ब्रज के भक्त भाग 3 · अध्याय 90

श्रीललितकिशोरीजी एवं श्रीललितमाधुरीजी

श्रीललितकिशोरीजी एवं श्रीललितमाधुरीजी की प्रेरक हिंदी कथा। जानिए उनके जीवन, भक्ति और साधना से जुड़े महत्वपूर्ण प्रसंग।

श्रीललितकिशोरीजी एवं श्रीललितमाधुरीजी
श्रीललितकिशोरीजी एवं श्रीललितमाधुरीजी — ब्रज के भक्त भाग 3

श्रीललितकिशोरीजी एवं श्रीललितमाधुरीजी का यह भक्त-चरित्र ब्रज की साधना, श्रद्धा और जीवन से जुड़े प्रसंगों को सामने लाता है। नीचे कथा को अलग-अलग विषयों में व्यवस्थित किया गया है।

जन्म, परिवार और प्रारम्भिक जीवन

[ वृन्दावन ]

सन् १८५७ के विप्लवकी सन्ध्या है। भारतीय सेनानी हार चुके हैं। बिटिश यवनके शाह कुन्दनलाल (श्रीललितकिशोरीजी) पर भी बागियोंका साथ देनेका सरकार चुन चुनकर लोगोंको फाँसी दे रही है. जिन्होंने विद्रोहियोंका साथ दिया था। योग है। उनके नाम वारंट जारी है। वे वृन्दावनसे नावके मार्गसे अगणित के साथ कीर्तन करते हुए मथुरा-कचहरी पहुँच गये हैं। आज मजिस्टेटके मेने उनकी पेशी है। कोर्ट खचाखच दर्शकोंसे भरा है। सबके चेहरोंपर उदासी हुई है। सब कुन्दनलालजीके लिए भगवानसे प्रार्थना कर रहे हैं, पर वरलालजी शान्त और निरुद्विग्न खडे हैं। वे जैसे तटस्थ भावसे प्रभुकी इस होलाका दर्शन कर रहे हैं। उनकी उस समयकी मनोवृत्तिका परिचय मिलता है उस समयकी उन्होंकी इस रचनासे-

श्रीवन-वीथिनके प्यारे हम दबते नहीं सवारोंसे । मिहतर हू से कमतर यद्यपि बिहतर शाह हजारोंसे ।।

भौह निशाने चढ़ि क्या डरना तलवारोंके वारोंसे ।

'ललितकिशारी' दरपर हाजिर खतरा क्या सरकारोंसे ।।

श्यामसुन्दरकी भौंहसे भी पैना क्या कोई अस्त्र है? जो एक बार उन भौंहोंका देशाना बन चुका उसे तलवारों और सवारोंसे क्या डर ?

शाह कुन्दनलालको शपथ दिलायी गयी। थोड़ी देरको कोर्टमें खामोशी छा गयी। उसी समय गूंज उठा अँग्रेज मैजिस्ट्रेटका गम्भीर स्वर-

'कुन्दनलाल, तुम बागी हीरासिंहको जानता है ?'

'जी सरकार।'

'तुम गदरके वक्त उसको और उसका सब आदमीको अपना घर रखा ? अका खातिर किया ?'

'जी सरकार।'

'तुम जानता है बागीका साथ देना जुर्म है ?'

'जी सरकार।'

'तुम जानता है उसका सजा क्या है ?'

'जी सरकार, फाँसी।'

जाइकाल

'ऐसा जानकर फिर तुम उसका साथ क्यों दिया ?'

'सरकार, मैने उसका साथ नहीं दिया। साम-दामसे उसको अपने वशमे कर चजको उसकी लूट-पाटसे बचा लिया। मैंने एक ओर अपनी सैन्य-शक्तिका प्रदर्शन किसी प्रकारका उपद्रव नहीं करेगा। राजाका फर्ज है प्रजाकी रक्षा करना, प्रजाका किया। दूसरी ओर उसकी आवभगत कर उससे वचन ले लिया कि वह व्रज-क्षेत्रमे मार-काटसे उसे बचाकर प्रजाके प्रति अपना फर्ज अदा करनेमें सरकारका साथ फर्ज है राजाकी सेवा करना। मैंने वजमें आपकी प्रजाकी रक्षा कर और बागियोंकी दिया, बागियोंका नहीं।'

