ब्रज के भक्त भाग 3 · अध्याय 66
श्रीराधामोहनदास बाबाजी
श्रीराधामोहनदास बाबाजी की प्रेरक हिंदी कथा। जानिए उनके जीवन, भक्ति और साधना से जुड़े महत्वपूर्ण प्रसंग।

श्रीराधामोहनदास बाबाजी का यह भक्त-चरित्र ब्रज की साधना, श्रद्धा और जीवन से जुड़े प्रसंगों को सामने लाता है। नीचे कथा को अलग-अलग विषयों में व्यवस्थित किया गया है।
जन्म, परिवार और प्रारम्भिक जीवन
[ वृन्दावन ]
सन् १८९३में मिथिला अञ्चलमें दरभंगासे २० मील दूर दसौत नामक ग्राममें, कुलीन ब्राह्मण वंशमें, श्रीअगहनूनाथ झाके घर श्रीराधामोहनदास बाबाका जन्म हुआ। नाम रखा गया श्रीरामलखन झा। बालपनेमें ही श्रीरामलखनने अपनी तीव्र मेधाशक्ति, त्याग और वैराग्यकी प्रबल प्रवृत्ति और एकान्तवासकी निरन्तर वर्धमान लालसासे लोगोंका ध्यान अपनी ओर आकर्षित किया। कालान्तरमें इन्हीं गुणोंके फलस्वरूप उन्होंने पाण्डित्यमें पराकाष्ठा और भक्तिमें परमगति लाभकर वाचस्पतिमिश्र, मण्डनमिश्र और महाकवि विद्यापतिकी जननी मिथिलामें अपने जन्मकी सार्थकताको सिद्ध किया।
उन्होंने विशुद्ध भक्तिमार्गमें पदार्पण करनेके पूर्व योगमार्गका सहारा लिया। दसौतके योगिराज श्रीढ़ढ़ाईझाके आनुगत्यमें योगाभ्यास कर योगकी ऊँची उपलब्धियाँ हासिल कीं। पर, उससे उन्हें वह शान्ति न मिली, जिसकी उन्हें खोज थी। मिल भी कैसे सकती थी ? श्रीचैतन्य महाप्रभुने कहा है कि कर्मी, ज्ञानी और योगी सभी अशान्त हैं, क्योंकि वे मुक्तिकामी हैं और यथार्थमें निष्काम नहीं हैं, केवल भक्त ही शान्त हैं, क्योंकि वे पूर्णरूपसे निष्काम है। *
यद्यपि भक्ति परम स्वतन्त्र है और किसी अन्य साधनकी अपेक्षा नहीं रखती, ज्ञान और योग भक्तिकी प्रारम्भिक अवस्थामें सहायक हैं, क्योंकि वे सांसारिक विषयोंकी कामनासे मुक्त और चित्त-शुद्धिके साधन हैं। योगाभ्यासके परिणामस्वरूप श्रीरामलखनझाकी चित्त-शुद्धि हुई और उनके भक्तिके जन्मजात
व्रजभूमि और तीर्थ से जुड़ी घटनाएँ
संस्कार जाग उठे। उन संस्कारोंने उन्हें भक्तिमार्गमें दीक्षा लेनेके लिए वृन्दावनकी ओर प्रेरित किया।
वृन्दावन जाकर वे गुरुकी खोजमें लग गये। एक दिन स्वप्नमें एक महात्माने उन्हें गोपालमन्त्र प्रदान किया। मन्त्र प्राप्त करते ही उनमें अष्टसात्विक भावोंका प्रबल उन्मेष हुआ। दूसरे दिनसे वे उन महात्माकी खोजमें व्रजके मठों और मन्दिरों, वनों और उपवनोंमें भटकते रहे। एक दिन, जब वे वृन्दावनकी परिक्रमा कर रहे थे, अकस्मात् गौघाटपर उनके दर्शन हुए। दर्शन करते ही वे उनके चरणोंसे लिपटकर रोने लगे। महात्माने चिरपरिचितकी भाँति उन्हें उठाकर हृदयसे लगा लिया। महात्मा थे निम्बार्क सम्प्रदायके टोपीकुञ्ज, वृन्दावनके श्रीमाधवदास बाबाजी महाराज।
