ब्रज के भक्त भाग 3 · अध्याय 101

श्रीप्रियाशरण बाबाजी

श्रीप्रियाशरण बाबाजी की प्रेरक हिंदी कथा। जानिए उनके जीवन, भक्ति और साधना से जुड़े महत्वपूर्ण प्रसंग।

श्रीप्रियाशरण बाबाजी
श्रीप्रियाशरण बाबाजी — ब्रज के भक्त भाग 3

श्रीप्रियाशरण बाबाजी का यह भक्त-चरित्र ब्रज की साधना, श्रद्धा और जीवन से जुड़े प्रसंगों को सामने लाता है। नीचे कथा को अलग-अलग विषयों में व्यवस्थित किया गया है।

जन्म, परिवार और प्रारम्भिक जीवन

(वृन्दावन/बरसाना)

श्रीप्रियाशरण बाबाका जन्म अगहन शुक्लपक्ष दशमी सम्वत् १९५२ में बिहारके बक्सर प्रान्तके अन्तर्गत सुनहारा ग्राममें कान्यकुब्ज चतुर्वेदी परिवार में हुआ। उनके माता-पिता दोनों रामानन्दी वैष्णव थे। वैष्णवताके संस्कार उन्हें पारम्भिक अवस्थामें ही उन दोनोंसे प्राप्त हुए, पर वे अपनी माँसे विशेषरूपसे प्रभावित थे। वे एक परम वैष्णवी, विदुषी महिला थीं।

विद्याध्ययनके लिए उन्हें अपनी ननसार वाराणसी भेज दिया गया। वहाँ एक कुशाग्र बद्धि होनहार बालकके रूपमें अपना परिचय देनेमें उन्हें देर न लगी। वाराणसीका वातावरण उनके भक्तिके संस्कारोंको भी पनपानेमें सहायक हुआ। श्रीमद्भागवत्से उन्हें बहुत प्रेम था। जहाँ-कहीं उसका पाठ होता सुन लेते वहाँ पहुँच जाते। सन्त-महात्माओंका संग भी किया करते। इसी बीच बक्सर स्थिर निम्बार्क सम्प्रदायके श्रीशोभूरामदेव द्वारेके महन्त श्रीश्यामदासदेवजी महाराजसे उनकी भेंट हुई। उनसे दीक्षा लेकर वे विधिवत् भक्ति मार्गपर आरुढ़ हुए।

पर, अभी उनका भक्ति-भाव इतना प्रबल और परिपक्व नहीं था कि वे सब कुछ छोड़कर एकान्त रूपसे इस पथके पथिक बन जाते। इस समय उनकी अवस्था केवल सोलह वर्षकी थी। विद्याध्ययनमें उनका मन रमा हुआ था। व्यायाम और कुश्ती आदिका भी उन्हें शौक था। नवयौवनकी नयी-नयी उमंगें नयी-नयी दिशाओंमें उड़ान भरनेको उन्हें चंचलकर रही थीं।

जिन महापुरुषोंने इस अवस्थामें गृह-त्याग किया है, उन्हें अपनी पूरी शक्ति मनोबलका प्रयोग करते हुए अगणित विघ्न-बाधाओंका सामना करना पड़ा है।

कुछको अपने कियेपर पछताना भी पड़ है, और कुछको घर लौट जाना

पड़ा है।

श्रीप्रियाशरण बाबाकी इस समय गृह-त्याग करनेकी न तो कोई इच्छा थी और न ही उन्होंने उनके लिए कोई प्रयास ही किया। अपने भक्तिके संस्कारीक कारण वे कभी-कभी यह स्वप्न अवश्य देखा करते थे कि एक दिन घर-गृहस्थीके बन्धनमे बैठकर प्रिया-प्रियतमकी मधुर लीलाओंका चिन्तन करते हुए सुखसे जीवन व्यतीत मुक्त हो वे वृन्दावनमें जा बसेंगे और वहाँके उपवनोंमें, लताओं-पताओंके बीच करेंगे। उन्होंने कभी यह कल्पना भी नहीं की थी कि उनका यह स्वप्न उनके बिना प्रयत्न किये ही अविलम्ब साकार हो उठेगा।

