतीपुरा में राधव पंडित की गुफा में रहने लगे। उस समय वे केवल मठा और नीम की पत्ती लेकर रहते और अहर्निशि भजन-चिंतन में डूबे रहते। कभी-कभी समाधिस्थ हो घंटों बाह्य ज्ञान शून्य अवस्था में पड़े रहते। उनकी अब ऐसी अवस्था हो गयी कि उन्हें विशेष देख-भाल की आवश्यकता थी। उनके उत्कट वैराग्य और भक्तिभाव से प्रभावित हो अब उनके बहुत से शिष्य और भक्त हो गये थे। वे उनकी देख-भाल करने लगे। वे कभी-कभी उन्हें आग्रहपूर्वक अपने घर ले जाकर उनकी सेवा-शुश्रूषा करते।

इस प्रकार वे अपने प्रिय शिष्य राल ग्राम के श्री शिवचरण वार्ष्णेय और जयपुर के श्री बलदेवराम गुप्ता के घर तथा अपने भक्त वृन्दावन के सर्राफ श्री हरिदासजी और उनके पुत्र भी मुरारीलालजी के घर बहुत दिन रहे। बलदेवरामजी उन्हें दो बार अपने साथ ले जाकर श्री धाम नवद्वीप और जगन्नाथपुरी की यात्रा भी करा लाये। वे जयपुर के एस०पी० भक्तप्रवर श्रीकाशी प्रसाद श्रीवास्तव, इंजीनियर श्री चोखराजजी गुप्ता और श्री हरीजी आदि के घर भी रहे। सन् १९७३-७४ में बाबा जयपुर में शुक सम्प्रदाय के प्रसिद्ध स्थान दरीबा पान में स्थित सरस कुञ्ज में रहे। वहाँ अखण्ड हरिनाम संकीर्तन का आयोजन किया। संकीर्तन के पश्चात् नगर में शोभायात्रा निकाली, जिसमें भावपूर्ण अवस्था में नृत्य करते-करते मूच्छित हो गये।

राधा-कृष्ण की कृपा प्राप्त सिद्ध संतों की भांति बाबा के चरणों में सिद्धियाँ लोटा करतीं। कभी-कभी उन्हें संसार के दुःखी जीवों के प्रति कृपा परवश हो उनका प्रयोग करने के लिए विवश होना पड़ता। एक बार वे जयपुर के पास एक

गाँव में गये, जहाँ दो साल से वृष्टि न होने के कारण त्राहि-त्राहि मच रही थी। लोगोंने कातर स्वर से बाबा से अपना दुःख निवेदन किया। बाबा का हृदय विगलित हो गया। कुछ देर चुप रहने के बाद बोले- 'वृष्टि आज हो जायेगी।' कुछ ही देर बाद काले बादल घिर आये। घंटे भर तक घनघोर वृष्टि हई। पृथ्वी की प्यास बुझ गयी।

जयपुर में रहते हुये एक बार बाबा अपने शिष्य श्रीबलदेवराम के साथ कोंडेरावाले पंडित श्रीजगन्नाथजी के घर सवाई माधोपुर गये थे। सूर्यास्त के समय जब स्टेशन वापस लौट रहे थे, रास्ता भूलकर जंगल में भटक गये। उस समय उन्हें काली अँधेरी रात में भील बालकों के साथ छद् वेश में श्रीकृष्ण के दर्शन हुये। भील-बालक-रूपधारी श्रीकृष्ण ने उनसे कहा- "बाबा, आप स्टेशन जायेंगे ? चलिये मैं पहुँचा दूँ।" इतना कह जैसे ही उन्होंने बाबा का हाथ पकड़ा उन्होंने देखा कि वे और बलदेव राम स्टेशन पर हैं और श्रीकृष्णसहित भील-बालक अन्तर्धान हो गये। यह घटना स्वयं श्रीबलदेवरामजी द्वारा प्रस्तुत विवरण के अनुसार लिखी गयी है।

बाबा को जतीपुरा में रहते समय एक बार योगमाया देवी और निताई-गौर के दर्शन हुये। निताई-गौर मिलकर एक हो गये और उन्होंने कहा- "निताई-गौर और राधा-कृष्ण मैं ही हूँ।"

राधा-कृष्ण की बाबा के साथ लुका-छिपी निरन्तर चलती ही रहती। एक बार उनके पूछरी में रहते समय राधारानी ने उन्हें दर्शन दिये ६-७ साल की बालिका के रूप में हारसिंगार की झाड़ी में पुष्प चयन करते हुये, एक बार जयपुर में नवरत्न शर्माजी के घर रहते समय माधव विलास के सामने बालिका रूपमें उनकी ओर देख मन्द-मन्द मुसकाते हुये, तो एक बार जब वे बरसाना के गह्वर वन की परिक्रमा कर रहे थे, वे प्रकट हुई एक व्रजवासी बालिका के रूप में और उनसे चूड़ियाँ पहनाने का आग्रह किया। बाबा के चूड़ियाँ पहनाते ही वे अन्तर्धान हो गयी।

एक बार जब बाबा वृन्दावन से राल ग्राम जा रहे, श्रीकृष्ण ने उन्हें दर्शन दिये, गोपालगढ़ के निकट तमाल वृक्ष के नीचे गोपवेश में सखाओं के साथ खेलते हुए और बोले- "बाबा ! आमी तोमार काछे थाकबो, रोज खीर खाबो।" बाबा ने झोले में से निकालकर एक लड्डू उन्हें देना चाहा, वैसे ही वे अन्तर्धान हो गये। एकबार श्री शिवचरण वार्ष्णेय के लड़के हेमन्त को चाँदनी रात के धवल प्रकाश में बालकरूप में श्रीकृष्ण दीखे बाबा के बिस्तर पर। उसने जैसे ही बाबा से कहा, वैसे

ही वे अन्तर्धान हो गये। प्रतिवार राधा और कृष्ण बाबा को दर्शन देते और अन्तर्धान हो जाते और उनकी विरह वेदना बढ़ा जाते। वे "हा कृष्ण ! हा राधा! हा किशोरी" कह भूमि पर गिर पड़ते और समाधिस्थ हो संज्ञाहीन अवस्था में घंटों पड़े रहते। अष्टसात्विक भाव उनके सारे शरीर पर स्वच्छन्द क्रीड़ा करते दीख पड़ते। बाबा की वेदना जब इतनी बढ़ गयी कि उनका जीना मुश्किल हो गया, राधारानी ने उन्हें जयपुर से बुलाकर उनकी सखी-मञ्जरी भाव की उपासना सिद्ध करने के लिये मञ्जरी रूप में सदा के लिये अंगीकार किया।

प्रेम और भक्ति — जीवन-संदेश

ईश्वर-प्रेम की अनुभूति भक्त-साहित्य का एक महत्त्वपूर्ण विषय है। इन प्रसंगों को श्रद्धा, संवेदनशीलता और समर्पण के संदर्भ में पढ़ा जा सकता है।

कथा का सार

श्रीराधारमण दास बाबा जी की कथा भक्ति, विनम्रता और साधना पर मनन करने का अवसर देती है। इस संग्रह में अन्य भक्तों के जीवन-प्रसंग भी पढ़ें।