ब्रज के भक्त भाग 3 · अध्याय 97

श्रीजगदीशदास बाबाजी

श्रीजगदीशदास बाबाजी की प्रेरक हिंदी कथा। जानिए उनके जीवन, भक्ति और साधना से जुड़े महत्वपूर्ण प्रसंग।

श्रीजगदीशदास बाबाजी
श्रीजगदीशदास बाबाजी — ब्रज के भक्त भाग 3

श्रीजगदीशदास बाबाजी का यह भक्त-चरित्र ब्रज की साधना, श्रद्धा और जीवन से जुड़े प्रसंगों को सामने लाता है। नीचे कथा को अलग-अलग विषयों में व्यवस्थित किया गया है।

जन्म, परिवार और प्रारम्भिक जीवन

[ वृन्दावन]

श्रीधाम वृन्दावनमें कालिन्दीतटपर प्राचीन कालीयदहके विशाल कदम्ब वृक्षके पीछे वृक्ष-लताओसे परिपूर्ण रमणीक स्थानके बीच एक जीर्ण कुटीके सम्मुख विराजमान है एक विशालकाय, वयोवृद्ध, परम तेजस्वी महात्मा। परिधानमें है केवल एक बहिर्वास। गलेमें है तुलसीकी कण्ठी और हाथमें जपकी माला। गोधूलिकी बेलामें उनके नग्न शरीरकी गौर कान्ति उमड़ते हुए अन्धकारको अतिक्रमण करती जान पड़ रही। उनकी उद्ग्रीव मुद्रा, अपलक नेत्र और मन्द स्मितसे लग रहा है कि वे दूर दिशामें किसी दिव्य और मनोरम दृश्यको देख आत्मविभोर हो रहे हैं।

पासमें बैठे हैं एक बीस-इक्कीस वर्षीय नवीन महात्मा, जिनका टाटका बहिर्वास परिचय दे रहा है उनके वैराग्यका, उदीयमान सूर्यकी अरूणिमाके समान तेजपूर्ण गोल मुखारविन्दकी अरुणिम आभा उनके ब्रह्मचर्यका और नामजपमें रत ओष्ठोंका स्पन्दन तथा अनवरत भींगे-भींगे-से छल-छलाते नेत्र उनके नवानुरागका।

नवयुवक एक बार वृद्ध बाबाकी ओर देखते हैं, एक बार उस और जिस ओर बाबा देख रहे हैं। पर उस ओर कुछ न देख पाकर कौतूहलवश बाबाके मुखारविन्दकी ओर एकटक देखते रह जाते हैं। बाबा एकदम बोल पड़ते हैं- 'देख, गोपाल देख ! लालजीकी शोभा कैसी हो रही है ! दोनों भइया झूमते-झामते कैसे चले आ रहे हैं ! गइयोंके खुरोंसे उड़े रज-कण अलकावलियोंपर कैसे शोभायमान है !

नवयुवक पीड़ा भरे शब्दोंमें कहते हैं- 'मेरे ऐसे भाग्य कहाँ बाबा, जो मैं देखें।' बाबा स्नेहसे नवयुवकके गालपर चाँटा मारते हुए कहते हैं- तुझे दीखेगा। जा, मैंने कह दिया, तुझे दीखेगा।'

नवयुवक श्रीसुभाषचन्द्र बोसकी जन्मभूमि सुभाषग्राम (चाँगडीपोता) के प्रसिद्ध वृद्ध महात्मा है कालीयदह वृन्दावनके सिद्ध श्रीजगदीशदास बाबा और अमदार श्रीभूपेन्द्रनाथ चक्रवर्तीक पुत्र और क्रान्तिकारी नेता श्रीफणीन्द्रकुमार बकवर्तक भाई श्रीधीरेन्द्रनाथ चक्रवर्ती, जो रमणरेती, वृन्दावनके सिद्ध श्रीगौराङ्गदास बाबाजीके नामसे विख्यात हुए। उन्हें श्रीजगदीशदास बाबा स्नेहवश गोपाल कहकर पुकारा करते थे।

