ब्रज के भक्त भाग 3 · अध्याय 69

श्रीजुगलदास बाबाजी

श्रीजुगलदास बाबाजी की प्रेरक हिंदी कथा। जानिए उनके जीवन, भक्ति और साधना से जुड़े महत्वपूर्ण प्रसंग।

श्रीजुगलदास बाबाजी
श्रीजुगलदास बाबाजी — ब्रज के भक्त भाग 3

श्रीजुगलदास बाबाजी का यह भक्त-चरित्र ब्रज की साधना, श्रद्धा और जीवन से जुड़े प्रसंगों को सामने लाता है। नीचे कथा को अलग-अलग विषयों में व्यवस्थित किया गया है।

जन्म, परिवार और प्रारम्भिक जीवन

[ वृन्दावन, जैत, पेरखू]

उन दिनों व्रजमें राजगढ़ीके निकट ख्यावल वनमें नंगा बाबा (श्रीशंकरानन्द) रहा करते। बड़े चमत्कारी महात्मा थे वे। उनके सम्बन्धमें प्रसिद्ध है कि वे कुएँमें कूदते तो तालाबमें जा निकलते, तालाबमें कूदते तो कुएँमें जा निकलते। पर, वे धतंगा बाबाका लोहा मानते। वे कहा करते- 'सौ नंगा, एक धतंगा।'

धतंगा बाबा एक चमत्कारी महात्मा तो थे ही, वे बड़े निर्भीक, निर्पेक्ष और स्वतन्त्र स्वभावके भी थे। उनका लम्बा-चौड़ा पंजाबी शरीर था। पहलवानी और पटेबाजीका उन्हें शौक था। कान तकका डण्डा वे अपने साथ रखते। दुष्ट उनसे भय खाते। साधु, महात्मा और गरीब व्रजवासी उनका भरोसा रखते। साधुओंकी टोली प्रायः उनके साथ रहती। उनकी ओरसे उन्हें दाल-बाटीका अकसर निमन्त्रण रहता। वे स्वयं सदा मस्त रहते और मस्ती चारों ओर बिखेरते रहते, पर यह बाबाका बाहरी स्वरूप ही था। उनका अन्तर राधा-प्रेमसे सदा परिपूर्ण रहता। राधा-नामका उनका जप चाहे वे जिस स्थितिमें हों बराबर चलता रहता। उनका कण्ठ जपके कारण सदा हिलता रहता।

वे निरंकुश और स्वाभिमानी लोगोंके शासक थे, सीधे-साधे, भक्तिभावसम्पन्न व्रजवासियोंके रक्षक, साधु-महात्माओंके सेवक और एक आदर्श सन्तके रूपमें साधकोंके पथप्रदर्शक ।

उनका सम्वत् १९०५ के लगभग पंजाबके झंग जिलेके सिंगाला ग्राममें यादव (अहीर) वंशमें हुआ। वे जब १४ वर्षके थे तभी उनका विवाह हो गया। ५ वर्षके भीतर उनके माता-पिता, पत्नी और कन्या सबका देहान्त हो गया। उनके परिवारका कोई न रहा। १९ वर्षकी अवस्थामें संसारने उन्हें और उन्होंने संसारको त्याग दिया।

तब १२ वर्ष तक तपस्वियोंके साथ रहकर उन्होंने वैराग्यपूर्ण जीवन व्यतीत किया। उन्हींसे पहलवानी और पटेबाजी सीखी, पर १२ वर्षक शुष्क वैराग्य और कठोर तपस्यासे उन्हें कुछ लाभ न हुआ। तब वे दक्षिण चले गये। नासिकके पास किसी स्थानके मन्दिरके पुजारीके रूपमें वैधी-भक्तिका याजन करने लगे। वैधी-भक्तिका याजन करते-करते उनका अन्तःकरण शुद्ध हो गया और किसी योग्य गुरुके माध्यमसे प्रभुसे सम्बन्ध जोड़कर उनकी रागमयी सेवा करनेके लिए उनके प्राण व्याकुल हो उठे।

उसी समय वृन्दावन आकर उन्होंने टटिया-स्थानके रसिक सन्त श्रीस्वामिनीशरणकी शरण ली। दीक्षा और वेश देनेके पश्चात् स्वामिनीशरणजीने उनका नाम रखा श्रीजुगलदास। पर, उनका यह नाम टटियास्थानके कुछ महात्माओंके सिवा और कोई नहीं जानता। वे धतंगा बाबाके नामसे ही प्रसिद्ध हैं। सम्भवतः इस नामसे वे तभीसे पुकारे जाने लगे थे, जब वे तपस्वियोंमें रहते थे।

