ब्रज के भक्त भाग 3 · अध्याय 95

श्रीकृपासिन्धुदास बाबाजी

श्रीकृपासिन्धुदास बाबाजी की प्रेरक हिंदी कथा। जानिए उनके जीवन, भक्ति और साधना से जुड़े महत्वपूर्ण प्रसंग।

श्रीकृपासिन्धुदास बाबाजी
श्रीकृपासिन्धुदास बाबाजी — ब्रज के भक्त भाग 3

श्रीकृपासिन्धुदास बाबाजी का यह भक्त-चरित्र ब्रज की साधना, श्रद्धा और जीवन से जुड़े प्रसंगों को सामने लाता है। नीचे कथा को अलग-अलग विषयों में व्यवस्थित किया गया है।

भजन-साधना और नाम-स्मरण के प्रसंग

(वृन्दावन)

लोगोंको एकत्र कर कहा- 'मेरे जीवनकी सन्ध्या आ पहुँची है। एक साल बाद श्रीकार्तिकचन्द्रजी पूर्ण स्वस्थ थे और उनकी अवस्था भी बहुत अधिक नहीं हुई थी सूर्यास्त हो जायेगा। मुझे आजसे नित्य हरि-संकीर्तन सुनाया करो।' उस समय इसलिए किसीने उनकी बातका विश्वास नहीं किया। उनके चारों पुत्र इस सोच-विचारमें पड़ गये कि कीर्तन प्रारम्भ कर देनेकी पिताकी आज्ञाका पालन कसे या न करें। यदि दसरे लोगोंको कीर्तनके कारणका पता चल गया, तो वे हैं करेंगे। कहेंगे कि लडके अच्छे-भले पिताकी मृत्यु मना रहे हैं: क्योंकि हमारे गाँवशे लोग संकीर्तन तभी करते हैं, जब किसीकी मृत्यु होनेको होती है।

फिर यदि पिताजीकी मृत्यु सचमुच हो गयी, तो लोग कहेंगे कि हमने उनके मरनेका कीर्तन कर उन्हें मार दिया, यदि न हुई तो पिता समेत हम सब मूर्ख कहे जाएँगे। चट्टग्राम, पूर्वीबंगालके प्रसिद्ध वैद्य और भक्त श्रीकार्तिकचन्द्रने एक दिन घरछे

श्रीकार्तिकचन्द्रके तीसरे लड़के श्रीकृष्णदास उन्हींके समान भक्ति-परायण औ

सुबोध थे। उन्होंने कहा- 'आप लोग वृथा सोच-विचारमें पड़े हैं। सब जानते हैं कि पिताजीकी बात मिथ्या नहीं होती। यदि उनकी मृत्यु न हुई, तो लोग कहेंगे कि हमारे कीर्तनके प्रभावसे उनका सङ्कट टल गया, यदि हो गयी तो पिताजीकी सद्‌गति हेरे और लोग उनकी आज्ञाका पालन करनेके लिए हमारी प्रशंसा करेंगे। फिर इस शुभकार्यमें हम इस बातकी चिन्ता ही क्यों करें कि लोग क्या कहेंगे? लोग प्रशंसा करे या निन्दा, पिताजी मरें या जीवित रहें, हमारे कीर्तनसे प्रभु तो प्रसन्न होंगे ही। स उनकी प्रसन्नताके लिए कीर्तन करेंगे।'

बस वे जुट गये कीर्तनकी व्यवस्थामें। सन्ध्या समय नित्य दो घण्टे खोल-करतालके साथ कीर्तन होने लगा। धीरे-धीरे एक वर्ष व्यतीत होनेको आया। कार्तिक मास प्रारम्भ हुआ। कार्तिक के आरम्भ होते ही कीर्तन अखण्ड रूपमे किया जाने लगा। गोपाष्टमीके दिन श्रीकार्तिकचन्द्रने गाँवके लोगोंकी सन्ध्या समय विशेष कीर्तनके लिए आमन्त्रित किया। घरके लोगोंको खा-पीकर कीर्तनके लिए

