ब्रज के भक्त भाग 3 · अध्याय 67
श्रीकुंजदास बाबाजी
श्रीकुंजदास बाबाजी की प्रेरक हिंदी कथा। जानिए उनके जीवन, भक्ति और साधना से जुड़े महत्वपूर्ण प्रसंग।

श्रीकुंजदास बाबाजी का यह भक्त-चरित्र ब्रज की साधना, श्रद्धा और जीवन से जुड़े प्रसंगों को सामने लाता है। नीचे कथा को अलग-अलग विषयों में व्यवस्थित किया गया है।
जन्म, परिवार और प्रारम्भिक जीवन
[ केशीघाट, वृन्दावन ]
श्रीकुञ्जदास बाबा उन बारह महापुरुषोंमें से हैं, जिन्हें बँगालके प्रसिद्ध महात्मा श्रीरामदास बाबाजी महाराज अपना गुरु मानते थे। उन्हें प्रेम-सम्पत्ति जैसे परम्परागत रूपसे उत्तराधिकारमें प्राप्त थी। वे श्रीनिवासाचार्य प्रभुके वंशज थे। श्रीनिवासाचार्य प्रभु गौर-प्रेमकी मूर्ति थे। उनका वर्ण गौरांग महाप्रभुके वंशज थे। श्रीनिवासाचार्य प्रभु गौर-प्रेमकी मूर्ति थे। उनका वर्ण गौरांग महाप्रभुकी तरह तपे सोनेका-सा था। उन्हींकी तरह वे सर्वांग सुन्दर और भक्ति-भाव-सम्पन्न थे। कहते हैं कि वे उनके द्वितीय कलेवर ही थे। श्रीकुञ्जदास बाबाजीभी सर्वांग-सुन्दर, गौरवर्णके और श्रीनिवासाचार्य प्रभुकी तरह प्रारम्भसे ही असाधारण भक्तिभाव-सम्पन्न थे।
मानभूमके अन्तर्गत जबडरा ग्रामके श्रीनदियाचाँद गोस्वामीके घर उनका जन्म हुआ। यज्ञोपवीत, विद्याध्ययन और चैतन्य-चरितामृतके पाठके पश्चात् गौर-प्रेममें उन्मत्त हो अल्पावस्थामें घरसे निकल पड़े। श्रीपाठ हीरापुर ग्राम जाकर श्रीनिवासाचार्य प्रभुके वंशधर श्रीकृष्णचन्द्र ठाकुरसे दीक्षा ली। पुरीधामकी यात्राकर गंगामाता मठके श्रीराधाचरणदास बाबाजीसे विरक्त वेश लिया। फिर चारों धामकी यात्राको निकल पड़े।
यात्रासे लौटकर एक दिन कृष्णनगरमें एक वृक्षके नीचे बैठे भजन कर रहे थे। भजन करते-करते तन्द्रा आ गयी। तन्द्राकी अवस्थामें श्रीनिवासाचार्य प्रभुने दर्शन देकर कहा- 'वृन्दावन जाकर भजन करो।'
बस वे वृन्दावनके लिए चल पड़े। वहाँ पहुँचकर यमुना-स्नान किया। केशीघाटपर बैठकर चिन्ता करने लगे - क्या करें, कहाँ जायें। उसी समय निकटकी गुफासे एक वृद्ध महात्मा निकले। उन्हें निकट बुलाकर बोले- 'चिन्ता
ओर संकेत किया वह अब अपने वर्तमान रूपमें गौडेश्वर ठौरके नामसे प्रसिद्ध है। मत करो। उस कटियामें रहकर भजन करो।' केशीघाटपर स्थित जिस कुरियाकी उस कुरियामें रहकर वे भजन करने लगे।
सेवा, प्रसाद और समर्पण की घटनाएँ
भजन करते कुछ दिन बीते। एक दिन फिर उन्हें श्रीनिवासाचार्य प्रभुके दर्शन हुए। उन्होंने कहा- तुम सन्त-सेवा किया करो। इसीसे तुम्हें अभीष्ट प्राप्ति होगी।'
वे सन्त-सेवा करने लगे। पण्डित रामकृष्णदास बाबा, श्रीराधिकानाथ गोस्वामी प्रभु श्रीमनोहरदास बाबा, श्रीविष्णुदास बाबा आदिका संग भी करते रहे। उनके संगके प्रभावसे उनका भजनमें आवेश धीरे-धीरे बढ़ गया और सन्त-सेवा छूट गयी। तब उन्हें महाप्रभुके अभिन्न परिकर श्रीगदाधर पण्डितके दर्शन हुए। उन्होंने सन्त-सेवा न छोडनेका आदेश दिया। उनका आदेश शिरोधार्य कर उन्होंने फिर सन्त-सेवा आरम्भ की। फलस्वरूप उन्हें श्रीकृष्ण-प्रेमकी प्राप्ति हुई। अष्टसात्विक भाव उन्हें अष्ट-प्रहरियोंकी तरह हर समय घेरे रहते। थोड़ा-सा भी उद्दीपन होनेसे प्रकाशित हो जाते।