लीला स्थलियों और सन्त-महात्माओंके दर्शन करनेके उद्देश्यसे, पर वहाँ जाकर पर, हुआ ऐसा ही। विद्यालयकी छुट्टियोंमें वे वृन्दावन गये केवल। वहाँको पकड़ लिये गये। ऐसे पकडे गये कि फिर घर लौटनेका नाम ही नहीं लिया। वृन्दावन जब किसीको पकड़ता है, तो ऐसे ही पकड़ता है। मनुष्य जब से पकड़ता है तो पकड़कर छोड़ भी सकता है, पर वृन्दावनके उसे पकड़कर छोड़नेका सवाल ही नहीं उठता।

वृन्दावन किसी को पकड़ता है अपने किसी ऐकान्तिक भक्तके माध्यमसे। वृन्दावन आते ही प्रियाशरण बाबा प्रेरित हुए व्रजके सन्तोंके मुकुटमणि, परम भागवत् पण्डित रामकृष्णदास बाबाजी महाराजके दर्शन करनेको। पण्डित बाबा उन दिनों गोवर्धनमें श्यामकुटीमें रहते थे। वहाँ जाकर उन्होंने उनके दर्शन किये। उनके दर्शनकर वे कृतकृत्य हो गये। उन्हें लगा कि जैसे उन्हें कोई अपूर्व निधि मिल गयी हो पण्डित बाबाने भी उनमें एक होनहार बालकके दर्शन लिये। उनकी पैनी दृष्टिने उनके भीतर-बाहर झाँककर उनका सब कुछ जान लिया। उन्होंने जान लिया कि जैसा उनका रूप सुन्दर है, वैसी ही उनकी आत्मा भी सुन्दर और उन्नत हैं। उनके द्वारा भविष्यमें जन-कल्याणका बहुत-सा कार्य होना है। उन्होंने अपना सारा प्रेम उनपर सहज ही उड़ेल दिया।

उस प्रेमसुधाका पानकर वे अपने माँ-बाप, घर और संसार-को एकदम भूल गये। उनके क्रीतदासकी तरह उन्हींके होकर उनके पास रह गये। ऐसा ही होता है महाजनोंके निःस्वार्थ प्रेमका चमत्कारी प्रभाव !

प्रियाशरण बाबा पण्डित बाबाके संरक्षणमें रहकर उनके आदेशोंका पालन करते हुए भजन करने लगे। वे निम्बार्क सम्प्रदायमें दीक्षित थे और पण्डित बाबा गौडीय सन्त थे। पर, गौडीय होते हुए भी उन्हें सभी सम्प्रदायोंके शाखों और साधन-पद्धतियोंका पूरा ज्ञान था। सभी सम्प्रदायोंके महात्मा उनका आदर करते थे।

प्रभीको वे उनके सम्प्रदायकी मान्यताओंके अनुसार भजनकी शिक्षा देते थे। उपदेश दिया। पर, पण्डित बाबाके प्रभावसे वे एक सम्प्रदायके अन्तर्भक्त होते हुए प्रियाशरण बाबाको भी उन्होंने उनके सम्प्रदायकी पद्धत्तिके अनुसार भजन करनेका श्री साम्प्रदायिक संकीर्णताओंसे सदा मुक्त रहे।

पण्डित बाबाने प्रियाशरण बाबाको सदाचार और वैराग्यादिकी शिक्षा देकर उनके चरित्रका जिस प्रकार अपने धर्मपुत्रके समान स्नेहपूर्वक गठन किया, वह उनके सम्बन्धमें घटित एक घटनासे स्पष्ट है।

वे उन्हें अपने साथ नित्य मधुकरीको ले जाया करते । एक व्रजवासीके घर मधुकरी बंधी हई थी। उसके घर जाकर वे बाहर खड़े रहते, प्रियाशरण भीतर जाकर मधुरकरी ले आते। उसके घर एक नवविवाहिता वधू थी, जो मधुकरी दिया करती थी। एक दिन मधुकरी देते समय उसके पैरका अँगूठा बाबाके पैरके अँगूठेसे स्पर्श कर गया। बाबाने इसपर ध्यान नहीं दिया, पर दूसरे दिन भी वैसा ही हुआ तीसरे दिन भी। तब उन्होंने बाहर निकलकर पण्डित बाबासे कहा- 'बाबा, कलसे इस घर में मधुकरीको नहीं आया करेंगे।' पूछनेपर उन्होंने कारण भी उन्हें बता दिया। कारण सुनते ही पण्डित बाबासे न रहा गया।