श्रीजगदीशदास बाबा पूर्वाश्रममें एक बड़े डॉक्टर थे। वर्धमानके एक कुलीन बाह्मणवशमें उनका जन्म था। कालनामें वे प्रैक्टिस किया करते थे। वे एक ঊर्नकाय गौर वर्ण पुरुष थे। कालनाके सिद्ध श्रीभगवानदास बाबाजी महाराजसे दीक्षा रहणकर ५० वर्षकी अवस्थामें संसार त्यागकर वृन्दावन चले आये थे। वृन्दावनमें श्रीमदनमोहनके पुराने मन्दिरमें रहकर भजन करते थे। कुछ दिन बाद कालीयदहके पास एक छोटी-सी कुटियामें रहने लगे थे।

श्रीजगदीशदास बाबा बड़े वैराग्यसे रहते थे। मधुकरी द्वारा जीवन निर्वाह करते थे। नमक नहीं खाते थे। हर समय भजनावेशमें किसी प्रकारका व्यवधान न हो, इस उद्देश्यसे यथासम्भव परापेक्षारहित जीवन व्यतीत करते थे, यहाँ तक कि क्षौर कार्यके लिए नापितपर निर्भर करना भी पसन्द नहीं करते थे। अपने पास एक कैंची रखते थे। आवश्यकता होनेपर सिर और दाढ़ीके बाल अपने-आप काट लिया करते थे।

उनके गुरु सिद्ध श्रीभगवानदास बाबा सभीको हरि-नाम-जप और साधारण भक्ति-योजनका उपदेश करते थे। पर उन्हें अधिकारी जानकर रागानुगा भक्तिका उपदेश किया था। इसलिए वे रागानुगा पद्धतिसे भजन करते हुए सदा श्रीकृष्णलीला-स्मरणमें तल्लीन रहते थे। उन्हें प्रायः बाह्यज्ञान नहीं रहता था। कभी-कभी सन्ध्या समयका उनके सामने रखा हुआ भोजन सवेरे तक रखा रह जाता था। कभी ऐसा भी होता था कि कोई उनके पास आता और दण्डवत्-प्रणामकर सामने बैठ जाता, तो भी उन्हें पता न चलता। बाह्यज्ञान होनेपर जब उनसे कोई कहता कि अमुक व्यक्ति आया था, दण्डवत् कर कुछ देर बैठा रहा, फिर चला गया, तो वे अपनेको अपराधी जानकर बहुत दुःखी होते।

इसलिए प्रायः वे जब कुटियाके बाहर बैठते, तो अपने सामने शालिगरामकी बटिया रखते, जिससे यदि कोई आकर दण्डवत् करे, तो दण्डवत् शालिगरामको हो और उन्हें प्रतिदण्डवत् न करनेका अपराध न लगे। T

बीजगदीशदास बाबाके लीला स्मरणमें जब कोई बाधा उपस्थित होती या उन्हें सहारा लेते। वे मधुकरीके लिए प्रतिदिन शृङ्गारवटमें श्रीनित्यानन्दप्रभुकी गद्दीपर भजनोल्लास न होता, तो वे वैष्णव महानुभावों और उनकी पवित्र चरण-रजका जाते। श्रप्रेमानन्दगोस्वामी उस समय गद्दीके अधिपति थे। एक दिन जब जगदीशदास बाबा मधुकरीके लिए वहाँ गये, तो उन्हें देखते ही वे बोल 'आज आपके मुखपर बात है ?' बाबाने रूंधे कण्ठसे उत्तर दिया 'प्रभुपाद ! सब कुछ तो आपके हाथमें है। आज मेरा भाग्य मन्द है।' प्रभुपाद समझ गये कि आज इन्हें लीला स्फूर्ति नहीं हो रही है। उन्होंने कहा- 'अच्छा, मधुकरीका झोला रखकर यहाँ रजमें थोडा लोट लो।' बाबाने वैसा ही किया। रोज जैसा उल्लास नहीं दीख रहा, क्या

