ब्रज के भक्त भाग 3 · अध्याय 93
श्रीअद्वैतदास बाबाजी
श्रीअद्वैतदास बाबाजी की प्रेरक हिंदी कथा। जानिए उनके जीवन, भक्ति और साधना से जुड़े महत्वपूर्ण प्रसंग।

श्रीअद्वैतदास बाबाजी का यह भक्त-चरित्र ब्रज की साधना, श्रद्धा और जीवन से जुड़े प्रसंगों को सामने लाता है। नीचे कथा को अलग-अलग विषयों में व्यवस्थित किया गया है।
जन्म, परिवार और प्रारम्भिक जीवन
[ गोवर्धन ]
श्रीअपूर्वचरण उस दिन न जाने किस चिन्तामें बैठे थे। उन्हें देख उनके बन्धु श्रीमृत्युञ्जयदासने कहा- 'आज किस चिन्तामें बैठे हो बन्धु ? चिन्ताके विषयकी विता न कर चिन्ताहरणकी चिन्ता करो न। असत्यकी चिन्ता न कर सत्यकी चिन्ता करो न ! चिन्ता अपने-आप भाग जायेगी।'
'इस जगत्में सत्य वस्तु कुछ है क्या?' अपूर्वचरणने प्रश्न किया।
'है नहीं क्या ? शास्त्राध्ययनसे सत्य-असत्यका पता चलता है' पर शास्त्र अनन्त हैं। उनके अध्ययनमें समय लगता है। मैं तुम्हें दो पैसेकी एक छोटी-सी मृतक दूँगा, जिसमें सब शास्त्रोंका सार है। उसे पढ़कर सहज ही जान लोगे कि सत्य क्या है और असत्य क्या है।' मृत्युञ्जयने इतना कह गाँवके एक प्राचीन वैष्णवके घरसे श्रीप्रेमानन्द-कृत 'मनःशिक्षा'की एक प्रति लाकर अपूर्वचरणको दे दी।
अपूर्वचरणने मनःशिक्षाका अध्ययन किया। उनके हृदय-पटलपर उसकी पंक्तियाँ सदाके लिए अंकित हो गयीं-
ए मन ! तुमि से अबोध बड़।
देखिया शुनिया बूझिते नारिया, करिते ना पार दृढ़ ।।
के सार असार, ना कर विचारः के तुमि कर कि काज ।
परेर कारणे, शरीर खोयालि, आपन काजे ते बाज ।।
ए धन ए जन, आपना भाविछ, से तोर बुद्धिर भूल।
एखन तखन, कखन कि हय, बूझ ना आपन मूल ।।
देख न जीवन केवल पवन, जाइते कि तार बाधा ।
किसेर कारणे, एतेक आरति, खाटिया मरिछ गाथा ।।
'मन ! तू कैसा मूर्ख है? देख-सुनकर भी कुछ नहीं समझ रहा है। सार-असार और अपने स्वरूपका बिना विचार किये यह तू क्या कर रहा है ? दूसरोंके लिए जीवन व्यर्थ गवाँ रहा है। अपने लिए कुछ नहीं कर रहा है। अपने धन-जनको जो तू अपना समझ रहा है, यह तेरी भूल है। कब यह तुझसे छूट जायें, कौन कह सकता है ? जो सचमुच तेरा अपना है, सदाके लिए अपना है, जिससे तेरी उत्पत्ति और स्थिति है, उसे तू नहीं जान रहा है। देख, तेरा जीवन पवनके समान अस्थिर है। इसे जाते क्या देर लगेगी ? इसकी क्या कोई रोक-थाम कर सकेगा ? यह पवनकी तरह आया है, पवनकी तरह विलीन हो जायेगा। फिर तू किसके लिए गधेकी तरह पिस-पिसकर मर रहा है ?