वे घरके भीतर गये और सबके सामने नववधूको फटकारते हुए बोले 'तू हमारे छोरानको बिगारबेकी आयी है झ्या?' अपने छोराके चरित्रकी उन्हें इतनी चिन्ता थी कि नववधूको भी सबके सामने इस प्रकार फटकारनेमें उन्होंने संकोच नहीं किया।

एक बार पण्डित बाबा प्रियाशरण बाबा और श्रीगौरांगदास बाबा आदि कई महात्माओंके साथ मधुकरीको निकले। कई घरोंपर गये, पर कहीं भी मधुकरी न मिली। यह एक असाधारण घटना थी, क्योंकि बाबाको मधुकरी देनेके लिए व्रजवासी सदा लालायित रहते। किसीको इसका कारण समझमें न आया। बाबाने अपनी दिव्य-दृष्टिसे कारण जान लिया। उन्होंने कहा- 'अच्छा, सब लोग बताओं तो कि इस समय किसके पास क्या-क्या है?' एक साधुने बताया कि उसके पास सात रुपये हैं। पण्डित बाबाने कहा- 'यही कारण है कि आज मधुकरी नहीं मिली। प्रभु हमारे योग-क्षेमकी चिंता तभी करते हैं, जब हम उनका पूर्णरूपसे आश्रय लें।

उनका आश्रय छोड़ जब हम अपने बल-बुद्धिका प्रयोग करने लगते हैं, तो वे भी अपना हाथ खींच लेते हैं।' तभीसे प्रियाशरण बाबाने रुपया-पैसा स्पर्श भी न करनेका संकल्प कर दिया।

प्रियाशरण बाबाने पण्डित बाबाकी आज्ञासे पूछरीमें गोपाल मन्त्रका अनुष्ठान प्रारम्भ किया। अनुष्ठान करते दस ही दिन बीते थे, जब उनमें कुछ ऐसी शक्तिका घटनाओंका पूर्वाभास हो जाता। उन्होंने जब पण्डित बाबाको यह बताया, तो उन्होंन संचार हुआ, जिससे उन्हें अज्ञात वस्तुओंका पता चल जाता और भविष्यको कहा- 'गोपाल मन्त्रका अनुष्ठान बन्दकर दो। केवल हरिनामका जप करो। मन्त्रसे कामना सिद्ध होती है। नामसे कामनाका नाश होता है।'

बाबाने अनुष्ठान बन्द कर दिया और नाम-जपमें लग गये।

पण्डित बाबासे प्रियाशरण बाबाने निम्बार्क सम्प्रदायके ग्रन्थोंका तो अध्ययन किया ही, अन्य सम्प्रदायोंके, विशेष रूपसे गौडीय सम्प्रदायके ग्रन्थोंका भी गम्भीर अध्ययन किया। फलस्वरूप, उन्हें सभी सम्प्रदायोंके ग्रन्थोंका अच्छा ज्ञान हो गया और उनका दृष्टिकोण समन्वयात्मक हो गया। कुछ ही दिनोंमें उन्होंने कथा कहना प्रारम्भ किया और एक अच्छे कथावाचकके रूपमें उनकी ख्याति हो गयी। अपनी कथाओंमें वे गौड़ीय और राधावल्लभीय सिद्धान्तोंका भी खुलकर वर्णन और समर्थन करते, जिससे कभी-कभी लोगोंको उनका वास्तविक झुकाव राधावल्लभीय या गौड़ीय सिद्धान्तकी ओर अधिक होनेका भ्रम हो जाता। पर, वास्तविकता यह थी कि उन्होंने निम्बार्क सिद्धान्तको उनके व्यापक रूपमें ही ग्रहण किया था।

