ब्रज के भक्त भाग 3 · अध्याय 83

श्रीकृष्णप्रेम (रोनाल्ड निक्सन) और माँ यशोदा

श्रीकृष्णप्रेम (रोनाल्ड निक्सन) और माँ यशोदा की प्रेरक हिंदी कथा। जानिए उनके जीवन, भक्ति और साधना से जुड़े महत्वपूर्ण प्रसंग।

श्रीकृष्णप्रेम (रोनाल्ड निक्सन) और माँ यशोदा
श्रीकृष्णप्रेम (रोनाल्ड निक्सन) और माँ यशोदा — ब्रज के भक्त भाग 3

श्रीकृष्णप्रेम (रोनाल्ड निक्सन) और माँ यशोदा का यह भक्त-चरित्र ब्रज की साधना, श्रद्धा और जीवन से जुड़े प्रसंगों को सामने लाता है। नीचे कथा को अलग-अलग विषयों में व्यवस्थित किया गया है।

जन्म, परिवार और प्रारम्भिक जीवन

रोनाल्ड निक्सनका जन्म १० मई १८९८ को इंग्लैंडके एक धर्मपरायण परिवार में हुआ था। कैम्ब्रिज विश्वविद्यालयसे उन्होंने अंग्रेजी साहित्यमें स्नातक परीक्षा उच्चतर सम्मान (Honours) के साथ पास की। विद्यार्थी जीवनमें ही उनके आत्मिक संस्कार धीरे-धीरे प्रकट होने लगे। स्नातक-परीक्षा पास कर लेनेके पश्चात् उन्होंने ईसाईधर्म, बौद्धधर्म और थियोसॉफीके कुछ ग्रन्थोंका गहराईसे अध्ययन किया।

उसी समय बज उठी प्रथम विश्वयुद्धकी भीषण भेरी। उन्होंने निश्चय किया देशकी सुरक्षा सेनामें योग देनेका। रॉयल एयरफोर्समें भरती हो सम्हाला बमवर्षक विमानके चालकका गुरुतर दायित्व।

हठात् वायुसेनाको आदेश मिला जर्मन अधिकृत बेलजियममें नये आक्रमणके लिए जमा हो रही सेनाकी बम्बार्ड करनेका। निक्सन सहित अन्य चालक अपने-अपने जहाजोंमें विध्वंसक बमोंका भार लेकर क्षिप्र गतिसे उड़ चले दुश्मनके उस ठिकानेकी ओर, पर दुश्मन सतर्क था। बेलजियमकी सीमा तक पहुँचनेके पूर्व ही उसके लड़ाकू विमान उस पूरी टुकड़ीको घेरकर उसका सफाया करनेमें जुट गये। निक्सनके सभी साथी काम आये। निक्सनके भाग्यका भी इसी प्रकार अन्त होना था। उसी समय उन्होंने देखा एक दिव्य दृश्य। दूर, अति दूर आकाशमें एक पहाड़के उत्तुंग शिखरकी गुफासे निकला एक उज्ज्वल प्रकाश, जो तीव्र गतिसे उनमें प्रवेश कर गया।

अर्धबाह्य अवस्थामें उन्होंने अनुभव किया कि एक अज्ञात शक्तिने उनके मन और देहपर पूरा अधिकार कर लिया है और उनके भीतर बैठा एक दूसरा चालक हवाई-जहाजको तेजीसे ऊपर- बहुत ऊपर उड़ाये ले जा रहा है। ऊपर ले जाकर उसने जैसे ही जहाजको विपरीत दिशामें मोड़ा, उनकी चेतना लुप्त हो गयी।

होश आनेपर उन्होंने देखा कि वे विमानके कॉकपिटमें नहीं हैं। लन्दनके निकट एक सामरिक अस्पतालमें। लन्दनके हवाई अड्डेपर जब उनका विमान CIASSA

उतरा, वे कॉकपिटमें बेहोश पड़े थे। उन्होंने उसी अवस्थामें वहाँसे अस्पताल ले आाया गया था। २११

अस्पतालमें जब उनकी चिकित्सा चल रही थी, उन्हें कई बार उसी प्रकारका भावावेश हुआ. जैसा विमानमें उस दिव्य प्रकाशमें उनके भीतर प्रवेश करते समय हुआ था। उन्हें लगा कि कोई उनसे कह रहा है- 'तुम्हारे जीवनकी रक्षा की है एक अलौकिक शक्तिने। उसका सन्धान तुम कर सकते हो भारत जाकर ।'

उस अलौकिक शक्तिने केवल उनके जीवनकी रक्षा ही नहीं की, उसमें एक नयी चेतना भी जाग्रत की। उन्होंने भारत जाट र आध्यात्मिक शक्तियोंक अनुसन्धान करनेका संकल्प किया।

अस्पतालसे निकलते ही उन्होंने रॉयल एयरफोर्ससे इस्तीफा दे दिया। कुछ दिन कैम्ब्रिज विश्वविद्यालयमें विभिन्न धर्मग्रन्थोंके अध्ययनमें व्यतीत किये। इसी चक्रवर्तीसे। वे उस समय लन्दनमें लखनऊ विश्वविद्यालयके अँग्रेजी विभागके लिए बीच उनकी भेंट हई लखनऊ विश्वविद्यालयके वाइसचांसलर डॉक्टर ज्ञानेन्द्रनाथ किसी योग्य अध्यापककी खोजमें थे। उन्होंने देखा कि निक्सन अँग्रेजी साहित्यमें व्युत्पन्न तो हैं. भारतके धर्म और संस्कृतिके श्रद्धावान भी हैं। उन्होंने उसी समय उनकी उस पदपर नियुक्ति कर दी।

लखनऊ पहुँचकर निक्सन डॉ० ज्ञानेन्द्रनाथ चक्रवर्ती महाशयके घर रहकर ही विश्वविद्यालयमें अध्यापन कार्य करने लगे। महाशयकी पत्नी श्रीमती मणिकादेवी एक सुशिक्षिता महिला थीं। वे बडे उदार और स्नेही स्वभाव की थीं। उनका वात्सल्य प्रेम निक्सनपर सहज ही बिखर पड़ा। निक्सनने भी सहज भावसे उनके प्रति आत्मसमर्पण किया। वे निक्सनको 'गोपाल' करकर पुकारतीं, निक्सन उन्हें 'माँ' कहते।

अध्यापन-कार्यके साथ-साथ रोनाल्ड निक्सनने आध्यात्मिक क्षेत्रमें अपनी खोजबीन जारी रखी। बौद्धधर्मके प्रति उनका प्रारम्भसे ही बड़ा आकर्षण था। इसलिए बड़े परिश्रमसे उन्होंने पाली भाषा सीखी और बौद्धधर्मके मूल ग्रन्थोंका अध्ययन किया। उनके अनुसार ध्यान-धारणादिका अभ्यास भी किया, पर इससे उनकी तृप्ति न हुई।

तक उनकी रुचि वेद-उपनिषदादिके अध्ययनमें हुई। संस्कृत भाषामें व्युत्पन्नता हासिल कर वे वेद, उपनिषद् और गीता आदिके तत्त्वान्वेषणमें लग गये।

विश्वविद्यालयके छात्र-छात्राएँ तो प्रोफेसर निक्सनके व्यक्तित्व और पाण्डित्यसे प्रभावित थे ही, लखनऊके गणमान्य व्यक्तियोंके सामाजिक जीवनके भी उनके भक्क

लखनऊ विश्वविद्यालयका ऊँची वेतनका पद त्यागकर उन्होंने बहुत कम वेतनपर वाराणसी विश्वविद्यालयके अंग्रेजी विभागके प्राध्यापकका पर स्वीकार किया।

बकवर्तीजी गंगा-तटपर श्रीरामकृष्ण डालमियाके 'राधाबाग' नामक भव्य भवनमें रहने लगे। मणिकोदवीके कई और विदेशी शिष्य निक्सनके साथ उसमें रहने लगे। नित्य नये उत्सव, पाठ, कीर्तनादिके अनुष्ठानोंसे उसका 'राधाबाग' नाम सार्थक हो उठा।

निक्सन और मणिकादेवीकी प्रेम-साधना निर्विघ्न चलती रही। मणिकादेवीने पाठके पश्चात् निक्सन बोले- 'माँ. मैंने निश्चय किया है वैष्णव-मन्त्रसे संन्यास-निक्सनको श्रीमद्भागवत् महापुराण पढ़ाना शुरू किया। एक दिन श्रीमद्भागवत् दीक्षा ग्रहण करनेका।'

'यह तो बड़ी अच्छी बात है गोपाल।' माँने प्रसन्न होकर कहा।

'मैंने यह भी निश्चय किया है कि संन्यास तुमसे ही लूँगा।'

'मैंने तो स्वयं गृही हूँ। संन्यास-दीक्षा दे कैसे सकती हूँ?'

'वह सब मैं कुछ नहीं जानता। संन्यास-दीक्षा मुझे आपको ही देनी होगी।'

कुछ देर रुककर माँ बोलीं- अच्छा, तो ठीक है। संन्यास-दीक्षा में दूँगी।'

वे वृन्दावन जाकर पहले स्वयं श्रीबालकृष्ण गोस्वामीजीसे संन्यास-दीक्षा ले आयीं। पीछे निक्सनको दी। उनका नाम हुआ - यशोदा माँ, निक्सनका श्रीकृष्णप्रेम।

इस बीच चक्रवर्ती महाशयका स्वर्गवास हो गया। यशोदा माँके जीवनमें एक नये अध्यायका श्रीगणेश हुआ। उन्होंने अपने धर्मपुत्र और अपनी पुत्री मतिरानीको लेकर प्रवेश किया हिमालयकी गोदमें। अल्मोड़ासे चौदह मील दूर मिर्तोलामें योगेश्वर-शिवस्थानके निकट एक आश्रम और मन्दिरका निर्माण किया। मन्दिरसे सन्निहित भूमिका नाम रखा 'उत्तर-वृन्दावन'।

उत्तर-वृन्दावनमें दुमंजिले मन्दिरके ऊपरके कक्षमें विराजमान थीं राधा-कृष्णकी नयनाभिराम युगल मूर्तियाँ। नीचे था आश्रमवासियोंके रहनेका स्थान। उससे संलग्न एक कक्ष था भागवत-पाठ और अतिथियोंके लिए और एक यशोदा माँके स्थानीय बालक-बालिकाओंकी पढ़ानेके लिए। आश्रमके एक ओर थी एक छोटी धर्मशाला कैलाश और योगेश्वर जानेवाले यात्रियों और साधुओंके विश्रामके लिए। चारों ओर ठाकुरके लिए फूलोंका बगीचा था और खेतीका भूमि। आश्रमसे कुछ ऊपर पहाड़पर था स्थानीय लोगोंकी चिकित्साके लिए एक चिकित्सालय।

