ब्रज के भक्त भाग 3 · अध्याय 56
श्रीगोपालदास बाबाजी
श्रीगोपालदास बाबाजी की प्रेरक हिंदी कथा। जानिए उनके जीवन, भक्ति और साधना से जुड़े महत्वपूर्ण प्रसंग।

श्रीगोपालदास बाबाजी का यह भक्त-चरित्र ब्रज की साधना, श्रद्धा और जीवन से जुड़े प्रसंगों को सामने लाता है। नीचे कथा को अलग-अलग विषयों में व्यवस्थित किया गया है।
जन्म, परिवार और प्रारम्भिक जीवन
[ सूर्यकुण्ड ]
श्रीगोपालदास बाबाजीका जन्म मणीपुरके इम्फाल नगरमें सन् १८५१ के लगभग हुआ। उनके पिता श्रीमेघवर्ण शर्मा बड़े भगवत्-भक्त थे। गोपालदासजीपर पिताकी पूरी छाप थी। अल्पावस्थामें ही उनकी भी एक महान् भगवत-भक्तके लक्षण दौखने लगे थे। वे बड़े वैराग्यसे रहते और अपना अधिकांश समय भगवत्-भजनम व्यतीत करते। उनका तीव्र वैराग्य देख पिताजीने उन्हें दीक्षा दी और व्रजमें जाकर भजन करनेका उपदेश किया। वे पैदल यात्रा करते हुए व्रज पहुँचे गये।
उनके भाग्यकी जितनी प्रशंसा की जाय उतनी कम है। कितने भक्तोंको श्रद्धा-भक्ति बिना किसी प्रयासके पैतृक सम्पत्तिके रूपमें स्वतः प्राप्त होती है ? कितनों को व्रजवास पिताकी आज्ञाके फलस्वरूप बिना घरवालोंसे और अपने आपसे संघर्ष किये इतने सहज रूपमें अपने आप प्राप्त होता है ? गोपालदासजीपर प्रारम्भसे ही भगवानकी कितनी कृपा थी, यह इस बातसे स्पष्ट है।
व्रज जाकर उन्होंने श्रीनरोत्तम ठाकुर महाशयकी परम्पराके श्रीदामोदरदासजी महाराजके शिष्य श्रीविनोददासजीसे वेश लिया। विनोददासजी उस समय गोवर्धनमें चकलेश्वर महादेवके पास रहते थे उनके आदेशसे उन्होंने राधाकुण्डमें ३ वर्ष रहकर बाबा ईश्वरदासजीसे श्रीमद्भागवत तथा गोस्वामी-ग्रन्थोंका अध्ययन किया। व्रजभाषा भी उन्होंने सीखना चाहा। पर श्रीईश्वरदासजीने निषेध कर दिया। उन्होंने कहा- 'व्रजभाषा न सीखना ही तुम्हारे भजनके अनुकूल होगा। व्रजभाषा सीख
लेनेसे तुम व्रजवासियोंके अधिक निकट आ जाओगे और उनके प्रति तुम्हारे द्वारा अपराध बन जानेकी आशंका बढ़ जायगी। जनसम्पर्क भी बढ़ जायगा, जिससे भजनमें विघ्न होगा।' तब उन्होंने व्रजभाषा सीखनेका विचार छोड़ दिया।
सेवा, प्रसाद और समर्पण की घटनाएँ
शास्वाध्ययन समाप्त करनेके पश्चात् वे बहुत दिन व्रजमें भ्रमण करते रहे।
एक दिनसे अधिक एक स्थानपर नहीं रहे। प्रतिवर्ष भादोंके महीनेमें वे व्रजयात्राको जाया करते और यात्रामें सन्तोंकी सेवा किया करते। अन्तमें वे कौन्ही ग्राममें बंशीकुण्डपर रहने लगे। वे व्रजवासियोंके घरसे भिक्षा कर लाते। सन्ध्या समय एक बार भोजन करते। यदि कभी मधुकरी अधिक मिल जाती, तो जब तक वह समाप्त न हो जाती भिक्षाको न जाते। भिक्षामें मिला सड़ा-गला अन्न भी मस्तकसे लगाकर प्रेमसे ग्रहण करते। पर यदि भिक्षामें मिष्ठान्न मिल जाता तो स्वयं न खाकर दूसरोंको दे देते। वे व्रज रजके पात्रोंका व्यवहार करते, धातु कभी स्पर्श न करते।
