ब्रज के भक्त भाग 3 · अध्याय 74

श्रीमदनमोहनदास बाबाजी

श्रीमदनमोहनदास बाबाजी की प्रेरक हिंदी कथा। जानिए उनके जीवन, भक्ति और साधना से जुड़े महत्वपूर्ण प्रसंग।

श्रीमदनमोहनदास बाबाजी
श्रीमदनमोहनदास बाबाजी — ब्रज के भक्त भाग 3

श्रीमदनमोहनदास बाबाजी का यह भक्त-चरित्र ब्रज की साधना, श्रद्धा और जीवन से जुड़े प्रसंगों को सामने लाता है। नीचे कथा को अलग-अलग विषयों में व्यवस्थित किया गया है।

व्रजभूमि और तीर्थ से जुड़ी घटनाएँ

[ वृन्दावन, छेत्रवन ]

नोवाखाली जिलेके मदनपुर ग्रामके ब्राह्मणकुलमें जनमें नवनीतकुमार सेनापतिके पुत्र श्रीमनोरञ्जन सेनापतिके प्रारम्भसे ही भक्तिके प्रबल संस्कार थे। उन्हें जब नवद्वीप संस्कृत पढ़ने भेजा गया, तो वहाँके अनुकूल वातावरणमें उन्हें और अधिक पनपनेका अवसर मिला। वहाँ वे रानी चौढ़ाकाके सिद्ध सन्त श्रीनित्यानन्ददास बाबाका संग करते। उनके मुखसे हरिकथा सुनते-सुनते भावाविष्ट हो जाते।

विद्याध्ययन समाप्त हुआ ही था कि घरसे संवाद आया- 'तुम्हारा विवाह-सम्बन्ध तय हो गया है। १२ दिन बाद अमुक तिथि विवाहके लिए निश्चित की गयी है। पत्र प्राप्त करते ही घर चले आओ।'

किसी भी नवयुवकके लिए, जब वह विद्यार्थी-जीवन समाप्त कर चुका हो, इससे अच्छा संवाद और क्या हो सकता है ? पर, मनोरञ्जन सेनापतिका तो मनोरञ्जन समाप्त हो गया। विषादकी काली घटायें उनके ऊपर छा गयीं। उन्हें लगा कि माया पिशाचीने उन्हें अपना ग्रास बनानेके लिए जाल फेंका है। वे उससे बचनेका उपाय सोचने लगे। तीन दिन निराहार पड़े रहकर प्रभुसे प्रार्थना करते रहे। तीसरे दिन स्वप्नमें अद्वैत प्रभुने आदेश किया- 'तुम व्रजधाम चले जाओ। व्रजबाड़ीके श्रीकृष्णदास बाबाका आश्रय लो।'

भजन-साधना और नाम-स्मरण के प्रसंग

उसी समय मन-ही-मन माता-पिताको सदाके लिए प्रणामकर वे वृन्दावन चल दिये। रेलगाड़ीसे हाथरस पहुँचे। वहाँसे पैदल चलकर पूछते-पूछते व्रजवाड़ी । रोते-रोते श्रीकृष्णदास बाबाके चरणोंमें गिरकर दीक्षा और वेश देनेकी प्रार्थना की। बाबाने प्रार्थना स्वीकार नहीं की। तो दो दिन पेड़के नीचे निराहार पड़े रहे। अन्तमें उनकी व्याकुलता देख बाबाने उनकी मनोकामना पूर्ण की। दीक्षा और वेश देकर नाम रखा श्रीमदनमोहनदास ।

मदनमोहनदास बाबा गुरुके निकट रहकर उनकी सेवा और भजन करते रहे। एक बार भजनमें ऐसा आवेश हुआ कि दो दिन तक लगातार एक आसनपर ध्यानमग्न बैठे रहे।

कुछ दिन बाद गुरुजी अन्तर्धान हो गये। उनके विरहमें वे कई दिन तक व्रजके कल्पतरुओंसे लिपट-लिपटकर और रो-रोकर अपना दुःख निवेदन करते रहे। एक दिन तन्द्रावस्थामें गुरुदेवने आज्ञा की 'वृन्दावन जाकर पण्डित रामकृष्णदास बाबाके आनुगत्यमें भजन करो।'

तब वे वृन्दावन चले गये और शाहजहाँपुरकी बगीचीमें रहकर पंडित बाबाके आनुगत्यमें भजन करने लगे। वे अपना भजन बहुत गुप्त रखते। भजनमें वे गीताके 'या निशा सर्वभूताना' श्लोककी सजीव मूर्ति थे। सारी रात भजन करते, दिनमें विश्राम करते। रात ८% बजे भजनमें बैठते और लीला-चिन्तनमें सारी रात व्यतीत करते। निशान्त-लीला समाप्तकर आसनसे उठते। शौच और स्नानादिसे निवृत्त हो, फिर २९% बजे तकके लिए भजनमें बैठ जाते। आधा घण्टा कीर्तन कर १ बजेसे ४ बजे तक विश्राम करते। ४ बजे पण्डित बाबाके सत्संगमें जाते। उसके पश्चात् मधुकरीको जाते। मधुकरीसे लौटकर १४ घण्टा विश्राम करते। ८ बजे फिर भजनमें बैठ जाते।

दिव्य अनुभूति और कृपा के प्रसंग

पण्डित बाबाके सिवा वे और किसीका संग न करते। गुदड़ी और करुएके सिवा और कुछ पास न रखते। उनके नेत्र सदा भींगे रहते। मुखारविन्द अन्तःकरणमें व्याप्त किसी अलौकिक वस्तुके तेजसे जगमगाता रहता।

लगभग १४ वर्ष इसी प्रकार भजन करते हुए वृन्दावनमें व्यतीत कर वे छत्रवन चले गये। वहाँ सम्वत् १९८४ में श्रावण, शुक्लपक्ष द्वादशीको निशांत लीलाके श्रीउपरान्त ९६ वर्षकी उम्रमें नाम जप करते श्रीधाम पधारे।

नाम-स्मरण और एकाग्रता — जीवन-संदेश

नाम-स्मरण, भजन और एकाग्रता के प्रसंग साधना की निरंतरता की याद दिलाते हैं। यहाँ वर्णित जीवन-अनुभवों से पाठक अपनी साधना के लिए प्रेरणा ले सकते हैं।

कथा का सार

श्रीमदनमोहनदास बाबाजी की कथा भक्ति, विनम्रता और साधना पर मनन करने का अवसर देती है। इस संग्रह में अन्य भक्तों के जीवन-प्रसंग भी पढ़ें।