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मनःशिक्षाकी उपर्युक्त पंक्तियोंसे उन्हें असत् वस्तुका ज्ञान हुआ और निम्नांकित पंक्तिसे सत् वस्तुके श्रेष्ठतम स्वरूपका-
ए मन ! गौरांग बिने नाहिं आर ।
हेन अवतार, हबे कि हयेछे, ऐन प्रेम परचार ।।
दुरमति अति, पतित पाषण्डी, प्राणे ना मारिल कारे ।
हरिनाम दिये, हृदय शोधिल, जाचि गिया घरे घरे ।।
भव-विरञ्चिर, वाञ्छित जे प्रेम, जगते फेलिल ढालि ।
काङ्गाले पाइये, खाइल नाचिये, बजाइया करतालि ।।
हासिये काँदिये, प्रेमे गड़ा गढ़ि, पुलके व्यापिल अङ्ग ।
चण्डाले ब्राहाणे, करे कोला कुलि, कवे बा छिलो ए रङ्ग ।।
'श्रीगौरांग महाप्रभु ही परत्तत्त्वत्की चरम सीमा है। ऐसा अवतार न कभी हुआ, व होगा। उनका जैसा प्रेमका प्रचार क्या कभी किसी अवतारने किया है ? दूसरे अवतारोंने तो दुष्टों, पतितों और पाषण्डियोंका वध कर धर्मकी रक्षा की। पर, गौरांग महाप्रभूने वध किसीका नहीं किया। अपितु दुष्ट और दुराचारी लोगोंक घर-घर जाकर हरिनाम सुनाकर उनका शोधन किया और उन्हें प्रेमदान किया। जिस प्रेमामृतके लिए ब्रह्मा भी लालायित रहते हैं, उसे उन्होंने भूतलपर ऐसे बहाया, जैसे अनायास उसकी बाढ़ आ गयी हो। उन सभी व्यक्तियोंने जो सदासे प्रेम-धनके कंगाल थे. जिन्होंने प्रेमामुतका आस्वादन छोड स्पर्श भी कभी नहीं किया था, नाच नाचकर, ताली बजा-बजाकर उसका जी भरकर पान किया।
उसका पानकर वे ऐसे प्रेमोन्मत्त हुए कि कभी हँसते, कभी रोते, कभी अश्रु-पुलकादि सात्विक भावोंसे अभिभूत हो भूमिपर लोट-पोट होते और कभी वे ब्राह्मण हों या चण्डाल, एक-दूसरेको प्रेमसे आलिंगन कर आनन्द विभोर होते। ऐसा रंग, ऐसा आनन्द क्या और कभी हुआ है ? ऐसा प्रेमका उन्मुक्त पवन क्या अन्य किसी अवतारने कभी बहाया है ?'
शुष्क काष्ठमें छिपी अग्निको प्रज्वलित करनेके लिए एक-दो चिनगारियाँ ही यथेष्ट होती हैं। वैसे ही मनःशिक्षाकी कुछ चिनगारियोंके संस्पर्शसे अपूर्वचरणकी वैराग्याग्नि धक् धक्कर जल उठी। घरके लोगोंसे छिपकर उन्होंने शोड़ा ग्रामके श्रीमन्नित्यानन्द वंशके श्रीअच्युतानन्द प्रभुसे श्रीकृष्ण-मन्त्रमें दीक्षा ली। दीक्षा लेकर वे अपना अधिकांश समय हरिभजनमें व्यतीत करते हुए संसार त्यागकर श्रीगौरांग महाप्रभुकी शरण लेनेके उद्देश्यसे उपयुक्त अवसरकी प्रतीक्षा करने लगे।
अपूर्वचरणका जन्म गौड़मण्डलके मेदिनीपुर जिलेके अन्तर्गत वयदाई ग्राममें भक्तश्रेष्ठ श्रीनीलकण्ठको पत्नी श्रीमती व्रजरानीदेवीके गर्भसे सन् १८७० में फाल्गुनी पूर्णिमाके दिन सायंकाल चन्द्रग्रहणके समय हुआ था। डेढ़ वर्ष पश्चात् उनके पिताका देहान्त हो गया। उनका लालन-पालन और विद्याध्ययन बड़े भाईकी देख-रेखमें चलता रहा, पर उनके बड़े भाईको अल्पावस्थामें उनका भजन-साधनमें संलग्न रहना अच्छा न लगता। वे उनपर कठोर शासन करते और मृत्युञ्जयदासको इसके लिए दोषी मानकर उनसे दूर रहनेको कहते। अपूर्वचरण पर इसका कोई
