ब्रज के भक्त भाग 3 · अध्याय 72
श्रीहरि बाबाजी
श्रीहरि बाबाजी की प्रेरक हिंदी कथा। जानिए उनके जीवन, भक्ति और साधना से जुड़े महत्वपूर्ण प्रसंग।

श्रीहरि बाबाजी का यह भक्त-चरित्र ब्रज की साधना, श्रद्धा और जीवन से जुड़े प्रसंगों को सामने लाता है। नीचे कथा को अलग-अलग विषयों में व्यवस्थित किया गया है।
जन्म, परिवार और प्रारम्भिक जीवन
[ वृन्दावन ]
एक बार भयंकर तूफान से आन्दोलित समुद्रकी प्रचण्ड लहरें तटीय प्रदेशकी न जाने कितनी बरबादी कर गयीं, कितने स्त्री-पुरुष, बूढ़ों और बच्चोंको अपने साथ बहा ले गयीं। सभीके सगे-सम्बन्धी अपने-अपने भाग्यको दोष दे हाथ-पर-हाथ रख बैठे रह गये। एक गौरइया चिड़ियाके अण्डे भी समुद्र बहा ले गया था। उसने सोचा- 'समुद्र कहीं फिर न इसी तरह मेरे अण्डों-बच्चोंको बहा ले जाय, इससे इसे पाट दूँ। वह अपनी चोंचमें मिट्टी भर-भर उसमें डालने लगी।
इसी प्रकार एक दिन श्रीहरि बाबाने बुलन्दशहर जिलेके खादरमें ४५ मीलके भीतर बसे ७०० गाँवोंमें प्रतिवर्ष गंगाकी बाढ़से होती तबाहीकी चिंता करते सोचा कि उन गाँवोंकी रक्षाके लिए जीवपुरसे राजघाट तक २० मील लम्बा, और कहीं-कहीं १२ फुट तक ऊँचा और ७५ फुट तक चौड़ा एक बाँध बना दूँ। सोचनेके साथ ही वे जुट गये इस कार्यमें। बाँधकी लकीर खींच लगे अपने हाथसे डलिया भर-भर मिट्टी डालने।
चिड़िया, जो समुद्र पाटना चाह रही थी, एक अति क्षुद्र और बुद्धिहीन जीव थी। पर बाबा, जिन्होंने इस विशाल बाँधके निर्माणका बीड़ा उठाया एक मेधावी महापरुष थे। व्यावहारिक बुद्धिकी भी उनमें कमी न थी। उन्हें इस असम्भव कार्यमें जुटा देख लोगोंके आश्चर्यकी सीमा न रही। वे लगे उनकी आलोचना करने- 'बाबाको यह क्या हो गया है ? आखिर उन्हें सूझी क्या है, जो अपने कन्धेपर इतना बड़ा काम उठा लिया है!'
पर, बाबाने अपने बलपर नहीं, हरिनामकी असीम, अचिंत्य शक्तिका सहारा लेकर इस कामको प्रारम्भ किया था। उनका आरम्भ करनेका ढङ्ग ही हरिनामकी शक्तिमें उनके अटल विश्वासका व्यञ्जक था। सन् १९२२ के पौष मासमें उन्होंने एक दिन सिलारा घाटपर अपने कुछ प्रेमियोंके साथ नाम-संकीर्तन किया। फिर गंगा माताको प्रणाम्, गणेश-पूजन, स्वस्तिवाचन और मंगल-पाठके पश्चात् मिट्टी डालनेका काम शुरू किया। अपने प्रेमी भक्तोंसे कहा- 'मैंने प्रण किया है कि चैत्र, शुक्लपक्ष अष्टमी तक मिट्टी डालनेका काम पूरा कर दूँगा। यदि ऐसा न कर सका तो प्राण त्याग दूँगा। आप लोग जो मेरे साथ सहयोग करना चाहें, बाँधका जो भी
काम करें, हरिनामका उच्चारण करते हए करें। नाम-प्रभु अवश्य हमारे संकल्पको पूरा करेंगे, इसमें मुझे तनिक भी सन्देह नहीं।
अब लोगोंक शंका और तर्क-वितर्क करनेका अवसर न रहा। बाबाने प्राणकी बाजी जो लगा दी थी। उनके प्रेमी भक्तोंके लिए, जिनकी संख्या अनन्त थी, बाँधके निर्माणमें जुट जानेके सिवा दूसरा कोई विकल्प न रहा। वे जुट गये बाबाके साथ मिट्टी ढोनेमें।
पर, इस विशाल कार्यके लिए बहुत अधिक धन, इन्जीनियरों और श्रमिकोंकी भी आवश्यकता थी। केवल श्रमदानसे मिट्टी डालकर तो इसका होना सम्भव था नहीं, इसलिए बाबा समय निकालकर कुछ भक्तोंके साथ भिक्षाको भी जाने लगे। थोडे ही समयमें सारी व्यवस्था हो गयी। बाबाके भक्त कुछ अवकाश प्राप्त इन्जीनियरों और ओवरसियरोंने अवैतनिक रूपसे काम करना शुरू कर दिया। हजारोंकी संख्यामें सेवापरायण स्त्री-पुरुष, बूढ़े-बच्चे मिट्टी डालनेके काममें लग गये। हजारों पैसा लेकर काम करनेवाले मजदूर भी ठेकेदारोंके नीचे काम करने लगे। इतने बड़े कामकी ऊपरी देखभालके लिए कंकड़-मिट्टी दूर-दूरसे लानेके लिए सैकड़ोंकी संख्यामें मोटरें, ट्रक, बैलगाड़ी, ऊँट और खच्चर आदि जाने कहाँ-कहाँसे आ पहुँचे।
एक बहुत बड़े भोजन-भण्डारकी व्यवस्था भी हो गयी, जिसमें कार्यकर्ताओंको भोजन कराया जाने लगा। हरिनामकी धुनके साथ काम तेजीसे चलने लगा।