श्रीकृपासिन्युदास बाबाजी

कीर्तनको तुमुल ध्वनिसे आकाश मुखरित हो उठा। उस ध्वनिमें और किसी शब्दका प्रस्तुत होनेको कहा। चार-चार खोल करतालके साथ तीन दलोंका कीर्तन लगा। बुलाकर कुछ आज्ञा की। कृष्णदासने तुरन्त आज्ञाका पालन किया। उन्हें चारपाईसे नायी पड़ना सम्भव न था। उसी समय कार्तिकचन्द्रने कृष्णदासको इशारेसे निकट पिलाया, व्रजरज छातीसे लगायी और योगपीठका चित्र उनके सामने विराजमान जीचे उतारकर स्नान कराया, द्वादश तिलक धारण कराये, ठाकुरका चरणामृत किया। चित्रको अपलक देखते-देखते उन्होंने देह छोड दिया।

पिता के देहावसानके पश्चात् कृष्णदासने भी संसार त्यागकर भजन करनेका । निश्चय किया। उनकी अवस्था उस समय केवल १९ वर्षकी थी। वे मैटिक पास कर चुके थे। भाइयोंकी इच्छा थी कि उन्हें उच्चशिक्षाके लिए किसी कॉलिजमें भर्ती कराया जाय। पर कृष्णदास अपना निश्चय बदलना नहीं चाहते थे। भाइयोंसे इसके विषयमें कुछ कहना भी नहीं चाहते थे। एक दिन वे किसी बहाने घरसे निकले और रेलसे श्रीधामपुरीकी यात्राको चल दिये।

पुरीमें उनकी श्रीनित्यानन्ददास नामके लगभग उन्हींकी उम्रके एक बाबाजीसे बेटे हुई, जो उन्हींकी तरह घर छोड़कर चले आये थे और तीर्थ तथा सन्तोंके दर्शन करते हुए इधर-उधर डोल रहे थे। वे बहुत ही सरल प्रकृतिके और बड़े स्नेही स्वभावके व्यक्ति थे। कृष्णदाससे उनका बन्धुत्व हो गया। दोनोंने श्रीधामपुरीसे पैदल यात्रा कर श्रीवृन्दावन जानेका निश्चय किया।

दोनोंने झारखण्ड तककी यात्रा एक साथ की, पर झारिखण्ड पहुँचकर दोनोंका साथ छूट गया। नित्यानन्ददासका आवेश कीर्तनमें अधिक था, कृष्णदासका स्मरणमें। मार्गमें कहीं सुन्दर कीर्तन होता देख नित्यानन्दास वहीं रह गये, कृष्णदास वृन्दावनके पथपर आगे-आगे अग्रसर हुए।

वृन्दावन पहुँचकर वे झाड़ मण्डलमें ठहरे, और वेश ग्रहण करनेके लिए योग्य गुरुकी खोज करने लगे। मन्त्र-दीक्षा वे घरपर रहते ही श्रीगोविन्दानन्द गोस्वामीसे ले चुके थे।

कुछ दिन बाद उन्हें पसोली ग्रामके श्रीकृष्णदास बाबाके दर्शन हुए, जो उस समय वृन्दावनमें गोविन्दकुण्डमें रहते थे। उनसे विधिवत् वेश ग्रहण किया; नाम हुआ श्रीकृपासिन्धुदास। वेश लेकर वे व्रजके गाँवोंमें भजन करने चले गये। कुछ दिन जैतके पास भरतिया ग्राममें रहे। फिर भदावलमें श्रीगोपालदास बाबाके पास रहकर उनकी सेवा करने लगे।

दिव्य अनुभूति और कृपा के प्रसंग

उजके भक

उस समय पण्डित रामकृष्णदास बाबाकी महाराज कुसुम सरोवरके पाम श्यामकुटीमें भजन करते थे। उनका स्वास्थ्य ठीक नहीं चल रहा था और उन्हें पक योग्य सेवककी आवश्यकता थी। गोपालदास बाबाको जब इसका पता चला तो उन्होंने कृपासिन्धुदास बाबाको उनकी सेवामें भेज दिया। कृपासिन्धुदास बाबा बड़ी तन्मयतासे उनकी सेवा करने लगे। पण्डित बाबा जब स्वस्थ हो गये तो कृपासिन्दाससे गोपालदास बाबाके पास लौट जानेको कहा। गोपालदास बाबाने उन्हें सदाके लिए पण्डित बाबाके पास रहकर उनकी सेवा करनेकी आज्ञा की थी पर, पण्डित बाबा स्वस्थावस्थामें किसीसे अपनी सेवा नहीं कराना चाहते थे कृपासिन्धुदास बाबाका असाधारण सेवाभाव देख उन्हें इस बातका भय हुआ कि उनके निकट रहनेसे उनकी निरपेक्षताकी हानि होगी।