कोन्हीमें वे लगातार ४० वर्ष रहे। उस समय सुरजकुण्डपर सिद्ध
श्रीमधुसूदनदास बाबाके शिष्य श्रीहरिगोपालदासजी रहते थे। गोपालदासजीको उनका संग बहुत प्रिय था, इसलिए वे कोन्हीं छोड़कर सूरजकुण्ड चले गये और वहाँ सूर्यकुण्डके किनारे एक प्राचीन मन्दिरके बरामदेमें रहकर भजन करने लगे।
बाबाका नियम नित्य एक अध्याय भागवत-पाठ करनेका था। जब उनकी उम्र ९० वर्षकी हो गयी, उनकी दृष्टि-शक्ति जाती रही। पाठ बन्द हो गया। इसका उन्हें बहुत दुःख हुआ। एक दिन अपराह्नमें अपनी दशाका चिन्तन करते-करते उन्हें तन्द्रा आ गयी। उस समय उन्हें एक सर्वाङ्ग-सुन्दर बालिकाके दर्शन हुए, जिसकी अलौकिक छटा दिशाओंको आलोकित करती हुई उसके दिव्यातिदिव्य स्वरूपका परिचय दे रही थी। उसने बाबाके प्रांत स्नेहसे दृष्टिपात करते हुए अपनी अमृतमयी वाणीमें पूछा- 'बाबा, चिन्तामें च्यों बैठ्यौ है ?'
दिव्य अनुभूति और कृपा के प्रसंग
बाबाने कहा- 'लाली, मेरी दृष्टि-शक्ति जाती रही है। भागवत-पाठ नहीं कर पा रहा हूँ। इसलिए मुझे जीवन भारी लग रहा है। ऐसे जीवनसे क्या लाभ, जिसमें भागवत-पाठ और ठाकुर तथा सन्त-महात्माओंके दर्शन भी न कर सकूँ ?'
बालिकाने बाबाको सांत्वना देते हुए कहा - 'चिन्ता मति करे। आज रातमें अपनी आँखन ते राधेश्याम-नामांकित अपनो उपर्ने बाँधके सोय जा। कल सबेरे आँखनमें ज्योति फिर आय जायेगी।'
यह सुनते ही बाबाकी तन्द्रा भंग हो गई। बालिकाकी वाणी उनके कानोंमें गूँजती रही और उसकी रूपछटाकी चकाचौंध उनके अन्तरमें व्यापती रही। रातको श्रीसखीचरणदास बाबाजी
वे उसके निर्देशानुसार राधेश्याम नामांकित कपडेसे नेत्र बाँधकर सो गये। दूसरे दिन सोकर उठे तो उन्हें सब कुछ पूर्ववत दीख रहा था। भगवत-पाठका उनका दैनिक कार्यक्रम फिर चल पड़ा।
बाबा अष्टयाम लीलाका चिन्तन करते थे। अष्टयाम लीलामें राधारानी मध्याह्नमें सखियों सहित सूर्य-पूजनके लिए सूर्यकुण्ड जाती हैं। ठीक उसी समय आषाढ़ कृष्णपक्ष ५, १३ जून, सन् १९७१ को बाबाने अपने सहचरी देहसे मध्याह्न लीलामें प्रवेश किया।
बाबा अपने उपदेशोंमें सन्त-सेवा, नाम-निष्ठा और व्रजरजकी निष्ठापर बल देते थे। पर व्रजरजको वे साधकके लिए सबसे अधिक श्रेयस्कर बताते थे। वे कहते थे- 'अन्त समय नाम भी छूट सकता है, पर श्रद्धापूर्वक व्रजरजमें पडे साधकको रज नहीं छोड़ती।'
नाम-स्मरण और एकाग्रता — जीवन-संदेश
नाम-स्मरण, भजन और एकाग्रता के प्रसंग साधना की निरंतरता की याद दिलाते हैं। यहाँ वर्णित जीवन-अनुभवों से पाठक अपनी साधना के लिए प्रेरणा ले सकते हैं।
कथा का सार
श्रीगोपालदास बाबाजी की कथा भक्ति, विनम्रता और साधना पर मनन करने का अवसर देती है। इस संग्रह में अन्य भक्तों के जीवन-प्रसंग भी पढ़ें।