प्रेमके केम्बिनके साथी डॉक्टर अलेक्जेण्डर डॉक्टरीको ऊँची डिग्री लेकर लखनऊके एक बड़े अस्पतालमें काम कर रहे थे। वे भी कुछ दिन बाद सेम और संन्यास-दीक्षा लेकर आश्रममें रहने लगे। उनका नाम हरिदास।

माधव-आशीष नामके एक और अंग्रेज संन्यासी श्रीकृष्णप्रेमसे संन्यास-दीक्षा लेकर आश्रमी ठाकुर-सेवामें उनका हाथ बटाने लगे। वे थे द्वितीय विश्वयुद्धके समय बंगालके हवाई अड्डेके ग्राउण्ड इंजीनियर। वे उनके साथ अपनी पहली भेटमें ही और श्रीकृष्ण-सेवामें जीवन उत्सर्ग करनेके

श्रीगुरु-सेवा लिए विवश हो रो पड़े थे। यह लोग उत्तर-वृन्दावनके दिव्य परिवेशमें और यशोदा माँके अपार्थिव सानिध्य और आनुगत्यमें रहकर भजन करने लगे। यशोदा माँ जैसे उनके प्राण थीं और वे उनके अंग-प्रत्यंग ।

यशोदा माँके दिव्य स्वरूपकी एक झलक मिलती है सन् १६४३ के अप्रैल साकी एक सन्ध्याकी कुछ घटनाओंसे. प्रत्यक्षदर्शी थे विश्वविख्यात गायक, लेखक, कवि और भक्त श्रीदिलीपकुमार राय, जो उनके आश्रममें उस समय ठहरे हुए थे। माँ उस समय बहुत अस्वस्थ थीं। वे मन्दिरके वगलके कमरे में शैय्यापर केंगे रहती थीं। आवश्यकता होनेपर बडे कष्टसे किसीके सहारे एक-दो कदम चल पाती थी। दिलीपकुमारने अपनी अँग्रेजी पुस्तक 'योगी श्रीकृष्णप्रेम' में उस सन्ध्याके अपने अनुभवोंका वर्णन इस प्रकार किया है-

'सन्ध्या-आरतीके पश्चात् उस दिन हम लोग मन्दिरके जगमोहनमें बैठे कीर्तनके लिए। मतिरानी मन्दिरकी देहलीके निकट बैठी, श्रीकृष्णप्रेम उनके बगलमें मेरी बाईं ओर, अलेक मेरी दाहिनी ओर।

श्रीकृष्णप्रेमने मुझसे गानेको कहा 'वृन्दावन-लीला' का मेरा एक गीत, जो ग्रामोफोनके माध्यमसे बहुत लोकप्रिय हो चुका था। मैने उसे कई बार जलसोंमें गाया था, पर उस दिन जिस प्रकार भाव-विभोर होकर गाया, वैसा पहले कभी नहीं गाया था। गाते-गाते मैं अपने-आप में खो गया और मेरे नेत्रोंसे अश्रुओंका प्रपात बह निकला।

जब गाना समाप्त हुआ, सब लोग शान्त और स्तब्ध बैठे रह गये। कुछ देर बाद मैंने सिर उठाया, तो देखा कि श्रीकृष्णप्रेमके नेत्रोंमें पानी भरा था और मतिरानी आँसू पोंछ रही थीं।

अलेकने सबसे पहले मौन भंग करते हुए कहा- 'श्रीकृष्णप्रेम जानते हो, माँ वरामदेमें खड़ी गाना सुन रही थीं !' उनके भक्त

श्रीकृष्णप्रेम चौकपडे 'माँ। हे भगवान् वे उस लम्बे रास्तेसे कैसे अकेली चलकर आ गयीं। वे मूर्च्छा खाकर गिर सकती थीं।' मतिरानीने भय और विस्मयसे कहा- 'बरामदे में ठिरन थी गजबकी

है।" अकेलने कहा- 'मैंने उन्हें बहुत देरमें देखा। जब वे दिलीपके गानका अन्तिम शब्द सुनकर जाने लगी थीं।

'परन्तु यह कैसा पागलपन । वे कितना अस्वस्थ हैं। ऐसेमें ठण्ड कितनी घातक हो सकती है।' श्रीकृष्णप्रेमने कहा।

हमने मन्दिरको लाँधकर झट उनके कमरेमें प्रवेश किया। माँ मतिरानीके देहलीपर बैठे रहनेके कारण पीछेके रास्तेसे आयी थीं।

वे पलंगपर मूर्ति-सी बैठी थीं। मोमबत्तीकी रोशनीमें उनके कपोलोंपर दो अनुधाराएँ चमक रही थीं।

श्रीकृष्णप्रेमने कहा- 'माँ! तुम कैसे ?'

वे इतना ही कह पाये थे कि मतिरानीने उन्हें इशारेसे रोकते हुए कहा-'देखते नहीं, माँ भाव-समाधिमें हैं।

थोड़ी देरमें उन्होंने आँसुओंसे डबडबाते अपने नेत्र खोले और एक आनन्दमयी मुस्कानके साथ मुझसे अपने निकट बैठ जानेको कहा।

मैं कुछ झिझकते हुए उनके पलंगपर उनके निकट बैठ गया। दूसरे लोग नीचे चटाईपर बैठ गये।

उन्होंने मेरे कन्धेपर हाथ रखते हुए प्यारसे पूछा- 'पूछा, तुमने देखा?' 'देखा? क्या देखा माँ ?' मैने आखें फाड़कर उनकी ओर देखते हुए पूछा।

'ठाकुरको।'

'क्या, श्रीकृष्णको ?'

'हाँ, हाँ उसीको' उन्होंने मुसकाते हुए कहा। और वे लड़खड़ाते शब्दोमें

अश्रुविसर्जन करते हुए कहती गयीं- 'तुम जब गीतकी अन्तिम पंक्तियाँ गा रहे थे, तब वह आया- पहले मेरे कमरेमें- एक सेकेंड खड़ा रहा। फिर देहली लाँधकर गया तुम्हारे पास। मैं उधरसे न जा सकी। दूसरी तरफसे गयी। बरामदेमें जाकर मैने देखा-देखा कि वह तुम्हारे पास खड़ा सुन रहा है। हाँ, मैंने देखा अपनी आँखोंसे, जैसे मैं उसे अकसर देखती हूँ। तुमने नहीं देखा उसे ?'

'नहीं माँ, पर मैने अनुभव किया कि CIAS-

श्रीकृष्णप्रेम (रोनाल्ड निक्सन ) और माँ यशोदा

मेरी बात बीचसे ही काटकर, जैसे उन्होंने कुछ सुना ही नहीं, वे फिर कहने लगी "सबमुच वह तुम्हारे बगलमें सुन रहा था। और तुम्हें प्यारसे अपलक देख रहा था। मैंने उससे कहा 'ठाकुर उसे चक्षु दो. जिससे वह तुम्हें देख सके।' दिलीप तुम धन्य हो।"

मैंने झुककर उनके चरण चुमे और रो दिया।

उन्होंने मेरे सिरपर हाथ फेरते हुए मुझे आशीर्वाद दिया।

कुछ देर चुप रहनेके पश्चात् मैंने साहस बटोरते हुए उनसे कहा- 'तुम तो कृष्णाको सभी समय देखती होगी माँ ?'

'हाँ. सव समय देखती हैं. पर हृदयमें बाहर नहीं।' '

'क्यों नहीं माँ ?

कुछ रुककर वे बोलीं- "मैंने एक बार उससे पूछा था। उसने कहा- 'यदि ने बहत बार तुम्हारे समक्ष प्रकट होऊँ तो तुम्हारा शरीर अधिक समय न रह सकेगा।"

उस दिन जैसे माँका करुणा-स्रोत फूट पड़ा। वे जैसे गोपनीयताका परदा हटाकर अपने अनुभवोंकी सारी बातें मुझसे कहने लगीं।

मैंने कहा- 'माँ, श्रीकृष्णप्रेमने बताया कि तुम्हें श्रीकृष्णके अतिरिक्त और भी बहुत-से देवी-देवताओंके दर्शन हुए हैं। क्या तुमने कभी गणेशके भी दर्शन किये हैं? मैं तो उन्हें एक काल्पनिक देवता ही मानता हूँ।'

माँ हँस दीं और बोलीं 'गणेशको तुम उनकी सूँड़के कारण ही काल्पनिक मानते हो न। मैंने उनकी सूँड़के स्पर्शका अनुभव किया है। एक दिन अर्धरात्रिमें मैं सो रही थी। मुझे लगा कि कोई मेरी गर्दनमें गुदगुदी मचा रहा है। मैंने चौंककर आँखें खोलीं तो, देखा कि एक छोटेसे प्यारे-प्यारे गणेश अपनी सुन्दर सूँड़से मेरी गर्दनमें गुदगुदा रहे हैं। मैं क्या कहूँ दिलीप उनका सौंन्दर्य कैसा था- तुम जैसी कल्पना करते होगे, उसके बिलकुल विपरीत। उनके अंग-अंगसे एक स्वर्णिम सौन्दर्यका अद्भुत प्रकाश फूट रहा था।'

'अच्छा माँ! मुझसे एक बार स्वामी शारदानन्दसे कहा था कि रामकृष्ण परमहंसके साथ रामललाकी अष्टधातुकी मूर्ति सजीव होकर उनके साथ खेला करती थी। मैंने यह भी पढ़ा है कि उनकी एक शिष्य 'गोपालेर माँ' अपने बालगोपालको सजीवरूपमें नहलाया-धुलाया और खिलाया-पिलाया करती थीं।' २१८/

उनके पास आकर लगे शिकायत करने- 'मौ. मेरी शैय्यापर तकिया नहीं है।' तो फिर मैंने हंसते हुए कहा 'और यही नहीं हाँ। कहते हैं कि एक बार बालगोपाल मौने का 'मेरी बहिपर सिर रखकर सो जाया कर' और वे उसी तरह सोने लगे। मैने इसी प्रकारको और न जाने कितनी कहानियाँ सनी हैं। तो क्या माँ यह सब सम्भव है, और आजके युगमें भी ?'