बाबा जब किसी स्थानपर काम कुछ ढीला होता देखते तो वहाँ स्वयं सबके साथ काम करने लग जाते। वे उनमें ऐसा शक्ति-संचार करते कि वे फिर पूरे जोशसे काम करने लग जाते।
सभी ओरसे काम सही रफ्तारसे चलनेकी खबरें आने लगीं। दिन बीतते गये और निश्चित अवधिमें मिट्टी डालनेका काम पूरा हो जानेकी आशा बँधने लगी। अष्टमीके दिन प्रातःकाल बाबासे कहा गया कि मिट्टी डालनेका काम पूरा हो गया। बाबा स्वयं जाँचके लिए निकले तो पता चला कि एक ठेकेदारकी गलतीसे एक जगह कई दिनका काम बाकी रह गया। तो अपने पूर्वनिश्चयके अनुसार उन्होंने घोषणा की कि वे बिना अन्न-जल ग्रहण किये बाँधपर मिट्टी डालते-डालते प्राण विसर्जन कर देंगे।
यह सुन कार्यकर्ताओंके होश उड़ गये। उन्होंने घोड़ियोंपर कुछ आदमियोंको गुन्नौर आदि गाँवोंमें भेजा। वहाँसे तत्काल हजारों आदमियोंकी भीड़ फावड़ा और
दिया। बाबाने सबको साधुवाद दिया। डलिया ले-लेकर टूट पडी। सबने मिलकर रात्रि १० बजे तक काम पूरा कर
गया। ज्येष्ठके दशहरे तक वह भी पूरा हो गया। उत्सवमें सम्मिलित हुए। उसी दिनसे बाँधपर कंकड डालनेका काम शुरू कर दिया दूसरे दिन रामनवमीका उत्सव बडी धूमधामसे मनाया गया। दस हजार लोग
आषाढमें गंगाजी पूर्वकी तरह चढीं, पर बाँधके कारण इस क्षेत्रके ७०० गाँवोंमें से एक को भी क्षति न पहुँचा सकीं। आश्विनमें दशहरेसे शरत्पूर्णिमा तक बाँधका उत्सव मनाया गया। अखण्ड कीर्तन, रासलीला, कथा और प्रवचन आदिकी सुन्दर व्यवस्था की गयी।
बाँधपर इस उत्सवकी परम्परा पड़ गयी और यह इसी समय प्रतिवर्ष मनाया जाने लगा। अब प्रतिवर्षकी गंगाकी बाढ तो समाप्त हई भक्तिकी बाढ़ आ गयी। शायद इस सारी योजनामें बाबाका उद्देश्य ही था गंगाकी बाढसे इस क्षेत्रके लोगोंको मुक्त करना उतना नहीं, जितना भक्ति-गंगाकी बाढमें उन्हें डुबो देना।
इस घटनासे हरिनामके प्रति तो इस क्षेत्रके लोगोंमें श्रद्धा बढ़ी ही, हरि बाबाके प्रति भी उनकी श्रद्धा इतनी बढी कि वे उन्हें साक्षात् भगवान् ही मानने लगे। जिन लोगोंने इस कार्यके लिए पहले उनकी आलोचना की थी, वे भी उनकी अपार शक्ति और सूझ-बूझकी सराहना करने लगे और सदाके लिए उसके भक्त बन गये।
श्रीहरि बाबाका जन्म हुआ सन् १८८४ में फाल्गुन शुक्लपक्ष चतुर्दशीके दिन, पंजाबके जिला होशियारपुरके मेंगरवाल ग्राममें, एक सिक्ख परिवारमें। उनके पिता श्रीप्रतापसिंह मेंगरवालमें पटवारी थे। उनके पाँच पुत्र थे, जिनमें श्रीहरि बाबा सबसे छोटे थे। उनका नाम था दीवानसिंह। दीवानसिंह बड़ी कुशाग्र बुद्धिके थे। होशियारपुरमें हाई स्कूलकी परीक्षा पासकर वे लाहौर पढ़ने गये। इण्टरमीडिएट पासकर लाहौर मेडिकल कॉलेजमें भरती हुए।
बाल्यावस्थामें ही आनन्दपुरके ब्रह्मविद् सन्त श्रीसच्चिदानन्द गिरि महाराजने उनमें महापुरुषका भाव देख गुरु रूपमें उनपर कृपा की थी। लाहौर मेडिकल कॉलेजमें पढ़ते समय वे बीच-बीचमें उनके पास जाकर उनकी सेवा किया करते थे।
उनके संगसे उनका वैराग्य बढ़ता या। जब एम.बी.बी.एस. की परीक्षाका एक ही वर्ष रह गया, वे कॉलेज छोड़कर संन्यास लेनेके उद्देश्यसे गुरुजीके पास
बले गये। गुरुजीसे संन्यासके लिए प्रार्थना की, तो उन्होंने कहा- 'अभी नहीं। संन्यास कहते हैं संसारसे पूर्ण उपरामताकी। केवल कपड़े रङ्ग लेनेसे संन्यास नहीं हो जाता। जब संसारसे पूर्ण उपरामता हो जायेगी तो सन्यास अपने-आप हो जायेगा।'
दीवानसिंहजी कुछ दिन आश्रममें रहकर गुरुदेवकी सेवा करते रहे। वैराग्याग्नि भीतर-भीतर सुलगती रही। धीरे-धीरे वह इतनी प्रचण्ड हो गयी कि वे बिना किसीसे कुछ कहे काशी चले गये। काशीमें अपना सारा सामान दीन-दुखियोंको बाँटकर स्वयं विद्वत् संन्यास ले लिया। संन्यास लेकर वे गंगा तटपर शूलटंकेश्वर नाम के निर्जन स्थानमें ब्रह्मचिन्तन करने लगे। कुछ दिन बाद प्रयाग चले गये। वहाँ द्रौपदीघाटपर एक गुफामें रहकर तपस्या करने लगे। उस समय वे सप्ताहमें एक दिन मधुकरीको जाते। जो रोटियाँ मिलतीं उन्हें कपड़ेंमें लपेटकर मिट्टीमें गाड़ देते। नित्य एक-दो रोटी निकालकर पानीमें भिगो देते। वही उनके सारे दिनका आहार होता।