स्मामिनीशरणजी उस समय रमणरेतीकी बारादरीमें रहा करते थे। धतंगा बाबा भी उससे कुछ दूर एक लताओंका मण्डप बनाकर उसमें भजन करने लगे। उसका उन्होंने नाम रखा 'भ्रमर-कोट'। 'भ्रमर-कोट'का अर्थ समझाते हुए वे कहा करते - 'इसमें राधा-कृष्णके लीला-रसका लोभी एक भ्रमर रहकर भजन करता है औरयह उसका कोट, अर्थात् दुर्ग है, क्योंकि इसमें माया प्रवेश नहीं कर सकती। माया नाम है आसिक्तिका और उसमें कोई भी ऐसी वस्तु रखना सम्भव नहीं, जिसमें भ्रमरकी आसक्ति हो और जिसके चोरी चले जानेसे उसे दुःख हो।' दो वर्ष बाद वे उसीके निकट राधा टीलेपर रहकर भजन करने लगे। राधाटीलेपर वे २४ वर्ष रहे। उस बीच प्रथम १२ वर्ष वृन्दावनमें झाडू की सेवा करते रहे। नित्य प्रातः झाडू लेकर वृन्दावनकी परिक्रमाको जाते।

जहाँ भी गन्दा देखते वहाँ झाडू देकर साफ कर देते। वे कहते कि वृन्दावनमें जुगल सरकार भ्रमण किया करते हैं। न जाने किस समय कहाँ उनके चरण-कमल पड़ जायें। सभी स्थान झाड़-पोंछकर साफ रखना चाहिये। राधाटीलेके शेष १२ वर्षोंकी उनकी दिनचर्या दूसरे प्रकारकी थी। वे

प्रातः ४ बजे नाम-जप करते हुए बरसाने जाते। वहाँ राजभोगकी आरतीके दर्शन करते। फिर मधुकरीको जाते। जहाँ जो भिक्षा मिलती उसे वहीं करपात्रीकी तरह हाथमें लिये-लिये पा लेते। भिक्षाके लिए उन्होंने झोला अपने कन्धेपर कभी नहीं रखा। सन्ध्या समय वे वृन्दावन लौट आते और बिहारीजीकी शयन-आरतीके दर्शन करते। उनका आने और जानेका समय सदा सुनिश्चित और एक-सा रहता। लोग अपनी-अपनी बस्तीसे उन्हें निकलते देख समयका ठीक अनुमान कर लेते। इस प्रकार लगातार १२ वर्ष तक नित्य ४० मीलकी पैदल यात्रा करते हुए जुगलके दर्शनकर उन्होंने अपना जुगलदास नाम सार्थक किया।

राधाटीलेसे वे जैत ग्राम चले गये। वहाँ एक बगीची बनाकर २१ वर्ष उसमें रहे। उसके पश्चात् पेरखू ग्राममें जैतकी ही तरह एक बगीची बनाकर १४ वर्ष रहे। अन्तमें वृन्दावन लौटकर टटिया-स्थानमें कुछ दिन रहे। वहीं सम्वत् २०२३, अगहन बदी तेरसको स्वस्थावस्थामें धाम पधारे। उस समय उनकी आयु ११८ वर्षकी थी। इतनी लम्बी आयुमें भी वे अस्वस्थ कभी नहीं हुए। लठिया बराबर साथ रखी, पर उसे टेककर कभी नहीं चले।

व्रजभूमि और तीर्थ से जुड़ी घटनाएँ

धतंगा बाबाके चमत्कारोंकी कहानियाँ जैत और पेरखूके व्रजवासियोंमें प्रसिद्ध हैं। जिन लोगोंने अपनी आँखोंसे उन चमत्कारोंको देखा है, उनमें से कुछ आज भी जीवित हैं। उनके मुखसे उन कहानियोंको सुन लगता है। जैसे प्रकृतिपर धतंगा बाबाका पूरा नियन्त्रण था और वह उन्हींके इशारेपर चलती थी।

एक बार जेठके महीनेमें पेरखूके कुछ लोगोंने किसी उत्सवपर बाबाकी बगीचीमें ठाकुर जीका फूलबगला बनाया। मथुरासे धन्धे, मुरारी आदि चौबे और वृन्दावनसे केलिदासजी, प्रेमदासजी आदि महात्मा पधारे। चौबोंने ठण्डाई घोटी। ठण्डाई घुट चुकी तो मुरारीने कहा धन्धेसे- 'अरे! मथुरा ते बरफ नायँ लायोका ?'