दिव्य अनुभूति और कृपा के प्रसंग

उस रूपमें उसका गौड़ीय और राधावल्लभीय सिद्धान्तोंके मुख्य रूपसे विरोध नहीं था।

प्रियाशरण बाबाने जबसे वृन्दावनमें पदार्पण किया, तभीसे पण्डित बाबाके

अतिरिक्त उन्हें श्रीगौरांगदास बाबाजीका भी अमूल्य संग प्राप्त हुआ। वे और गौरांगदासजी दोनों नवयुवक थे। दोनोंका वैराग्य असाधारण था। दोनों पण्डित बाबाके अन्य शिष्योंके समान उनके अध्यात्मिक संरक्षण और आश्रयमें रहकर शस्त्राध्ययन और भजन-शिक्षा ग्रहण करते थे। दोनोंसे पण्डित बाबा पुत्रवत् स्नेह करते थे। प्रियाशरण बाबा अन्त समय तक बात-बातमें गौरांगदास बाबाकी यादकर अश्रु विसर्जन करते और अपनी कथाओंमें श्रोताओंके समक्ष उनकी अनुपम भक्ति और वैराग्यका उदाहरण प्रस्तुत करते।

प्रियाशरण बाबाने गोवर्धनके सिद्ध मनोहरदास बाबा और पियासेवाले बाबा श्रीराधिकादासजीका भी संग बहुत किया। सम्वत् १९७५ में वे टटिया स्थान, वृन्दावनके महन्त श्रीभगवानदासजी महाराजके सम्पर्कमें आये, उनसे और टटिया स्थानके ही श्रीनवेलीशरणजीसे उन्होंने वाणी-ग्रन्थोंका गम्भीर अध्ययन किया।

इसके पश्चात् वे कथा विशेष रूपसे वाणी ग्रन्थोंकी ही कहा करते। उनकी बैठते। श्रीहरि बाबा और श्रीउडिया जैसे सन्त भी उनकी कथा सुनने आया करते। में जिस अपूर्व रसकी वृष्टि होती, उसमें सराबोर हो लोग अपनी सुध-बुध खो एक बार व्रजमें व्रज-लीला और निकुञ्ज-लीलाको लेकर विवाद छिड़ गया।

स्वारसिकी है, क्योंकि वह स्वेच्छामयी है और भिन्न-भिन्न समय, भिन्न-भिन्न स्थानोंपर भित्र-भित्र रूपोंमें अनुष्ठित होती रहती है। वह प्रवाहरूपा है. पर शास्त्रोंमें बहुत-से लीला दो प्रकारकी है- स्वारसिकी और मन्त्रोपासनामयी। अप्रकट लीला उपासना-मन्त्रोंमें ऐसी लीलाओंका भी उल्लेख है, जो सदा-सर्वदा एक ही स्थानपर मला अन्तर्भक्त लीलाओंका सबका आदि, मध्य और अवसान होता है। पर, एक ही रूपमें होती रहती हैं। उन्हें मन्त्रोपासनामयी लीला कहते हैं। स्वारसिकी स्वोपासनामयी लीलाका आदि, मध्य और अवसान नहीं होता। वह प्रत्यास्थितिशीला है। एक ही प्रकारसे, एक ही स्थानपर नित्य होती रहती है।

स्वोपासनामयी नित्यस्थितिशीला लीला स्वारसिकी गतिशीला लीलासे उसी प्रकार इभूत और उसके अन्तर्गत है, जिस प्रकार यमुनामें कालीयहृदके समान बहुत-से द उससे उद्भुत और उसके अन्तर्गत हैं। स्वारसिकी लीला अपने चक्राकार प्रवाह-पथपर चलते हुए बहुत-से हृदोंके भीतरसे बहती हुई निकलती रहती है। जिस समय स्वारसिकी लीलाका प्रवाह मन्त्रोपासनामयी लीलाके हृदमें प्रवेश करता उस समय सामयिक रूपसे दोनों लीलाओंका ऐक्य होता है। पर, स्वारसिकी तबेलाका प्रवाह आगे बढ़ जाता है और मन्त्रोपासनामयी लीलाका हृद वहीं रह जाता है।

उपासना-मन्त्रोंकी विभिन्नताके अनुसार मन्त्रोपासनामयी लीला थी अनेक उकारकी है, जैसे गोचारण लीला, रस-लीला, कुञ्ज-क्रीड़ा-लीला इत्यादि। बैतन्य-चरितामृतमें निकुञ्जके नित्य-विहारका वर्णन इस प्रकार है* -

चरित ।। राय कहे-कृष्ण हय धौर ललित । निरन्तर काम क्रीड़ा जाँहार रात्रि दिन कुञ्ज-क्रीड़ा करे राधासंगे । कैशोर-वयस सफल कै क्रीड़ा रंगे ।।