असर न हुआ। उनका भजनमें आवेश दिन-पर-दिन बढ़ता गया। यह देख बड़े भाईने १९ वर्षकी अवस्थामें उनका विवाह कर देनेका निश्चय किया।
एक दिन वे अपूर्वचरणसे बोले- 'देखो, कल अक्षयतृतीया है। मुझे तुम्हारा विवाह-सम्बन्ध तय करने बाहर जाना है। तुम अक्षयतृतीयाके उपलक्ष्यमै कुछ ब्राह्मणोंको भोजन करा देना।'
अपूर्वचरणको ब्राह्मण भोजनके लिए कुछ रुपये देकर वे चले गये। बहुत दिनोंसे अपूर्वचरण जिस अवसरकी प्रतीक्षा कर रहे थे वह आ गया। दूसरे दिन ब्राह्मणोंको भोजन कराकर वे मृत्युञ्जयदासके साथ घरसे निकल पड़े। श्रीधाम नवदीप होते हुए मयनाडाल पहुंचे। वहाँ मित्र ठाकुर महाशयके आश्रममें रहकर उनसे सकीर्तनकी शिक्षा लेने लगे। 'निरमल गोरा तनु'के पदगानसे संकीर्तन-शिक्षा आरम्भ की। उस पदका गान करते-करते संकीर्तनपिता गौरांग महाप्रभुके भावमें इतना आविष्ट हो गये कि सोते-जागते, खाते-पीते हर समय बिना किसी प्रकारकी चेष्टा किये उनका चिन्तन आने-आप होता रहता उसी समय एक दिन रात्रिमें श्रीमन्महाप्रभुने स्वप्नमें उन्हें दर्शन दिये।
महाप्रभुके दर्शन करते-करते उन्होंने देखा कि वे एक बाबाजीका रूप धारणकर उनके प्रति स्नेहपूर्वक देख रहे हैं।
दूसरे दिन जब वे मित्रठाकुरके आश्रमके मन्दिर में श्रीमन्महाप्रभुके दर्शन करने, गये, तो महाप्रभुके दर्शनके पश्चात् तत्काल एक बाबाजीके दर्शन किये, जिनका ठीक वैसा ही स्वरूपं था, जैसा स्वप्नके उन बाबाजीका, जिनका रूप महाप्रभुके धारण किया था। वे उन बाबाजीकी तरह ही स्नेहपूर्वक उन्हें देख रहे थे। उन्हें देखते ही वे अपनी सुध-बुध खो बैठे। उनके चरणोंसे लिपटकर 'हा, गुरुदेव ! कृपा करो गुरुदेव' कहते हुए रोदन करने लगे। बाबाने उन्हें हृदयसे लगाया और मृदु वाक्योंसे आश्वस्त कर शान्त किया। दूसरे दिन उन्हें महाप्रभुके मन्दिरमें ही संकीर्तनके बीच वेश देकर नाम रखा श्रीअद्वैतदास।
भजन-साधना और नाम-स्मरण के प्रसंग
यह थे वृन्दावनके श्रीविष्णुदास बाबाजी महाराज, जो गोवर्धन तटवर्ती गोविन्दकुण्डमें श्रीमाधवेन्द्रपुरी द्वारा प्रकटित श्रीनाथजीकी सेवा करते थे और इस समय वृन्दावनमें मयनाडाल होते हुए जगन्नाथजीके दर्शन करने श्रीधामपुरी जा रहे थे। कौन जाने कि वे श्रीमन्महाप्रभुकी प्रेरणासे अपूर्वचरणको वेश देनेके लिए ही मयनाडाल आये थे।
वश ग्रहणकर श्रीअद्वैतदास बाबाजीने मृत्युञ्जयदासके साथ वृन्दावन गमन ॥। वहाँ वे श्रीविष्णुदास बाबाजीके भजन-स्थान नारङ्गाबादमें रहकर भजन करने
लगे। विष्णुदास बाबाजीने जगन्नाथपुरीसे लौटनेपर मृत्युञ्जयदासको भी वेश देकर नाम रखा श्रीमाधवदास ।
