ब्रज के भक्त भाग 3 · अध्याय 59
श्रीमाधवदास बाबाजी
श्रीमाधवदास बाबाजी की प्रेरक हिंदी कथा। जानिए उनके जीवन, भक्ति और साधना से जुड़े महत्वपूर्ण प्रसंग।

श्रीमाधवदास बाबाजी का यह भक्त-चरित्र ब्रज की साधना, श्रद्धा और जीवन से जुड़े प्रसंगों को सामने लाता है। नीचे कथा को अलग-अलग विषयों में व्यवस्थित किया गया है।
जन्म, परिवार और प्रारम्भिक जीवन
[ पूँछरी, गिरिराज ]
श्रीमाधवदास बाबाका जन्म संवत् १९२० के लगभग व्रजमें छटीकरा-के निकट सकराया ग्राममें एक गौड़ ब्राह्मण कुलमें हुआ। घरका नाम था मकुआ। बाल्यावस्थामें ही पिताका देहान्त हो गया। माँ उन्हें लेकर व्रजके अड़ींग ग्रामके पास अपने पीहर चली गयीं।
अड़ींगमें अद्वैतवंशके नीलमणि प्रभुके शिष्य पण्डित ग्यासीरामजी रहते थे। वे गृहस्थ होते हुए भी परम विरक्त थे। घरसे दूर एकान्तमें एक कुटियामें रहकर भजन करते थे। दो चार विद्यार्थी उनके पास पढ़ने आया करते थे। मकुआ भी उनके पास पढ़ने जाने लगे। श्रीसखीचरणदास बाबाजी
मकुआजी बडे भोले-भाले स्वभावके थे। परमार्थ विषयक जिज्ञासा उनमें वे अपने नाती-पोतोंसे भी अधिक उनसे स्नेह करने लगे। उनकी जिज्ञासाओंको पारम्भसे ही बडी प्रबल थी। यह देख ग्यासीरामजीका वात्सल्य उनपर उमड़ पड़ा। साज-सम्हारकर उनमें भक्तिका बीजारोपण करने लगे। मकुआ भी उनसे इतना हिल-मिल गये कि नाना-नानीको छोड उनके पास रहने लगे।
मकुआजीका हृदय जितना सुन्दर था उतना ही बाहा स्वरूप भी। गला भी उनका बड़ा मधुर था। रासमण्डलीमें राधारानीका स्वरूप धारण करनेके लिए वे बड़े उपयुक्त थे। यह देख एक रासमण्डलीके स्वामीने ग्यासीरामजीसे उन्हें अपनी रासमण्डलीमें शामिल करनेकी अनुमति माँग ली। वे रासमें राधारानीका अभिनय करने लगे। उनका सहज और स्वाभाविक अभिनय देख लोग अपनी सुध बुध खो बैठते।
रासमण्डलीमें रहते समय भी मकुआजी बडी पवित्रतासे रहते। त्रिसन्ध्या स्नानकर शालग्रामकी सेवा करते। शालग्रामकी बटिया एक बटुएमें रखा करते।
राधारानीका अभिनय करते-करते उनका हृदय भक्तिभावसे परिपूर्ण हो गया। किशोरावस्थामें ही ग्यासीरामजीसे मन्त्र-दीक्षा ले वे भक्ति-साधनामें जुट गये।
एक बार ग्यासीरामजीने मकुआ सहित अपने घरके सभी बच्चोंको चाँदीके कड़े पहनाए। कुछ दिन बाद गोवर्धनमें चकलेश्वरपर अखण्ड कीर्तन हुआ। मकुआजी कीर्तनमें गये। अपने कड़े साधु-सेवाके लिए वहाँ भेंट कर आये। ग्यासीरामजीके पोतेने उनसे शिकायत की - 'दादा कडूल साधुअन्न नै दै आयौ ।'
ग्यासीरामजीका रुष्ट होना तो दूर, वे यह सुनकर बहुत प्रसन्न हुए। बोले- 'मकुआकूँ ऐसौ-वैसौ मत जानियों। मकुआ महात्मा है। बाबाजी बनैगौ।'
मकुआजी सचमुच बाबाजी बनना चाहते थे। पर नाना-नानीने उनकी सगाई तय कर दी थी। जिससे वे संकटमें पड़ गये थे। गुरुजीके वाक्यको उन्होंने आशीर्वाद समझा। इससे उन्हें बल मिला और और उनका गृह-त्याग करनेका मार्ग प्रशस्त हुआ। छ। नत्र।
वे प्रति पूर्णमासीको गोवर्धन परिक्रमा किया करते थे। परिक्रमा करते समय गोविण्दकुण्डमें श्रीचैतन्यदास बाबाके दर्शन और उनका सत्संग करते थे। चैतन्यदास बाबा भी उनसे बहुत स्नेह करते और उन्हें भजन-साधनकी शिक्षा देते। मकुआजीने मन-ही-मन उनसे वेष लेनेको निश्चय कर लिया, यद्यपि वे किसीको वेष देते नहीं
थे। सगाई हो जानेके पश्चात् से से पूर्णमासी निकल गयीं, पर वे गोवर्धन परिक्रमाको नहीं गये। उन्हें चैतन्यदास बाबाके सामने जानेमें लज्जा लगती, जैसे सगाईकी छाप लग जानेपर वे विरक्त महात्माओंके संगके योग्य न रहे हों। तीसरी पूर्णमासीको चैतन्यदास बाबाने परिक्रमा कर रहे अडींग ग्रामके दूसरे व्रजवासियोंसे पूछा-'मकुआ क्यों नहीं आ रहा ?'