'दिलीप में केवल मानती ही नहीं, जानती है कि ऐसी लीलाएँ ठाकुर करते हैं और आज भी करते हैं।' फिर उन्होंने आलमारीकी तरफ इशारा करते हुए कहा- 'तुम देखते हो वह बालगोपालकी मूर्ति। एक दिन रातको जब मैं घोर निद्रामें सो रही थी, उसने आकर मुझे जगाया और अपने छोटेसे प्यारे-प्यारे औंठ निकालते हुए कहा- 'माँ तुम तो आरामसे सो रही हो और मुझे चीटियाँ काटे जा रही हैं।' में चौंककर उठी, तो देखा कि मैंने भूलसे शहदकी शीशी उसके पास रख दी है, जिससे वहाँ चीटियाँ इकट्ठा हो गयी हैं। यह देख मुझे रोना आ गया। मैंने बोतल बहाँसे हटाते हुए उससे क्षमा माँगी। उसके अंगसे चीटियाँ झाड़ी और उसे अपने बिस्तरपर लिटा लिया। मेरे बिस्तरपर आकर वह बहुत खुश हुआ और आरामसे सोया।'

मैंने आँखें फाड़कर माँकी ओर देखता रहा गया।

उन्होंने कहा- 'तुझे विश्वास नहीं हो रहा है?'

'नहीं माँ, विश्वास न करनेका तो प्रश्न ही नहीं। तुम्हारी बातका अविश्वास, जिसकी स्वामी विवेकानन्दने भी पूजा की !'

'यह तुमसे किसने कहा ?'

'मैंने कहा माँ अलेक उसी समय बोल पड़े। 'क्या मैंने-'

'नहीं, नहीं, वो ठीक है। माँने मुस्कराते हुए कहा, 'पर पूजा नहीं। उन्होंने केवल दो-एक बार मेरे ऊपर पुष्प चढ़ाये थे, जब मैं गाजीपुरमें बारह-तेरह वर्षकी थी।'

'वह पूजा ही तो थी माँ! पूजा क्या केवल आरती-घण्टेसे होती है? श्रीकृष्णप्रेमका विश्वास है कि उन्होंने अवश्व तुम्हारे अन्दर कुछ देखा था। तभी न उन्होंने तुम्हारे चरणोंमें फूल चढ़ाये थे' अलेकने फिर कहा।

'उन्होंने पुष्प अर्पण किये तुम्हारे चरणोंसे ?' मैंने विस्मयके स्वरमे पूछा ?

पुष्प अर्पण किये ? उन्होंने गाकर माँकी स्तुति की। एक बार नहीं कई बार।' मतिरानीने ऊँचे स्वरमें कहा।

CIASSA

'सब वे कैसा गाते थे माँ ? उनके एक शिष्यने मुझसे उनके गलेकी प्रशंसा की थी।' मैंने उत्सुकतासे पूछा।

'ओह. वे अद्भुत गायक थे। मैं अक्सर गोपालसे कहा करती हैं। मैंने अपने जीवनमें गायक देखे हैं तो दो हो। एक स्वामीजी और दूसरा (मेरी हुए) दूसरेका नाम बताऊँ क्या?"

ओर मुसकाते देखा है क्या?' मैंने झट विषयको बदलते हुए पूछा- 'माँ, तुमने गाजीपुरमें पवहरि बाबाको

'ओह, वे तो योगियोंमें राजा थे' सम्मानपूर्वक हाथ जोडकर माधेसे लगाते हुए कहा। 'उनका जैसा तेज मैंने आज तक किसी मनुष्यके चेहरे पर नहीं देखा।'

'नहीं माँ' मतिरानी फिर शरारत भरी मुस्कुराहटके साथ बोल पड़ी 'दिलीपदाके गानकी प्रशंसा करनेके पश्चात् तुम्हें कहना चाहिये- मैंने अपने जीवनमें केवल दो ही मनुष्योंके मुखपर ऐसा तेज देख है, एक पवहरी बाबा और दूसरा (श्रीकृष्णप्रेमीकी ओर देखकर मुस्कुराते हुए) - दूसरेका नाम बताऊँ क्या?'

'चुप रहो मति' श्रीकृष्णप्रेमने भृकुटि चढ़ाते हुए डॉक्टर कहा।

'पवहरि बाबा बड़े चमत्कारी पुरुष थे न माँ ?' मैंने कौतूहलवश पूछा।

माँ हँस दीं 'सुनो, उनके चमत्कारकी एक बात। एक मैं उस समय चौदह-पन्द्रह वर्षकी थी। मैने सुना पवहरि बाबा भण्डारा कर रहे हैं। जितने भी साधु आयेंगे, सबको एक-एक धोती और लोटा देंगे। मैंने सोचा कि यह छोटी-सी गुफामें रहनेवाले विरक्त बाबाजी कहाँसे कैसे इतने बड़े भण्डारेकी व्यवस्था करेंगे? इसमें क्या रहस्य है- यह जाननेके लिए मैं भी लड़केका भेष बना साधुओंकी लाइनमें जा लगी। लाइनके साथ एक-एक कदम आगे बढ़ाती गयी। जैसे ही गुफाके सामने पहुँची और बाबा मुझे लोटा-धोती देनेको हुए, मैं छलाँग मारकर गुफाके भीतर चली गयी। मैंने इसकी बिलकुल चिंता न की कि बाबा और बाहरके लोग क्या कहेंगे। और जानते हो मैंने भीतर क्या देखा?'

'क्या देखा माँ ?'

माँ खिलखिलाकर हँस पड़ीं और बोलीं- 'गुफा बिलकुल खाली थी! उसमें न तो कोई लोटा था और न ही धोती!'

थोडी देर और इसी प्रकारकी कुछ बातें होती रहीं। अन्तमें मैंने कहा- 'माँ। एक बात पूर्व? मुझसे ध्यान बिलकुल नहीं होता। बहुत चेष्टा करता हूँ, पर किसी प्रकार मन एकाग्र ही नहीं होता। मुझे क्या करना चाहिये ?'

भाने मेरी पीठ ठोकते हुए कहा- 'तुम केवल ठाकूरके लिए गाया करो। तुम्हें ठाकुर गानसे मिलेंगे, ध्यानसे नहीं। मैंने आज जो देखा उससे मुझे पूरा विश्वास है कि ठाकुर तुम्हारे ऊपर कृपा अवश्य करेंगे।'

श्रीकृष्णप्रेम अपने शिष्योंके सहयोगसे यशोदा माँ द्वारा निदिष्ट गौडीय-वैष्णव रीतिके अनुसार ठाकुर-सेवाका प्रत्येक कार्य बडी निष्ठा और शुद्धतासे करते। वे भिक्षाटन कर ठाकुरके लिए अन्न जुटाते। ठाकुरकी रसोई भी अधिकतर स्वयं बताते। इस कार्य में वे कितना दक्ष थे और ठाकूर उनके द्वारा प्रस्तुत किया हुआ भोग कितना प्रेमसे आरोगते थे, यह एक दिनकी विशेष घटनासे स्पष्ट है।

उस दिन आश्रमवासियोंने बहुत अच्छा घी संग्रह किया था। श्रीकृष्णप्रेमने बडे जतनसे ठाकुरके लिए हलुआ बनाया भोग निवेदनकर दरवाजा बन्द कर दिया। बाहर बैठकर सब लोग करने लगे जप और ध्यान। कुछ देर में श्रीकृष्णप्रेम हठात् उठे और बोले-'लगता है ठाकरने आज हलुआ बडे प्रेमसे पाया है। चलो देखें. उन्होंने क्या सचमुच आरोगा है?'

यशोदा माँ पास बैठी थीं। गोपालकी बात सुन वे कुछ मुसका दीं। उसी समय सब लोगोंने ठाकुर-घरमें प्रवेश किया। सचमुच ठाकुर आधेसे ज्यादा हलुआ खा गये थे। उनकी ऊँगलीके निशान भी हलुएमें बने हुए थे। यह देख सब लोग आनन्दसे उन्मत्त हो नृत्य-कीर्तन करने लगे।

यशोदा माँका ठाकुरके प्रति वात्सल्य भाव था। श्रीकृष्णप्रेमीको भी वे अपना पुत्र मानती थीं। इस दृष्टिसे श्रीकृष्णप्रेम ठाकुरके बड़े भाई होते थे। ठाकुरको इस रिश्तेसे इन्कार कब था? वे तो चाहते ही हैं कि कोई उन्हें अपना भाई, बन्धु, पुत्र या स्वामी कुछ माने, जिससे वे भी उसी भावसे उसे अपना मानकर और उनके प्रेम रसका आस्वादन कर धन्य हों।

भक्ति-प्रेम और विरह की अनुभूति

एक दिन रातको सोते समय श्रीकृष्णप्रेमके कानमें आवाज आयी- 'दादा, दादा!' उन्होंने चौंककर चारों ओर देखा, पर कोई न दीखा। आवाजको अपना भ्रम समझकर उन्होंने आँखें मींच लीं।

फिर वह मधुर स्वर- 'दादा!' इस बार स्पष्ट लगा कि आवाज मन्दिरके भीतरसे आ रही है।

पर मन्दिरमें तो कोई है नहीं ठाकुरके सिवा। तो क्या यह ठाकुरको आवाज शीतलयाचे, जंगला खुला आचे दादा, ठण्ड लग रही है, जंगला खुला है।' 11- सोचते-सोचते जैसे ही वे मन्दिरके निकट पहुंचे, उन्होंने फिर सुना-'दादा,

उनका शरीर काँप गया। झट मन्दिरका दरवाजा खोलकर जंगलेका दरवाजा उन्होंने कहा- ठाकुर, तोमाकेऊ शीत लागे ? - ठाकुर, तुम्हें भी ठण्ड लगती है? बंद किया। ठाकुरको अच्छी तरह उढ़ाकर सुला दिया। उढाते समय मृद स्वर में

उसी समय ठाकुरके नेत्रोंसे दो अश्रु-बिन्दु टपक पड़े। यह देख श्रीकृष्णप्रेमका प्रेम-सिन्धु उथल पड़ा। वे स्थिर न रह सके। 'हा ठाकुर ।' कह स्वयं भी रो पड़े। फिर किसी प्रकार अपनेको सम्हाल कर बहिर्वाससे ठाकुरके आँसू पोंछ दिये।

ठाकुर तो सो गये, पर श्रीकृष्णप्रेमको नींद कहाँ ? उनके कानोंमें अब भी गूँज रहा था ठाकुरका मधुर कण्ठस्वर। ठाकूरने उन्हें 'दादा' कहकर पुकारा था। मानो प्यार भरे इन दो अक्षरोंके माध्यमसे अपना सारा प्यार उडेल दिया था उनपर । मानो अकरके प्यार बादल सहसा उमड़ पड़े थे उनके हृदयाकाशपर और एक ही क्षणमे उस प्रेम-पयोधिका सारा जल उडेल पड़े थे उनके हृदय प्रांगणमें। उनका क्षुद्र हृदय क्या झेल सकता था पेमकी इस प्रबल बौछारको ? बौछारका सारा जल झर-झर वह रहा था उनके दोनों नेत्रोंसे दो जल-प्रपातोंके रूपमें। इन प्रपातोंका वेग क्या थमनेको बा कभी? यह तो नित्य बढ़ता ही गया। आजीवन सिक्त करता रहा उनके वक्षको और सार्थक करता रहा उनके 'श्रीष्णप्रेम' नामको।

इस घटनाके पीछेसे बार-बार झाँक पड़ता है एक रहस्यमय प्रश्न-ठाकुरके - आँसू आ जानेका कारण क्या था? श्रीकृष्णप्रेमने सहज भावसे यही न पूछा था उनसे - 'ठाकुर, क्या तुम्हें भी ठण्ड लगती है?' इसमें रो पड़नेकी कौन-सी बात धी? कौन-से उनके मर्मस्थलसे जा टकराया था श्रीकृष्णप्रेमका यहा साधारण प्रश्न ?