पाठ-कीर्तनमें उन्हें अपूर्व भावावेश होता। अश्रु, कम्प और पुलकसे सारा शरीर व्याप्त हो जाता। बीच-बीचमें ऐसी हुँकार भरते जिससे दिशाएँ गूंज उठतीं। मूर्छा भी कभी-कभी आ जाती। नगर-कीर्तनमें उद्दण्ड नृत्य करते-करते वे मूर्छित हो जाते। लोग उन्हें अपने कन्धोंपर ले चलते, या उन्हें घेरकर नृत्य-कीर्तन करते लगते। ऐसी अवस्थामें वे दो-तीन प्रहर तक आनन्दाम्बुधिमें डूबे रहते। बाह्य जगत् और अपने शरीरकी सुध बिलकुल भूले रहते। प्राणगोपाल प्रभु और श्रीराधिकानाथ प्रभु अपने पाठमें उन्हें मुख्य श्रोताके रूपमें सामने बैठाते और उनके भाव-भूषित देहको देख-देख स्वयं भावमें डूबकर कथाको एक अनूठे और अधिक प्रभावशाली ढुङ्गसे प्रस्तुत करनेमें समर्थ होते।
उनकी लीला-चिन्तनकी रीति निराली थी। वे पहले महाप्रभुका चिन्तन करते हुए बाँसुरी बजाते। उनकी बाँसुरीकी मधुर धुन सुन महाप्रभुको श्रीकृष्णकी बंशी-ध्वनिका उद्दीपन होता। वे अभिसारिणी राधाके भावसे भावित हो भाव देहसे यमुना-पुलिनमें श्रीकृष्णसे जा मिलते। कुञ्जदास बाबा भी चिन्तनमें अपने मंजरी स्वरूपसे उनका अनुगमन करते। वहाँ रासलीला और जलकेलि आदिका दर्शन करते। गुरुरूपा मजरीके आनुगत्यमें आवश्यकतानुसार जुगलकी सेवा करते।
दिव्य अनुभूति और कृपा के प्रसंग
कभी-कभी यमुना-स्नान करते समय उन्हें श्रीकृष्णकी गोपिकाओंके साथ श्रीयदुनन्दनदास बाबाजी
जलकेलि-लीलाका उद्दीपन हो जाता, तो वे भावाविष्ट अवस्थामें घण्टों जलमें बैठे रहते।
एक बार उनके पैरमें सैप्टिक हो गया। ऑपरेशनकी आवश्यकता पड़ी। डॉक्टरने क्लोरोफॉर्म संघानेको कहा। वे बोले- 'क्लोरोफॉर्म नहीं, ऐसे हैरी ऑपरेशन कर दो।' ऑपरेशनके पूर्व उन्होंने अपनी वृत्ति अन्तर्मुखी कर ली और लीला-चिन्तनमें डूब गये। डॉक्टर ऑपरेशन कर चुका तो भी संज्ञाहीन जैसे स्थिर बैठे रहे। उसने हिला-डुलाकर कहा- 'बाबा, ऑपरेशन हो गया।' तब उन्हें किंचित् बाह्य ज्ञान हुआ। बाह्य ज्ञान होते ही वेदनाका अनुभव हुआ। तब उन्होंने एक बार 'सी' की और फिर लीलामें डूब गये।
कुंजदास बाबाने गौड़ मण्डलमें और उत्तर प्रदेशके हाथरस आदि स्थानोंमें जा-जाकर भक्तिका बहुत प्रचार किया। उनके अनेकों शिष्य हुए। शिष्योंकि सहयोगसे उन्होंने अपनी भजन-स्थलीको वर्तमान गौड़ेश्वर ठौरका रूप दिया। उसमें प्राणगौर-नित्यानन्दके श्रीविग्रहोंकी प्रतिष्ठा की और पर्याप्त भू-सम्पत्ति जुटाकर साधु-सेवाकी स्थायी व्यवस्था की। वह स्थान आज भी व्रजमें साधु-वैष्णवोंके आतिथ्य और उनकी सेवाके लिए प्रसिद्ध है।
सन् १९४२ में चैत, शुक्लपक्ष चतुर्थीक दिन उन्होंने नित्य-लीलामें प्रवेश किया।
नाम-स्मरण और एकाग्रता — जीवन-संदेश
नाम-स्मरण, भजन और एकाग्रता के प्रसंग साधना की निरंतरता की याद दिलाते हैं। यहाँ वर्णित जीवन-अनुभवों से पाठक अपनी साधना के लिए प्रेरणा ले सकते हैं।
कथा का सार
श्रीकुंजदास बाबाजी की कथा भक्ति, विनम्रता और साधना पर मनन करने का अवसर देती है। इस संग्रह में अन्य भक्तों के जीवन-प्रसंग भी पढ़ें।