ब्रज के भक्त भाग 3 · अध्याय 61

श्रीईश्वरदास बाबाजी

श्रीईश्वरदास बाबाजी की प्रेरक हिंदी कथा। जानिए उनके जीवन, भक्ति और साधना से जुड़े महत्वपूर्ण प्रसंग।

श्रीईश्वरदास बाबाजी
श्रीईश्वरदास बाबाजी — ब्रज के भक्त भाग 3

श्रीईश्वरदास बाबाजी का यह भक्त-चरित्र ब्रज की साधना, श्रद्धा और जीवन से जुड़े प्रसंगों को सामने लाता है। नीचे कथा को अलग-अलग विषयों में व्यवस्थित किया गया है।

भजन-साधना और नाम-स्मरण के प्रसंग

[ वृन्दावन ]

दिल्लीके श्रीईश्वरदयाल माथुर बी०ए० पास करनेके बाद वृन्दावनकी साधु माँके शिष्य पं० मंगलसेनके सम्पर्कमें आये। २५ वर्षकी अवस्थामें उनसे दीक्षा ले वृन्दावन चले गये। दो-तीन वर्ष प्रेम महाविद्यालयमें अध्यापन कार्य किया। इस बीच उनका मन भजनमें इतना रम गया कि अध्यापन करना सम्भव न रहा। नौकरीसे इस्तीफा दे उन्होंने किसीसे वेश ले लिया। नाम हुआ ईश्वरदास।

अब उनका अधिकांश समय श्रीगौरांगमहाप्रभुकी लीलासे सम्बन्धित पदोंकी रचना करनेमें जाता। वे पद-रचना करते और श्रीओमप्रकाशजी कीर्तनियाँ नृत्य-कीर्तन सहित उनका अभिनय करते। अपनी रचनाओंका इस प्रकार कीर्तन और अभिनयके माध्यमसे मूर्तरूपमें आस्वादनकर वे आत्म-विभोर हो जाते। श्रीओमप्रकाशजीने गौर-लीला-कीर्तनमें निष्णात हो जो भक्त-समाजकी सेवाकी वह अपूर्व है। पर कम ही लोग जानते हैं कि उसके पीछे श्रीईश्वरदास बाबाका कितना हाथ था।

ईश्वरदास बाबाको ही आचार्य श्रीकिशोरीरमणजीको भागवत-कथामें निष्णात करनेका श्रेय है। १७ वर्ष की अल्पावस्थामें ही उन्होंने आग्रहपूर्वक उनसे भागवत सप्ताहकी कथा कहलाना प्रारम्भ किया। वे नित्य परिश्रम कर कथाकी रूपरेखा तैयार करते। किशोरीरमणजी उनसे उसकी व्याख्या सुनते और उसीके अनुरूप कथा कहनेकी चेष्टा करते। बाबा भी उस कथामें एक श्रोता होते। कथाके पश्चात् वे उनका ध्यान आकर्षित करते कथाके उन अंशोंकी ओर, जो भूलसे रह जाते, या जिनका सिद्धान्त वे ठीकसे व्यक्त न कर पाते।

ईश्वरदास बाबाने पण्डित रामकृष्णदास बाबाका संग बहुत किया। श्रीगौरांगदास बाबाजीसे भी वे बहुत प्रभावित थे। उनकी कथा वे बड़े ध्यानसे सुनते

सेवा, प्रसाद और समर्पण की घटनाएँ

और उसके नोट्स लेते। उनकी कथा सुनते-सुनते उनका श्रीराधाकृष्णके चरणोंमें अनुराग बहुत बढ़ गया। वे श्रीराधाकृष्णके विग्रहकी सेवा करते और उसके माध्यमसे अष्टकालीन लीलाका चिन्तन करते। सेवा करते समय वे सखीवेश धारण करते और कुटियाका दरवाजा बन्दकर लेते।

ठाकुरकी वे आत्मवत् सेवा करते। उन्हें अपने बगलमें ही दूसरे पलंगपर सलाते। रात्रिमें अपनेको प्यास लगती. तो पहले उन्हें जल पिलाकर आप पीते. अपनेको ठण्ड लगती, तो पहले उन्हें दोहर या रजाई उढ़ाकर अपने-आप ओढते।

