ब्रज के भक्त भाग 3 · अध्याय 99

श्रीफूल बाबाजी

श्रीफूल बाबाजी की प्रेरक हिंदी कथा। जानिए उनके जीवन, भक्ति और साधना से जुड़े महत्वपूर्ण प्रसंग।

श्रीफूल बाबाजी
श्रीफूल बाबाजी — ब्रज के भक्त भाग 3

श्रीफूल बाबाजी का यह भक्त-चरित्र ब्रज की साधना, श्रद्धा और जीवन से जुड़े प्रसंगों को सामने लाता है। नीचे कथा को अलग-अलग विषयों में व्यवस्थित किया गया है।

जन्म, परिवार और प्रारम्भिक जीवन

( वृन्दावन)

श्रीइन्दुभूषण बसुका जन्म सम्वत् १९७६ में बँगालके जिला बाखरगंजमें हुआ। अठारह वर्षकी अवस्थामें उन्होंने इण्टरमीडियेट और मध्यमाकी परीक्षाएँ पास कीं। इन परीक्षाओंमें उत्तीर्ण होनेके पश्चात् भौतिक उन्नतिके सारे मार्ग उनके लिए

खुल गये। उनकी तीक्ष्ण बुद्धि, अच्छा स्वास्थ्य, परिश्रमी स्वभाव और उच्च शिक्षाके लिए उपलब्ध आवश्यक पारिवारिक सुख-समृद्धिपूर्ण भविष्यकी सूचना देने देंगे।

कोई कहता कि वे उच्च कोटिके विद्वान बनेंगे, कोई कहता कि वे एक सफल वकील या बैरिस्टर बनेंगे: कोई कहता, वे एक यशस्वी समाजसेवक और नेता बनेंगे। पर कोई भी कल्पना न कर सका कि वे बीस-बार्डस वर्षकी अल्पावस्थामें ही वृन्दावनके बाँके बिहारीके शृङ्गारके लिए फूलोंकी चोरी करनेवाले फूल बाबा बनेंगे।

पर, इसमें आश्चर्यकी कोई बात नहीं। बाँकेबिहारीका प्रभाव ही कुछ इस प्रकारका है। जिसकी उनके ऊपर एक बार दृष्टि पड़ जाय. जिसके मानस पटलपर उनकी बाँकी छवि एक बार उदय हो जाय, जिसके कर्ण-कुहरमें उनके नाम-गुण, रूप, लीला-कथाकी ध्वनि एक बार गुज जाय, उसका लौकिक दृष्टिसे सबकुछ एकदम उलट-पुलट हो जाना कोई असाधारण बात नहीं।

इन्दुभूषण पिता श्रीनिशिकान्त बसु बड़े कृष्ण-भक्त थे। इसलिए, वृन्दावनके बाँकेबिहारीसे अल्पावस्थामें ही उनका परिचय हो जाना स्वाभाविक था। जबसे उनका परिचय प्राप्त हुआ, तभीसे उन्हें प्रतीत होने लगा कि उनके यथार्थ बन्धु आत्मीय स्वजन वे ही हैं, उनका धाम ही अपना धाम है, उनकी सेवा ही अपना धर्म है।

जैसे-तैसे विद्यार्थी-जीवनके कुछ दिन व्यतीतकर बीस वर्षकी अवस्थामें वे कलकत्तेके नगेन्द्र मठके विष्णुस्वामी सम्प्रदायके सन्त श्रीयुग ध्यानप्रकाशजी महाराजसे गोपाल-मन्त्रमें दीक्षा लेकर ब्रज चले गये। गुरुदेवने नाम रखा श्रीज्योतिप्रकाशदास। पर, व्रजमें वे फूल बाबाके नामसे पुकारे जाने लगे; क्योंकि सेठोंके बगीचोंसे बिहारीजीके शृङ्गारके लिए फूल चुराकर लाना ही उनकी मुख्य सेवा और भजन था।