अद्वैतदासके घरसे चले आनेके पश्चात् उनकी माता बहुत दुःखी हुई। उनके भाईको जब पता चला कि वे वृन्दावन चले गये हैं. उन्होंने पत्र लिखकर उनसे एक बार माताके दर्शन कर जानेका आग्रह किया। श्रीगुरुदेवके वे अपने जन्म-स्थान गये। उन्हें देखकर मॉने कहा- 'बेटा, तुम जहाँ रहना। पर बीच-बीचमें में अपना संवाद भेजते रहना। और मेरे अन्त समयमें मेरे निकट रहना।'
जब वे लौटकर वृन्दावन आये, गुरुदेवने उन्हें श्रीनाथजीकी सेवामें नियुक्त भक्तिशास्त्रोंका अध्ययन करनेकी आज्ञा की। श्रीमनोहरदास बाबाजी महाराजकी कर दिया। साथ ही सिद्ध श्रीमनोहरदास पण्डित बाबाजीसे श्रीमद्भागवतादि कृपासे उन्होंने थोड ही समयमें भक्तिशास्त्रोंमें निपुणता प्राप्त कर ली। तदन्तर वे बीजगदानन्ददास बाबाजीके साथ रहकर गोवर्धनमें सिद्ध श्रीकृष्णदास बाबा (द्वितीय) के आनुगत्यमें अष्टाकालीय लीला-स्मरण करने लगे।
कुछ ही दिनोंमें उन्होंने एक महान पण्डित और भक्तिशास्त्रोंके विशिष्ट ज्ञाताके रूपके ख्याति लाभ की। भक्त-जन श्रीमद्भागवत्-पाठादिके लिए उनसे आग्रह करते और वे लीला-स्मरणसे समय निकालकर उनकी सेवा करते।
श्रीअद्वैतदास बाबा बड़े वैराग्यसे रहते। उन्होंने अपने हाथसे मिट्टी सानकर श्रीनाथजीके मन्दिरके पीछे एक कच्ची कुटियाका निर्माण किया। उसके ऊपर किरचे (लकड़ीके तख्तों) की छत डालकर उसे मिट्टी और गोबरसे लीप ली दिया। उस कुटियामें रहकर वे भजन करते। मधुकरी द्वारा जीवन-निर्वाह करते। पैसा कभी स्पर्श न करते। एक दिन वे कुटियामें बैठे दरवाजा बन्दकर उच्च स्वरसे कीर्तन कर रहे थे। कोई भक्त उनके दर्शन करने आया और दरवाजेपर एक रुपया रखकर चला गया। दरवाजा खोलते वे रुपया देखकर चौंक पड़े और दो हाथ पीछे खिसक गये। उसी समय एक नाई जाता दीखा। उसने उन्होंने रुपया लेकर स्थान गोबरसे लीप देनेको कहा। जब तक रुपया वहाँसे उठ नहीं गया और स्थान धो-लीपकर पवित्र नहीं कर दिया गया, उन्हें चैन नहीं आया।
पर उनका वैराग्य शुष्क नहीं था। वे कहा करते कि शुष्क वैराग्यसे अहंकार बढ़ता है, हृदय कठोर हो जाता है और भाव-भक्तिके उदय होनेमें बाधा पड़ती है। इस सम्बन्धमें वे अपने शिक्षा-गुरु श्रीमनोहरदास बाबाके एक विचित्र अनुभवकी बात अक्सर कहा करते।
श्रीमनोहरदास बाबा केवल सात घरोंसे मधुकरी माँगते और उसे भी दूसरे साधुओंमें बाँटकर खाते। कुछ दिन बाद वे केवल आटेकी मधुकरी करने लगे और आटा पानीमें घोलकर पीने लगे। एक दिन वे गोविन्दकुण्डके किनारे बैठे भजन करते-करते यह सोचकर दुःखी हो रहे थे कि इतना सब करनेपर भी वे श्रीकृष्णकी कृपासे वंचित रहे और यह सोच-सोचकर अपने जीवनको बार-बार धिक्कार रहे थे। उसी समय उन्हें एक विशेष स्फूर्ति हुई। उन्होंने देखा कि गिरिराजकी गुफासे लगते हुए पेट और जीर्ण-शीर्ण बहिर्वासकी देख लगता था जैसे स्वयं वैराग्य मूर्ति एक महात्मा निकले। उनके शरीर की दूसरे चमकती हुई एक-एक हड्डी, पीठसे धारण कर चला आ रहा हो। उन्होंने गोविंदकुण्डमें स्नान किया। करुएम जल भरकर बाहर निकले।