इसका उत्तर तो स्वयं ठाकुर ही दे सकते हैं। हमारी बुद्धिकी क्षमता कहा, जो उनके मर्मस्थलको छू भी सके। पर, उनके चरण-कमलोंकी हृदयमें धारण कर कुछ लगानेमें क्या कोई हर्ज है?

ठाकुरके आँसू आ गये थे एक और बार भी, जब यशोदा माँने उन्हें स्तनपान करते अतृप्तावस्थामें गोदमें उतार दिया था, दूध उफनता देखकर। पर, इस बारकी अतृप्ति एक दूसरे प्रकार की थी। इस बार प्रश्न ठाकुरकी उदर-पूर्तिका नहीं, आत्मा-पूर्तिका-उनके अन्तरतम आत्माकी पूर्तिका था। वजके भक्त

ठाकुरके अन्तरतम आत्माका सम्बन्ध अपने भक्तो से है। उनके प्रेमरस निर्याससे है। उन्हें जितना अपने भक्त प्रिय है, उतना और कोई प्रिय नहीं है। उन्हें जितना मुख अपने भक्तोंकी प्रेम-सेवामे मिलता है उतना अपने आनन्द-स्वरूप आत्मासे भी नहीं मिलता। उनके साधक-भक्त उनकी साक्षात् सेवा ऐसे तो कर नहीं करते है, तो वे विग्रह रूपमें साक्षात् प्रकट होकर उनकी सेवा ग्रहण करते हैं। इस सकते. जैसे उनके सिद्ध-भक्त करते है। इसलिए जब वे उनकी सेवाकी इच्छा प्रकार साधकोका कल्याण तो होता ही है- क्योंकि उन्हें माया-बन्धनसे मुक्ति मिलती है-उनकी अपनी भी आत्म-तृप्ति होती है।

भक्त प्रेमसे उनकी सेवा करता है वे प्रेमसे उसे ग्रहण करते हैं। भक्त प्रेमसे हैं। भक्त प्रेमसे तरह-तरहके वस्त्राभूषण धारण कराता है, वे प्रेमसे धारण करते हैं। खिलाता है. वे प्रेमसे खाते हैं। भक्त प्रेमसे नहलाता-धुलाता है, वे प्रेमसे नहाते-धोते भक्त जो कुछ भी उनके लिए प्रेमसे करता है, वे उसे प्रेमसे अंगीकार करते हैं।

ठाकुरको भक्तका नहलाना-धुलाना, पहराना-उढ़ाना, खिलाना-पिलाना तृप्तिकर हो सकता है, तभी जब उन्हें इस सबकी सचमुच आवश्यकता हो, इसकी सच्ची भूख हो। यदि कोई यह माने कि पूर्णात्पूर्ण, आप्तकाम, पूर्णकाम भगवान्‌को भूख-प्यास कैसी, तो वह भले ही माने। आप्तकामता भी उनका एक स्वरूप है। पर, यह उनका बाह्य स्वरूप ही है, जिसका ज्ञानीको दूरसे आभास होता है। उनका वास्तविक स्वरूप, आन्तरिक और निज स्वरूप वह है, जिसका भक्तको निकटसे अनुभव होता है। उसे भूख-प्यास, गर्मी-सर्दी सभी कुछ व्यापती है, पर उसकी तृप्ति होती है केवल भक्त द्वारा प्रेमसे दिये गये उपकरणोंसे। वह भक्तकी प्रेम-सेवाका भूखा रहता है। भक्तकी प्रेम-सेवा उसे उतनी ही तृप्तिकर होती है, जितनी भक्तमें प्रेम-सेवाकी भूख होती है-

नानोपचारकृत

पूजनमार्तबन्धो,

प्रेम्पौब भक्तहृदयं सुखविद्रुतं स्यात् ।

यावत् क्षुदस्ति जठरे जरठा पिपासा, तावत् सुखाया भवति ननुभक्ष्यते यत् ।।

(पद्यावली-१०)

"भगवान् 'आर्तबन्धु' हैं। वे भक्तमें प्रेम-सेवाकी जितनी भूख देखते हैं, उतनी ही उनकी जठराग्नि तीव्र होती है। वे उसकी प्रेम-सेवा ग्रहण करनेको उतना ही

अधिक व्यग्र हो उठते हैं और उसे ग्रहणकर उनको तृप्ति भी उतनी ही अधिक होती

यह भगवान्का मधुर, रसमय स्वरूप है जो उनके ऐश्वर्यको पूर्णतया आच्छादित किये रहता है। रसकी अशेष तृष्णाके कारण वे अपने ऐश्वर्यको भूले उन्हें भक्तके प्रेमसेवा-रसका आस्वादन करानेके लिए उनके ऐश्वर्यको आच्छादित रहते हैं। केवल भूले ही नहीं रहते, उनकी अघटन घटन-पटीयसी योगमाया शक्ति कर उसे मधुर नर-लीलाके इतना उपयुक्त बना देती हैं कि उन्हें साधारण जीवके समान ही भूख-प्यासादि व्यापने लगती है।

भक्त यदि कोई ऐसा कार्य करे, तो भगवानके इसे रसमय स्वरूपके अनुकूल हो. तो उन्हें अपार सुख होता है। यदि वह कोई ऐसा कार्य करे, जो उसके प्रतिकूल हो. तो उन्हें अपार दुःख होता है। श्रीकृष्णप्रेमने उनसे पूछकर - 'ठाकुर, तुम्हें भी ठण्ड लगती है?" उनके रसमय स्वरूपके विपरीत कार्य किया था, उनकी जठराग्नि जगाकर उसपर पानीका घड़ा उडेलने जैसा कार्य किया था, अतिथिको आमन्त्रितकर उसे न पहचानने जैसा कार्य किया था। ठाकुरकी यथार्थ सेवा ही कब हो सकती है. यदि उसकी भूखकी यथार्थ पहचान न हो ?

ठाकुर श्रीकृष्णप्रेमके प्रश्नका जैसा उत्तर दिया आँसू बहाकर वैसा वे कुछ कहकर नहीं दे सकते थे। ठाकुरके उन आँसुओंकी कीमत श्रीकृष्णप्रेमसे अधिक और कौन जान सकता था ? उन्होंने अपने बहिर्वासके उस छोरको फाड़ लिया, जिससे आँसू पोछे थे। उसे एक चाँदीके ताबीजमें आजीवन लगा रखा अपनी छातीसे।

ठाकुर और ठकुरानीकी मनोज्ञ प्रेमलीलाके भी श्रीकृष्णप्रेमको कभी-कभी दर्शन होते। एक दिन सदाकी भाँति वे ठाकुर-ठाकुरानीको शयन करा मन्दिरके दरवाजेका ताला बन्दकर सो गये। दूसरे दिन प्रातःकाल दरवाजा खोलकर मन्दिर के भीतर गये, तो देखा एक अद्भुत दृश्य! राधारानीका सोनेका हार श्रीकृष्णके गलेमें और कृष्णके सोनेके नूपुर राधारानीके चरणोंमें। श्रीकृष्णप्रेमने उसी क्षण आश्रमवासियोंकी बुलाकर कहा- 'देखो ठाकुर-ठाकुरानीकी लीला! अप्राकृत व्रज-धाममें, भक्तके हृदय-मचपर और मन्दिरकी बेदीपर सभी जगह एक-सा विलास।'

इस प्रकारकी ठाकुरोंकी लीलाको तो आश्रमके सभी लोग देखते। पर, श्रीकृष्णप्रेमके हृदय-मंचपर जो लीलायें घटतीं उन्हें उनके सिवा और कौन जानता ?

पर, इन लीलाओंका रहस्य क्या था? रहस्य था केवल श्रीकृष्णप्रेमकी गुरु-भक्ति और एकनिष्ठता। श्रीकृष्णप्रेमके लिए यशोदा माँका एक-एक शब्द, उनका

एक-एक निर्देश वेद-वाक्यके समान था। उन्होंने अपने आपको उनके द्वारा उनकी अपके भुनरूप उनके आदर्शकि साँचे में ढाले जानेके लिए पूर्ण आत्म-उनके जीवनको समग्र आध्यात्मिक उपलब्धि, इष्ट-कृपा और लीला-स्फूर्ति आप ही समर्पण कर दिया था। अपने पिछले सभी संस्कारों। विद्या, बुद्धि, ज्ञान, गौरवादिकी पूर्ण आहुति देकर उनके चरणोंके एकात्मता प्राप्त कर ली थी उनसे । इसलिए उत्तर आयी थी उनके हृदय-प्रांगणमें।

श्रीकृष्णप्रेमकी गुरुनिष्ठाके सम्बन्धमें एक बार माँ यशोदाने दिलीपरायसे कहा था 'मैं गोपालको गुरुनिष्ठाके दो उदाहरण प्रस्तुत कर सकती हैं। एक तो यह को उसने जब मुझसे पहले शिष्य रूपमें उसे स्वीकार करनेको कहा, तो मैंने कहा-'मैं तुम्हें शिष्य रूपमें स्वीकार तभी कर सकती है. जब तुम यह वचन दो कि तुम्हें जीवन भी कोई आध्यात्मिक उपलब्धि न हो तो भी तुम मेरा और भक्ति-पथका त्याग न करोगे। मैं तो जानती थी कि यदि उसने यह वचन दे दिया, तो उसे आध्यात्मिक उपलब्धि न होनेका कोई प्रश्न ही नहीं। पर, बता देना चाहती थी कि गुरु-दीक्षा ग्रहण करनेमें पूर्ण समर्पण आवश्यक है। उसमें किसी प्रकारकी शर्त या सौदेको गुंजाइश नहीं है।

उसने मुझे वचन दिया और काय, मन और वाक्यसे सहर्ष अपने-आप को मुझे समर्पित कर दिया, वैसे ही जैसे बच्चा पूर्ण विश्वासके साथ अपने-आप को माँको समर्पित कर देता है।'

दूसरा उदाहरण एक चमत्कारिक घटना है, जो कभी न घटी होती यदि वह मुझे केवल अपनी माँ ही मानता होता। घटना इस प्रकार है। वह बाहर बैठा ध्यान कर रहा था। उस समय किसी कीड़ेने उसके टखनेमें काट लिया। वहाँ सेप्टिक हो गया। उसका जहर बराबर बढ़ता गया। अलेक और दो और डॉक्टरोंको बुलाया गया, पर वे किसी प्रकार उसे बढ़नेसे न रोक सके। वह इतना बढ़ गया कि उन्होंने उसकी टाँगे काट देनेकी सलाह दी। तब मैंने उन्हें रोका और कहा- 'गोपाल ठीक हो सकता है, यदि वह सारी दवाइयाँ बन्द करके केवल ठाकुरका चरणामृत ले।' गोपाल झट तैयार हो गया। डॉक्टरोंकी सलाहकी उसने तनिक भी परवाह न की और सचमुच वह बिलकुल ठीक हो गया केवल ठाकुरके चरणामृतके प्रभावसे!'