कृपासिन्धुदास बाबा धर्मसंकटमें पड गये। वे श्रीगोपालदास बाबाकी आज्ञाका पालन करें. या पण्डित बाबा की ? पण्डित बाबाकी सेवामें उनके मन-प्राण सदाके बाबाने जब फिर उनसे चले जानेको कहा, तो वे बोले "मैं आपका शिष्य तो है लिए उलझ चुके थे। इसलिए उन्होंने उनकी आज्ञाको अनसुनी कर दिया। पण्डित नहीं, जो आपकी आज्ञा मानूँ। मैं नहीं जाऊँगा। आपसे कुछ सीखने आया हूँ। लोग पूछेंगे कि पण्डित बाबासे क्या सीखा, तो क्या कहूँगा? यही कि जो कोई आर्तभावसे तुम्हारे पास आये कुछ सीखने, उसकी अवहेलना करो और कह दो - 'चले जाओ यहाँसे।' मैंने आपसे सीखा है निरपेक्षता, इसलिए मैं निरपेक्ष भावसे यहाँ रहूँगा। आपकी आज्ञाकी भी उपेक्षाकर रहूँगा।"

पण्डित बाबा उनके उत्तरसे प्रसन्न हुए और उन्हें अपने आप रहनेकी आज्ञा दे दी। तभीसे श्रीकृपासिन्धुदास बाबाके जीवनका एक नया और स्वर्णिम अध्याय आरम्भ हुआ। गुरुबुद्धिसे पण्डित बाबाकी सेवा उनके भजनका मुख्य अंग बन गया। किस प्रकार वे सेवाके माध्यमसे पण्डित बाबाके अभिन्न अंग बन गये, उसका हम विस्तारसे वर्णन कर आये हैं पण्डित बाबाके निज चरित्रके सम्बन्धमें। उन्होंने जो कुछ प्राप्त किया वह पण्डित बाबाकी सेवाके फलस्वरूप ही। इसके सम्बन्धमें एक प्रत्यक्ष घटनाका उल्लेख कर देना उचित होगा।

कृपासिन्धुदास बाबा नित्य पण्डित बाबाकी सेवा-पूजाके समय पुष्पादिको व्यवस्था कर रखते। एकदिन पूजाके समयसे पूर्व वे भंगीसे छूआ गये। उन्हें स्नान करना पड़ा। फूल समयसे न ला सके। चिन्तामें पड़ गये कि पूजाका समय आ गया, अब क्या करें? उसी समय एक सुन्दर कन्या आयी और उन्हें फूल दे गयी। पीछे

कृपासिन्धुदास बाबाने यह बात पण्डित बाबासे कही। उन्होंने कहा- 'तेरी भावसिद्धि हो गयी है। यह बात किसीने न कहना।' कदाचित उनका संकेत था कि कन्याके स्वरूपमें उन्हें अपने ही सिद्ध-स्वरूपका अनुभव हुआ था। जो सेवा उनसे न बन सकी, वह उनके सिद्ध-स्वरूपने कर दी।

कृपासिन्धुदास बाबाने पण्डित बाबाकी आज्ञासे श्रीगोविन्दलीलामृत पूरा कण्ठ कर लिया था और वे उनकी बतायी हई रीतिसे लीला स्मरण किया करते थे। उन्होंने अपने हाथसे गोविन्दलीलामृतके अनुसार श्रीराधाकृष्णकी अष्टकालीन लीलासे सम्बन्धित विभिन्न लीला-स्थलियों और कुञ्जोंके अनेक चित्र बनाये थे, जिन्हें वे एक लम्बे गोल टीनके डिब्बेके भीतर लपेटकर रखते थे और उस डिब्बेको बहुत दिनोंतक अमूल्य गोपनीय निधिके रूपमें जहाँ भी जोते कन्धेपर लटकाकर ले जाते थे। बहुत-से साधक उनके पास लीला-स्मरण-सम्बन्धी शिक्षा लेने आया करते थे। उन्हें वे उन चित्रोंके माध्यमसे लीलाका उपदेश करते थे, जिससे उन्हें लीला-चिन्तनमें विशेष सुविधा होती थी।