'तुम बहुत होशियार है। बात बनाकर अपना कसूर छिपाना चाहता है। तुमको फाँसी जरूर होना चाहिये।'

'सरकार, आप मालिक हैं। फाँसी देना चाहें तो दें. पर फाँसीपर चढनेके पहले मुजरिमसे पूछा जाता है वह क्या चाहता है ? मैं आपको बता दूँ कि मैं क्या चाहता हूँ ? मुझे फाँसी वन्दावनमें दी जाय और फाँसीके समय हरिनाम संकीर्तन सुनाया जाय। यदि आपने इस प्रकार फाँसी दी. तो मैं उसे सजा नहीं मानेंगा, आपका इनाम मानूँगा।'

'तो, तुम ऐसा फाँसीके लिए तैयार है ?'

'जी सरकार।'

कुन्दनलालजीकी निर्भीकता और धर्मपरायणता देख मजिस्ट्रेटको विश्वास हो गया कि वे जो कुछ कह रहे हैं, उसमें कृत्रिमता बिलकुल नहीं है। उन्होंने उन्हें तुरन्त बरी कर दिया।

शाह कुन्दनलालका जन्म कार्तिक कृष्ण २ सम्बत् १८८२ में लखनऊमें शाह गोविन्दलालजीके पुत्र रूपमें हुआ। उनके पितामह शाह बिहारीलालजी लखनऊके एक बहुत बड़े रईस थे। नवाबसे उन्हें 'शाह' की उपाधि मिली हुई थे। शाह फुन्दनलाल उनके भाई थे। वे उनसे तीन वर्ष छोटे थे।

उस समयकी आवश्यकतानुसार दोनों भाइयोंको फारसीकी शिक्षा दी गयी। फारसीके वे अच्छे विद्वान हुए। हिन्दी, पंजाबी, गुजराती और बँगला भाषाएँ भी उन्होंने सीखीं। दोनों भाइयोंका कृष्णलीलामें अभिनिवेश था। दोनोंने व्रजभाषा और उर्दू में कृष्णलीलाका गान किया है। शाह कुन्दनलाल 'श्रीललितकिशोरी' के नामसे

प्रकाशित है। और शाह फुन्दनलाल 'ललितमाधुरी के नामसे कविता लिखते थे। किशोरीजीकी ललित कविताओका संग्रह 'अभिलाषमाधुरी के नामसे

शाह बिहारीलालजीने वृन्दावनमें अपने इष्टदेव श्रीराधारमणलालजी के नये मन्दिरका निर्माण किया। उसे देखने उन्होंने अपने दोनों पौत्रोंको वृन्दावन भेजा। संवत् १९०६ के लगभग दोनों वृन्दावन गये। अपने साथ श्रीराधारमणजीके लिए एक सोनेका सिंहासन लेते गये।

बाल्यकालसे ही दोनों भाई इस सुअवसरकी प्रतीक्षामें थे। एक महीने वृन्दावनमें रहकर उन्होंने वजकी विभिन्न लीला स्थलियोंके दर्शन किये। उनका मन उजमें ऐसा रमा कि घर लौटनेकी कौन कहे. घरकी याद भी उन्हें दुःख देने लगी। पर माता-पिता और पितामहके भयके कारण घर लौटना पड़ा।

घर तो लौटे पर, प्राण वृन्दावनमें ही पड़े रहे। वृन्दावनवासके लिए उनकी उत्कण्ठा दिनोंदिन बढती गयी। कब वह दिन होगा जब वे युगलनामका जप करते हुए सदा वृन्दावनमें वास करेंगे अंग-अंगमें वजरजकी छाप लगाकर वृन्दावनके जोंमें सुखपूर्वक भ्रमण करेंगे- यह अभिलाषा उनके मनमें दिन-प्रतिदिन तीव्र होती गयी-

जपौं जुगल नित नाम सु छिनपल बसौं सदा वृन्दावन खोरी । छापौं छाप अंग व्रजरजकी भ्रमत रहौं कुञ्जनकी ओरी ।।