आजकलके मनीषी भगवत्तामें विश्वास नहीं करते। उनके विचारसे एक जड़-शरीरधारी जन्म-मरणशील गुरुको भगवान्से अभिन्न मानना भगवान्‌का अपमान करना है। परन्तु श्रीकृष्णप्रेमका, उनकी विद्या, बुद्धि और जन्मगत् पाश्चात्य।

संस्कारोंके होते हुए भी गुरु और भगवान्‌की अभिन्नतामें पूर्ण विश्वास था। एक बार उन्होंने तार्किक दिलीपरायको, जिन्हें गुरुको भगवान्से अभित्र माननेसे आपत्ति थी. तर्क द्वारा गुरु और श्रीकृष्णकी अभिन्नताके सिद्धान्तको अपने दो पत्रोंमें बड़े सुन्दर ढंगसे समझानेकी चेष्टा की थी। प्रायः देखा गया है कि साधक मुखसे भले ही गुरुको भगवानसे अभिन्न मानें, उनके हृदयमें शंकाकी गुंजाइश रहती है और गुरुमें घोड़ी-सी भी कमी या त्रुटि दीखनेपर वह पनपने लगती है. जिसके कारण उनको उन्नति नहीं होती। उनके भावकी पुष्टिके लिए हम उन पत्रोंके कुछ अंशका हिन्दी अनुवाद यहाँ उद्धृत कर रहे हैं:

जहाँ तक गुरु और कृष्णकी अभिन्नताका प्रश्न है. मुझे लगता है कि शायद तुमने इसका अर्थ ठीक नहीं समझा। ऐसा न होता तो तुम गुरुके बाह्य और भौतिक रूपकी कृष्णसे तुलना न करते। परन्तु यदि तुम्हें तत्वतः गुरुको श्रीकृष्णसे अभिन्न मानने में कठिनाई होती है, तो तुम उन्हें श्रीकृष्णके दास और उनके प्रतिनिधिके रूपमें तो उनसे अभिन्न मान ही सकते हो। बहत-से, या शायद अधिकांश श्रीकृष्ण-भक्त, इस रूपमें ही गुरु और श्रीकृष्णको अभिन्न मानते है।

परन्तु, गुरु और श्रीकृष्णकी एकताका अर्थ यह नहीं कि गुरुका शरीर या मन कृष्ण है, बल्कि यह है कि गुरुमें जो ईश्वरीय-सत्ता या चेतना है वह श्रीकृष्ण है। कृष्णका अर्थ है भगवदीय सत्ता। गुरु उस सत्ताको अभिव्यक्त करता है। शिष्यको उस सत्ताकी अभिव्यक्ति जितनी गुरुमें होती है, उतनी और कहीं नहीं होती। वह सत्ता (और वह शक्ति) ही वास्तविक गुरु है, न कि उसका बाह्यरूप, जिसके द्वारा वह अभिव्यक्त होती है। बाह्यरूप मानुषिक और अपूर्ण है और उसमें त्रुटियाँ भी हो सकती हैं। पर, उसमें जो भगवदीय चेतना है, वह पूर्ण है।

हम जब किसीको गुरुरूपमें वरण करते हैं, तो इसलिए नहीं कि वह बड़ा विद्वान या चरित्रवान है और उसे सिद्धियाँ प्राप्त हैं, बल्कि इसलिए कि जाने या बिन जाने, उसके माध्यमसे ही हमारा उस भगवदीय सत्तासे प्रथम सम्पर्क हुआ होता है। जो यह कहा जाता है कि सब गुरु एक है, वह भी इसी अर्थमें कि भगवदीय चेतना ही वास्तविक गुरु है, जो सब गुरुओंमें एक-सी विद्यमान है। संक्षेपमें उस भगवदीय चेतनाके रूपमें श्रीकृष्णका प्रकाश और श्रीकृष्णकी कृपा ही गुरु है।

'शायद तुम कहो कि यह तो कोरे ज्ञानकी बात है, तो इसका एक दूसरा पक्ष भी है। श्रीकृष्ण ही हैं प्रेमके एकमात्र विषय। हम किसीसे प्रेम इसीलिए करते हैं कि २२६/

उजके भक

(सर्वाकर्षक श्रीकृष्णके समान) उसकी ओर आकर्षित करता है। प्रेमका उसमें श्रीकृष्ण्यका (या श्रीकृष्णके सौंदर्यादि गुणोंका) आंशिक प्रकाश हैं, तो जो अर्थ है आत्मसमर्पण। विशुद्ध प्रेमका अर्थ पूर्ण आत्मसमर्पण। पूर्ण आत्मसमर्पण गुरु या श्रीकृष्णको किया जाता है। इसलिए गुरुके गुरुत्व और श्रीकृष्णमें कोई अन्तर नहीं है।

'श्रीकृष्णको प्रेमसे पाया जाता है। जितना प्रेम या आत्मसमर्पण उतनी उसकी श्रीकृष्ण-प्राप्ति। श्रीराधाका आत्मसमर्पण श्रीकृष्णके प्रति पूर्ण है। इसलिए उन्हें श्रीकृष्णकी पूर्ण प्राप्ति है। श्रीकृष्ण अपने एक अंशको भी उनसे छिपा नहीं सकते। उनके सामने सदा अपने पूर्ण-पूर्णतम रूपमें प्रकट रहते हैं।

'श्रीकृष्णके गुरु रूपको हम पूरी तरह पहचान नहीं पाते. या वे इस रूपमें पूर्णरूपसे हमारे सामने प्रकट नहीं होते। इसका कारण यह है कि हमारा आत्मसमर्पण उनके प्रति पूर्ण नहीं है। जैसे-जैसे उनके प्रति हमारा आत्मसमर्पण बढ़ता है. वैसे-वैसे उनके स्वरूपकी हमारी जानकारी बढती है। जब हमारा आत्म-समर्पण पूर्ण हो जाता है, तब उनके वास्तविक स्वरूपकी पूर्ण अनुभूति भी हमें से जाती है, तब हम ठीक-ठीक जान लेते हैं कि जो श्रीकृष्ण हैं, वही श्रीगुरु हैं।*

श्रीकृष्णप्रेमके सम्बन्धमें एक बार श्रीअरविन्दने शिष्य स्याउकको लिखा था-'श्रीकृष्णप्रेममें एक शक्ति थी। उसके सहारे वे बहिरंग जगत्‌के चिंतास्रोतसे अपने-आप को विच्छिन्न रख सकते थे और पहुँच सकते थे उस स्थलपर, जहाँसे शाश्वत ज्ञानका उत्स फूटता है। उनकी यह शक्ति सचमुच बहुत प्रशंसनीय थी। यदि वे जागतिक चिन्ता-स्रोतके साथ योगायोग रखकर चलते, तो उन्हें रम्याँ-रत्यां और इसी प्रकारके, अन्य संस्कृतिवान् मनीषियोंके स्तरपर ही पढ़े रहना होता। ....शिष्यके प्रकृत आत्मसमर्पणका भाव उन्होंने द्रुतगतिसे परिपूर्ण रूपमें ग्रहण किया था। तभी न उन्हें अपनी साधनामें इतनी सफलता मिली। एक आधुनिक मनुष्यके लिए, चाहे वह शिक्षित इयोरोपियन हो या भारतीय, इस प्रकारकी सफलता हासिल करना बहुत कठिन है।

कारण यह कि आधुनिक मनुष्यमें है अत्यधिक विचार-विश्लेषण, संशय और तर्क-वितर्ककी भावना। चाहने पर भी वह इससे मुक्त नहीं हो सकता। मैं अपनी निजी अभिज्ञता और अन्यान्य साधकोंकी अभिज्ञताके बलपर कह सकता हूँ कि सत्यकी उपलब्धिका पथ इतना लम्बा और टेढ़ा-मेढ़ा नहीं है, यदि साधक संशय और विश्लेषणकी बाधाओंको दूर रख सके CLASS

श्रीकृष्णप्रेमने सहज ही इस बाधाका अतिक्रमण कर लिया था, इसलिए मैं उनका प्रशंसक हूँ।""

श्रीकृष्णप्रेम और यशोदा माँ मिर्तीला आते-जाते अलमोडामें अपने मित्र वैज्ञानिक वंशीसेनके बँगलेपर ठहर जाया करते थे। उनकी स्त्री श्रीमती एमरसनसेन उनकी नैष्ठिकताके बारेमें सब कुछ जानती थीं। उनके आते ही वे बरामदेको धो-पोछकर रखतीं और रसोईके लिए नये बर्तनोंकी व्यवस्था कर देती। श्रीकृष्णप्रेम और यशोदा माँ नहा-धोकर पवित्रतासे रसोई बनाते और ठाकुरको भोग देकर स्वयं प्रसाद ग्रहण करते। एक दिन वंशीसेनने ठट्टा करते हुए श्रीकृष्णप्रेमसे कहा- 'रसोईमें इतनी छुआछूत यदि मेरी बुढी विधवा दादी करती तो मैं समझ सकता। पर, आप इतनी छुआछूत करते हैं क्यों? कैम्ब्रिजमें पढ़ते समय तो आपका दूसरा परिवेश था। निश्चय ही उस समय आप गो-मांसादि भी खाते रहे होंगे। अब अपने-आप को विधि-निषेधके इस जंजालमें क्यों डाल रखा है?'