तीन वर्ष इस प्रकार गङ्गातटपर व्यतीत कर वे वहाँसे चल पड़े। पैदल घूमते-फिरते होशियारपुर पहुँचे। बड़े संकोचसे रात्रिमें गुरुदेवके पास गये। वे उन्हें संन्यास वेषमें देख प्रसन्न हुए और बोले- 'तुम स्वयं ही साधु हुए हो, इसलिए तुम्हारा नाम रखा 'स्वतः प्रकाश' ।'
कुछ दिन फिर गुरुदेवकी सेवामें संलग्न रहकर वे बुलन्दशहर जिलेमें, अनूपशहरसे ४ मील दक्षिण भृगुक्षेत्रमें गङ्गातटपर जाकर रहने लगे। वहाँ उनकी श्रीउड़िया बाबा और श्रीअच्युत मुनिसे भेंट हुई। अच्युत मुनिसे वे वेदान्त ग्रन्थोंका अध्ययन करने लगे। अच्युत मुनि जब वर्धा जाने लगे तो उन्हें अपने साथ ले गये। वहाँ भी उनका वेदान्त अध्ययन चलता रहा।
वर्धामें हनुमानगढ़ी नामक एक स्थान है, जहाँ समर्थ गुरु रामदासकी परम्परानुसार 'श्रीराम जय राम जय जय राम'का अखण्ड कीर्तन होता था। श्रीपराञ्जपे उसके अधिकारी थे। उस स्थानपर उन्हें पहली बार प्रेमरस-भरा हरि-कीर्तन सुननेका अवसर मिला। उसने उनकी हृदय-तन्त्रीको जैसा स्पर्श किया, वैसा किसी वस्तुने पहले नहीं किया था। उसमें एक नये भावका उन्मेष हुआ। उनकी जीवन-धारामें एक नयी तरंग उठी, जो एक नयी दिशा खोजने लगी।
उस समय उनमें जिन सात्विक भावोंका उदय हुआ, उनसे पराञ्जपे महोदयका ध्यान उनकी ओर आकर्षित हुआ। उन्होंने उन्हें उपयुक्त पात्र जान
महात्मा शिशिरकुमार घोषकी 'लॉर्ड गौरांग' (Lord Gauranga) पुस्तक पढ़नेको दी। पुस्तकको पढ़कर उन्हें वह नयी दिशा मिल गयी। उनकी जीवनधारा अबाध गतिसे गौरांग महाप्रभु द्वारा प्रदर्शित भक्ति-पथ पर वह चली।
अभी तक उन्होंने वेदान्तियोंका ही संग किया था, वेदान्त-ग्रन्थोंका ही अध्ययन किया था। उनके जन्मजात भक्तिके संस्कारोंको जगानेवाला न तो कोई संग उन्हें मिला था, न वैसा कोई साहित्य। वे ज्ञानके लक्ष्यको ही अन्तिम लक्ष्य मानकर उसके अनुसार ध्यान-धारणामें लगे हुए थे। 'लॉर्ड गौरांग' पढ़कर उनकी समझमें आया कि ज्ञानियोंका लक्ष्य ज्ञानीको संसारके सुख-दुःखसे परे एक तुरीय अवस्थाका अनुभव कराता है अवश्य, पर वह अपने पृथक अस्तित्वको भूलकर ब्रह्मानन्दके निस्तरङ्गः समुद्रमें खो जाता है और उस तुरीयातीत रसानुभूतिसे वंचित रह जाता है, जिसका अनुभव करने और करानेके लिए परब्रह्म 'एकोहं बहुस्यामि'के अनुसार एकसे अनेक होता है। वह 'अहं ब्रह्मास्मि'का चिन्तन करते-करते ब्रह्ममें लीन होकर अपनेको ब्रह्म मानने लगता है।
इस प्रकार द्वैतसे अद्वैतमें प्रवेश कर वह प्रभुकी उस प्रक्रियाको उलट देता है, जिसमें वे एकसे अनेक होकर उत्कृष्टम प्रेम-लीला रसका स्वयं आस्वादन करते हैं और दूसरोंको कराते हैं।
भजन-साधना और नाम-स्मरण के प्रसंग
आप्तकाम और आत्माराम होते हुए भी प्रभु स्वयं उस रसके लिए लालायित रहते हैं, यह अपने-आप में इस बातका प्रमाण है कि यह रस ब्रह्मानन्दकी अपेक्षा कितना उत्कृष्ट और लोभनीय है।
स्वतः प्रकाश नामके सत्यकी खोजमें लगे इन ज्ञानी महात्मापर 'लॉर्ड गौरांग' पढ़कर भक्तिका रङ्ग चढ़ना स्वाभाविक था। इसके रचयिता प्रसिद्ध देशभक्त श्रीशिशिर कुमार घोष भी पहले ज्ञान-मार्गके साधक थे। चैतन्यचरितामृत ग्रन्थका स्पर्श करते ही वे भक्तिभावमें डूब गये थे। भक्तिभावसम्पन्न किसी व्यक्तिको, जिसे प्रभुके प्रेमकी प्राप्ति हो चुकी है, ज्ञानका आश्रय लेते नहीं देखा गया। पर, ज्ञानियोंके ऐसे अनेक उदाहरण हैं, जिन्होंने ज्ञानमार्गका परित्याग कर भक्तिका सहारा लिया है। श्रीमद्भागवतके अनुसार तो निर्गुण ब्रह्मके उपासक आत्माराम मुनिगण हरिके गुणोंसे आकृष्ट हो उनका अहैतुकी भक्ति करते ही आये हैं-