उस समय यमुना शृङ्गारवटको घेरकर बहती थी। वृन्दावन परिक्रमा करनेवाले भक्तोंको शृङ्गारवटके प्रांगणमें होकर जाना होता था और उनकी चरण-धूलि वहाँ पड़ती थी। धूलिमें लोट-पोट होते ही बाबाके मनमें भजनोल्लास होने लगा। प्रभुपादके अप्रकट होनेके पश्चात् एक बार फिर जब उनकी लीला स्फूर्तिमें बाधा उपस्थित हुई, तब वे प्रातःकाल प्रभुपादके शिष्य श्रीमाधवदास बाबाजीके पास केशीघाट स्थित श्रीगोपालकृष्ण गोस्वामीकी समाज में गये। माधवदास बाबाजीने उन्हें उदास देखकर उनके असमय आनेका कारण पूछा। उन्होंने पूर्वोक्त घटना सुनाते हुए और अपनी तत्कालीन मानसिक स्थिति बतलाते हुए कहा - 'प्रभुपाद तो मेरे दुर्भाग्यसे अब प्रकट हैं नहीं। तुम मुझे उनकी समाधिपर ले चलो।' माधवदास बाबा उन्हें प्रभुपादके समाधि-स्थलपर ले गये।

वहाँ जैसे ही वे रजमें लोट-पोट हुए, प्रभुपादकी कृपासे उन्हें लीला-स्फूर्ति होने लगी।

श्रीजगदीशदास बाबा श्रीकृष्ण-लीला-समुद्रमें मीनके समान सदा तैरते, डूबते और उतराते रहते। यह उनकी बाह्यदशासे भी स्पष्ट प्रतीत होता। उनके हृदयमें जिन नये-नये भावोंका संचार होता, वे उनके शरीरके तदनुरुप बदलते हुए वर्षोंमें दृष्टिगोचर होते। जब किसी कारणवश लीला-स्फूर्ति बन्द हो जाती, तब वे जलसे निकली मछलीके समान तड़फड़ाते। उनकी विरह-वेदना इतनी असह्य हो जाती कि एक क्षणके लिए भी प्राण धारण करना कठिन हो जाता। एक बार ऐसी ही अवस्थामें उन्होंने श्रीगौरांगदासजीसे कहा- 'गोपाल ! एक काम करेगा ?'

व्रजभूमि और तीर्थ से जुड़ी घटनाएँ

'आज्ञा कीजिये बाबा!'- गोपालने उत्तर दिया।

'देख, मैं कुएँके पास खड़ा हो जाऊँ। तू मुझे धक्का देकर विरह-वेदनासे मेरी

रक्षा कर।'

आत्महत्या न कर लें। गोपालको जीवनमें पहली बार जगदीशदास बाबाकी आज्ञाकी अवहेलना करनेको विवश होना पड़ा। इतना ही नहीं, उस दशामें सदा उनके निकट रहकर विशेष रूपसे इस बातकी सावधानी रखनी पड़ी कि कहीं वे विरह दशा व्याकुल हो

गौरांगदासजी गोवर्धनमें रहते हुए बीच-बीचमें वृन्दावन जाकर श्रीजगदीशदास श्रीजगदीश बाबाकी चरण-सेवा कर उनकी शैय्याके समीप भूमिपर शयन कर रहे बाबाकी देख-रेख करते और उनके सत्संगका लाभ उठाते। एक दिन रात्रिमें वे थे। उसी समय बाबाका वात्सल्य-समुद्र उमड़ा और उन्होंने अपने चरण-कमल उनकी छातीपर रख दिये। चरणोंका स्पर्श पाते ही उन्हें साक्षात् श्रीकृष्ण लीलाके दर्शन होने लगे। उसी समयसे उनके हृदयमें श्रीकृष्ण लीलाकी स्वतः स्फूर्ति होने लगी।

एक बार राधाकुण्डमें उन्हें एक साधुका आतिथ्य स्वीकार कर उसकी कृटियापर प्रसाद ग्रहण करने और रात्रि वहीं व्यतीत करनेका संयोग हुआ। साधु कृपथगामी था। गौरांगदासजीको भी अपने मार्गपर ले आनेके उद्देश्यसे उसने एक योजना बनायी थी। गौरांगदासजीको जैसे ही इसका आभास हुआ, उन्होंने उसकी भर्त्सना की और उसका संग त्याग दिया। पर, थोड़ी देरके उसके संगके प्रभावसे या उसके अन्नके प्रभावसे उन्हें लीला-स्फूर्ति होना बन्द हो गया। उनकी वहीं अवस्था हो गयी जो कृपण व्यक्तिकी अपना सारा धन खो बैठनेपर या मछलीकी तालाबका जल सूख जानेपर होती है। दूसरे दिन कड़ी धूपमें भी वे गिरिराजकी परिक्रमाको चल दिये। दिन भर परिक्रमा कर गिरिराजसे प्रार्थना करते रहे। सन्ध्या समय क्लांत हो उद्धवकुण्डकी सीढ़ीपर लेट गये। थोड़ी देरमें आँख लग गयी।