'अरे दादा! बरफकी तौ यादई नाँय रई!' धन्धेने उत्तर दिया। फिर वह बोला- 'बाबा ते कह न। कहूँते मँगामिंगे। बरफ बिना तो सब मजा किरकिरा हय जायगौ।'

बाबा कुछ दूर बैठे सुन रहे थे। वे बोले- 'बाबा कहाँ ते मँगामिंगे ? पेरखूमें कहूँ बरफ मिलै है ?'

पर थोड़ी ही देरमें आँधीके साथ एक बादलका टुकड़ा उड़कर आया और

बगीचीके चारों ओर बडे-बडे ओले बरसा गया। बाबाने कहा-ले बरफ। ठाकुरने सुन ली तेरी ।' चौबे और व्रजवासी बालक 'धतंगा बाबाकी जय।' बोल-बोलकर ओले बीनने लगे। देखते-देखते आसमान साफ हो गया, जैसे बाबाकी आज्ञासे बादल आये और ओले बरसाकर चले गये।

बाबा पेरखूमें आये थे उसी समय चन्दन बोहरेने उनके लिए अपने खेतके पास एक कुटिया बनवा देनेका प्रस्ताव किया था। उन्होंने सोचा था कि बाबा वहाँ रहेंगे तो उनके खेतकी चौकसी रहेगी। बाबाने वहाँ कुटिया बनानेको मना किया। फिर भी वे न माने। कुटिया बन गयी। उसके ऊपर छप्पर छा दिया गया। बाबासे उन्होंने प्रार्थनाकी कुटियामें पधारने की। बाबाने पूछा- 'पण्डितसे कुटियामें प्रवेश करनेका मुहूर्त भी दिखवा लिया ?'

'मुहूर्त तो नहीं दिखाया बाबा। कल दिखवा लूँगा।'

मुहूर्त दिखानेके पहले ही पवनका एक झोंका आया और छप्पर उड़ा ले गया। बाबाने बोहरेसे कहा- 'अब तू अपना आग्रह छोड़ दे। ठाकुरकी इच्छा नहीं कि मैं उस कुटियामें रहूँ।'

जल, वायु आदिके देवता तो बाबाके नियन्त्रणमें रहते ही, आदमीके बनाये कल-पुरजोंके चक्के भी जड़-विज्ञानके नियमोंकी अवहेलना कर बाबाके इशारेपर चलते और रुक जाते।

एक बार बाबाको कुछ लोग व्रजके बाहर कहीं ले जाना चाह रहे थे। बाबाने मना किया पर उन्होंने बाबाकी बगीचीमें धरना धर दिया। विवश हो बाबा उनके साथ मोटरपर बैठ लिये। होड़लके पास बनचारीमें व्रजकी सीमापर मोटरका चलना बन्द हो गया। ड्राइवरने बहुत कोशिशकी चलानेकी, पर मोटर टस-से-मस न हुई। बाबाने कहा- 'तेरी मोटर तो चलती नहीं। मैं जा रहा हूँ।' वे पेरखू लौट गये। बाबा जैसे ही उनकी आँखोंसे ओझल हुए मोटर चल पड़ी। उन्होंने चाहा कि मोटरको लौटाकर बाबाको वापस ले आयें। पर उनमें से एक वयोवृद्ध व्यक्तिने कहा- 'किसी सन्तकी इच्छाके विरुद्ध उसे व्रजसे बाहर ले जाना ठीक नहीं। हमारे दुराग्रहके कारण ही गाड़ी व्रजकी सीमापर आकर रुक गयी। अब अपना कुशल चाहते हो तो सीधे घर चले चलो। नहीं तो किसी और संकटमें पड़ जाओगे।'

प्रभाती बैलगाड़ीवाला बाबाका भक्त था। वह पेरखूसे बैलगाड़ी लेकर अपने गाँव लोहारनका नगरा जा रहा था। बाबाकी बगीचीके पास आकर गाड़ीका पहिया टूट गया। उस दिन उसे घर पहुँचना जरूरी था, पर वह करता क्या ? उसने सोचा

बाबासे आज्ञा लेकर रात उनकी बगीचीमें गुजारू, दूसरे दिन पहिया बनवाकर घर जाऊँ। उसने जब बाबासे जाकर अपनी बात कही। तो वे बोले- 'चिन्ता मत कर। गाड़ीका कुछ बिगड़ा नही है। उसे हाँक लेजा।'