श्रीकृष्णप्रेमने हँसते-हँसते उत्तर दिया- 'वर्तमान युगमें व्यक्तिगत और सामाजिक नियन्त्रणके सभी संयम-नियमोंको भाड़में झोंका जा रहा है। मैं समझता हूँ कि ऐसे दुःसमयमें इस प्रकारके संमय-नियमके कुछ बन्धनमें रहना ही अच्छा है। फिर मेरे पहले जिन लोगोंने इस पथका अनुसरण किया, वे लक्ष्य-स्थलपर ठीक पहुँच गये। तब जिस व्यक्तिने इस पथपर यात्रा आरम्भ ही की हो, उसके लिए क्या यह कहना उचित है-मैं ऐसा करूंगा; वैसा नहीं करूँगाः इस नियमका पालन करूँगा, उसका नहीं करूँगा? इसलिए मैं इस पथके सारे ही नियमोंको मानकर चलता हूँ।'*

श्रीकृष्णप्रेम अपने आश्रममें कोई रेडियो या अखबार न रखते। उनका लक्ष्य था एक मात्र श्रीकृष्णप्रेम। उस लक्ष्यके अतिरिक्त और सभी चीजोंको उन्होंने अपने दृष्टि-पथसे दूर कर रखा था। माण्डुक्य उपनिषद्‌की इस उपमाका वे सदा ध्यान रखते थे-'ओग्' है धनुष, आत्मा है शर और लक्ष्य है श्रीभगवान् या ब्रह्म, जिसमें शरको बिद्ध करना है। 'शरवत् तन्मयो भवेत्'-शरके समान तन्मय होना है। समस्त जीवनको क्षिप्रगतिके धुनुःशर रूपमें परिणत करना है और उस शरको तीक्ष्ण कर लेना है पूजा-अर्चना और ध्यान-धारणाके माध्यमसे। आत्माकी पूर्णाहुति दे देनी है प्रभुके चरणोंमें। इसके बिना कुछ नहीं होना है। श्रीकृष्ण हमारा सब कुछ

इसलिए असम्पूर्ण खण्डरूप किसी व्यवहारको पसन्द नहीं करते। उन्हें पानेके लिए लेना चाहते हैं और अपना सब हमें देना चाहते हैं। वे पूर्ण अखण्ड वस्तु हैं न। दोनों हाथोंसे उनके चरण पकडने होते हैं। एक हाथ बढ़ाओ उनके चरणोंकी ओर, दूसरा रखो संसारकी ओर, तो वे पकड़में नहीं आते।

असली साधनाके स्वरूपके सम्बन्धमें दिलीपकुमार रायको अपने एक पत्रमे उन्होंने लिखा- 'असली योगका स्वरूप है श्रीकृष्णमें परिपूर्ण आत्मसमर्पण। इस समर्पणमें किसी प्रकारकी आकांक्षा या वासना नहीं होती। होता है श्रीकृष्णके चरणोंमें अपने आत्माका पूर्ण उत्सर्ग। जो भी कार्य या विचार आत्माके इस प्रकारके उत्सर्गको सम्भवपर करे, वही है असली साधना। और इस पूर्ण उत्सर्गक फलस्वरूप, जो आत्मिक वस्तु साधकके समक्ष उपस्थित हो. वही है लीला।'

कालिमा। गुरुगतप्राण श्रीकृष्णप्रेमके मर्मस्थलपर हुआ भीषण वज्राघात । यशोदा सन् १९४४ में उत्तर-वृन्दावनमें छा गयी शोक-कादम्बिनीकी व्यापक माँका तिरोधान हो गया। ऐसा आघात उन्हें अपने जीवनमें पहले कभी नहीं लगा था।

दिव्य अनुभूति और कृपा के प्रसंग

दिलीपकुमार रायको अपने एक पत्रमें उन्होंने लिखा-'गल स्टोन व्याधिके कारण माँ मर-देह त्यागकर चली गयीं। देहान्तके समय जो परिपूर्ण शान्ति विराज रही थी उनके अन्तरमें उसका वर्णन नहीं कर सकता। श्रीकृष्ण-दर्शन-जनित परितृप्तिकी एक नयी आभा झलक रही थी उनके मुख और नेत्रोंमें।

मैं ठीक जानता हूँ कि वे अब भी हमारे बीच विराज रही हैं, पहलेसे भी अधिक घनिष्ठ रूपसे। फिर भी उनके दैहिक सान्निध्यका अभाव मुझे असह्य हो रहा है। ...तुम तो जानते हो ही दिलीप, माँ मेरे निकट कौन-सी परम वस्तु थीं। बीस वर्षोंसे अधिक वे थीं मेरी सद्‌गुरु और मेरी माँ। उन्हें केन्द्रमें रखकर ही मैंने अपना सारा संसार बनाया था। अब भी वे उसी केन्द्र रूपमें विराजमान हैं सही, परन्तु उन्हें देहमें पानेका, दुःख बड़ा असहनीय है।

तिरोधानके पश्चात् भी माँने अपने प्रिय गोपालको अपनी आँखोंसे ओझल कभी नहीं किया। उस दिन दण्डेश्वर झरनेके पास माँका देह भस्मीभूत हो जानेके पश्चात् वे आश्रमवासियोंके साथ आश्रम लौट आये। थके होनेके कारण रातमें देर तक सोते रहे। शेषरात्रिमें हठात् सुनायी पड़ा माँका स्वर - 'गोपाल, यह क्या? अभी भी पड़े सो रहे हो। भजनका समय चला जा रहा है जो।' थोड़ा रुककर उन्हें आश्वस्त करते हुए फिर बोलीं- 'गोपाल, मैं अब भी आगेकी तरह तुम्हारे निकट सदा रहती हूँ, यह निश्चय जानना।'

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श्रीकृष्णप्रेम चौककर उठ खड़े हुए और चारों ओर देखते हुए अश्रुपूर्ण नेत्रोंसे बोले- माँ यदि तुम पासमें ही हो तो दीखता क्यों नहीं। अब तुम्हारे दर्शन कभी

'न बाबा, तुम्हींको आना होगा मोरे पास, एकके बाद एक पद आगे ते हुए। तुम्हारी साधना ठीक चलती रहे। तुम यहाँ लोकमें आकर मुझसे मिलोगे।"

श्रीकृष्णप्रेम जाडोंमें अधिकतर वृन्दावन चले जाया करते थे, वहाँ परम गुरुदेव श्रीबालकृष्ण गोस्वामी के निकट रहकर सदियोंके कुछ दिन निकाल देनेके उद्देश्यसे। प्रानगुदड़ीमें भरतपुरवाले बगीचेमें। उन्हें देख वहाँ अच्छी-खासी हलचल मच गयी प्रथम बार वे माँके साथ वृन्दावन गये थे १८ फरवरी, सन् १९३१ को। ठहरे थे स्यावनमें देखा गया था। उनकी असाधारण बुद्धि, और विद्वता और उनके विशुद्ध है। वे शायद पहले इयोरोपियन थे, जिन्हें कण्ठी-माला सहित वैष्णवके वेशमें वोचित आचार-विचार-से श्रीराधारमण मन्दिरके गोस्वामीगण उनके विशेष रूपसे प्रभावित थे। उन्हें अधिकारी जान उन्होंने उनके श्रीराधारमणके मन्दिरमें प्रवेश कर राधारमणके दर्शन करनेमें भी कोई आपत्ति नहीं की थी। उसका वृन्दावनके कुछ वने विरोध भी किया था।

पर विरोध शीघ शान्त हो गया था। इतना ही नहीं. उनके सम्मानमें गोस्वामी श्रीवनमाली लालाजीकी अध्यक्षतामें एक सभाकी गयी थी. जिसमें उन्हें उपाधि-पत्र प्रदान किया गया था और 'गौर-प्रेम-निधि' की उपाधि दी वो थी। श्रीकृष्णप्रेम शायद पहले इयोरोपियन थे, जिन्हें किसी हिन्दी-मन्दिर में प्रवेश दिया गया था और जिनका वैष्णव-समाजमें इस प्रकार सम्मान किया गया था।

'गौर-प्रेम-निधि'की इस उपाधिके पीछे एक रहस्य है, जिसका श्रीबालकृष्ण ऐस्वामीजीने अपनी डायरीमें उद्घाटन किया है। श्रीकृष्णप्रेम पहले श्रीगौरांगमहाप्रभुको इंकृष्णका अवतार नहीं मानते थे। उनकी धारणा थी कि सम्प्रदायके लोगोंने उन्हें अवतार बना दिया है। उन्होंने संकल्प किया था कि गौड़ीय-सम्प्रदायके अन्तरभुक्त हते हुए भी वे तब तक उन्हें अवतार न मानेंगे, जब तक श्रीकृष्णसे ही इस सम्बन्धमें कोई संकेत प्राप्त न हो। फलस्वरूप भक्तवाञ्छाकल्पतरु-श्रीकृष्णने स्वप्नमें दर्शन देकर उनसे कहा था- 'जो में हूँ वही श्रीचैतन्य महाप्रभु हैं।' तभीसे गैर-प्रेममें वृद्धि होने लगी थी और वे 'गौर-प्रेम-निधि' बन गये थे।

माँके अन्तर्धानके पश्चात् भी श्रीकृष्णप्रेम वृन्दावन जाते रहे। एक बार जब वे वृदावनमें थे, उनके साथ थीं मतिरानी, जिन्होंने अब उनसे मन्त्र-दीक्षा और संन्यास

ले लिया था। काशीके डॉ० गोविन्दगोपाल मुखोपाध्यायको भी उन्होंने वहाँ बुला लिया था।

उसी समय डॉ० गोविन्दगोपालके बड़े भाई और श्रीकृष्णप्रेमके पुराने बन्धुका टेलिग्राम आया। उसमें उन्होंने श्रीकृष्णप्रेमसे किया था मिर्तोला लौटते समय बैद्यनाथधाममें उनके पास होकर जानेका।

सोब-विचार कर रहे थे। हठात् वे उठ खड़े हुए और बोले- 'रुको मैं अभी उनके पास जानेके लिए मतिरानी और डॉ० गोविन्दगोपालसे श्रीकृष्णप्रेम आता हूँ।'

वे अपने कमरे में चले गये। थोडी देर बाद आकर बोले- 'माँका निर्देश प्राप्त हुआ है। उन्होंने कहा है- 'तुरन्त मिर्तोला चले जाओ। तुम्हारा वहाँ पहुँचना बहुत आवश्यक है।'