यदि करवट बदलते तो सीढ़ियोंसे लुढ़कते हुए कुण्डमें जा गिरते। किसी व्यक्तिने उन्हें गोदमें उठाकर ऐसे स्थानपर लिटा दिया, जो सुरक्षित था। उसी समय उनकी निद्रा भंग हुई। लगा कि किसीने उन्हें उठाकर दूसरी जगह लिटा दिया है। चारों ओर मुड़कर देखा, पर दूर तक कोई न दीखा। वे आश्चर्यचकित रह गये !

दूसरे दिन वे जगदीशदास बाबासे पास गये। उन्हें देखते ही वे कुद्ध होकर बोले- 'मूर्खकी तरह जहाँ-तहाँ सो जाता है। तुझे इतना भी ज्ञान नहीं कि कहाँ लेटना चाहिये, कहा नहीं।' वे समझ गये कि उन्होंने ही उन्हें उद्धवकुण्डपर उठाकर दूसरी जगह लिटाया था। उनका हृदय भर आया और नेत्रोंसे आंसू टपकने लगे।

उन्होंने समझ लिया कि किस प्रकार गुरुदेव छायाकी तरह शिष्यके साथ रहका कठिन परिस्थितियोंमें उनकी रक्षा करते हैं।

उन्होंने राधाकुण्डके साधुसे मिलनेका और अपनी लीला-विस्मृतिका सारा हाल बाबासे कहा और उनके कृपा आशीर्वादकी प्रार्थना की। बाबाने उन्हें आशीर्वाद दिया। उसी समयसे उन्हें लीला स्फूर्ति फिर होने लगी।*

श्रीजगदीशदास बाबा विशेष रूपसे सावधान रहते कि कभी कही जाने-अनजाने किसीके भी प्रति कोई अपराध न बन जाय। साधारणतया भजनानन् महात्मा भजनमें आवेशके कारण आगन्तुक लोगोंसे बातचीत करना पसन्द नहीं करते। परन्तु, जगदीशदास बाबा आगन्तुकोंकी कभी उपेक्षा न करते। यदि कोई उन्हें इसके विपरीत परामर्श देता, तो कहते- 'मेरा नाम जगदीशदास है। आगन्तुकोंके रूपमें जगदीशकी सेवा करना मेरा कर्तव्य है। महाप्रभु लोगोंको मेरे पास भेजते हैं उनकी शंकाओंका समाधान कराने और भजन-सम्बन्धी उपदेश दिलानेके लिए।

यदि मैं उपदेश देकर उनकी सेवा न करूँ, तो उनके प्रति अपराधका भागी तो बनूँगा ही, महाप्रभुके प्रति भी अपराध करूंगा।' वे अपनी कुटियापर ग्रन्थ-पाठ या कथादिका आयोजन भी इसी भयसे न करते कि कहीं कोई हुई व्यक्ति पाठके समय उनके पास अपनी जिज्ञासा लेकर आये और पाठ होता देख निराशापूर्वक वापस चला जाय। इसलिए जब वे बाह्यदशामें होते और आगन्तुक उनके पास होते, तो उनका समय इष्ट-गोष्ठीमें ही व्यतीत होता। गोष्ठीमें वे बीच-बीचमें स्वयं प्रश्न करते और उसका उत्तर दे देते, तब दूसरे लोगोंसे अपना मत प्रकट करनेके लिए कहते। वे नहीं चाहते कि पहले दूसरे लोग अपना मत व्यक्त करें और उन्हें उसका प्रतिवाद करना पड़े।

आग्र

एक दिन राजर्षि वनमाली रायबहादुरसे उन्होंने प्रश्न किया-"चैतन्य-चरितामृतका वाक्य है- 'सर्वत्यागी जीवेर कर्तव्य कांहां बास ? सुन