आसरो आस वासना मेरे दृढ़ करि मन यह ललितकिशोरी ।

रहौं चैतन्यचन्द्र-चिंतामणि-चरणचारु-नखचन्द्र चकोरी ।।

वृन्दावनवास वृन्दावनकी अधीश्वरी वृषभानुदुलारी श्रीराधारानीकी कृपाके बिना सम्भव नहीं होता। इसलिए वृषभानुदुलारीसे वे निरन्तर इस प्रकार प्रार्थना करने लगे-

व्रजभूमि और तीर्थ से जुड़ी घटनाएँ

श्रीवृन्दावन वास दीजिये आस यहै वृषभानुदुलारी । वंशीवट तट नटनागर सँग करत केलि अवलोकौं प्यारी ।। ★ कब ★ उपहास जग मिटैहौ । श्रीवृषभानुकिशोरीजू इन्द्रिन बसै जिन जानि हैस्यौ मुहि तिन दृग सकुच करै हौ ।।

लालकिशोरी नित्त निकुन्जन श्रीवन माहि बसही । चितवनि चितै स्वामिनी निज दासी न हसही ।।

करुणा किशोरीने जैसे उनकी पुकार सुन ली। दो ही एक वर्षकि भीतर उनके पितामह पिता और माताका स्वर्गवास हो गया। वृन्दावन जानेका उनका मार्ग बहुत उनपर पड़ा। इस कारण उनका तुरन्त वृन्दावन जाना सम्भव न हो सका। उनकी कुछ प्रशस्त हो गया। पर पितामहको विपुल सम्पत्तिकी देख-भालका भार एकाएक अपसामध्ये कहीं थी, जो इस नयी बाधासे जूझकर वृन्दावनकी ओर अग्रसर हो सकते। वे राधारानीका भरोसा लिये उनकी पूर्ण कृपाकी प्रतीक्षा करते रहे।

प्रियतमको प्रतीक्षामें बैठी प्रेयसीको काक भी प्रियतमका सन्देश लेकर आया सन्देश लेकर आया जान पड़ता था। इस बार उनके भाग्यसे उनके घर पधारे जाना पड़ता है। ललितकिशोरीजीको वृन्दावनसे आया प्रत्येक व्यक्ति राधारानीका माहाराज। उन्हें लगा कि वे राधारानीका सन्देश लेकर आये हैं। राधारानीने उन्हें भेजा वृन्दावनके श्रीराधारमणके मन्दिरके गोस्वामियोंके मुकुटमणि भक्तश्रेष्ठ श्रीगल्लूलाल है उन्हें बुला लानेके लिए। वे उल्लास भरे स्वरमें गा उठे-

गोस्वामी आज यहाँ गल्लूजी आये हैं,

वाहवा है अजी वाहवा है।

स्वामिनी कृपासे भये मेरे मन भाये हैं,

वाहवा है अजी वाहवा है ।

वृन्दावन वास है हैं हियरा हुलसाये हैं,

वाहवा है अजी बाहवा है ।

ललितकिशोरी मनौं बोलिबे पठाये हैं,

वाहवा है अजी वाहवा है ।।

कुछ दिन बाद वृन्दावनसे ललितकिशोरीजीके गुरु श्रीराधागोविन्द गोस्वामी लखनऊ पधारे। जब वे जाने लगे, तो उन्होंने निजसेव्य श्रीराधारमणजीका विग्रह उनके साथ भेज दिया और कहा- 'हम शीघ्र वृन्दावन आनेकी चेष्टा करेंगे। जब तक न आ सकें आप कृपाकर अपनी देखरेखमें इनकी सेवाकी व्यवस्था कीजियेगा।'

वृन्दावन पहुँचनेके कुछ ही दिन बाद श्रीराधारमणजीने ललितकिशोरीजीको

देश देकर कहा- 'अब तुम शीघ्र वृन्दावन चले आओ। निधिवनके पास मेरे के लिए भवनका निर्माण करो।'

बस, फिर क्या था। वृन्दावन जाकर निधिवनके निकट रहनेका निश्चय हो दया। साथ ही उनके हृदयमंचपर गूँज गयी आनन्द-लहरीकी यह झंकार-