तत्काल वे मिर्तीला चले गये। देखा कि जिस पुजारीपर ठाकुरको सेवा-पूजाका भार छोड़ गये थे, वह चला गया। यदि वे उस दिन वहाँ न पहुँचे, तो ठाकुरकी सेवा न हो सकती। शायद उन्हें उपवासी रहना पड़ता।

वृन्दावन आते-जाते श्रीकृष्णप्रेममें वृन्दावनीय राधा-भावका संचार हुआ। वे हर समय राधाका चिन्तन करते, राधाका कीर्तन करते, किसीको बुलाना होता तो भी वृन्दावन भक्तोंकी तरह 'जय-राधे' कहकर उसे सम्बोधन करते। राधारानीने भी अपना सारा स्नेह उनपर उड़ेल दिया। वे उनसे साक्षात् बातें करतीं। उन्हें आदेश-निर्देश देतीं।

इस सम्बन्धमें 'भारतेर साधक' के लेखक श्रीप्रमथनाथ भट्टाचार्यने अपने और श्रीकृष्णप्रेमके घनिष्ट मित्र श्रीहेरम्बर मुखोपाध्यायकी आँखोंदेखी एक मनोज्ञ घटनाका वर्णन किया है।

भक्त सुनील और स्त्री आरती श्रीकृष्णप्रेमके शिष्य थे। सुनील इलाहाबादमें

किसी दफ्तरमें काम करते थे। बीच-बीचमें मिर्तोला जा गुरुदेवका संग करते थे। एक बार वे और उनकी स्त्री दोनों बेचैन थे शीघ्र किसी प्रकार गुरुदेवके पास पहुँच जानेको। पर, पैसे थे नहीं टिकट खरीदने तकको। क्या करें, सोचते-सोचते स्त्री बोली- 'लो, ये मेरे सोनेके कड़े बेच डालो।'

सोनेके कड़े बेचकर वे परमानन्दपूर्वक मिर्तोला पहुँच गये। एक दिन श्रीकृष्णप्रेम ठाकुरकी सेवा-पूजा कर बाकर निकले। उनके हाथमें थे सोनेके दो कड़े। सुनील

औरतोके पास आकर स्निग्ध स्वरमें बोले- 'आरती, बताओ तो तुमने अपने क्या किये ? सच बताना।'

केकडे आरती मुख नीचे कर खड़ी रहीं। श्रीकृष्णप्रेम मन्द मन्द हँसते हुए बोले-रानीने मुझे बता दिया है। तुम लोग यहाँ आनेकी छटपटीमें तुरन्त खर्च जुटा सके। इसीलिए कडे बेच दिये। राधारानीने मुझसे कहा है- 'मेरे हाथके कडे बोलकर आरतीको दे दो। उसके नंगे हाथ अच्छे नहीं लगते।'

सन् १९४८ में श्रीकृष्णप्रेम दक्षिण भारतीको तीर्थ यात्राको निकले। पहले स्वास और पाण्डचेरी होते हुए गये तिरुवन्नामलईमें रमण महर्षिक आश्रम। उस समय महर्षि अपनी कोचमें लेटे थे। उनके विस्फारित नेत्र रहस्यमय लोककी किसी दय वस्तुपर टिके थे। मुखपर विराज रही थी अन्तरात्माकी परितृप्ति-सूचक अर्थस्फुट हँसी। चारों ओर बैठे भक्त नियमित ध्यान और जपमें रत थे। दर्शनार्थी विर्निमेष आत्माज्ञानी महात्माकी ओर देख रहे थे।

श्रीकृष्णप्रेम भी प्रणाम् कर एक ओर बैठ गये ध्यानकी मुद्रामें। थोडी ही देर में हे एक दिव्य भावसे आविष्ट हो पड़े। अन्तर्लोकसे अस्फुट स्वरमें ध्वनित हुआ एक प्रश्न- 'कौन हो तुम ? क्या है तुम्हारा स्वरूप ?'

पहले उन्होंने इसपर कोई ध्यान नहीं दिया, पर जब बार-बार वही प्रश्न सुनायी एडने लगा, तो बोले- 'मैं हूँ श्रीकृष्णका नणण्य दास। इसके सिवा और कुछ न्हें।'

फिर ध्वनित हुआ, दूसरा प्रश्न - 'कौन श्रीकृष्ण, कौन श्रीकृष्ण ?'

'नन्दसुत श्रीकृष्ण, वंशीधारी, स्वयं श्रीभगवान् ।'

प्रश्नकतनि जब और प्रश्न कर इससे भी और पीछे उन्हें ठेलना चाहा, तो उन्होंने कृपामयी राधारानीकी शरण ली। राधारानीने उत्तर दिया- 'श्रीकृष्णको छोड़ और किसी वस्तुका अस्तित्व ही नहीं। तब उनका और परिचय क्या हो सकता है। शैकृष्णका परिचय श्रीकृष्ण ही दे सकते हैं। मनुष्यकी क्या क्षमता जो उनके सम्बन्धमें कुछ कह सके।'

दूसरे दिन प्रातः जब वे महर्षिके निकट बैठे थे, उन्होंने उनके प्रति घुमायी अपनी अतलस्पर्शी दृष्टि और कुछ देर नीरव रहकर हँस दिये। श्रीकृष्णप्रेम समझ पये कि पिछले दिन उनके अन्तरालमें जो प्रश्न उठे थे, उनके पीछे वे ही थे। उजके भक्क

तब प्रेमने मन-ही-मन प्रश्न किया 'महापुरुष, अब आप बतायें आप कौन है और क्या है आपका स्वरूप ?' उसी समय हठात् उनका स्थूल देह सबके पूर्ववत् विराजमान श्रीकृष्णप्रेमकी ओर देखकर मुस्कुरा रहे हैं। श्रीकृष्णप्रेम समझ सामने शुन्यमें विलीन हो गया। थोड़ी देर में फिर सबने देखा कि वे अपने स्थानपर गये कि वे स्थूल-सूक्ष्मकी परिधिसे बाहर एक आत्मज्ञानी महापुरुष हैं।

जब श्रीकृष्णप्रेम महर्षिके आश्रमसे चले गये, तब उन्होंने अपने एक भक्तसे उनकी प्रशंसा करते हुए कहा-

'श्रीकृष्णप्रेममें एक ज्ञानी और भक्तका अद्भुत समावेश है।'

तिस्वनामलाईसे श्रीकृष्णप्रेम त्रिचनापल्ली होते हुए श्रीरंगम गये। वहाँ शेषशायी रंगनाथकी मूर्तिक दर्शन किये। उस समय उन्हें एक दिव्य अनुभूति हुई। उन्होंन वहाँसे लौटते समय पाण्डचेरी में दिलीपरायसे उसका वर्णन किया। दिलीपरायके शब्दोंमें उन्होंने कहा -

"वह एक अद्भुत दृश्य था दिलीप ! जैसे ही मैंने श्रीरंगनाथजीको दण्डवत्की मेरी बाह्य चेतना जाती रही और मैंने देखा - क्या बताऊँ दिलीप क्या देखा-ओह कैसा मनोरम ! कैसा आकर्षक ! मैं इन जड़ शब्दोंमें, मरे-मरे शब्दोंमें उस जीवित-ज्वलन्त दृश्यका कैसे वर्णन करूँ ?'

'मैंने देखा एक तरल प्रकाशका अनन्त समुद्र। वह सृष्टिके पूर्वका जलधि था या क्या मैं नहीं जानता। देखते-देखते वह समुद्र प्रेमके निश्वाससे तरंगायित हुआ और उसकी नीली-नीली लहरोंमें एक-एककर निकल पड़े अनन्त शुभ्रवर्णक कमल ! प्रत्येक कमलपर दण्डायमान थे वंशी बजाते श्रीकृष्ण और मन्द-मन्द मुस्काती राधा ! ओ दिलीप ! क्या कहूँ? वह कैसी सुषमा ! कैसी बंशी-ध्वनि ! कैसा राधारानीका छलकता प्रेम ! कैसी अपूर्व शान्ति ! कैसा अपूर्व आनन्द !'

जब वे यह कह रहे थे उनका कलेवर कम्पित हो रहा था और वाणी अवरुद्ध हो रही थी। प्रेमाश्रु उनके दोनों कपोलोंसे ढलककर वक्षस्थलको सिक्त कर रहे थे।

अपनी इस अनुभूतिका वर्णन करते हुए श्रीकृष्णप्रेम कहा करते - 'भारतके मन्दिर और सिद्धपीठ आध्यात्मिकताके एक-एक शक्ति-केन्द्र है। निष्ठाके साथ वहाँ रहकर यदि कोई साधना करे, तो फलकी प्राप्ति अवश्य होती है।

भारतके अन्तर्जीवनके सम्बन्धमें श्रीकृष्णप्रेमकी जैसी श्रद्धा थी, वैसी स्वयं भारतवासियोंमें भी कम देखनेमें आती है। वे कहा करते - 'भारत ही विश्वका एक मात्र देश है, जहाँ दीर्घकालसे आज तक सिद्ध-साधकोंका राजत्व रहा है और

श्रीकृष्णप्रेम (रोनाल्ड निक्सन ) और यशोदा

जिसके कोटि-कोटि लोग उन्हें बराबर श्रद्धा और सम्मानकी दृष्टिसे देखते रहे हैं। साधकोंकी आत्मिक ज्योतिके परकोटेमें उसका आध्यात्मिक जीवन सुरक्षित रहा है। इधर प्राय: एक सौ वर्षसे भारतीको चिंताधारामें कुछ परिवर्तन हुआ है। कुछ लोगोंने कहना प्रारम्भ किया है कि हिन्दू धर्म मध्ययुगीय है, हिन्दुओके देवी-देवताओंकी अनावश्यक बोझ मात्र हैं। जो लोग ऐसा कहते हैं. चे पाश्चात्य देशोंकी वैषयिक पूजा पेड-पौधों और ईंट-पत्थरोंकी पूजा है और हिन्दू साधु-समाजके ऊपर सफलताकी चकाचौंधसे मोहग्रस्त हैं। वे हमारी दयाके पात्र हैं। प्रसन्नताकी बात यह है कि ऐसे लोगोंकी संख्या बहुत कम हैं। भारतका साधारण व्यक्ति आज

भी साधु-जीवनकी पवित्रताका सम्मान करता है. भक्ति और ज्ञानमें श्रद्धा रखता है। वह स्वयं भजन-साधन करे या न करे जो लोग हजार हजार वर्ष पुराने आत्मिक ऐश्वर्यको वहन करते हैं. उनके चरणोंमें प्रणत अवश्य होता है।**

भारत पर जब चीनने आक्रमण किया. मिसेज सेनने उद्विग्न हो उनसे पूछा- 'आपकी क्या धारणा है. इस आक्रमणका क्या परिणाम होगा ?'