श्रीवृन्दावन भूमि जांहां नित्य लीला-रास।' (अर्थात् सर्वत्यागी व्यक्तिको रहना चाहिये वृन्दावनमें जहाँ रासलीला नित्य होती है।) तुमने तो सर्वत्याग किया नहीं है, फिर तुम यहाँ क्यों रहते हो ?" प्रश्न सुनकर राजर्षिका माथा चकरा गया, पर वे कुछ उत्तर दें उसके पूर्व ही बाबाने कहा- "प्रभु तुम्हें यहाँ लाये हैं उन लोगोंकी सेवाके

लिए जो सर्वत्यागकर यहाँ रह रहे हैं और भजन कर रहे हैं।' राजर्षि वनमाली बाबू बहुत अर्थ व्यय कर वृन्दावनमें साधु-वैष्णवोंकी सेवा किया करते थे।

श्रीजगदीशदास बाबासे जब कोई विदा लेता, तब वे उसके मुखको और देखकर यह जाननेकी चेष्टा करते कि वह प्रसन्न मनसे विदा हो रहा या नहीं। यदि कुछ शंका होती तो पछ लेते कि उनकी वार्तासे उसे कुछ कष्ट तो नहीं पहुंचा है। एक बार अकस्मात् उनके छोटे भाई बंगालसे आये। बाबाने उनका यथायोग्य आदर किया और उनके प्रति स्नेह प्रदर्शन किया। भाईने जब उन्हें यह संवाद चुनाया कि उनकी स्वीका देहान्त हो गया है. तब वे बोले- 'चलो अच्छा हुआ, संसार-बन्धनसे तुम्हें मुक्ति मिली। अब आ जाओ. दोनों भाई साथ रहकर भजन किया करें।'

भाईक जानेके पश्चात् वे सोचने लगे-जाते समय वह कुछ प्रसन्न नहीं दीख रहा था। मैंने उसे सांन्त्वना देनेके बजाय कहा- 'अच्छा हुआ।' कहीं उसने मेरी बातका बुरा तो नहीं माना ? वे भाईसे पूछना भूल गये थे कि वे कहाँ ठहरे हैं। उन्होंने किसी प्रसंगमें कहा था कि वे एक-दो दिनमें चले जायेंगे। इसलिए वे उनसे क्षमा माँगनेके उद्देश्यसे दो-तीन दिन लगातार वृन्दावन स्टेशन गये। पर उनसे भेंट न हुई। तब उन्होंने अपने परिचित वर्धमानके एक वकील साहबको पत्र लिखकर आग्रह किया कि वे भाईसे पूछकर लिखें कि उसने उन्हें क्षमा कर दिया है या नहीं। वकील साहबने लिखा कि भाई उनकी बातसे जरा भी दुःखी नहीं हुए थे। उनके पास फिर इस भयसे नहीं गये कि उनके भजनमें व्याघात होता। तबसे बाबा जो कोई उनके पास आता उसका पता पहले पूछ लेते।

जीवन के अंतिम प्रसंग और स्मृतियाँ

किसीमें दोष-दृष्टि रखते या किसीकी निन्दा करते बाबाको कभी किसीने नहीं देखा। दोष-दृष्टि रखनेकी बात तो दूर, वे ऐसे अवसरोंको ही न आने देनेकी यथासम्भव चेष्टा करते, जिनमें दोष-दृष्टिकी सम्भावना हो। वे कहीं पाठ आदि सुनने भी नहीं जाते इस भयसे कि कदाचित् पाठकर्ताकी कोई बात उन्हें अच्छी न लगे और उनमें दोष दीखने लगे। जब किसीकी निन्दा या त्रुटिका कोई प्रसंग आता, तो वे गुरुदेव श्रीभगवानदासकी एक बात कहकर उसका समाधान किया करते। वे कहते कि एक दिन श्रीभगवानदास बाबाके किसी भक्तने उनसे कहा- 'अमुक भक्त आपके पास आकर बड़ी लम्बी-चौड़ी हाँकता है। पर, आप जानते हैं कि नहीं, उसने मछली खाना भी अभी नहीं छोड़ा है ?' बाबाने उत्तर दिया- 'तुम भी तो कभी मछली खाया करते थे, अब नहीं खाते। जो दोष तुम्हारे अपने भीतर रहा हो