वृन्दावनको जाना हेली वृन्दावनको जाना

रसिक रंगीले राधामोहन तिनसों दिल लहिराना है ।।

ललितकिशोरीने दृढ़कर अब ये ही मनमें ठाना है।

ललितलता निधुबनके नीचे ह्वाँ ई ठीक ठिकाना है ।।

अब एक नहीं मानेंगे हम श्रीवृन्दावन जावेंगे ।

★

★

रूखी सूखी घीकी चुपड़ी पावैगे सो खावैगे ।। ललितकिशोरी कौन कचोने परे कुञ्ज गुन गावैंगे।

अवलोकत छबि जुगललालको त्रिभुवन सुख बिसरावैंगे ।।

उन दिनों वृन्दावनके मार्गमें लुटेरोंका बहुत भय था। ललितकिशोरीजीको राधारमणजीके आदेशानुसार एक विशाल मन्दिरके निर्माणके लिए पर्याप्त धन लेकर वृन्दावन जाना था। इसलिये सं० १९१३ वैशाख शुक्ल १३ को दोनों भाई साके लिए शस्त्रधारी सिपाहियोंकी सेना साथ लेकर वृन्दावनको चल पड़े। व्रजकी सीमाके बाहर किसी स्थानपर उनका अन्तिम पड़ाव हुआ। वहाँ नित्यकी भाँति करने ललितकिशोरीजीके सामने हुक्का भरकर रखा। उन्होंने हुक्केको लात गरी। उसके पश्चात् जीवनमें कभी हुक्का नहीं पिया।

व्रजकी सीमाके भीतर उन्होंने नंगे पाँव प्रवेश किया। वृन्दावन पहुँचकर पहले श्री राधारमणलालजीके मन्दिरके निकट राजा पटनीमलके कुञ्जमें निवास किया। कुछ भृत्य उनके साथ रहे। बाकी यमुना किनारे बड़े-बड़े तम्बुओंमें ठहराये गये।

सम्वत् १९१७, माघ शुक्ल ५ से निधिवनके निकट संगमरमरके एक विशाल भवनके निर्माणका कार्य प्रारम्भ हुआ। आठ वर्षमें यह कार्य शेष हुआ। सं० १९२५, माघ शुक्ल ५ को ललितकिशोरीजीके निज-सेव्य श्रीराधारमणके विग्रहको बड़े समारोहके साथ इसमें ले जाया गया। इसका नाम रखा गया 'ललित-निकुञ्ज', पर शाहजीके मन्दिरके नामसे विख्यात रहकर आज भी यह वृदावनमें यात्रियों और पर्यटकोंके आकर्षणका केन्द्र बना हुआ है।

उजके भक

भग

वृन्दावन ललितकिशोरीजीका मन एक क्षण भी भजन छोडकर और किसी मंगला आरती करते। बाल-भोग रखकर दैनिक भजनमें बैठ जाते। श्रृंगार आरतीक कार्यमेन जाता। प्रातः ४ बजे उठाकर शौच स्नानादिसे निवृत्त हो वे ठाकुरजी पश्चात् ठाकुरजीके राजभोगके समय अपने सारे अमलेके साथ कीर्तन करते हुए श्रीराधारमणजीके मन्दिर जाते। राधारमणजीके दर्शन कर कुछ देर गुरुदेव श्रीराधागोविन्दजीके घर जाकर उनका सत्संग करते। वहाँसे कीर्तन करते-करते अपने स्थानको लौट जाते। प्रसाद ग्रहणकर किंचित विश्राम करते। विश्रामके पश्चात् पद-रचनादि विभिन्न भगवत-कार्योंमें लग जाते। सन्ध्या समय ठाकुरजीकी सेवाका भार भाईपर लोड स्वयं यमुना तटपर जाकर भजन करते। दो-ढाई घण्टे वहाँ भजन करनेके बाद घर लौटते। हलका-सा प्रसाद ग्रहणकर फिर भजनमें बैठ जाते।

रात बारह-एक बजे तक भजन करते रहते। सोते रातमें केवल तीन-चार घण्टे ही।

ललितकिशोरीजी बँगला, फारसी, हिन्दी आदि भाषाओंके विद्वान और एक अच्छे कवि तो थे ही, वे गायक भी ऊँचे दर्जेके थे। सभी तरहके बाजे बजा सकते थे। नृत्य-कला, विभिन्न शिल्प-कलाओं और हिकमतका भी उन्हें अच्छा ज्ञान था।