आत्मारामाश्च मुनयो निर्ग्रन्था अप्युरुक्रमे ।
कुर्वन्त्यहैतुकीं भक्तिमित्थंभूतगुणो हरिः ।।
(भा० १-७-१०)
नारायण स्वामीने ज्ञानियों और योगियोंके हरिके रूप और गुणोंसे आकृष्ट हो सहज ही भक्त बन जानेका इन शब्दोंमें सुन्दर चित्रण किया है-
चाहे योग करि भृकुटीके मध्य ध्यान धरि, चाहे नाम-रूप मिथ्या जानिके निहार लै ।
निर्गुण, निर्भय, निराकार ज्योति व्याप रह्यो, ऐसी तत्त्व-ज्ञान निज मनमें तू धार लै ।।
नारायण अपनेको आप ही बखान करि, मोते वह भिन्न नहीं या विधि पुकार लै ।
जौ लौं तोहि नन्दको कुमार नहिं दृष्टि परै, तौ लौं तू भले बैठि ब्रह्मको विचार लै ।।
स्वतःप्रकाशजी नित्य हनुमानगढ़ी जाने लगे। कीर्तनमें उनकी रुचि बढ़ती गयी। वे स्वयं भी भावविभोर हो नृत्य-कीर्तन करने लगे। अच्युतमुनिजीको इसका पता चला, तो उन्होंने उन्हें फटकारते हुए कहा- 'तुम प्रातः मुझसे अद्वैत वेदान्त पढ़ते हो और सन्ध्या समय भक्त मण्डलीमें जाकर नाचते-गाते हो। द्वैत और अद्वैतकी उपासनायें एक साथ नहीं चल सकतीं। या तो वेदान्त पढ़ना छोड़ दो, या नाच-गाना बन्द कर दो।'
वे अद्वैत वेदान्तको नमस्कार कर अच्युतमुनिके स्थानसे चले आये और हुनमानगढ़ीमें ही रहकर भजन-कीर्तन करने लगे। पराञ्जपेजीका संग उन्हें प्रिय लगा। वे भी उनके जैसे भावुक भक्तका संग प्राप्तकर बहुत प्रसन्न हुए। उनके आग्रहसे उन्होंने हनुमानगढ़ीमें कथा-प्रवचनके समय 'लॉर्ड गौरांग'के आधारपर हिन्दीमें कथा कहना स्वीकार किया। भक्तके मुखसे भक्तवतार गौरांग महाप्रभुकी कथा सुन श्रोताओंको बड़ा सुख मिला।
कुछ दिन भक्तोंको गौर-कथामृत पान करा वे वहाँसे चल दिये। नर्मदाके उद्गम स्थान अमरकण्टक होते हुए गवाँ पहुँचे। गवाँ अनूपशहरसे कुछ दूर एक गाँव है। वहाँके धनी-मानी भक्त लाला कुन्दनलालजी और उनके भतीजे हीरालालजीसे उनका प्रेम-सम्बन्ध उसी समय जुड़ गया था, जब वे पहली बार भृगक्षेत्र गये थे। इस बार उन्होंने गवाँ और उसके आस-पास बरेरा, निजामपुर, शिवपुरी, भिरावटी आदि ग्रामोंमें जा-जाकर भक्तोंकी खोज की। उन्हें लेकर
जगह-जगह संकीर्तन-यज्ञका आयोजन किया। कीर्तन करना और कराना उनके जीवनका मुख्य अंग बन गया। वे सभी जाति और वर्गके लोगोंसे हरिनामका संकीर्तन करनेका आग्रह करने लगे। कभी-कभी तो वे रास्ता चलते लोगोंके पीछे पड़ जाते और उनसे कीर्तन करवा कर रहते।
एक बार ज्येष्टके महीनेमें वे बरेरासे गवाँ हरिनाम उच्चारण करते हुए जा रहे थे। रास्ते में देखा एक बूढ़े कुम्हारको, जो मिट्टीके बरतनोंका टोकरा सिरपर रखे सिंधौली जा रहा था। वह बहुत थका जान पड़ता था। सिंधौली अभी वहाँसे ३ मील दूर था। उन्होंने उससे कहा- 'भइया, तुम बहुत थके हो। थोड़ा छायामें विश्राम कर लो। तुम्हारा टोकरा मैं उतरवाए लेता हूँ।' उन्होंने उसका टोकरा उतरवा लिया। कुछ देर विश्राम कर जब वह चलनेको हुआ, तो बोले- 'अब तुम यह टोकरा मेरे सिरपर रख दो और मेरे पीछे हरिनाम उच्चारण करते चले आओ। मैं तुम्हारा काम कर दूँ, तुम मेरा कर दो,' नहीं, नहीं, बाबा यह कैसे हो सकता है ?' बूढ़ेने कहा, पर वह उनका विनयपूर्ण आग्रह न टाल सका।
वे टोकरा सिरपर रख आगे-आगे चले और बूढ़ा मन्त्रमुग्धकी तरह नाम उच्चारण करता पीछे-पीछे। सिंधौली गाँवके बाहर पहुँचकर उन्होंने टोकरा उसके सिरपर रखते हुए कहा - 'देखो मैं तुम्हारा बोझा ढोया है। मजूरीके रूपमें तुम्हें नित्य कुछ समय हरि-नाम संकीर्तन करना होगा। करोगे न ?' 'करूँगा', एक सम्मोहित व्यक्तिकी तरह उसने कहा। बाबाकी उस समयकी भावपूर्ण छविके साथ हरिनाम उसके हृदयमें सदाके लिए समा गया।