उसके कारण दूसरेको दोषी कहना ठीक नहीं। जीवमात्रकी उन्नति क्रमशः होती है यह सोचकर किसीका भी दोष नहीं देखना चाहिये।'

श्रीजगदीशदास बाबा अन्तर्मुखतासे सदा लोला-ग्समें निमग्न रहनेके कारण उत्सवादि पसन्द नहीं करते थे। अपने गुरुदेवकी तिथिपर एक सेर मालपुआ मंगाकर भोग लगा देते थे और जो कोई आता था उसे उसमें से एक टुकड़ा प्रसादका दे देते थे। एक बार गुरुदेवकी तिरोभाव तिथिपर उनकी इच्छा हई वैष्णव-सेवा करनेको । किनूबाबू नामक एक व्यक्ति उन्हें उत्सवके लिए ४०) रुपये दे गये। बाबा स्वयं जाकर मालपुओंके लिए २० रुपयेका गुड़ खरीद लाये। गुड़ कुटियामें रखवाकर सामनेके कुएँपर पैर धोने गये, पर कुटियाकी साँकल लगाना भूल गये। इस बीच बन्दरोंकी एक टोलीने कुटियामें प्रवेश किया। उसी क्षण गुड़का महोत्सव प्रारम्भ हो गया।

जगदीशदास बाबा दूरसे बानररूपी वैष्णवोंकी गुड़-भोजन-लीला देखकर प्रसन्न अपने-अपने स्थानको जाने लगे, बाबाने उन्हें दण्डवत् प्रणामकर आनन्दपूर्वक विदा हुए और हरिध्वनि करने लगे। जब बानर महानन्दपूर्वक गुड़-महोत्सव समाप्तकर किया।

सन्ध्या समय जब कुटियापर भक्त समागम हुआ और किनूबाबूने महोत्सवको बात पूछी, तो बाबाने उत्तर दिया- 'आज तुम्हारी कृपासे बहुत-से वैष्णवोंकी सेवा हुई। कुल २०) रुपये खर्च हुए, बाकी २०) रुपये यह लो। प्रसाद चाहिये तो कुटियामें जाकर देखो, गुड़-प्रसादके कण भूमिपर छिटके पड़े होंगे, या गुड़की बोरीमें चिपके होंगे।'

एक दिन बाबाके मनमें वासना जागी कि श्रीकृष्णलीला-स्थली कालीयदहमें प्राचीन दहके स्मृति-चिह्नके रूपमें एक विशाल दीर्घिका का निर्माण कराया जाय। उन्होंने राजर्षि वनमाली रायबहादुरके मैनेजर श्रीकामिनीकुमार बाबूसे इसे व्यक्त किया। कामिनीबाबूके माध्यमसे इस बातका धनी-समाजमें प्रचार होते ही दीर्घिका के लिए धन एकत्र होने लगा। दूसरे ही दिन भक्त श्रेष्ठ श्रीलालाबाबूके वंशकी एक विधवा रमणीने ७५ हजार रुपये देना स्वीकार किया। हेतमपुरके राजाने २५ हजार रुपये देनेका वचन दिया। बाकी खर्चका भार राजर्षि बाबूने ले लिया। जगदीशदास बाबासे परामर्श कर एक सुन्दर और सुवृहत् दीर्घिकाका एस्टिमेट तैयार कर लिया गया।

उस दिन रात्रिमें बाबाका भजन न हो सका। प्रस्तावित दीर्घिका की चिन्तामें ही सारी रात बीत गयी। उन्हें इतना क्षोभ हुआ कि वे रात्रिमें ही कुटिया छोड़कर किसी

वनमें चले गये। चार-पाँच दिन तक लोग उन्हें खोजते रहे, पर पता न चला। एक दिन अकस्मात् वे भजन-कुटीमें आकर उपस्थित हुए। दीर्घिका खोदनेके लिए जब मेरे भजनमें भयंकर बाधा उपस्थित हो गयी थी। यदि इसका कार्य आरम्भ हो गया उनसे अनुमति मांगी गयी तो वे गम्भीर होकर बोले- 'दीर्घिका की वासना लेकर तो मेरा सभी कुछ चला जायेगा। इसलिए मैं निषेध करता हूँ कि अब कभी भी इसके विषयमें मुझसे कोई कुछ न कहे। यदि किसीकी इच्छा हो तो मेरे मरनेके बाद मेरी वासना की पूर्ति भले ही कर दे।'