जीवन के अंतिम प्रसंग और स्मृतियाँ

उन्होंने अपनी बहुमुखी प्रतिभाका निरन्तर भगवत-सेवा-कार्योंमें प्रयोग किया। रासलीलाओंमें उनकी विशेष रुचि थी। रासलीलाके पदोंकी रचना वे स्वयं करते थे। रासधारियों और रासके स्वरूपोंको गान, नृत्य और अभिनयकी शिक्षा भी स्वयं देते थे। ललितकुञ्जका नक्शा और इसके चित्र उन्होंने स्वयं बनाये थे। हिकमतके उनके बहुत-से शिष्य नवाबोंके यहाँ नौकरी करते थे।

सब प्रकारसे योग्य और ऐश्वर्यशाली होते हुए भी, वे अति सरल और दैन्यभावसम्पन्न थे। उनका रहन-सहन बहुत सादा था। वे केवल धोती और दुपट्टा धारण करते थे। सबसे बड़े प्रेमसे मिलते थे। सबके प्रति सेवाका भाव रखते थे।

व्रज और व्रजरजमें उनकी निष्ठा अद्वितीय थी। व्रजके बाहर कभी न जानेका उनका दृढ़ संकल्प था। अन्त समय तक उन्होंने इसका पालन किया। व्रजके बाहर अपने चित्र तकको न जाने दिया। व्रजकी पवित्र भूमिमें मल-मूत्र विसर्जन करना उनके लिए असम्भव था। आगरेके बने मिट्टी के पात्रों में वे मल-मूत्र करते थे। उन पात्रोंको व्रजकी सीमाके बाहर फिकवा दिया जाता था। उनका आदेश था कि उनकी मृत्युके पश्चात् उनके शरीरको विमान आदिमें रखकर लोगोंक कन्धोंपर न ले जाया जाय, बल्कि वृन्दावनकी वीथियोंमें घसीटते हुए इस प्रकार ले जाया जाय, जिससे बजरजका निरन्तर स्पर्श होता रहे।

भगवत प्रसादमें भी उनकी इतनी निष्ठा थी कि उसका एक भी कण नष्ट नहीं होने देते थे। प्रसाद पा चुकनेके पश्चात् दोनों और पत्तलोंकी सीकें निकालकर उनमें लिये हुए प्रसादके कणोंको मुखमें डाल लेते थे।

राधारानीके वे अनन्य उपासक थे। सारे विश्वको राधामय देखते थे-

नैनन राधे बैनन राधे सैनन राधे कृतानित राधे ।

कानन राधे तानन राधे भानन राधे हितवित राधे ।।

दुखमें राधे सुखमें राधे मुखमें राधे उर चित राधे ।

ललितकिशोरी इत-उत राधे जित देखौं मैं तित-तित राधे ।।

राधादासीपनेके अपने अभिमानमें उन्होंने ऋद्धि, सिद्धि और ब्रह्मानन्दको ठुकरानेकी बात ही नहीं, हरिको अँगूठा दिखानेकी बात तक कह डाली है-

मैं दासी अपनी राधाकी करत खवासी जो रुचि पावत ।

सूधे वचन न बोलत सपनेहु हरिहूको अँगूठा दिखरावत ।।

ब्रह्मानन्द मगन सुख सिधि निधि श्रीवन गैल पाँव ठुकरावत ।

मुसतगनी मगरूरी डोलत ललितकिशोरीको गुन गावत ।।

अब राधारानीकी दासीके रूपमें उनकी साक्षात् सेवाके लिए उनका चित्त व्याकुल रहने लगा। सं० १९३० में दशहरेके बाद उन्हें फसली बुखार हुआ।