इसी प्रकार वे कभी किसी घसियारेकी घास छीलकर, कभी किसी किसानका हल चलाकर और कभी किसीके हाथसे ढेकुली छीन उसकी कुइयाँ चलाकर, उसके मन-प्राण अपने वशमें कर लेते और फिर हरिनाम करते रहनेका उससे वचन भरवा लेते।
गाँवके लोगोंके साथ वे तरह-तरहके खेल खेलते, जिनमें हरिनाम संकीर्तनकी प्रधानता होती। जैसी कबड्डी' कहनेके बजाय और घेरा बनाकर कोड़ेका खेल खेलते तो 'कोड़ा जमालशाही' आदि कहनेके बजाय हरिनामका उच्चारण करवाते। सबके साथ महाप्रभुका पार्ट लेते। महाप्रभुकी संन्यास-लीलाके अभिनयके पश्चात् महाप्रभुके भावसे अभिभूत हो वे उन्हींकी तरह रात्रिके समय बिना किसीको बताये उन्हें छोड़कर किसी अज्ञात स्थानमें चले जाते। उनका विरह उन्हें असह्य हो जाता। वे उनका और उनके साथकी हुई महाप्रभुकी लीलाओंका स्मरण कर रोते। उन्हें फिर अपने बीच पा लेनेके उद्देश्यसे कई-कई दिनका अखण्ड कीर्तन करते। तब वे
अज्ञातवाससे लौटकर फिर उनके साथ लीला, कीर्तन और खेल-कूदका कार्यक्रम आरम्भ कर देते।
इस प्रकार हरिनामका उस क्षेत्रमें खूब प्रचार हुआ और हरिनामके प्रति वहाँके लोगोंमें अटूट श्रद्धा हो गयी। वे सुखके समय हर्ष और उल्लास व्यक्त करनेके लिए और दुःखके समय संकट निवारण करनेके लिए हरिनामकीर्तन ही किया करते। ऐसा करते समय उन्हें हरिनामके चमत्कारोंका
भी कई बार अनुभव हुआ। एक बार उस क्षेत्रमें भयंकर सूखा पड़ा। अनावृष्टिके कारण त्राहि-त्राहि मच गयी। लोगोंने बाबासे कहा- 'महाराज, कुछ कीजिये, नहीं तो न जाने कितने घर बरबाद हो जायेंगे, कितने मवेशी मर जायेंगे।'
बाबाने उत्तर दिया- 'नाम भगवान् तुम्हारे साथ हैं। फिर किस बातकी चिन्ता ? ऐसा कौन-सा असम्भव कार्य है. जो उनकी कृपासे नहीं हो सकता ? उनकी शरण लो और निश्चिन्त हो जाओ।'
कुछ विचार-विमर्शक बाद निश्चय हुआ कि स्वयं बाबा और उनके चार भक्त पण्डित जयशंकर, पण्डित ललिताप्रसाद, श्रीनित्यानन्द और श्रीजौहरीलाल ७ दिन तक केवल दूध पीकर कीर्तन करते हुए गाँवोंमें फेरी करेंगे और कथाका समय होनेपर कहीं भी बैठकर कथा करेंगे। आठवें दिन सभी गाँव मिलकर अखण्ड संकीर्तन और समष्टि भोजन करेंगे। ऐसा ही किया गया। आठवें दिन रात्रि १२ बजे बादल घिर आये और उमड़-घुमड़कर मूसलाधार वृष्टि करने लगे।
लाला कुन्दनलालका पौत्र रामेश्वर १४ महीनेसे बीमार था। वे उसकी बीमारीपर लगभग बीस हजार रुपये खर्च कर चुके थे। कलकत्तेके बड़े-बड़े डॉक्टर भी उसका इलाज कर हार गये थे। अब उसके जीवनकी कोई आशा नहीं रही थी। कुन्दनलालजी बड़े भजननिष्ठ और साधुसेवी व्यक्ति थे। बाबा उनका बड़ा आदर करते थे। उन्होंने उन्हें उसके निमित्त कुछ दिन अखण्ड हरिनाम-संकीर्तन करनेका परामर्श दिया। कीर्तनकी व्यवस्था हो गयी। तीन महीने तक लगातार कीर्तन होता रहा, पर उसकी हालतमें कोई सुधार न हुआ। कीर्तन करनेवाले लोग थक गये। अरके लोग भी कीर्तनमें विश्वास खो बैठे। केवल बाबाकी आज्ञाका पालन करनेके लिए किसी प्रकार कीर्तन खिंचता रहा। यह देख बाबाने कहा- 'इस तरह कीर्तन करनेसे क्या लाभ ?
नामकी शक्ति में विश्वास न रखते हुए नाम-संकीर्तन करनेसे को नामके प्रति उलटा अपराध ही होता है। यदि सचमुच आप रामेश्वरको बचाना
चाहते हैं तो प्राणकी बाजी लगाकर श्रद्धापूर्वक नाम संकीर्तन करें। रामेश्वर ठीक होगा, इसमें तनिक भी सन्देह नहीं।'
तब नयी स्फूर्ति और नये विश्वासके साथ कीर्तन किया जाने लगा। रामेश्वरको आराम कुर्सीपर लिटाकर कीर्तनके निकट ले जाया गया। बाबा स्वयं बीच-बीचमें कीर्तनमें भाग लेकर सबका उत्साह बढ़ाते रहे। एक दिन बाबा घण्टा बजा-बजाकर कीर्तन मण्डलीके बीच चक्रकी तरह घूम रहे थे। उसी समय निजामपुरके भक्त खुबीरामको विचित्र आवेश हुआ। वह नृत्य करता-करता रामेश्वरके पास जाकर उसे फटकारने लगा- 'हमारे भगवान् तो कीर्तनमें नृत्य कर रहे हैं। तू आराम कुर्सीपर पड़ा है! बड़ा रईसका बच्चा है!'
