ब्रज के भक्त भाग 3 · अध्याय 73

श्रीकृपासिन्धुदास बाबाजी

श्रीकृपासिन्धुदास बाबाजी की प्रेरक हिंदी कथा। जानिए उनके जीवन, भक्ति और साधना से जुड़े महत्वपूर्ण प्रसंग।

श्रीकृपासिन्धुदास बाबाजी
श्रीकृपासिन्धुदास बाबाजी — ब्रज के भक्त भाग 3

श्रीकृपासिन्धुदास बाबाजी का यह भक्त-चरित्र ब्रज की साधना, श्रद्धा और जीवन से जुड़े प्रसंगों को सामने लाता है। नीचे कथा को अलग-अलग विषयों में व्यवस्थित किया गया है।

जन्म, परिवार और प्रारम्भिक जीवन

[ काम्यवन ]

काम्यवनके श्रीकृपासिन्धुदास बाबाका जन्म उड़ीसा प्रान्तके जिला बरहमपुरके गंजम ग्राममें हुआ। उनकी गान-कीर्तन और मृदङ्ग-वादनमें विशेष रुचि थी। गान-कीर्तन करते-करते वे भगवत्प्राप्तिके लिए विशेष रूपसे उत्कण्ठित हो पड़े। वक्रेश्वर पण्डित के परिवारमें दीक्षित हो भजन-साधनमें जुट गये। किसीने कहा भगवान् शङ्करकी कृपाके बिना भगवत्प्राप्ति नहीं होती। तो शङ्गरजीकी बड़े मनोयोगसे आराधना करने लगे। शङ्गरजीने कृपाकी। दर्शन देकर कहा- 'व्रजमें जाकर भजन करो। इष्ट-प्राप्ति होगी।'

वे व्रज आ गये। श्रीगोपाल गुरुकी परम्पराके नन्दगाँवके श्रीनित्यानन्ददास बाबाके गुरु श्रीश्यामचरण बाबाजीसे वेश ले गान-कीर्तन करते हुए कुछ दिन व्रजकी लीला-स्थलियोंमें भ्रमण करते रहे। फिर नन्दगाँवमें नित्यानन्ददास बाबाके निकट रहकर भजन करने लगे। दोनों महात्मा कदम्बखण्डीमें एक सूखे कदम्ब-वृक्षके नीचे बैठकर उच्चस्वरसे कीर्तन किया करते। एक दिन कृपासिंधुदास बाबाने नित्यानन्ददास बाबासे कहा- 'मैंने हरिनामके प्रभावके सम्बन्धमें 'शुष्क तरु पल्लवे' की बात कहीं पढ़ी है। पर, हम लोग कितने दिनसे इस शुष्क तरुके नीचे कीर्तन कर रहे हैं, इसमें तो कहीं पल्लव आते दीखे नहीं।'

नित्यानन्ददास बाबाने नाम-प्रभुके इच्छा-स्वातन्त्र्यकी बात कह प्रश्न-को टाल दिया। पर, लगता है नामप्रभुने इसे सुन लिया। वे तो स्वतन्त्र होते हुए भी भक्तकी इच्छाके अधीन हैं। भक्तकी इच्छा जान उन्होंने उसकी शङ्कनका समाधान किया। कुछ ही दिन बाद वह सूखा पेड़, जिसके हरे होने की कोई आशा नहीं रही थी, हरे-हरे पत्तोंसे लहलहाने लगा !

दिव्य अनुभूति और कृपा के प्रसंग

नाम-प्रभु कभी-कभी इस प्रकारका चमत्कार दिखाकर भक्तके भावकी पुष्टि करते रहते हैं। कृपासिंधु बाबाकी नामकी शक्ति तथा कृपामें श्रद्धा और दृढ़ हो गयी।

उन्हें विश्वास हो गया कि जब नाम-प्रभू अपने सम्बन्धमें साधारण बातचीत भी कार देकर सुनते हैं, तो उच्चस्वरसे किये गये नाम-संकीर्तनका अवश्य ही प्रेमसे श्रवण करते हैं। उन्हें नाम-संकीर्तन करते समय प्रभुके सान्निध्यका अनुभव होने लगा और अष्ट-सात्विक भावोंसे उनका अङ्ग-प्रत्यंग सुशोभित रहने लगा।

नामकी ही कृपासे उनका श्रीमद्भागवत और श्रीकृष्णकी लीलाकथाओंमें अपूर्व अभिनिवेश हो गया। समूची श्रीमद्भागवत उन्हें कण्ठस्थ हो गयी और भागवतके एक बडे मर्मज्ञके रूपमें उनकी ख्याति हो गयी। भागवतकी बड़ी रसमयी कथा वे कहने लगे। भागवत कथारसके पिपासु सभी लोग उनकी कथा सुननेके लिए लालायित रहने लगे।

भागवतकी महिमा वर्णन करते समय वे एक स्वरचित श्लोक कहा करते.

जिसके प्रत्येक पदका प्रथम अक्षर जोडनेसे 'भा-ग-व-त' शब्द बन जाता है।

भक्तों के साथ मिलन और सत्संग

श्लोक इस प्रकार है-

भाति सर्वेषु वेदेषु गतिर्यस्य त्रिलोकके ।

वरिष्ठं सर्वशास्त्रेषु तरणी जु भवार्णवे ।।

नन्दग्राममें कुछ दिन रहनेके बाद कृपासिंधु बाबा गोवर्धन चले गये। वहाँ श्रीविष्णुदास बाबा, श्रीअद्वैतदास बाबा और श्रीमनोहरदास बाबाके सान्निध्यमें कुछ दिन भजन किया। अन्त में वे काम्यवन जाकर शङ्करजीके मन्दिरमें रहने लगे।

उनके जीवनका अधिक समय वहीं व्यतीत हुआ।

उनकी वाणी मधुर थी, पर वे बोलते बहुत कम थे। कोई उपदेश करनेको कहता तो दो-चार शब्दोंमें नाम और व्रजकी अहैतुकी कृपाका वर्णनकर चुप हो जाते थे। वे हर समय भावमयी अवस्थामें रहते थे। मन्दिर में जो भी बालिका दर्शन करने आती थी, राधाके भावसे उसके चरण स्पर्श करते थे। ऐसा करते समय वे भाव-विभोर हो जाते थे और उनके नेत्रोंसे आँसू टपक पड़ते थे। उन्हें लोग एक सिद्ध महात्माके रूपमें जानते थे।

सन् १९७७ के फाल्गुन मासमें एक दिन उन्होंने जो कुछ उनके पास था लोगोंमें बाँटना शुरू कर दिया। लोगोंने पूछा- 'बाबा, ऐसा क्यों कर रहे हैं?'

'अब हम जा रहे हैं' उन्होंने उत्तर दिया। कुछ दिन बाद, फाल्गुन मासमें ही ९८ वर्षकी उम्रमें स्वस्थावस्थामें नाम-जप करते हुए वे श्रीधाम पधारे।

प्रेम और भक्ति — जीवन-संदेश

ईश्वर-प्रेम की अनुभूति भक्त-साहित्य का एक महत्त्वपूर्ण विषय है। इन प्रसंगों को श्रद्धा, संवेदनशीलता और समर्पण के संदर्भ में पढ़ा जा सकता है।

कथा का सार

श्रीकृपासिन्धुदास बाबाजी की कथा भक्ति, विनम्रता और साधना पर मनन करने का अवसर देती है। इस संग्रह में अन्य भक्तों के जीवन-प्रसंग भी पढ़ें।