कुछ दिन बाद उनके श्रीधाम पुरीके बन्धु श्रीनित्यानन्ददास बाबा भी वृन्दावन आकर उनसे मिले और कुसुम सरोवरसे श्यामकुटीसे कुछ दूर एक कुटियामें रहकर उनके उपदेशानुसार लीला-चिन्तन करने लगे। हम पहले ही कह चुके हैं कि वे बहुत भोले-भाले और श्रद्धालु व्यक्ति थे। उन्हें लीला-चिंतनमें अभूतपूर्व सफलता मिली। वे नित्य कृपासिन्धुदास बाबासे मिलने जाया करते और उन्हें जो-जो अनुभव होते उन्हें सुनाया करते। एक बार कई दिनोंतक लगातार कृपासिन्धुदास बाबाको उनके दर्शन न हुए। तब वे उनकी कुटियापर गये। वहाँ देखा कि उनका रजका करुआ, आसन और अन्य सामान मौजूद हैं।

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आसनपर गाँठ लगी हुई उनकी लँगोटी भी ऐसे पड़ी है, जैसे वे लँगोटी लगाये आसनपर बैठे हों और लँगोटीको बिना खोले इस तरह उसमें से निकल गये हों, जैसे साँप केंचुलीमें से निकल जाता है। इसके पश्चात् नित्यानन्ददासको कभी किसीने नहीं देखा। कृपासिन्धुदास बाबा यह निर्णय किये बिना न रह सके कि उन्हें राधारानीकी कृपासे सशरीर अप्राकृत व्रजधामकी प्राप्ति हो गयी !

सन् १९१८ में जब पण्डित बाबा फिर अस्वस्थ हुए, तो कृपासिन्धुदास बाबा उन्हें लेकर वृन्दावन चले गये। वृन्दावनमें लगभग नौ वर्ष मदनमोहनकी बगीची आदि स्थानोंमें रहनेके पश्चात् १९२६ से दाऊजीकी बगीचीमें रहने लगे, जहाँ सन् १९४० में पण्डित बाबाने शरीर त्याग दिया। पण्डित बाबाके अप्राकट्यके पश्चात्

कृपासिन्धु बाबाको उनका विरह असहनीय हो गया। उनका अन्न-जल छूट गया। मालते-चलते बरसाना पहुंचे। क्लान्त हो जानेके कारण श्रीजीके मन्दिर की शरीर त्याग देनेका निश्चयकर वे आश्रमसे निकल पड़े। उनका भूखे-प्यासे सौदियोंपर लेट गये। लेटे-लेटे सोच रहे थे कि वहाँ जाकर किस प्रकार प्राण विर्सजन करें। उसी समय तंद्रा आ गयी। तंदामें उन्होंने देखा कि पण्डित बाबा उनसे कह रहे हैं- 'तू पागल हो गया है। मेरे पास किसलिए आया था ? श्रीजीकी सेवा सीखनेके लिए न। क्या मैंने तुझे यही सिखाया था कि श्रीजीकी सेवा, उनकी सेवाके उपकरणको त्यागकर की जाती है? तुझे यह शरीर उन्होंने अपने सेवाके लिए ही तो दिया है। उनकी दी हुई, उन्हीं की सेवाकी वस्तुके साथ इस प्रकार मनमानी करना

ही क्या तूने मुझसे सीखा है?' पण्डित बाबाके दर्शनकर और उनकी प्यार-भरी फटकार सुनकर वे आश्वस्त हुए और अपनी आत्महत्याके संकल्पके कारण अपने-आप को धिक्काने लगे।