उसने उसे घसीटकर दो चपत लगाए और कीर्तनके बीच खड़ा कर दिया। खड़े होते ही उसके पैर लड़खड़ाए। पर वह शीघ्र सम्हल गया और कठपुतलीकी तरह उर्ध्वबाहु हो नृत्य करने लगा। जिस रामेश्वरने १९ महीनेसे चारपाईके नीचे पैर नहीं रखा था, उसे उन्मत्तकी भाँति नृत्य करते देख लोगोंके आश्चर्य और आनन्दकी सीमा न रही। उसी समयसे पूर्ण स्वस्थ हो गया।
रामेश्वर पहले आर्यसमाजी विचारोंका था। मूर्ति-पूजा और नाम-संकीर्तन आदिके सम्बन्धमें बाबासे तर्क किया करता था। पर, अब वह उनका ऐसा भक्त हो गया कि उनके संगके बिना उसका जीना दूभर हो गया।
पण्डित जयशंकर और नित्यानन्दके चचेरेभाई सीतारामका देहावसान हो गया।
कुछ दिन बाद नित्यानन्दने स्वप्नमें देखा कि सीताराम गङ्गाजीकी बाढ़में तैरते-तैरते थककर डूब रहा है और उनसे कह रहा है 'मुझे बचाओ !' नित्यानन्द ज्योंही उसे बचाने गये, वह डूब गया। उसीकी जगह एक गायकी बछिया, जिसके माथेपर सफेद टीका था, जलमें तैरने लगी। उसे नित्यानन्दने उठा लिया। वह बोली- 'मैं सीताराम हूँ। ईसापुरमें अमुक अहीरके घर बछिया होकर जन्मा हूँ। तुम बाबा महाराजसे मेरा प्रणाम् कहना और मेरा उद्धार करनेको कहना।'
दूसरे दिन नित्यानन्दने वह स्वप्न बाबाको सुनाया। बाबाने कहा- 'आज कथाके पश्चात् ईसापुर चलेंगे। कथा समाप्त होनेपर सब लोग ईसापुर उस अहीरके घर गये। उसके घर ठीक वैसी ही बछिया, जिसके माथेपर सफेद टीका था, एक दिन पहले जन्मी थी। बाबाने उसे घेरकर सबके साथ कीर्तन किया और चले आये। दो दिन बाद बछिया मर गयी। नित्यानन्दको फिर स्वप्न हुआ। उन्होंने देखा कि सीताराम पशुयोनिसे छूटकर भगवद्धामको चला गया।
दिव्य अनुभूति और कृपा के प्रसंग
बाँधका निर्माण भी हरिकीर्तनका ही चमत्कार था। हरिकीर्तन और उसके बमत्कारोंने उस क्षेत्रकी जनतामें बाबाको इतना प्रिय बना दिया कि उन्हें 'श्रीहरि बाबा' और 'श्रीहरि भगवान्' कहकर पुकारने लगे। उनका स्वतः प्रकाश नाम सबको विस्मृत हो गया। यह स्वाभाविक था, क्योंकि श्रीहरि बाबामें स्वतः प्रकाशका अब रह ही क्या गया था ? स्वतः प्रकाश परमज्ञानी थे. हरि बाबा परमभक्त थे। स्वत: प्रकाश मोक्षकामी थे. श्रीहरि बाबा मोक्ष की कामनाओं भक्तिमें बाधक मानते थे। ब्रह्मनिष्ठ थे. श्रीहरि बाबा गौरांग महाप्रभुके अनन्य भक्त थे। श्रीहरि बाबाकी उपासनाके सम्बन्धमें 'हमारे श्रीमहाराजजी' ग्रन्थके लेखक ब्रह्मचारी शिवानन्द आंजनेयने लिखा है-
'आपके हृदयधन हैं श्रीकृष्णचैतन्य। उनके लीला रसका आस्वादन ही जीवनभर आपकी अतृप्त पिपासा रही है। यही आपका इष्ट है, यही निष्ठा है, यही रङ्ग है और पीने-पिलानेके लिए यही रस है।'*
गौरनिष्ठ होते हुए भी श्रीहरि बाबाने गौड़ीय साम्प्रदायसे अपना कोई औपचारिक सम्बन्ध नहीं जोड़ा। वे रामनवमी, शिवरात्रि, दुर्गापूजा आदि उत्सवोंको उसी धूम-धामसे मनाते, जिस धूमधामसे श्रीकृष्ण जन्माष्टमी और गौर-पूर्णिमाके उत्सव मनाया करते। रामायण, हनुमान चालीसा आदि ग्रन्थोंका पाठ उसी उत्साहसे कराते, जैसे श्रीमद्भागवत और चैतन्यभागवत आदि ग्रन्थोंका कराते। गौर-लीला और श्रीकृष्ण-लीलाकी भाँति रामलीला भी कराया करते, इसलिए सभी सम्प्रदायके लोग उन्हें अपना मानते।
फिर भी गौरांग महाप्रभु और संकीर्तनका प्रचार उनके जीवनका मुख्य उद्देश्य रहता। इस उद्देश्यसे वे बाँधपर तो बड़े-बड़े उत्सव करते ही, बड़े-बड़े नगरोंमें भी जाकर विराट् उत्सव किया करते, जिनमें गौरलीला और हरिनाम-संकीर्तनको प्रधानता होती। बाँधके उत्सवोंके लिए उन्होंने पीलीकोठीका निर्माण किया, जिसमें लीला-स्थल, भण्डारघर, रसोईघर, नक्कारखाने और आमन्त्रित महात्माओंके ठहरनेके लिए कमरे बनाये। जिन महात्माओंको वे उत्सवोंमें आमन्त्रित किया करते, उनमें श्रीउड़िया बाबा, श्रीआनन्दमयी माँ, श्रीस्वामी अखण्डानन्दजी, स्वामी श्रीप्रेमानन्दजी, श्रीगौरांगदास बाबाजी, श्रीजगन्नाथदास भक्तमालीजी, ग्वालियरके श्रीरामदास बाबाजी, श्रीमधुसूदन भट्टजी और श्रीयमुनावल्लभ गोस्वामी आदिके नाम विशेष रूपसे उल्लेखनीय हैं।