वह जब गाड़ीके पास गया तो देखा कि पहिया ठीक है। बाबाकी जय बोलता हुआ वह बैलगाड़ी हाँक ले गया। घरके निकट पहुँचकर बोला- 'बाबा, घर आ गया। अब तू भले ही समेट ले अपनी माया।' बाबा तो वहाँ थे नहीं, पर वे जहाँ थे वहींसे उन्होंने अपनी माया समेट ली। पहिया फिर टूटा दीखने लग गया।

बाबा पैसा-कौड़ी अपने पास न रखते। यदि कोई कुछ देता तो उसे तुरन्त किसी-न-किसी प्रकार खर्च कर देते। कहीं ताँगेसे जाते होते, तो ताँगेवालेको दूना-तिगुना किराया दे देते। बससे जाते होते तो एकके बजाय दो टिकट खरीद लेते। कोई पूछता- 'बाबा, दो टिकट कैसे ?' तो कहते - 'एक मेरा, एक मेरी लाठीका।' यदि कहींसे पैसे कुछ अधिक आ जाते, तो सन्तों और व्रजवासियोंको दाल-बाटीकी दावत कर देते।

दाल-बाटीके बहाने बाबा सन्तोंको जुटाकर इष्ट-गोष्ठी किया करते। एक बार उन्होंने राधाटीलेपर दाल-बाटीका आयोजन किया। सन्त समाज इकट्ठे हुए। गोष्ठी आरम्भ हुई। हास्य-विनोद भी बीच-बीचमें होता रहा। उसी समय दाल-बाटीके लोभसे एक कर्मकाण्डी पण्डित वहाँ आ विराजे। रसिक महात्माओंको अपनी सभामें उन कर्मकाण्डी पण्डितजीका प्रवेश अच्छा न लगा। उन्होंने उस विजातीय संगसे छुटकारा पाना चाहा। एक महात्माने बाबाके कानमें कहा- 'बाबा, यह दाल-भातमें मूसलचन्द कहाँसे आ गया ? इसे भगाओ न।'

जीवन के अंतिम प्रसंग और स्मृतियाँ

बाबाने कहा - 'चिन्ता न करो।' आप ही चला जायेगा।' थोड़ी देर बाद वे बोले- 'भाइयों ! धतङ्गाने एक गीत जोड़ा है। उसमें अपनी सारी पोल खोल दी है। कहो तो सुनाऊँ।'

'सुनाओ बाबा' सबके सब बोल पड़े।

'तो सुनो' बाबाने कहा और गीत गाना शुरू किया।

धतंगा

दारीको बेझरकी माँगे

चार ।

रूखिउ माँगे सूखिउ माँगे, माँगे चटनी अचार ।। एक दिना मेरे जेमन बैठ्यो, खाय गयो डलिया झार ।।

जात-पाँतकी खबर नाँय, भंगी है कि चमार ।।

धतंगा दारीको बेझरकी माँगे चार ।।

ब्राह्मण देवता गीतकी अन्तिम पक्ति सुन चुपके खिसक लिये।

इस प्रकारकी तुकबंदियाँ बाबा अक्सर किया करते। भिक्षाके लिए जाते तो अकसर लोग उन्हें सुनानेको कहते। बाबा बिना किसी संकोचके सुना दिया करते। हँसना और हँसाना उनका काम ही जो था। व्रजवासी उन्हें अपना एक खिलौना कहा करते।

व्रजवासियोंसे इतना घुले-मिले होते हुए भी यदि वे उनमें से किसीको किसीके पति कुछ अन्याय या अनाचार करते देखते , तो फटकारे बगैर न रहते।

एक दिन जैतमें उनकी बगीचीके पासवाले कुएँसे कुछ नवविवाहिता गोपियाँ पानी भर रही थीं। दो बदमाशोंने उनसे छेड़-छाड़ की। दोनों ऐसे थे, जिनसे गाँववाले कुछ कहनेकी हिम्मत नहीं कर सकते थे। बाबाने उन्हें बुरी तरह फटकारा। तबसे बाबा उनकी आँखोंमें खटकने लगे। वे उन्हें जैतसे भगानेका उपाय सोचने लगे। एक दिन रातमें जब वे बगीचीमें सो रहे थे, वे उनके सिरपर लाठीसे प्रहारकर भाग गये। दूसरे दिन उनके सिरसे खून बहता देख व्रजवासियोंने चिन्तित हो पूछा- 'बाबा यह क्या ?'

