ब्रज के भक्त भाग 3 · अध्याय 94
श्रीअनन्तदास बाबाजी
श्रीअनन्तदास बाबाजी की प्रेरक हिंदी कथा। जानिए उनके जीवन, भक्ति और साधना से जुड़े महत्वपूर्ण प्रसंग।

श्रीअनन्तदास बाबाजी का यह भक्त-चरित्र ब्रज की साधना, श्रद्धा और जीवन से जुड़े प्रसंगों को सामने लाता है। नीचे कथा को अलग-अलग विषयों में व्यवस्थित किया गया है।
भजन-साधना और नाम-स्मरण के प्रसंग
[ करहला ]
वजमें करहला नामक एक ग्राम है। वहाँ श्रीकृष्णके पौत्र वज्रनाभकी समाधि है। महात्मा घमण्डीदासको वहीं श्रीकृष्णने अपना चूड़ा प्रदान किया था। गाँवमें एक विशाल कदमखण्डी हैं। कदमखण्डीमें कण्डके तटपर सघन लताओंसे मण्डित एक कुटी है। लता-पताओं और झाडियोंसे कूटी इस प्रकार घिरी है कि उसमें सूर्यकी किरणोंका प्रवेश नहीं-जैसा होता है। पक्षियों और साँप बिच्छुओंके रहने के लिए वह उपयुक्त स्थान है। कोई मनुष्य उस कुटियामें रह सकता है. इसकी कल्पना करना भी कठिन है। पर, आजसे कुछ ही दिन पूर्व उसमें श्रीअनन्तदास बाबा रहते थे। श्रीअद्वैतदास बाबाजी महाराजसे दीक्षा और वेश लेकर वे इस कुटियामें भजन करते थे।
वे एक सीधे-साधे सरल प्रकृति वाले व्यक्ति थे। हरिनाममें प्रबल निष्ठा थी। चार-पाँच लाख नामका जप नित्य किया करते थे। उनके रोम-रोममें, श्वास-श्वासमें नाम जैसे बस रहा था। वे जितनी देर श्वास लिये बिना रह सकते थे, उतनी देर भी बिना नामके नहीं रह सकते थे। नाम ही उनका जीवन और प्राण था।
वे सन्ध्या समय एक बार मधुकरीको जाते। उसके अतिरिक्त हर समय कुटियामें नाम-जपमें तल्लीन रहते। दिन-प्रति-दिन, मास-पर-मास, वर्ष-पर-वर्ष उन्हें उसी प्रकार बिना एक क्षणका अवकाश लिये नाम करते बीत गये।
उस दिन, जब वे मधुकरीसे लौटे, तो कुटियाके द्वारपर एक काले साँपने फुफकारकर उन्हें पास आनेसे रोका। पर, बाबा तो नामकी धुनमें राधा-कृष्णकी किसी मनोरम-लीलाका स्मरण करते हुए चले आ रहे थे। उन्हें उसकी फुफकार।
परीक्षा, धैर्य और वैराग्य का प्रसंग
M
नाई पड़ती कैसे ? उन्होंने जैसे ही पैर आगे बढ़ाया, उसने काट लिया। बाबाकी -चेतना जागी। उन्होंने सब कुछ जान लिया। उन्हें किसी विषैले सपने इस जन्मका या पूर्व जन्मका बदला लेनेको नहीं काटा था। स्वयं अनन्तदेवने उनपर कृपाकर उनके अन्त समयकी पूर्व सूचना देकर उनपर कृपा की थी।
अनन्तदेवको मन-ही-मन धन्यवाद देते हुए उन्होंने मधुकरीका झोला खूँटीपर टांग दिया और पद्मासनसे बैठकर लगे उच्चस्वरसे नाम-संकीर्तन करने। ना करते-करते पता नहीं कब उनकी समाधि लग गयी। दो दिन और दो रात बीत गये, पूर्ण स्वस्थ था। उसमें न तो कोई ज्वाला थी और न ही साँपके काटेका कोई और पर उनकी समाधि नहीं टूटी। तीसरे दिन जब उन्हें बाह्यज्ञान हुआ, तब उनका शरीर दुष्परिणाम। उनका अन्त समय आया तो था, पर अनन्तदेवने कृपाकर उस टाल दिया, जिससे कुछ दिन और जीवित रहकर वे वे भजन-सुखका अनुभव कर सकें।
ऐसे नाम-निष्ठ महात्माओंके लिए जीवन और मृत्युमें कोई अन्तर नहीं होता। वे जिस स्तरपर जीते हैं. उसमें देहमें उनका सम्बन्ध नाम मात्रका ही रह जाता है। देह जैसा रहा, जैसा न रहा। किसी भी समय अनायास वे भगवत्-इच्छासे या अपनी इच्छासे उसे वैसे ही छोड़ सकते हैं, जैसे मुसाफिर सरायको या पक्षी - घोंसलेको छोड़ जाता है। प्राकृत दृष्टिसे भले ही जान पड़े कि उनकी किसी रोगके कारण कष्टसे मृत्यु हुई, पर कष्ट तो शरीरको होता है, जिसका उन्हें पता भी नहीं होता। उनकी चित्त-वृत्ति मङ्गलमय प्रभुके चरणोंमें लीन रहकर परम शान्तिका अनुभव करती होती है।
सेवा, प्रसाद और समर्पण की घटनाएँ
बाबाके अन्त समय उनका मूत्र अवरुद्ध हो गया था। ऐसेमें जो असह्य वेदना होती है, उसका उन्हें तनिक भी अनुभव नहीं हुआ। उन्होंने सारे जीवन कोई औषधि नहीं ली थी। किसी व्यक्तिकी किसी प्रकारकी सेवा भी ग्रहण नहीं की थी। अन्त, समय भी उन्होंने न तो कोई औषधि ली और न ही किसीकी सेवा। वे कई दिन मधुकरीको जा न सके। गाँवके व्रजवासी, जो उनसे बहुत स्नेह करते थे, उन्हें अस्वस्थ जान उनके पास आ गये। उनके सेवा और चिकित्साके अनुरोधको उन्होंने यह कहकर अमान्य कर दिया कि जहाँ मङ्गलमय श्रीहरिनाम विराजमान है, वहाँ किसी चिकित्सक या किसी व्यक्तिकी सेवाका सहारा लेना मङ्गलमय प्रभुके मङ्गलमय विधानमें बाधा डालना है।
व्रजवासियोंने देखा कि उन्होंने उस कठिन रोगकी अवस्थामें पूर्ण शान्त और प्रसन्न मुद्रामें नाम करते-करते शरीर छोड़ दिया।
सेवा और समर्पण — जीवन-संदेश
सेवा का मूल्य केवल बाहरी कार्य में नहीं, बल्कि उसके पीछे के निष्कपट भाव में भी होता है। इस चरित्र के प्रसंगों को पढ़ते समय सेवा के इसी भाव पर विचार किया जा सकता है।
कथा का सार
श्रीअनन्तदास बाबाजी की कथा भक्ति, विनम्रता और साधना पर मनन करने का अवसर देती है। इस संग्रह में अन्य भक्तों के जीवन-प्रसंग भी पढ़ें।