(चै०च० २.८.१४७-४८)

* भक्तिरसामृतसिन्धु, दक्षिण विभाग १म-विभावलहर्याम् १/१२३-२४ में भी नित्य-विहारका इसी प्रकार वर्णन है।

प्रत्येक मन्वोपासनामयी लीलाकी अवस्थिति वृन्दावनके एक विशेष प्रकाशमें

क्जलीला और निकुञ्जलीलाका यह समन्वय बाबाके मनमें बैठा हुआ था। भित्र है और निकुञ्जेश्वरी राधारानी वृषभानुनन्दिनीसे भिन्न हैं। निकुञ्जके पर इस विवाद कुछ लोगोंका कहना था कि निकुञ्जलीला वजलीला से सर्वचा श्यामा-श्याम अनादि और अजन्मा है। उनके न तो कोई माता-पिता हैं और न तो उनका बज-लीलासे कोई सम्बन्ध है। वे नित्य-किशोर और किशोरी हैं, उनका विहार नित्य है। कुछका मत था कि निकुञ्जेश्वरी और वृषभानुनन्दिनीमें कोई भेद नहीं है और निकुञ्जलीला भी बजलीलाके अन्तर्गत है। श्यामा-श्याम अजन्मा और अनादि है, पर प्रकट लीलामें उनका जन्म है। नन्द-यशोदाका अनादि कालसे उनके प्रति वात्सल्य भाव है. जिसकी प्रकट-लीलासे और भी पुष्टि होती है। विवादके कारण बाबाके मनमें भी इस सम्बन्धमें कुछ सन्देह होने लगा।

इस प्रश्नको लेकर वे बडी उलझन में पड़ गये। एक दिन उन्हें गोपालकुटीमें इसी उलझनमें बैठे-बैठे तन्द्रा आ गयी। उस समय स्वयं राधारानीने दर्शन देकर उनसे कहा- 'मैं ही वृषभानुनन्दिनी है. मैं ही निकुञ्जेश्वरी है।' तबसे उनका विश्वास इस सिद्धान्तमें और भी दृढ़ हो गया।

प्रियाशरण बाबा बड़े स्पष्टवादी थे। विषयमें हो या दूसरोंके, उन्हें जहाँ कहाँ त्रुटियाँ दीखती, उन्हें दूसरोंकी कष्ट होता। पर, उनका उद्देश्य होता दूसरोंका सुधार करना, न कि उनकी निन्दा करना।

एक बार निम्बार्क सम्प्रदायके अनन्तश्रीविभूषित श्री 'श्रीजी' महाराज वृन्दावन पधारे। उनके आग्रहसे प्रियाशरण बाबाने निम्बार्क सद, रमणरेतीमें श्रीमहावाणी, सिद्धान्तसुखकी कथा कहना प्रारम्भ किया। श्री'श्रीजी' महाराज कथा सुनने आने लगे। प्रियाशरण बाबा उनका यथोचित सम्मान करते और उन्हें उचित आसनपर बिठाकर स्वयं पत्थरके चबूतरेपर बैठते। प्रथम दिन श्रीजीके सामने वे बिना कुछ बिछाये ही चबूतरेपर बैठे। श्रीजीके आग्रहपर उसपर चटाई बिछाकर बैठनेको राजी हुए। फिर भी सम्प्रदायके एक वयोवृद्ध सन्तने श्रीजी द्वारा प्रियाशरण बाबाकी कथा सुननेपर आपत्ति की। उन्होंने इसे लेकर एक आन्दोलन खड़ा कर दिया। फलतः श्रीजी महाराजको छः दिन कथा सुननेके बाद कथामें आना बन्दकर देना पड़ा।

उसके पश्चात् एक दिन, जब वह वृद्ध महात्मा कथामें उपस्थित थे, बाबाने किसी प्रसंगमें उन्हें लक्ष्य कर कहा- "श्रीहरिव्यास देवाचार्यने मायाको चेली बनाया।

महात्माओंको लगना।" शिक्षा प्रदान करते समय उससे कहा- "अब तू वैष्णवी हो गयी है। यदि पुराने अभ्यासवश किसीको लगनेका मन कर आये तो वृन्दावनमें रहनेवाले बुढ