व्रजभूमि और तीर्थ से जुड़ी घटनाएँ
उन्होंने कहा- 'बाबा, उसकी तो सगाई हो गई। वह अब क्यों आने लगा ?'
यह सुन बाबा चिन्तामें पड गये। मकुआजीको व्रजवासियोंसे इसका पता चला, तो दूसरी पूर्णमासीको उनके पास गये। उन्हें देखते ही वे बोले- 'क्यों रे, तू इतनी पवित्रतासे रहता है। त्रिसन्ध्या स्नान करता है। तेरी बहू आयेगी, उसके बच्चा होगा, रोटी बनाते-बनाते बच्चा गोदीमें टट्टी कर देगा तो तू उसके हाथका खायेगा ?'
मकुआने कहा-'बाबा, आप ठीक कहते हैं। पर यदि मैं ब्याह न करूँ और बाबाजी बनूँ, तो आप वेष देंगे ? मैं और किसीसे वेष नहीं लेना चाहता। आप भेष दें तभी न मैं विवाहके बन्धनसे मुक्त रहकर भजन कर सकता हूँ।
बाबा चुप रहे। उनके मौनको स्वीकृति समझ मकुआजी प्रसन्न-मन घर लौटे। दूसरे दिन चुपचाप घरसे निकल गये और चैतन्यदास बाबाके पास जाकर उनसे वेष लिया। वेषका नाम हुआ माधवदास ।
वेष लेकर माधवदास बाबा गोवर्धनमें पुराने बिहारीजीके मन्दिर* में रहकर भजन करने लगे। माधवदास बाबा अभी बालक तो थे ही। एक बार उनके मनमें इच्छा जागी उस पारसमणिको निकालनेकी, जिसे उनके गुरुने पीपलके पेड़के नीचे गाड़ दिया था। उन्होंने पण्डित बाबासे इसके लिए स्वीकृति चाही। उन्होंने कहा- 'पारसमणि तो वह मन्त्र है, जो गुरुसे तुझे मिला है, जिसके प्रभावसे शिष्य स्वयं पारसमणि बनकर संसारको तार सकता है। तू पत्थरके पारसमणिको लेकर गुरुको कलंकित करना चाहता है। खबरदार जो उसकी कभी चिन्ता भी की।'
माधवदासने तब पारसमणिकी चिन्ता करना छोड़ दिया। पण्डित बाबा जब वृन्दावन चले गये, तब वे श्यामकुटीमें रहकर भजन करने लगे। कुछ ही दिनोंमें उन्हें गोपाल-मन्त्र सिद्ध हो गया।
श्रीरूपमाधुरीदासने अपने समयके व्रजके जिन सिद्ध सन्तोंका अपनी वाणीमें वर्णन किया है, उनमें माधवदास बाबा भी हैं। उनके सम्बन्धमें उन्होंने लिखा है-
* यह अब श्रीनाथजीका मन्दिर कहलाता है। श्रीसखीचरणदास बाबाजी
पूरो त्याग ओ विराग, नैना झलके अनुराग, जाको अति ऊँची भाग, ऐसो सन्त माघोदासजी ।
वज तज नहिं जावे, टूक माँग के जो खावै, हिय आनन्द मनावै रखे पैसा न पास
जी ।। बोलै अति मीठी बानी, प्रेमरस लपटानी, उन्हें जानी पूरो ध्यानी, रसिकन में खास जी ।
रहे पूँछरी स्थान, जाके नेक नहिं मान, हिय दीनता प्रधान, लखै दम्पति विलास जी ।।
( श्रीरूपमाधुरीशरणजीकी वाणी ३-३४)
माधवदास बाबा 'दम्पति-बिलास'का अनुभव करते और उसके रसमें छके रहते, इसमें सन्देह नहीं। उन्होंने एक बार श्रीगौरांगदास बाबाजी महाराजसे मणि-माणिक्य जटित, सुन्दर झाडियों और झरनोंसे युक्त दिव्य गिरिराजके अपने टर्शनकी बात कही थी। श्रीगौरांगदास बाबाजी महाराज अक्सर अपने भक्तोंसे उनकी चर्चा किया करते।
सेवा, प्रसाद और समर्पण की घटनाएँ
गोविन्दकुण्डपर सम्वत् १९९९ की नृसिंह चतुर्दशीके दिन रासलीला का चिन्तन करते-करते वे धाम पधारे। वहीं उनकी समाधि है। उनके शिष्य श्रीजगन्नाथदास बाबाने उनकी धाम-प्राप्तिपर चौरासी कोस व्रजका भण्डारा किया। जगन्नाथदास बाबाके अतिरिक्त उनके प्रधान शिष्य हैं श्रीराधामोहनदास बाबा, श्रीप्रह्लाददास बाबा और कालीदहके सुपण्डित महात्मा श्रीकिशोरीदास बाबा।