पर, बाँकेबिहारीकी फूल-सेवा उन्हें व्रजमें आते ही नहीं मिल गयी। बाँकेबिहारीकी सेवाका रास्ता इतना सहज और सीधा थोड़े ही है। वह भी बाँकेबिहारीकी तरह कुछ बाँका-टेढ़ा ही है। व्रजमें आकर श्रीफूल बाबा कुछ दिन वृन्दावनमें रहे। फिर सीधे नन्दगाँव चले गये, यह जानकर कि नन्दगाँव नन्दलालका निज घर है। वहाँ सखाओंके साथ खेलते-कूदते या गो-चारणके लिए नन्द-भवनसे आते-जाते उनक दर्शन सहज में हो सकेंगे। पर, वहाँ कहीं भी उनके दर्शन न हुए।

जब खोज-खोजकर हार गये, तब उन्होंने प्राण त्याग करनेका निश्चयकर अनशन आरम्भ कर दिया। साधु-महात्माओंके बहुत समझानेपर भी अनशन नहीं

छोड़ा। तब एक दिन बाँकेबिहारीने स्वप्नमें दर्शन देकर कहा-'मेरा दर्शन ह नहीं, प्रेमसे होता है। कल यहाँसे उत्तर दिशामें चले जाना।'

बाँकेबिहारीने अपना रास्ता आप ही बता दिया। नन्दगाँवसे उत्तर दिशाणे हादिनी शक्ति प्रेमस्वरूपिणी राधारानीका स्थान है। नन्दलाल सब प्रकारसे प्रेमके बरसाना है। नन्दग्रामका प्रकृत रास्ता बरसाना होकर ही है। बरसाना नन्दलालकी अधीन है। इसलिए प्रेमकी अधिष्ठात्री देवी राधारानीके अधीन हैं। उनके संकेतक बिना वे कुछ भी कर सकनेमें लाचार हैं। उनकी कृपा प्राप्त करनेके लिए, राधारानीकी कृपा प्राप्त करना अनिवार्य है।

बाबा वृषभानुनन्दिनीका स्मरण करते हुए बरसानेकी ओर चल दिये। वे जैसे ही सिंहद्वारपर पहुँचे, उन्होंने देखा कि एक व्यक्ति उनके लिए राधारानीके प्रसादका

दिव्य अनुभूति और कृपा के प्रसंग

थाल लेकर वहाँ खडा है। राधारानीको इस रूपमें बाबाका स्वागत करना ही था. क्योंकि उन्हें स्वयं नन्दलालने उनकी शरणमें जानेके लिए प्रेरित किया था।

राधारानीका दिव्य प्रसाद प्राप्तकर उन्होंने अपना कई दिनोंसे चला आ रहा अनशन समाप्त किया।

उस प्रसादको प्राप्तकर उन्हें एक नया बल, नयी स्फूर्ति प्राप्त हई। उन्हें लगा कि करुणामयी राधारानीकी शरणमें जाते ही उन्होंने अपना करुणा-वारिधि उनके ऊपर उड़ेल दिया है। वे इस प्रकार उनके करुणा-वारिधिसे अभिषिक्त हो, उनके भावमें दिन-रात डूबे रहकर बरसानेके निर्जन और सुरम्य सांकरीखोरमें भजन करने लगे। वे हर समय भाव-समाधिमें डूबे रहते। उनके आहारादिकी चिन्ता स्वयं राधारानीको करनी पड़ती। वे कभी किसीको, कभी किसीको प्रेरणा देकर प्रसाद उनके पास पहुँचा दिया करतीं। कभी-कभी तो वे स्वयं ही ब्रजवासी बालिकाके रूपमें खानेकी सामग्री ले उनके पास उपस्थित होतीं।

राधारानीको इस प्रकार कष्ट करते देख उन्होंने मधुकरीके लिए जाना आरम्भकर दिया। कुछ दिन साँकरीखोरमें भजन करते और राधारानीको अनुपम कृपाका अनुभव करते हुए बीत गये, तो उन्हें बाँकेबिहारीकी याद फिर उद्वेलित करने लगी। वे राधारानीका कृपा-आशीर्वाद लेकर वृन्दावन पहुँचे।

वृन्दावनमें निधिवन नामक स्थान है, जहाँ प्रिया-प्रियतम सखियों सहित आज भी रास-विलास करते हैं। आज भी उनके भाग्यवान भक्त वहाँ उनके दर्शनकर कृतार्थ होते हैं। बाबा वहाँ युगलके दर्शन प्राप्त करनेकी लालसासे सोहनी-सेवा करने लगे। इस भावसे कि यह प्रिया-प्रियतमके रास-विलासकी भूमि