कुछ देर नीरव रहकर उन्होंने शान्त भावसे आत्मविश्वासके सुरमें कहा- 'आपको याद होगा कि कुरुक्षेत्रमें युद्धके समय अर्जुनको बध करनेके लिए अश्वत्थामाने ब्रह्मास्त्र छोडा था। उससे रक्षा पानेका कोई भी उपाय न था। उस समय सारथी श्रीकृष्णने रथको अपने चरणोंसे दबा दिया था, जिससे रथका पहिया धंस गया था। रथ नीचा हो गया था और ब्रह्मास्त्र अर्जुनके सिरके ऊपरसे निकल गया था। मेरा विश्वास है कि किसी संकटमें श्रीकृष्ण भारतको अपने चरणतलमें इसी प्रकार दबाकर सुरक्षित रखेंगे। भारतकी आत्माका विनाश कभी नहीं होगा।'

भारतीय धर्म और संस्कृतिमें आस्था रखनेके कारण श्रीकृष्णप्रेमको कभी-कभी कटु वाक्य सुनने पड़ते थे। एक बार वे मद्रास जा रहे थे। गाड़ीके डिब्बेमें एक ओर बैठी थी एक एंग्लो इण्डियन महिला। वह बड़े ध्यानसे देख रही थी उन्हें और उनकी वेशभूषाको। मुण्डित मस्तक, लम्बी चुटिया, तिलक-कण्ठी, और गलेमें लटकी झोलीमें नित्य सेवित श्रीकृष्णके विग्रहको देख-देख वह मन-ही-मन कुढ़ रही थी। देखते-देखते वह एकदम बिखर पड़ी- 'धर्मत्यागी, धर्मद्रोही कहींके! तुम्हें शर्म नहीं आती पवित्र ईसाई धर्म छोड़कर देश और स्वजनोंको छोड़कर यहाँके मूर्ख लोगोंका संग करते ?'

गाडीमें बैठे और लोग विरोधपूर्ण भंगीसे उसकी ओर ताकने लगे। श्रीकृष्णप्रेम नौरव रहकर मन्द-मन्द मुस्काते रहे।

उन्हें इस प्रकार मुस्काते देख वह झुंझलाकर बोली-'मैं पूछती हूँ क्या पाया है तुमने अपना देश, धर्म और संस्कृति छोड़कर ?'

श्रीकृष्णप्रेमने ठाकुरको निकाला झोलीसे और उन्हें हाथमें ले प्राण खोलकर हँसते हुए बोले- 'मैडम, पाया है इसे, अपने श्रीकृष्णको।'

महिला और कुछ न कह सकी। पीठ फेरकर खिड़कीकी ओर देखने लगी ।

श्रीकृष्णप्रेमकी जीवन-नैया अब धीरे-धीरे गन्तव्य स्थानके निकट पहुँच रही थी। हक्वर्मकी बीमारीसे उनका शरीर दुर्बल होने लगा था। चिकित्साके लिए कोई कहता तो वे हँसकर कहते- 'सदासे ठाकुर ही तो हैं मेरे डॉक्टर। अब और कौन-से डॉक्टरपर जाऊँ।'

भक्तोंने एक बार कहा - 'ठाकुर और राधारानीसे आपने कितनी बार क्या-क्या कहा है। उन्होंने कभी अपकी अनसुनी की है? इस बार उनसे कहिये न कि आपको ठीक कर दें।'

'तुम उनसे आयु बढ़ानेके लिए कहनेकी कह रहे हो? एकबार तो उन्होंने आयु बढ़ा ही दी। उसीकी म्याद न अभी तक चल रही है' उन्होंने हँसते हुए उत्तर दिया।

म्याद पूरी होनेमें अब बहुत समय तो था नहीं। १४ नवम्बर सन् १९६५ में श्रीकृष्णप्रेमने कृष्णप्रेम-समुद्रमें ऐसी डुबकी ली कि फिर उन्हें निकलते किसी ने नहीं देखा। वे निकले दूर एक ऐसे स्थानपर जाकर, जहाँ राधा-कृष्ण तटपर खड़े उनकी प्रतीक्षा कर रहे थे अपने सुकोमल हाथोंसे उन्हें अपने निकट खींच लेनेके लिए !

श्रीकृष्णप्रेम शायद पहले अँग्रेज थे, जिन्होंने हिन्दू-धर्म-शास्त्रोंका गम्भीर अध्ययन ही नहीं किया, उनके अनुरूप साधनाके द्वारा परात्पर तत्त्व श्रीराधा-कृष्णका साक्षात्कार किया, उनके प्रेमकी उपलब्धि की और विश्वको उसका सन्देश दिया।

उनके तीन ग्रन्थ हैं, जिनके द्वारा आज भी उनका सन्देश देश-विदेशके मुमुक्षुओं तक पहुँचकर उनके कल्याणका पथ प्रशस्त कर रहा है। वे हैं-

श्रीकृशप्रेम (रोग विर) और

इनके अतिरिक्त Aryan Path और 'कल्याण' आदि पत्रिकाओंने जो उनके लेखों श्रीदिलीपकुमार राय द्वारा प्रकाशित उनके पशेसे भी लोगोंको प्रेरणा मिलती

ऐसे बहुतसे यूरोपियन और अमेरिकन भाग्यवान व्यक्ति है, जिन्होंने श्रीकृष्णप्रेम के व्यक्तित्वसे प्रभावित हो उनसे शिक्षा-दीक्षा ग्रहण की। पर आश्चर्यकी बात यह है कि उनके भारतीय शिष्यों और भक्तोंकी संख्या उनसे भी अधिक है। विदेशी जिज्ञासुओंको भारतीय सन्तोंसे दीक्षा लेते तो बहुत देखा गया है। पर, किसी विदेशी सन्तसे भारतीय व्यक्तियोंको दीक्षित होते शायद ही कभी देखा गया हो। वास्तवमें वे विदेशी तो नामके हौ थे। पूर्वजन्मके संस्कारों और इस जन्मकी अपनी उपलब्धियोंसे वे साधारण भारतीयसे भी कहीं अधिक भारतीय थे।

साधारण भारतीय मन्दिर में प्रतिष्ठित भगवान्‌की मूर्तिको देखकर 'मूर्ति' कहता है, वर्षाऋतुमें यमुना-जलको देख उसे गन्दा कहता है, व्रजरजको देख उसे मात्र धूल कहता है। श्रीकृष्णप्रेमके सामने यदि कोई ऐसा कहता, तो उन्हें आन्तरिक दुःख होता। मन्दिर में भगवान्‌के सामने यदि कोई ऐसे कहता- 'कब दर्शन दोगे प्रभु? तो वे कुद्ध हो कहते- 'तुम प्रभुके दर्शन कर नहीं रहे हो? यह क्या केवल एक मूर्ति है, जिसे देख रहे हो? यदि तुम्हारी यही भावना है, यदि तुम उनके सामने खड़े उनके दर्शनसे अपनेको वंचित समझ रहे हो, तो तुम उनके दर्शनसे सदा वंचित रहोगे, यह जान लो।'

यदि कोई यमुना-जलको गन्दा कहता, तो कहते- 'अमृत भी कभी गन्दा होता है ?' यदि व्रजरजको कोई धूल समझकर उसकी उपेक्षा करता, तो कहते - 'जिस रजको स्वयं भगवान्ने अपने शरीरमें लपेटा है, जिसे भक्षण कर उन्होंने आत्मसात किया है, उसे तुम साधारण धूल मानकर उसकी उपेक्षा करते हो ?'

एक बार वृन्दावनमें एक भिखारिन-भक्तने उनसे पूछा- 'प्रभु, मुझे आपके ठाकुर बहुत अच्छे लगते हैं। मैं उनके भोगके लिए कुछ लाऊँ तो आप ग्रहण करेंगे ?'

'क्यों नहीं ?' उन्होंने शीघ्र उत्तर दिया।

'तो बताइये आपके ठाकुरको क्या पसन्द है ? भिखारिन ने प्रसन्न होकर

पूछा। २०६/

'ठाकुर बना-चबेना बहुत पसन्द करता है।'

भिखारिन समझी कि उन्होंने बताने में संकोच किया। वह चना-चबेनाको जगह बादाम ले आयी।

श्रीकृष्णप्रेम यह देखकर बोले 'अच्छा, तुम बादाम ले आयी हो, तो इन्हें यमुना-जलमें पौस लो।'

श्रीकृष्णप्रेम उस समय जगन्नाथ घाटपर ठहरे थे। भिखारिनने वहाँसे यमुना-जल लिया। घाटपर बैठकर एक ईंटसे यमुना-जलमें बादाम पीसे। पेय अपनी मैली-कुचैली धोतीके पल्लेमें छानकर श्रीकृष्णप्रेमको दे दिया। श्रीकृष्णप्रेमने ठाकुरको निवेदन कर उस मैले पेयका प्रेमसे पान किया।

यदि कोई उनके ही देशका व्यक्ति उनके इस कृत्यको देखता, तो क्या वह आश्चर्यसे यह कहे बगैर रह सकता कि इस पढे-लिखे अंग्रेजकी बुद्धिको क्या हो गया है, जो रास्ते में पड़ी मैली-कुचैली ईंटसे पीसे गये और ऐसे मैले-कुचैले कपडेमें छाने गये पेयका पान कर रहा है ? पर, श्रीकृष्णप्रेमके लिए न वह ईंट मैली थी न भिखारिनका आँचल। उनमें तो पवित्र व्रजरज लिपटी हुई थी और पवित्र पेयमें था भिखारिनके श्रीकृष्णप्रेमका पुट, जिसने उसे और भी स्वादु बना दिया था।

कुछ लोगोंने वह दृश्य भी देखा है, जिसमें श्रीकृष्णप्रेमने इस भिखारिन कृष्ण-भक्त महिलाकी कुटियामें जाकर उससे कृष्ण-कीर्तन सुना और स्वयं कीर्तनके साथ-साथ दोनों भुजाएँ उठाकर भावपूर्ण मुद्रामें नृत्य किया।

प्रेम और भक्ति — जीवन-संदेश

ईश्वर-प्रेम की अनुभूति भक्त-साहित्य का एक महत्त्वपूर्ण विषय है। इन प्रसंगों को श्रद्धा, संवेदनशीलता और समर्पण के संदर्भ में पढ़ा जा सकता है।

कथा का सार

श्रीकृष्णप्रेम (रोनाल्ड निक्सन) और माँ यशोदा की कथा भक्ति, विनम्रता और साधना पर मनन करने का अवसर देती है। इस संग्रह में अन्य भक्तों के जीवन-प्रसंग भी पढ़ें।