पण्डित बाबाने आज्ञा की थी कि उनके अप्राकट्यके पश्चात् उनके आश्रमके सभी लोग दाऊजीकी बगीची छोड़कर अन्यत्र चले जायें। इसलिए कृपासिन्धु बाबा लौटकर दाऊजीकी बगीची नहीं गये। कुछ ही दिनोंमें उनके भक्तोंने दाऊजीकी बगीचीके निकट 'भागवत-निवास' नामके एक भव्य आश्रमका निर्माणकर दिया। बाबाका शेष जीवन वहीं व्यतीत हुआ।

भागवत-निवास श्रीगौरांगदास बाबाके समाधि-स्थल श्रीराधारमण-निवासके निकट है। राधारमण-निवासमें श्रीगौरांगदास बाबाके अप्राकट्यके समयसे अखण्ड हरिनाम-संकीर्तन आज तक हो रहा है। एकदिन रात्रिमें २ बजेके लगभग कीर्तन करनेवाले साधुओंकी झपकी लग गयी। उसी समय कृपासिन्धुदास बाबाको स्वप्न हुआ। स्वप्नमें गौरांगदास बाबाने उनसे कहा- 'मेरे आश्रममें नाम खण्डित हो गया है। जाकर साधुओंकी सचेत कर दो।' शीघ्र शैय्यासे उठाकर वे राधारमण-निवास गये। देखा कि नाम बन्द है और साधु बैठे-बैठे औंघाई ले रहे हैं। उन्होंने जगाकर उनकी ताड़ना-भर्त्सना की।

जबसे बाबा भागवत-निवासमें रहने लगे। उन्होंने अन्न त्याग दिया। मधुकरीको जाना भी बन्दकर दिया। केवल दूधपर रहने लगे। वे नित्य रात्रिमें १ बजे शैय्या त्याग देते। स्नानादिकर भजनमें बैठ जाते और मध्याह्न १२ बजेतक भजन करते रहते। १२ बजे स्नान कर गिरिधारीजीकी सेवा करते। फिर दूध पीकर विश्राम करते। कुछ देर विश्रामकर फिर भजन में बैठ जाते। बाबाकी भजनक्रियाका मुख्य

भक्त दादर रहमान

अंग था नाम जप सहित अष्टयाम लीला स्मरण। वे सन्ध्याका समय जिज्ञासु साधकोंके लिए खाली रखते। जो लोग उनके पास भजन-सम्बन्धी उपदेश ग्रहण करने आते, उन्हें उपदेश देते।

शेष अवस्थामें बाबाके पास दर्शनार्थी बहुत आने लगे। शिष्य-सेवक भी बहुत उन्होंने संकेतवटपर श्रीगोपालभट्ट गोस्वामीकी भजन-कुटीके निकट एक छोटे-से एकत्र हो गये। वे भागवत-निवासके कोलाहलपूर्ण वातावरणसे ऊब गये. इसलिए संकेतबिहारीके मन्दिरका निर्माण किया। उसमें संकेतबिहारीकी मूर्तिकी प्रतिष्ठा करा वहाँ जाकर रहनेकी व्यवस्था करने लगे। सब तैयारी हो गयी। दूसरे दिन, पौष शुक्ल, सम्वत् २०२९ को संकेतवट जाना था। गये भी, पर शरीर वृन्दावनमें छोड़ गये। रात्रिमें १ बजे सदाकी भाँति सोकर उठे। स्नान और तिलकादि कर तखतपर बैठे। कुछ अस्वस्थताका अनुभव किया। और 'हा गौर! हा निताई!' कहकर संकेतबिहारीके निकट प्रयाण किया।

नाम-स्मरण और एकाग्रता — जीवन-संदेश

नाम-स्मरण, भजन और एकाग्रता के प्रसंग साधना की निरंतरता की याद दिलाते हैं। यहाँ वर्णित जीवन-अनुभवों से पाठक अपनी साधना के लिए प्रेरणा ले सकते हैं।

कथा का सार

श्रीकृपासिन्धुदास बाबाजी की कथा भक्ति, विनम्रता और साधना पर मनन करने का अवसर देती है। इस संग्रह में अन्य भक्तों के जीवन-प्रसंग भी पढ़ें।