'कुछ नहीं, एक पेड़से टक्कर लग गयी', कह बाबाने उस बातको छिपानेकी कोशिश की। पर, व्रजवासियोंको किसी प्रकार सच्ची घटनाके साथ उन अपराधियोंका पता चल गया। सब मिलकर उन्हें दण्ड देनेकी सोचने लगे। यह देख बाबा अपना डण्डा और बाल्टी उठा वृन्दावनके लिए चल पड़े। यह खबर तुरन्त सारे गाँवमें फैल गयी। गाँवके लोग, बालक-वृद्ध, स्त्री-पुरुष सब ऐसे मर्माहत हुए, जैसे उनका सर्वस्व लुट गया हो। सब बाबाके पीछे दौड़ पड़े। दो मीलकी दौड़ लगाकर उन तक पहुँचे। उनके चरणोंमें लोटकर उनसे जैत न त्यागनेकी प्रार्थना की। बड़ी मुश्किलसे सबके यह आश्वासन देने पर कि वे उस घटनाको भूल जायेंगे और उन दोनों व्यक्तियोंसे कुछ न कहेंगे बगीची लौटनेको तैयार हुए। बाबा स्वयं भी उस घटनाको भूल गये।

सन्त तो स्वभावसे क्षमाशील होते ही हैं, पर उनके प्रति किया हुआ अपराध स्वयं अपराधीको ले बैठता है। कुछ दिन बाद उन दोनों व्यक्तियोंमें से एकको उसीके किसी शत्रुने गोली मार दी। दसरेको लकवा मार गया और वह मर गया।

कभी-कभी बाबाका क्रिया-कलाप लोगोंकी समझके बाहर होता। पर, वे जो भी आज्ञा देते उसका उन्हें पालन करना होता। एक बार उन्होंने जैतके कुछ लोगोंसे कहा- 'एक अर्थी और सात काली हँड़िया लाओ। अर्थीपर मुझे मुर्देकी तरह लिटाकर वृन्दावन ले चलो। हँड़ियोंको मेरे अगल-बगल फोड़ते जाओ और 'राम-राम सत्य है' बोलते जाओ। कोई पूछे तो कह दो - 'धतंगा मर गया।' लोग उन्हें अर्थीपर उसी प्रकार ले चले। बाबा बिना हिले-डुले मुर्देकी तरह उसपर लेटे रहे। रास्तेमें जो भी सुनता कि धतंगा बाबा मर गये, वह अर्थीक साथ हो लेता। वृन्दावन पहुँचते-पहुँचते बहुत-से लोग साथ हो गये। जब यमुनाजीमें अर्थी बहायी गयी तब बाबा यमुनामें स्नान कर टटिया-स्थानकी ओर चल दिये।

शायद इस प्रकार उन्होंने अपने धाम पधारनेका संकेत किया, क्योंकि इसके एक महीने पश्चात् ही उन्हें धाम-प्राप्ति हुई। उस एक महीनेमें उनकी वृत्ति बराबर अन्तर्मुखी रही। वे किसीसे बातचीत न करते। अर्धसमाधिस्थ अवस्थामें राधा-नाम जपते रहते।

बाबाके शिष्य बहुत हुए, पर उनकी सेवाका सौभाग्य मुख्यरूपसे प्राप्त हुआ श्रीराधाकृष्णदास बाबाको। उपदेश, प्रवचन आदि बाबा कुछ नहीं करते थे। उनका जीवन ही उपदेश था। वे श्रीराधारानी और श्रीस्वामी हरिदासजीके अनन्य भक्त थे। राधारानीकी भक्ति स्वामी हरिदासकी कृपासे प्राप्त होती है, ऐसा मानते थे। एक बार टटिया-स्थानके श्रीश्यामसुन्दरदास बाबाजीने उनसे कुछ उपदेश करनेका आग्रह किया, तो उन्होंने कहा- 'हरिदास', इन चार अक्षरोंको याद रखो। इन्हींमें सब कुछ है।'

प्रेम और भक्ति — जीवन-संदेश

ईश्वर-प्रेम की अनुभूति भक्त-साहित्य का एक महत्त्वपूर्ण विषय है। इन प्रसंगों को श्रद्धा, संवेदनशीलता और समर्पण के संदर्भ में पढ़ा जा सकता है।

कथा का सार

श्रीजुगलदास बाबाजी की कथा भक्ति, विनम्रता और साधना पर मनन करने का अवसर देती है। इस संग्रह में अन्य भक्तों के जीवन-प्रसंग भी पढ़ें।