पर, श्रीउड़िया बाबाजी, स्वामी श्रीप्रेमानन्दजी और माँ आनन्दमयीसे उनका विशेष सम्बन्ध था।
उडिया बाबासे उनका स्नेह तभी हो गया था, जब वे प्रथम बार भगक्षेत्र गये थे और उन्हींकी तरह ज्ञानमार्गकी साधनामें संलग्न थे। भक्तिपथमें पदार्पण करनेके पश्चात भी उनका उनसे स्नेह वैसा ही बना रहा। यह एक आश्चर्यका विषय है कि साधनामे विभिन्न पथोंके पथिक होनेके कारण दोनों एक-दूसरे से इतना दूर होते हुए भी एक-दूसरेके इतना निकट थे, एक-दूसरेसे इतना प्रेम करते थे, एक-दूसरेके सुखके लिए अपना सब कुछ त्यागनेको तत्पर रहते थे। उडिया बाबाने श्रीहरि बाबाके कारण अपना जन्म भरका किसी सवारीपर न चढ़नेका नियम तोड़ दिया था। श्रीहरिबाबाने उड़िया बाबाके गम्भीर रूपसे बीमार पड़नेपर जप और कीर्तनादिकर उन्हें कई बार बचा लिया था। श्रीहरि बाबाने बाँधपर उड़िया बाबाके रहनेके लिए स्थान अलग बनाया था।
उड़िया बाबाने श्रीहरि बाबाके लिए वृन्दावनमें अपने आश्रममें स्थान अलग बनाया था। उड़िया बाबाने श्रीहरि बाबाके लिए वृन्दावनमें अपने आश्रममें स्थान अलग छोड़ रखा था। उनका आश्रम भी बाँधकी तरह श्रीहरि बाबाके प्रचारका एक केन्द्र बन गया था। उनके कथा-संकीर्तन, श्रीकृष्णलीला और गौर-लीलाके आयोजनोंसे वह जाग्रत रहता था।
स्वामी श्रीप्रेमानन्दजी और श्रीहरि बाबाका एक-दूसरेके प्रति आकर्षण दोनोंकी गौर-भक्तिके कारण था। दोनों संन्यासी होते हुए भी गौरांग महाप्रभुके चरणोंमें पूर्णरूपसे समर्पित थे। दोनोंकी महाप्रभुके प्रेम-धर्मके प्रचारमें आसक्ति थी। दोनोंका प्रथम मिलन भी उसी मञ्चपर हुआ था।
श्रीहरि बाबा बंगाली भक्तों द्वारा महाप्रभुका नाटक बीच-बीचमें कराया करते थे। नाटक रात देर तक चलता था, जिससे उन्हें अपने दैनिक नियमोंका पालन करनेमें असुविधा होती थी। जो लोग बँगला नहीं जानते थे, वे उन नाटकोंको अच्छी तरह समझ नहीं पाते थे। इसलिए उन्होंने सोचा कि महाप्रभुकी छोटी-छोटी लीलाएँ व्रजभाषामें इस ढङ्गसे लिखी जायँ, जिससे उनका भी श्रीकृष्ण लीलाओंकी शैलीमें दो-ढाई घण्टेका मंचन हो सके। इस कार्यके लिए एक ऐसे व्यक्तिकी आवश्यकता थी, जो संस्कृत, बँगला और व्रजभाषाका विद्वान् हो संस्कृत और बँगालामें लिखे गौड़ीय ग्रन्थोंका मर्मज्ञ हो, जिसकी लेखनी सशक्त और सरस हो और जो स्वयं भावुक गौर-भक्त हो। वृन्दावनमें स्वामी प्रेमानन्दजी एक ऐसे व्यक्ति थे। वे मौन धारणकर एकांतमें रहते थे।
इसलिए श्रीहरि बाबाका उनसे कोई सम्पर्क नहीं था।
पर लगता है महाप्रभु स्वयं इन दोनों महापुरुषोंके माध्यमसे अपनी लीलाका प्रचार करानेको उत्सुक थे। इसलिए प्रेमानन्द बाबाको भी गौरलीलाके सम्बन्धमें
उसी समय वैसी ही प्रेरणा हुई, जैसी श्रीहरि बाबाको हुई थी। उन्होंने स्वेच्छासे वैसी ही दो लीलाएँ तैयार कर किसीके माध्यमसे श्रीहरि बाबाको भेज दीं। वे मनचाही वस्तु अनायास प्राप्तकर बहुत प्रसन्न हुए। प्रेमानन्दजीको बुलवाकर उन्होंने उनसे महाप्रभुके सम्पूर्ण चरित्रसे सम्बन्धित वैसी लीलाओंकी रचना करनेको कहा और अपना मौन तोड़कर रासधारियोंको महाप्रभुके भावके अनुकूल उनके अभिनयकी शिक्षा देनेका अनुरोध किया। प्रेमानन्दजीने बड़ी योग्यता और लगनके साथ इस कार्यको सम्पन्न किया। फलस्वरूप गौर-लीलाका अपने वर्तमान रूपमें जन्म हुआ।
इस प्रकार इन दोनों महापुरुषोंका गठबन्धन गौर-लीलाके माध्यमसे गौराग महाप्रभुकी प्रेरणासे हुआ। गौर-लीलाके आविष्कार और प्रचारके लिए भक्त-समाज इनका चिरऋणी रहेगा। इस लीलाका भक्त-समाजने जैसा स्वागत किया वह सर्वविदित है। इसके माध्यमसे भक्तोंके चरमकल्याणका पथ जैसा प्रशस्त हुआ, वैसा श्रीकृष्ण-लीलासे नहीं हुआ था। श्रीहरि बाबा कहा करते कि श्रीकृष्ण-लीला सिद्धोंके आस्वादनकी वस्तु है, गौर-लीला साधकोंके आस्वादन की। गौर-लीलासे जैसा दर्शकोंका तादात्म्य होता है, वैसा श्रीकृष्ण-लीलासे नहीं होता। गौर-लीला हमें श्रीकृष्णके लिये रोना सिखाती है, हमारे हृदयमें श्रीकृष्णको पानेकी तड़प पैदाकर श्रीकृष्ण-लीलाके आस्वादनका अधिकार जन्माती है। गौर-लीला साधन है, श्रीकृष्ण-लीला साध्य है।