सन् १९१९ आषाढ़ मासमें गुरुपूर्णिमाके शुभ दिन उन्होंने रामलखनजीको श्रीनिम्बार्क सम्प्रदायकी प्रथानुसार शरणागत मन्त्रके पश्चात् फिर वही अष्टादशाक्षर गोपालमन्त्र कानमें सुनाकर दीक्षा दी, जिसे उन्होंने पहले स्वप्नमें प्रदान किया था। दीक्षाके पश्चात् उनका नाम रखा श्रीराधामोहनदास।
कहते हैं कि मन्त्रराजके कानमें प्रवेश करते ही श्रीराधामोहनदास बाबा मूर्छित हो गये और उन्हें तत्काल अभीष्टकी प्राप्ति हुई। यह सम्भव है, क्योंकि निर्मल और निरपराध चित्तमें मन्त्रके फलीभूत होनेमें एक क्षणकी भी देर नहीं लगती।
गुरु-सान्निध्य और आध्यात्मिक शिक्षा
दीक्षाके पश्चात् वे कुछ दिन वृन्दावनमें रहे। उसके पश्चात् गुरुदेवकी आज्ञासे भक्तिका प्रचार करनेके उद्देश्यसे अधिकतर मिथिलामें रहकर वहाँके लोगोंको राधाकृष्ण-कथामृत पान कराने लगे। उनकी रसमयी वाणीसे प्रभावित हो अनेकों मिथिलावासी उनसे मन्त्र लेकर भक्ति पथके अनुगामी बने।
सन् १९६० में उन्होंने श्रीप्रियाशरण बाबाके आदेशसे वृन्दावनमें दावानलकुण्डके निकट मिथिलाकुञ्ज-नामक स्थानका निर्माण किया और १९६४ से स्थायी रूपसे उसमें रहने लगे। तबसे वृन्दावनके रसिक सन्त श्रीविशाखाशरणजी और श्रीकुञ्जबिहारीशरणजी आदिको उनके निरन्तर संगका सुयोग मिला। ये सभी महानुभाव नित्य प्रति रमणरेती स्थित श्रीनिम्बार्क-सदनमें एकत्र होकर श्रीमहावाणी, श्रीयुगल शतक और अन्य वाणी-ग्रन्थोंका सामूहिक रूपसे रसास्वादन करते।
सन् १९७७ में रक्षाबन्धनके दिन ८५ वर्षकी अवस्थामें अपने अनेकों भक्तोंकी कीर्तन-ध्वनिके बीच राधामोहनदासने नित्य-लीलामें प्रवेश किया। इसका संकेत उन्होंने अपने शिष्य, मिथिलाकुंजके वर्तमान महन्त श्रीराधाश्याम बाबासे ९ श्रीकुंजदास बाबाजी
महीने पूर्व, अक्षय तृतीयाके दिन कर दिया था, जब उनके साथ बिहारीजीके दर्शन करते समय उन्हें एक अलौकिक अनुभव हुआ था, जिसमें श्रीरंगदेवीजीने 'मोहन-महल' में शीघ्र चले आनेकी आज्ञा दी थी।
गुरु और साधना — जीवन-संदेश
गुरु के प्रति श्रद्धा और साधना में निरंतरता भक्ति-परंपरा के प्रमुख विषय हैं। इस चरित्र को पढ़ते समय यह देखना उपयोगी है कि सीख और आचरण किस तरह एक-दूसरे से जुड़ते हैं।
कथा का सार
श्रीराधामोहनदास बाबाजी की कथा भक्ति, विनम्रता और साधना पर मनन करने का अवसर देती है। इस संग्रह में अन्य भक्तों के जीवन-प्रसंग भी पढ़ें।