श्रीजगदीशदास बाबा महाप्रभुके 'तृणादपि सुनीचेन तरोरिव सहिष्णुना। अमानिना मानदेन कीर्तनीयः सदा हरिः' श्लोककी साक्षात् मूर्ति थे। उनसे यदि कोई

पूछता कि प्रेम-भक्ति लाभ करनेका सबसे सरल और अचूक उपाय क्या है? तो वे कहते कि जो इस श्लोकके साँचेमें अपने जीवनको ढालनेमें जितना समर्थ होगा, जो जितना अपनेको तृणसे भी तुच्छ मानकर वृक्षसे भी अधिक सहिष्णु होकर, स्वयं सम्मानकी अभिलाषा न रखते हुए और दूसरोंको सम्मान देते हुए निरन्तर हरि-कीर्तनमें रत रहकर जीवन व्यतीत करनेमें समर्थ होगा, वह उतना प्रेम-भक्तिके निकट होगा, जिस दिन वह पूर्ण रूपसे अपने-आपको इस साँचेमें ढाल लेगा, उस दिन निश्चित रूपसे प्रेम-भक्ति प्राप्त कर लेगा। स्पष्ट है कि जिसका जीवन इस प्रकार ढला होगा, उसका हृदय वासना-शून्य होगा।

इसलिए, इसी प्रकारके एक प्रश्नके उत्तरमें उन्होंने एक बार कहा था- 'तुम्हारे हृदयमें जब प्रेम-भक्तिके सिवा अन्य किसी वस्तुकी चाह न रहेगी तभी तुम प्रेम-भक्ति लाभ कर सकोगे।'

श्रीजगदीशदास बाबाकी आयु अब लगभग १०० वर्षकी हो गयी थी। वे अपनी प्रकट-लीला समाप्त करनेको थे। उस समय श्रीगौरांगदास बाबा उनके पास थे। उनके स्नेहके कारण उनके पास रहते लीला समाप्त करना उनके लिए सम्भव न था। इसलिए उन्होंने उन्हें आज्ञा दी- 'तुम बरसाने जाओ। भानुखर सरोवरकी झाडू-बुहारीकी सेवा किया करो।' उनके विदा होते समय उन्होंने कहा- 'मेरी तीन बातें याद रखना। जीवनमें कभी किसीके आगे हाथ न पसारना। किसीसे अपने हृदयकी बात न कहना। साधु-वैष्णवोंकी पंगतमें बैठकर प्रसाद न पाना।'

गौरांगदासजी बरसाने जाकर नियमसे भानुखर सरोवरकी सेवा करने लगे। कुछ दिन पश्चात् उन्होंने श्रीजगदीशदास बाबाके ज्योतिर्मय स्वरूपके वहाँ दर्शन किये। वे कुछ दूरपर उनके सामने खड़े थे। गौरांगदास जब उनकी ओर बढ़े तो १५०]

उन्होंने हाथ मिलाकर मना किया और अन्तर्धान हो गये। गौरांगदास समझ गए । की बाबाने देह त्याग दिया है। वे विरह-वेदनासे पीडित हो तुरन्त वृन्दावनकी ओर चल पड़े मार्ग में पता चला कि आषाढ़ शुक्ल षष्ठीको वे नित्यले प्रवेश कर गये।

नाम-स्मरण और एकाग्रता — जीवन-संदेश

नाम-स्मरण, भजन और एकाग्रता के प्रसंग साधना की निरंतरता की याद दिलाते हैं। यहाँ वर्णित जीवन-अनुभवों से पाठक अपनी साधना के लिए प्रेरणा ले सकते हैं।

कथा का सार

श्रीजगदीशदास बाबाजी की कथा भक्ति, विनम्रता और साधना पर मनन करने का अवसर देती है। इस संग्रह में अन्य भक्तों के जीवन-प्रसंग भी पढ़ें।