श्रीहरि बाबा और माँ आनन्दमयीका सम्बन्ध अनोखा था। आनन्दमयी श्रीहरि बाबाकी माँ थीं, श्रीहरि बाबा उनके पिता। श्रीहरि बाबा माँ आनन्दमयीको 'माँ' कहते थे, आनन्दमयी उन्हें 'पिताजी' कहती थीं। दोनों एक-दूसरेके प्रति व्यवहार भी उसी तरह करते थे, दोनों उसी प्रकार एक-दूसरेका आदर करते थे, उसी प्रकार एक-दूसरेको अपना संरक्षक, शिक्षक, और सहायक मान एक-दूसरेपर आश्रित रहते थे। दोनों एक-दूसरेके उत्सवोंमें सम्मिलित होते थे और एक-दूसरेके बिना उन्हें असफल मानते थे।
माँ अपने-आपको श्रीहरि बाबाका ऋणी मानती थीं। एक बार किसी कथा-प्रसंगमें उन्होंने अपने आश्रितजनोंसे कहा था- 'तोराकी जानिश आमीकी पेयेची श्रीहरि बाबार थेके ?- तुम लोग क्या जानों मैंने क्या पाया है श्रीहरि बाबासे ?' कुछ लोगोंका अनुमान है कि चिरकालसे योगाभ्यासमें रत माँको श्रीहरि बाबाने गौर-भक्तिकी ओर प्रेरित किया।
श्रीहरि बाबा इसी प्रकार अपने-आपको माँका ऋणी मानते थे। ठीक-ठीक किसलिए दोनों अपने-आप को एक-दूसरेका ऋणी मानते थे, यह तो वे ही जाने।
पर दोनोंमें अपार्थिव प्रेमका घनिष्ट सम्बन्ध था और दोनों एक-दूसरेके बिना अपने-आप को निराश्रय और निस्हाय मानते थे। इसलिए अन्त समय जब श्रीहरि बाबा बीमार पड़े, उन्होंने माँके पास काशी जानेका आग्रह किया। १ जनवरी, सन् १९७० को वे काशी पहुँचे। दो दिन बाद, ३ जनवरीको माँके सान्निध्यमें शरीर छोड़कर नित्य-धाम को पधारे। उनके शरीरको बाँध ले जाया गया, जहाँ उन्हें समाधि दी गयी।
श्रीहरि बाबाके चरित्रमें कई बातें विशेष रूपसे ध्यान देनेकी हैं। वे बड़े नियम-निष्ठ थे। समयको ही ईश्वर मानते थे। १ मिनट भी व्यर्थ नहीं जाने देते थे। सोते केवल ३ घण्टे थे। दिनमें बिलकुल नहीं सोते थे। प्रातः २ बजेसे रात्रि ११९८ बजे तक उनका त्रिसन्ध्या-स्नान-ध्यान दोनों समयका व्यायाम (आसन, सूर्य नमस्कार और टहलना) पाठ, कीर्तन, कथा और स्वाध्याय आदि नियमित रूपसे निश्चित समयपर चलता रहता था। उन्हें किसीसे बात करनेकी फुरसत बिलकुल नहीं रहती थी। यदि किसीको उनसे बात करनी होती, तो चलते-फिरते थे। किसीकी आलोचना, सच्ची हो तो भी नहीं सुन सकते थे। वे कहते थे- 'व्यर्थालाप दिवास्वापं त्यजेच्च परनारिवत्', अर्थात् व्यर्थालाप और दिनमें सोना परस्त्रीके समान त्याग कर देना चाहिए। 'आलस्य तो उन्हें छूकर भी नहीं गया था।
यदि कभी आलस्यका बोध करते, तो खड़े हो जाया करते या टहलने लगते। आलस्यका कारण वे अधिक भोजन बताते थे, इसलिए सदा शुद्ध, सात्विक स्वल्पाहार करते थे। वे स्वयं कहा करते थे- 'मैने सारा जीवन न तो कभी पेटभर खाया और न ही मैं कभी नींदभर सोया।'
उनकी ख्याति जैसे-जैसे बढ़ती गयी, वैसे-वैसे उनका वैराग्य और दैन्य बढ़ता गया। अपनी ओरसे उन्हें गुरु माननेवाले लोगोंकी संख्या भी बढ़ती गयी, पर उन्होंने शिष्य किसीको नहीं बनाया। यदि किसने आग्रह किया तो कहा- 'मैं शिष्य तो बन नहीं सका, गुरु कैसे बनूँ।'
पाठ, कीर्तन और लीला आदिमें उन्हें ऊँचा सिर किये बैठे कभी किसीने नहीं देखा। उनका सिर सदा झुका होता, दृष्टि पृथ्वीपर गड़ी होती और वृत्ति अन्तर्मुखी होती। श्रीकृष्ण-लीला हो, गौर-लीला, या राम-लीला, लीलाके समय वे स्वरूपोंके पीछे खड़े, नेत्र नीचे किये, उन्हें पंखा झलते होते या चमर डुलाते होते। उस समय साक्षात् भगवान्की सेवामें अपनेको मान चमर डुलाते और अर्धोन्मीलित नेत्रोंसे श्रीकृपासिन्धुदास बाबाजी
भावपूर्ण, शान्त, सौम्य मुद्रामें नीचे देखते हुए भी उनकी मनोहर छवि, जो भक्ति भाव उद्दीप्त कर दर्शकोंके मन प्राण हर लेती बिसराई नहीं जा सकती।
नाम-स्मरण और एकाग्रता — जीवन-संदेश
नाम-स्मरण, भजन और एकाग्रता के प्रसंग साधना की निरंतरता की याद दिलाते हैं। यहाँ वर्णित जीवन-अनुभवों से पाठक अपनी साधना के लिए प्रेरणा ले सकते हैं।
कथा का सार
श्रीहरि बाबाजी की कथा भक्ति, विनम्रता और साधना पर मनन करने का अवसर देती है। इस संग्रह में अन्य भक्तों के जीवन-प्रसंग भी पढ़ें।