। यहाँ प्रिया-प्रियतम नित्य रात्रिमें रास करते हैं, वे उसे झाड़-बुहारकर उसके क-कंकड़ बीनकर उसे स्वच्छ और स्वच्छ और सुकोमल रखने लगे।

फूलबाबा निरन्तर यह भावना करते कि वे राधारानीकी प्रिय सखी हैं। इसी किबिहारी के शृङ्गारके लिए जहाँ-तहाँसे फूल चुनकर लाते। उन्हें जहाँ, जिस बसे वे निधिवनमें सोहनी-सेवा करते और बाँकेबिहारीके मन्दिरमें फूल-सेवा। उनके लिए वृन्दावनके सभी स्थान वृन्दावन-बिहारीके थे और वहाँके सभी फूल कोठी या बगीचे में सुन्दर फूल खिले दीख पड़ते, उसीमें घुसकर फूल तोड़ने लगते। उनकी सेवाके लिए खिलते थे। इसलिए, उन्हें कहींसे फूल तोडनेमें सङ्कोच नहीं सुननी पडती कभी मारतक खानी पडती। एक बार तो उन्हें हवालात की हवा भी सेता था, पर उनके भावको सब लोग नहीं समझते थे। इसलिए, उन्हें कभी गालियाँ खानी पड़ी। पर, उन्होंने यह सेवा नहीं छोडी। कुछ दिन बाद सेठ हरगुलालने उन्हें बिहारीजीके बगीचेसे फूल तोड़नेकी छूट दे दी।

तब उन्होंने दूसरे बगीचोंसे फूलोंकी चोरी करना बन्द कर दिया।

कोई कार्य शुभ है या अशुभ, प्रभु उससे प्रसन्न हैं या अप्रसन्न, उसके परिणामसे जाना जाता है। फूल बाबाकी फूल-सेवाके फलस्वरूप उन्हें युगलकी जो कृपा मिली, उससे अनुमान लगाया जा सकता है कि प्रभु उनके चोरीके फूलोंसे कितना प्रसन्न थे।

प्रिया-प्रियतमको जब किसी भक्तपर कृपा करनी होती है, तब योगमाया उसके लिए भूमिका तैयार कर देती हैं, उसके अनुकूल किसी लीला-विशेषका सृजन कर देती हैं। एक दिन जब निधिवनमें रास-नृत्य हो रहा था, नृत्य करते-करते प्रियाजीके गुपुर बिखर गये। सखियोंने उन्हें सपेटा और पिरोकर प्रियाजीको पहना दिया। नृत्य समाप्त होनेपर प्रियाजीने नूपुरों को गिना। एक नूपुर कम था। सखियाँ उसे खोजनेमें कुट गयीं। बहुत खोजनेपर भी वह न मिला।

सेवा, प्रसाद और समर्पण की घटनाएँ

दूसरे दिन रास आरम्भ होनेसे पूर्व प्रियाजीने सखियोंसे कहा-'प्रातःकाल फूलसखी निधिवनमें नित्य सोहनी-सेवा करती है। उसे आज सोहनी-सेवा करते समय नूपुर अवश्य मिला होगा। तुम उसके पास जाकर नूपुर ले आओ।'

उधर फूलबाबा भाव-समाधिमें देख रहे हैं कि उन्हें सखीरूपमें रासमण्डलमें सोहनी-सेवा करते समय राधारानीका नूपुर मिला है। वे सोच रहे हैं कि सखियाँ अके पास नूपुर माँगने आयेंगी, तो वे क्या कहेंगे। उसी समय सखियाँ उनके पास पहुंची और पूछा- 'तुम्हें सोहनी-सेवा करते समय श्यामाजीका नूपुर मिला है?'