तटवर्ती तलसीमंचके निकट जाकर मंचपर विराजमान गिरिधारीजीको स्नान कराया। स्नानका जल नीचे एक गड्ढेमें जा गिरा। उसमें से उन्होंने दो चुल्लू जल निकालकर पिया। फिर रो-रोकर कहने लगे - 'हाय! अभी तक मुझे भगवत्-प्राप्ति नहीं हुई। फिर भी मैं जल पीता हूँ और जिन्दा हूँ! मुझे धिक्कार है।' इस प्रकार रोते और अपने-आप को धिक्कारते हुए वे गुफाको लौट गये। मनोहरदास बाबाको तीन-तीन दिन बाद तीन बार उसी प्रकार उन महात्माके दर्शन हुए। तब उन्होंने समझा कि महात्मा तीन दिन केवल दो चुल्लू जल पीकर रह रहे हैं, फिर भी उन्होंने भगवत्-प्राप्ति नहीं हो रही है। यह देख उनका अपने त्याग और वैराग्यका अभिमान जाता रहा।
उन्होंने यह भी जान लिया कि प्रभुने इसके द्वारा उन्होंने यह समझानेकी चेष्टा की है कि केवल शुष्क वैराग्यसे उनकी प्राप्ति नहीं होती।
श्रीअद्वैतदास बाबाजीका हृदय बड़ा सरस था। कीर्तनमें अकसर उन्हें असाधारण भावावेश हो जाता। एक बार वृन्दावनमें शृङ्गारवटके श्रीब्रह्मानन्द ठाकुरके पोष्यपुत्र और श्रीचैतन्यमंगलके प्रसिद्ध गायक श्रीचाँपाठाकुर महाशयने लगातार दो महीने चैतन्यमंगलका कीर्तन किया। श्रीअद्वैतदास बाबाने प्रारम्भसे ही श्रीमन्महाप्रभुके उस लीला-कीर्तनका श्रवण किया। बीचमें एक दिन महाप्रभुके पिता श्रीजगन्नाथ मिश्रके परलोकगमनका प्रसंग आया। शची माँकी विरह-कातरावस्थाका हृदयविदारक वर्णन किया गया। उसी अवस्थामें उस दिनका कीर्तन समाप्त हो गया। उस समय बाबा विरहभावमें इतना व्याकुल हो गये कि उनके मुखसे रक्त गिरने लगा। यह देख चाँपाठाकुरने तुरन्त लीला-कीर्तन फिर आरम्भ किया और शची मंकि विरहापनोदनके पश्चात् बन्द किया।
तब बाबा प्रकृतिस्थ हुए।
एक दिन बाबा गोविन्दकुण्डके दक्षिण तटपर अपनी कुटियाकी छतपर बैठे नेत्र द किये भजन कर रहे थे। भजनावेशमें उन्होंने देखा कि कृष्ण-बलराम खाओके साथ गोचारणस वापस लौट रहे हैं। उनकी अन्तर्दष्टि उनकी रूपमाधुरीमें उलझकर रह गयी। वे तबतक एकटक उन्हें निहारते रहे. जब तक वे आँखोंसे ओझल नहीं हो गये। जैसे ही वे आँखोंसे ओझल हुए, उन्होंने देखा कि विन्दकुण्डके उस पार वृक्षरूपमें एक भक्त, जो उन्होंकी तरह उनकी ओर एकटक निहार रहे थे, मूच्छित हो भूमिपर गिर पड़े। उसी समय उन्होंने आँखें खोली। कुण्डके उसपार जाकर देखा कि सचमुच एक वृक्ष, जो अभीतक हरा-भरा खड़ा था, अब भूमिपर गिरा पड़ा है।