एक बार वृन्दावनमें कहींसे एक महात्मा पधारे। उनकी स्थिति बड़ी विलक्षण थी। कथा-कीर्तनमें उन्हें अश्रु कम्पादि भाव होते थे। मुर्च्छा भी आ जाती थी। वे अधिकतर भाव-समाधिमें रहते थे। भगवानसे बातें करते थे. जिन्हें सुनकर लोग बहुत प्रभावित होते थे। शीघ्र ही सिद्ध महात्माके रूपमें उनकी ख्याति चारों ओर फैल गयी। बड़े-बड़े महात्मा भी उनके दर्शन करने आने लगे। श्रीहरि बाबाने भी उनके संगका लाभ उठाना चाहा।

उन्होंने उनसे कहा- 'महाराज, प्रभु सदा ही आपकी सन्निधिमें विराजते हैं। क्या आप पूछनेकी कृपा करेंगे कि मुझे उनके दर्शन कैसे हो सकते हैं?

महात्माने उत्तर दिया- 'यारका कहना है कि आप २१ दिन अनशन करें तो आपको दर्शन हो जायेंगे।'

भोले-भाले हरिबाबाने अनशन आरम्भ कर दिया। जब किसीने प्रियाशरण बाबाको यह सब बताया, तो उन्होंने कहा- 'उन महात्माको मेरे पास ले आओ।'

जीवन के अंतिम प्रसंग और स्मृतियाँ

वे महात्माको उनके पास ले गये। बाबाने आदरपूर्वक प्रणमादिकर उन्हें आसन देकर अपने पास बिठाते हुए कहा-

'महाराज अपराध क्षमा करें। मुझे स्वयं आपको पास जाना चाहिये था।

आपने बड़ी कृपा की जो यहाँ पधारनेका कष्ट किया।'

'कोई बात नहीं। यारने अनुमति दे दी, तो चला आया, महात्माने उत्तर दिया।

प्रियाशरण बाबाने कुछ देर भजन-सम्बन्धी बातें कर उन्हें भली प्रकार समझने और परखनेकी चेष्टा की। अच्छी तरह कसौटीपर कस लेनेके बाद उसने कहा-

'सुना है, आपपर प्रभुकी बड़ी कृपा है।'

'हाँ, उनकी मुझपर असीम कृपा है।

'वे आपको दर्शन दिया करते हैं, आपसे बातें भी करते हैं?'

'हाँ, वे हर समय मेरे साथ ही रहते हैं।

'इस समय भी आपके साथ हैं क्या?'

'हैं तो, पर वे बाहर खड़े हैं। उन्होंने कहा है- तुम बाबासे बातकर आओ।

मैं भीतर नहीं जाऊँगा।'

उसी समय बाबाने त्योरी बदलकर महात्माको घूरते हुए ऊँचे स्वर अनशन करूंगा, तब प्रसन्न होगा। यह भी कहा है न उसने तुमसे ? धूर्त कहीं का। आया है वृन्दावनमें भोले-भाले बाबाओंको ठगने। चला जा यहाँसे इसी क्षण, नहीं तो कहा- 'हाँ, मैंने तेरे यारकी भैंस चुराई है न । इसीलिए मुझसे रुष्ट हैं। अब मैं देता हूँ शाप।'

महात्माको पसीना आ गया। वे थर-थर काँपने लगे। आँखें नीची कर जानेको हुए, तब बाबाने कहा-

'रुको। पहले हरि बाबाके पास जाकर उनके अनशन तोडनेको कहो, तब चले जाओ यहाँसे।' महात्माने ऐसा ही किया।

गोपाल मन्त्रके अनुष्ठानके समय बाबामें जिन दिव्य शक्तियोंका विकाश हुआ था, उनकी अभिव्यक्ति उनके जीवनमें बीच-बीच में होती रहती। अपनी ओरसे तो वे चेष्टा यही करते कि वे प्रकाशमें न आयें। पर भक्तोंसे उनके सहज प्रेमके कारण उनका प्रकाश कभी-कभी हो ही जाता।