कैसे जान? दोनोंके चरण देखकर उनके नुपुरोंसे मिलान करूं तभी न पता चले कि फूलसखीने कहा- 'नूपुर तो मिला है. पर वह श्यामका है या श्यामाका, पै नूपुर किसका है। में मिलाकर दुखूँगी। नूपुर जिसका होगा उसीको दूँगी।'

श्यामाजीसे जाकर जब सखियोंने यह कहा, तो उन्होंने फूलसखीको बुल भेजा। उसने कहा- 'देख री, नूपुर मेरा खोया है. श्यामका नहीं। नूपुर मुझे दे दे।

फूलसखीने अपना हठ फिर भी न छोडा। तब श्याम और श्यामा दोनो अपने-अपने चरण उसके आग बढ़ा दिये। फलसखीकी जन्म-जन्मान्तर की साध मिट गयी। नील और करुण चरण-कमल-द्रयको प्राप्तकर उसका भाव-समुद्र उमद पड़ा। प्रेमाश्रओंके अर्घ्यके उनका प्रच्छालनकर उसने अपने प्राण-पुष्प उनपर चढ़ा दिये। नूपुर तो राधारानीको दिया ही अपने मन और प्राण भी सदाके लिए उनके चरणोंमें समर्पित कर दिये।

जब बाबाकी भाव-समाधि भंग हई और उन्हें श्यामा-श्याम सामने न दीखे तो उनकी विरहाग्निने और भी प्रचण्ड रूप धारण किया। वे उन्मत्तकी भाँति 'ता कृष्ण! हा राधे!' कहकर प्रलाप करते और अश्वविसर्जन करते बाह्यज्ञान रहित ते इधर-उधर डोलने लगे। इस अवस्थामें उन्हें कभी श्रीकृष्णकी वंशी-ध्वनि सुनायी पड़ती, कभी रास-लीलाके दर्शन होते और कभी युग अपनी एक झलक दिखाते और अन्तर्धान हो जाते।

यह आँख-मिचौलीका खेल कुछ दिन चलता रहा, पर यह कब तक चलता रह सकता था? बाबाका पार्थिव शरीर आँख मिचौलीके अपार्थिव झटकोंको कब तक सहन कर सकता था? संवत् २००३ आश्विनका महीना था। प्रभुने उद्दे अपने नित्य-धाममें बुला लेनेका विचार किया। उन्हें थोड़ा ज्वर हुआ। उसके साथ-साथ उन्हें आभास हुआ कि प्रभु उन्हें अपने निकट बुला लेनेको व्यग्र हो रहे हैं। इन्होंने सेवाकुञ्ज और ज्ञान-गुदड़ीकी रज मँगवाकर बिहारीजीके बगीचेमें अपने लेटनेके लिए रजकी शैय्या बनवायी। उसी समय बिहारीजी पधारे उन्हें ले जानेको। उन्होंने देखा और गुड़का भोग लगाकर उनका सत्कार किया। सेवकोंसे कहा हाथ धुलानेको। सेवक हाथ धुलाते समय हाथ गुड़से सना देख अवाक् !

जैसे बिहारीजी उन्हें ले जानेको जल्दी कर रहे हों, हाथ धोकर वे तुरन रज-शैय्यापर लेट गये। सेवकोंने महामन्त्रका कीर्तन शुरू किया। बिहारीजीका चरणामृत उनके मुखमें दिया। बिहारीजी उन्हें अपने साथ ले गये। उनका पार्थिव शरीर व्रज-रजपर पड़ा रह गया। अपार्थिव सिद्धदेह नित्य-लीलामें प्रवेशकर गया। श्रीशचीनन्दनदास बाबा

बाबाकी फूलोंकी चोरीका यह परिणाम ! यहाँ कारागार, वहाँ मुक्ति और नित्य-लीलाका सुख अपार ! कितना अन्तर है व्यवहार और परमार्थक दो दृष्टिकोणोंमें

प्रेम और भक्ति — जीवन-संदेश

ईश्वर-प्रेम की अनुभूति भक्त-साहित्य का एक महत्त्वपूर्ण विषय है। इन प्रसंगों को श्रद्धा, संवेदनशीलता और समर्पण के संदर्भ में पढ़ा जा सकता है।

कथा का सार

श्रीफूल बाबाजी की कथा भक्ति, विनम्रता और साधना पर मनन करने का अवसर देती है। इस संग्रह में अन्य भक्तों के जीवन-प्रसंग भी पढ़ें।