कुछ दिन पूर्व ईश्वरदास बाबा टिकारी घाटसे बिहारीपुरा चले आये थे और अब स्थायी रूपसे सेवाकुञ्ज स्थित गोपालकुटीमें रहने लगे थे। नवीन अवस्थाके दो बाबाजी श्रीगोपालदास और श्रीरामदुलारे उनके पास रहते थे, उनकी

सेवा करते थे।

एक बार श्रीईश्वरदास बाबा बीमार पड़े। ठाकुर-सेवामें गोपालदास बाबाकी नियुक्त करना पड़ा। गोपालदास नित्य प्रेमसे सेवा करने लगे। एक दिन उन्हें सेवा करते समय राधारानीके पैरका नूपुर न मिला। बहुत खोजकर हार गये तो डरते-डरते बाबासे कहा। बाबाने कहा- 'चौकी, सिंहासन, पलंग आदि सब ठीकसे देखो जायेगा कहाँ ?' गोपालदासके फिर खोजनेपर भी जब नूपुर न मिला, तो बाबा कुछ चिन्तामें पड़ गये। थोड़ी देर आँखें बन्द किये न जाने क्या सोचते रहे। फिर एकाएक बोल पड़े- 'गोपाल, यह दोनों नित्य रात्रिमें सेवाकुञ्जमें रास करने जाते हैं न ! देख जाकर, कहीं रास चबूतरेपर न गिरा आये हों।'

दिव्य अनुभूति और कृपा के प्रसंग

गोपालदास बाबा भागे गये सेवाकुञ्ज । पुराने रास-चबूतरेपर वे जैसे ही चढ़े उसके ईशान भागमें नूपुर पड़ा देख खुशीसे उछल पड़े। उसे उठाकर अपने अश्रुसिक्त नेत्रोंसे लगाया। कुटियापर आकर जब बाबाको दिया, वे रो पड़े और बोले- 'हाय ! मैं अभी भी लाड़िलीकी सेवाके योग्य न बन सकी। रासके समय सेवामें मेरी असावधानीके कारण ही तो नूपुर वहाँ पड़ा रह गया!'

बाबा लगातार तीन वर्ष बीमार रहे। धीरे-धीरे उनकी शक्ति इतनी क्षीण हो गयी कि वे करवट भी अपने-आप न बदल सकते। पर उनका लीला चिन्तन बराबर चलता रहा। अन्तमें एक दिन रातमें उन्होंने कहा- 'मुझे रजमें लिटा दो।'

उन्हें भूमिपर लिटा दिया गया। गोपाल और रामदुलारे उनके दोनों ओर बैठकर महामन्त्रका कीर्तन करने लगे। रातको साढ़ेतीन बजे उन्होंने पूछा- 'कै बजे हैं ?'

४ बजे फिर पूछा- 'कै बजे हैं ?' तीसरी बार जब पूछा तो गोपालने कहा- 'साढ़े चार बजे हैं। राधारमणकी मंगलाका घण्टा बज रहा है।'

'अच्छा!' कह वे चौंक पड़े। मन्द स्वरमें मंगलाका पद गुनगुनाने लगे। पद समाप्त होते ही न जाने कहाँसे शक्ति प्राप्तकर एकदम उठ बैठे और दोनों भुजाएँ ऊपर उठाकर मन्द स्मितके साथ सजल और विस्फारित नेत्रोंसे टकटकी लगाए अपने बायीं ओर ऊपर किसीको देखते हुए चीख पड़े 'लाड़ली-लालकी जय। लाड़ली-लालकी जय ! लाड़िली- ।।' बस इतना ही कह पाये थे कि इनका पार्थिव शरीर रजमें लुढ़क गया। । तीसरी बार 'लाड़ली' कहनेके साथ ही वे सिद्ध देहसे लाड़िलीके चरणोंमें जा पहुँचे !'

सेवा और समर्पण — जीवन-संदेश

सेवा का मूल्य केवल बाहरी कार्य में नहीं, बल्कि उसके पीछे के निष्कपट भाव में भी होता है। इस चरित्र के प्रसंगों को पढ़ते समय सेवा के इसी भाव पर विचार किया जा सकता है।

कथा का सार

श्रीईश्वरदास बाबाजी की कथा भक्ति, विनम्रता और साधना पर मनन करने का अवसर देती है। इस संग्रह में अन्य भक्तों के जीवन-प्रसंग भी पढ़ें।