[ श्यामकुटी, वृन्दावन ]
वृन्दावनमें यमुना किनारे पानीघाटसे कुछ दूर परिक्रमा मार्गपर तरुपल्लवोंसे परिवेष्ठित एक सुशीतल, निर्जन स्थानमें 'श्यामकुटी' नामकी मनोरम पर्णकुटी है। कुटी बहुत प्राचीन है। उसमें श्यामा-श्यामके दो प्राचीन विग्रह हैं। किसी समय कोई प्राचीन महात्मा उसमें रहकर उनकी सेवा करते रहे होंगे। चालीस वर्ष पूर्व
श्रीमाधवदास बाबा उसीमें रहकर सहचरी भावसे उनकी सेवा करते थे। सेवा-सुखमे श्रीहंसदास और श्रीग्वारिया बाबा जैसे महात्मा भी उनका संगकर सुखी होते थे। निरन्तर छके रहते थे। सभी रसिक महानुभाव उनसे प्रेम करते थे। श्रीअवधदास
श्रीरूपमाधुरीदासने उनके सम्बन्धमें लिखा है-
जाको शील है सुभाव, सब रसिकन में भाव, दर्श किये सुख पाव, ऐसो सन्त माधवदास जू ।
राजे श्यामकुटी स्थान, नेक नहिं अभिमान, मन प्रेम की छकान, बोले बानी मृदु हाँस जू ।।
(श्रीरूपमाधुरीजीकी वाणी ३-१६)
व्रजमें ही दाऊजीके पास कारो ग्राममें ब्राह्मण कुलमें उनका जन्म हुआ था। वे गौर वर्णके थे, इसलिए लोग उन्हें 'भूरे' पुकारते थे। बचपनमें ही वैराग्य हो जानेके कारण वे वृन्दावन चले आये थे और श्रीराधिकादासजी महाराजसे वेष लेकर भजन करने लगे थे। राधिकादास निम्बार्की सम्प्रदायके उद्धव घमण्डदेवाचार्यजीके द्वारेकी परम्परामें पंचमालाधारी निर्मोही अखाड़ेके श्रीमहन्थ थे। वे नागाओंकी जमात लेकर जगह-जगह घूमा करते थे। पर माधवदास बाबाने उनसे व्रजके बाहर उन्हें कहीं न ले जानेकी प्रार्थना की थी। उन्होंने उसे स्वीकार कर व्रजमें ही रहकर भजन करनेकी आज्ञा दे दी थी।
माधवदास बाबा बड़े वैराग्यसे रहते। दो दिनमें एक बार भोजन करते। मधुकरीको न जाते। जो अपने आप आ जाता उसीसे ठाकुर-सेवा करते। वृदावनकी नित्य परिक्रमा करते। नित्य युगल-शतक और महावाणी-का पाठ करते। संध्या-आरतीके पश्चात् सामूहिक कीर्तन करते। कुटियाके पास किसीको धूम्रपान और सांसारिक वार्त न करने देते। कोई उनके लिए आश्रम बनानेको कहता तो मनाकर देते। कहते - 'ठाकुरको यह झोंपड़ी ही अच्छी लगती है। ये महलोंमें नहीं रहना चाहते।' कोई उनसे वेश लेना चाहता तो कहते- 'पहले संसारकी तरफसे मरकर आओ, नहीं तो यहाँ प्रपञ्च फैलाओगे' और उसे तब तक वेश न देते, जब तक वह संसारसे नाता पूरी तरह न तोड़ लेता।
सन्तोंमें उनकी बड़ी निष्ठा थी। जहाँ-कहीं सन्तोंका भण्डारा होता, वहाँ जाकर उनकी चरणरज अपने माथेपर चढ़ाते। कोई प्रसाद ग्रहण करनेको कहता तो कणिका मात्र लेकर प्रसादका सम्मान कर देते।
वैराग्य और विवेक — जीवन-संदेश
वैराग्य का भाव केवल वस्तुओं से दूरी नहीं, बल्कि जीवन के उद्देश्य पर स्पष्ट दृष्टि रखना भी है। पाठ में आए प्रसंग पाठक को अपने व्यवहार और प्राथमिकताओं पर सोचने का अवसर देते हैं।
कथा का सार
श्रीमाधवदास बाबाजी की कथा भक्ति, विनम्रता और साधना पर मनन करने का अवसर देती है। इस संग्रह में अन्य भक्तों के जीवन-प्रसंग भी पढ़ें।