एक बार उनके भक्त श्रीउमाशंकर अग्रवाल बरेली जाते समय उनसे आज्ञा लेने गये। उन्होंने जानेको मना किया, पर जरूरी कामकी वजहसे उन्हें जाना पड़ा। उन्हें विदा करते समय बाबाने कहा- 'मङ्गल हो।' दूसरे दिन अखबारोंमें उस गाड़ीके लड़ जानेकी खबर छपी, जिससे वे गये थे। उस समय उनकी पुत्री कुसुमजी बरसानेमें ही थीं। उन्हें उनके विषयमें चिन्ता होने लगी। तब बाबाने कहा- 'चिन्ता न करो। उमाशंकरजीकी कोई हानि न होगी।' पीछे पता चला कि जिस डिब्बेमें वे बैठे थे, उसके आगे और पीछेके डिब्बोंके बहुतसे लोग मारे गये, पर उन्हें खरोंच भी नहीं आयी।

कुसुमजीको भी एक बार बाबाने व्रजयात्रामें जानेको मना किया। फिर भी उन्होंने जानेकी सब तैयारी करली। जिस दिन वे जानेको थीं, उसी दिन उन्हें अचानक साँसका ऐसा दौरा पड़ा कि वे न जा सकीं। उस यात्रामें भीषण वृष्टिके कारण लोगोंको बहुत कष्ट उठाना पड़ा और बहुतसे लोग बीमार भी पड़ गये। तब बाबाने कहा- 'देख, जाती तो कितना कष्ट पाती।'

सन् १९६६ में जब बाबा बरसानेमें गबरी बाईकी धर्मशालामें रह रहे थे, हीरालालजीने वहाँ एक भण्डारेका आयोजन किया। धर्मशालाके मैनेजर श्रीगौरी पण्डित उसका प्रबन्ध कर रहे थे। बाबाने उनसे कहा- 'भट्टीपर टीन और पंगतको

जगह शामियाने डलवा लेना।' बैसाखका महीना था। उस समय वृष्टिको कोई आशङ्का थी नहीं। इसलिए हीरालालजीने गौरी पण्डितको बाबाको इस बातपर विशेष ध्यान न देनको कहा। पर, गौरी पण्डितसे बाबाकी आज्ञाकी अवहेलना न हो सकी। उन्होंने टीन और शामियाना डलवा दिया।

जब लड्डू बन चुके और पुरियाँ उतारी जा रही थीं, इतनी जोरकी वर्षा हई कि यदि व्यवस्था न की गयी होती तो भट्टीपर काम करना असम्भव हो जाता और पंगत भी निर्धारित स्थानपर न हो सकती।

मथुराके श्रीचन्दन चौबे बहुत बड़े गायक थे। एक बार बाबा उनका लीला-गान सुन रहे थे। गान बड़ा मधुर था, बाबा उसे सुन भाव-मग्न हो रहे थे। उसी समय किसीने कहा- 'चौबेजीके कोई लड़का नहीं हैं। बिचारे दुःखी हैं। भावाविष्ट अवस्थामें बाबाके मुखसे निकला - 'लड़का होगा, होगा, होगा।' तीन बार 'होगा-रंगा' कहनेके परिणामस्वरूप उनके तीन लड़के हुए। चन्दन चौबे बाबाके भक्त हो गये। अन्त तक गान द्वारा उनकी सेवा करते रहे। उन्हींसे गान-विद्या सीखकर बाबा स्वयं अच्छे गायक बने।

सम्वत् २०३३ फाल्गुन कृष्णपक्ष प्रतिपदाके दिन ६७ वर्ष व्रजवास करनेके पश्चात् ८१ वर्षकी अवस्थामें गोवर्धनकी तलहटीमें बाबाने नित्य-निकुञ्जमें प्रवेश किया। कुछ दिन पहलेसे वे अस्वस्थ थे। उस दिन प्रातः जब सेवक औषधि लेकर आया, उन्होंने कहा- 'औषधि नहीं लूँगा। आज मुझे जाना है।'

उसी समय वे उठकर बैठ गये। सेवकने मसनद लगादी। वे राधा नामका जप करते रहे। उनका कण्ठ तब तक चलता रहा, जब तक उनका श्वास चलता रहा।

बाबाके जीवनके तीन अभिन्न अङ्ग थे - धाममें वास, महावाणीका पाठ और राधा-नामका जप। उन्होंने व्रजधामका एक दिनको भी परित्याग नहीं किया। एक बार निम्बार्क सम्प्रदायके एक सन्त श्रीदीनजीने उनसे कहा- 'मेरा मन प्रयागके कुम्भ मेलेमें जानेको बहुत कर रहा है। वैसे तो मैं धाम छोड़कर कहीं जाता नहीं, पर मैं समझता है कि कुम्भके पावन अवसरपर तीर्थराज प्रयागको जानेमें कोई हर्ज नहीं। अपकी क्या राय है?'