दस-बारह दिनमें बुखार ठीक हो गया। दुर्बलता बनी रही। उसी समय निरोग अवस्थामें कार्तिक शुक्ल प्रतिपदाको उन्हें ज्ञात हुआ कि राधारानी अविलम्ब उन्हें निकुञ्जमें अपनी साक्षात् सेवामें लेनेके लिए आतुर हो रही हैं। उसी दिन उन्होंने आतुर संन्यास लिया। दूसरे दिन प्रातःकाल ललितमधुरीजीको व्रजरजका चबूतरा तैयार करनेकी आज्ञा दे वे अपने दैनिक भजनमें बैठ गये। छोटे भाईने यमुनाजीकी कोमल, स्वच्छ, छनी हुई बालुकासे चबूतरा तैयार करवाया। चबूतरेके चारों ओर राधारमणजीके चित्र लगाये। दैनिक भजन समाप्त करनेके पश्चात् ललितकिशोरीजी चबूतरेपर विराजमान हुए। उस समय उनके मुखपर अवर्णनीय प्रसन्नताकी अलौकिक आभा थी। लग रहा था जैसे वे इन्द्रासनके सुखका अनुभव कर रहे हों। उस समय उन्होंने इस पदकी रचना की-

वृन्दावन अवनी अली करो राधिका सोर । गली गली छुट राधिका नाम न दूजौ घोर ।।

नाम न दूजौ घोर ओर दश हूँ रङ्ग राँचै ।

जल थल पातन पात सोर राधा धुनि माचै ।।

ऐसौ बनै समाज सदा रहिहों जग जिन्दा ।

ललितकिशोरी बन जाउठेंगे प्रान बिन्दा ।।

पदको पढ़कर सुनाया। पद पढ़नेके बाद कीर्तनका आदेश दिया। कीर्तनकी ध्वनि चारों ओर गूँज गयी। वे भी मन्द स्वरमें कीर्तन करते जाते और चारों ओर हँगे राधारमणके चित्रोंका दर्शन करते जाते। कभी चित्रोंमें राधारमणके चरणोंका स्पर्शकर माथेसे लगाते, कभी हाथ बढ़ाकर उन्हें अपने हृदयमें रख लेने जैसा अभिनय करते, कभी हाथ उठाकर नृत्य करने जैसी भंगी करते। अन्तमें राधारमणजीके चित्रकी ओर एकटक देखते-देखते और उनका नाम उच्चारण करते-करते नश्वर शरीरको त्यागकर वे उनके नित्यधाम पहुँच गये।

बिजलीकी-सी द्रुतगतिसे यह संवाद चारों ओर फैल गया। सहस्रोंकी संख्यामें लोग उमड़ उमड़ आने लगे। उनके अन्तिम संस्कारकी उनकी अपनी इच्छानुसार तैयारी की जाने लगी। वृन्दावनकी वीथियोंपर कोमल यमुनाजीकी रज बिछायी गयी। उसपरसे धीरे-धीरे वृन्दावनके मुख्य मुख्य मन्दिरोंके सामने से होते हुए हजारों लोगोंके कीर्तनकी महाध्वनिके बीच उन्हें ले जाया गया। अन्तमें उनके पूर्वनिर्देशानुसार उन्हें समाधि दे दी गयी।

सम्वत् १९४२, ज्येष्ठ शुक्ल ५ को इसी प्रकार श्रीललितमाधुरीजीने भी निरोग अवस्थामें अकस्मात् रजका चबूतरा तैयार करवाया और इसी प्रकार चबूतरेपर लेटे कीर्तन करते हुए उन्होंने भी नित्यधाममें प्रवेश किया। दोनों भाइयोंकी समाधियाँ श्रीललितनिकुञ्जके चन्दपोल नामक द्वारके दोनों ओर, जो निधिवनके अति समीप है, विद्यमान हैं। दोनों जय-विजयकी तरह द्वारपाल रूपमें आज भी अपने इष्ट श्रीराधारमणकी सेवामें नियुक्त हैं।

प्रेम और भक्ति — जीवन-संदेश

ईश्वर-प्रेम की अनुभूति भक्त-साहित्य का एक महत्त्वपूर्ण विषय है। इन प्रसंगों को श्रद्धा, संवेदनशीलता और समर्पण के संदर्भ में पढ़ा जा सकता है।

कथा का सार

श्रीललितकिशोरीजी एवं श्रीललितमाधुरीजी की कथा भक्ति, विनम्रता और साधना पर मनन करने का अवसर देती है। इस संग्रह में अन्य भक्तों के जीवन-प्रसंग भी पढ़ें।