बाबाने उत्तर दिया- 'व्रजधाममें एक पल वास करनेका जो फल है वह हजार बार कुम्भके पर्वपर प्रयागराजमें वास करनेका भी नहीं है। मैं तो किसीको मरकर भी व्रजसे बाहर जानेकी सलाह नहीं दूंगा।'

महावाणीका पाठ बाबा नित्य करते। जङ्गलमें रहते समय इतने ऊँचे स्वरमे पाठ करते कि दूर-दूरके लोग भी उसे सुन पाते।

राधा-नामका उनका जप तो सर्वदा स्वतः ही होता रहता। उसके कारण उनका कण्ठ सदा स्पन्दित रहता। उनके शरीर छोडनेके कुछ दिन पूर्व भक्तश्रेष्ठ श्रीजगनथदासजी भक्तमाली उनके दर्शन करने गये थे। उन्हें अस्वस्थ देख उन्होंन उन्हें हनुमान चालीसाका पाठ करनेका परामर्श दिया था। उत्तरमें उन्होंने कहा था- 'भइया, मैं श्रीराधा-नामका जप करता हूँ। उसीमें सब कुछ मान लेता है। उन दिनों जो कोई उपदेशके लिए उनके पास आता था उसे वे श्रीमद्भागवत्का निम्नांकित श्लोक पढ़कर सुनाते थे-

'संसारसिन्धुमतिदुस्तरमुत्तितीर्षोनन्यिः' प्लवो भगवतः पुरुषोत्तमस्य । लीलाकथारसनिषेवणमन्तरेण पुंसो भवेद् विविधदुःखदवार्दितस्य ।।

(जो लोग अत्यन्त दुस्तर संसार-सागरसे पार होना चाहते हैं, अथवा जो अनेकों प्रकारके दुःख-दावानलसे दग्ध हो रहे हैं, उनके लिए पुरुषोत्तम भगवन्को लीला-कथा-रूप रसके सेवनके अतिरिक्त और कोई नौका या साधन नहीं है। वे केवल-रसायनका सेवन करके ही अपना मनोरथ सिद्ध कर सकते हैं।)

शरीर छोड़नेक कुछ दिन पहले बाबाने यह भी कहा था- 'पण्डित बाबाकी कृपासे ही मेरा व्रज-धाममें वास हुआ है। उनके प्रथम दर्शन मुझे गोवर्धनमें हुए थे। इसलिए मेरा अन्तिम संस्कार गोवर्धनमें ही होना चाहिये।' गोवर्धनमें जिस स्थानपर उनका संस्कार हुआ, उसका भी उन्होंने पहले ही इंगित कर दिया था। उस स्थानपर उन्हें श्रीजीकी विशेष कृपा हुई थी, जिसके फलस्वरूप वे कई दिन अप्रकृतिस्थ रहे थे।

पण्डित रामकृष्णदास बाबाकी प्रतिमूर्ति श्रीप्रियाशरण बाबाने उन्हींके पथका अनुसरण करते हुए न कोई आश्रम बनाया, न किसीको मन्त्र-शिष्य किया। अपने अनन्य भक्त बरसानेके श्रीबनवारीलाल ब्रजवासीकी सेवासे वे बहुत प्रसन्न थे। उनके बारेमें कहा करते- 'यही मेरा एकमात्र शिष्य, सेवक और पुत्र है।' उन्होंने ही उनकी पूर्व-आज्ञाके अनुसार उनका अन्तिम संस्कार किया।

प्रेम और भक्ति — जीवन-संदेश

ईश्वर-प्रेम की अनुभूति भक्त-साहित्य का एक महत्त्वपूर्ण विषय है। इन प्रसंगों को श्रद्धा, संवेदनशीलता और समर्पण के संदर्भ में पढ़ा जा सकता है।

कथा का सार

श्रीप्रियाशरण बाबाजी की कथा भक्ति, विनम्रता और साधना पर मनन करने का अवसर देती है। इस संग्रह में अन्य भक्तों के जीवन-प्रसंग भी पढ़ें।