कौन जाने बाबाको चिन्तनमें इस प्रकारकी और कितनी लीलाओंका अनुभव हुआ। कभी-कभी वे अपने किसी अन्तरंग भक्तसे किसी प्रसंगमें उनका वर्णन कर दिया करते। उनके शिक्षा-शिष्य श्रीप्रियाचरणदास बाबा उनके विशेष कृपापात्र थे।
जीवन के अंतिम प्रसंग और स्मृतियाँ
श्रीकृष्ण-बलरामके दर्शनकी उपर्युक्त घटनाका वर्णन उन्होंने उनसे किया था।
कुछ दिन पश्चात् श्रीअद्वैतदास बाबा राधाकुण्डमें जाकर रहने लगे और श्रीमद्भागवतादि भक्तिशास्त्रोंकी आलोचना कर राधाकुण्डके वैष्णवोंको आनन्दित करने लगे।
इसी बीच उन्हें गोवर्धनसे अपने गुरुदेव श्रीविष्णुदास बाबाजीकी अस्वस्थताका सम्बाद प्राप्त हुआ। वे गोवर्धनके लिए चल पड़े। उनके शिष्य श्रीहरिदास गोवर्धनमें गुरुदेवकी सेवामें नियुक्त थे। जब वे मार्गमें ही थे, हरिदासने उनसे कहला भेजा कि गुरुदेव नित्यलीलाओं प्रवेश कर गये। यह सुनते ही वे 'हा गौरांग!' कह मूच्छित होकर गिर पड़े। कुछ चैतन्य लाभकर उन्होंने हरिदास द्वारा भेजे गये व्यक्तिसे कहा-'मेरी अब जानेकी सामर्थ्य नहीं है। हरिदाससे कहना, वह बाबाजी महाराजकी अंत्येष्टिका यथोचित रूपसे समाधान कर दे।'
हरिदास बाबाजी महाराजका अन्तिम संस्कारकर रात्रिमें गोविन्द-कुण्डमें शयन कर रहे थे। शेष रात्रिमें श्रीविष्णुदास बाबाजीने स्वप्नमें हरिदाससे कहा- 'अद्वैतदास मेरे विरहमें बहुत कातर हो रहा है। उससे जाकर कहो, कोई दुःख न करे। मैं जिस तुलसीके नीचे बैठकर भजन किया करता था, वहाँ जाकर वह पहलेकी तरह मुझे देख सकेगा और मुझसे बात कर सकेगा।' हरिदासने उसी दिन प्रातःकाल राधाकुण्ड जाकर अद्वैतदास बाबाको स्वप्नका सब वृत्तान्त कह सुनाया। बाबाने आकुल भावसे कहा- 'मुझे शीघ्र वहाँ ले चलो। यदि सचमुच उनके दर्शन हुए, तो
उनके भता
पारो गोविन्दण्डमें डूबकर मर जाऊँगा।' गोविन्दकुण्ड कर आश्वस्त होनेपर धैर्यधारणकर पूर्ववत् श्रीमद्भागवत्-पाठादि द्वारा लागोंको क उनने तुलसी के नीचे गुरुदेवके साक्षात् दर्शन किये। उनके द्वारा भली करने लगे।
इस समय पूर्वोक्त बौचौपाठाकर महाशयने आकर उनसे वेश ग्रहण किया। वाम हुआ श्रीकृष्णचैतन्यदास और भी बहत-से शिष्य हुए, जिनमें मुख्य थे-श्रीवैष्णवदास शास्त्री, श्रीभागवतदास, श्रीकृञ्जबिहारीदास, श्रीदीनशरणदास, श्रीप्रेमानन्द शास्त्री, डॉ० अमरनाथ सेन, श्रीरासगौर घोषाल इत्यादि।
सन् १९६२ में एक दिन श्रीअद्वैतदास बाबाने सभी शिष्योंको पत्र लिखकर फाल्गुन मास के कृष्णपक्षमें गोवर्धन आकर उनसे मिलनेकी आज्ञा की। दूर-दूरसे शिष्य आने लगे। सबको यथायोग्य उपदेश देकर नवमीके दिन श्रीहरिदास और श्रीनित्यानन्ददाससे बोले- 'मेरे दीक्षा गुरुदेव मुझे लेने आये हैं। एकादशीके दिन निशान्त होते जब श्रीमन्महाप्रभु श्रीवास-आँगनमें कीर्तन आरम्भ करेंगे में गुरुदेवके साथ श्रीश्रीनिताई-गौरके चरणोंमें जा उपस्थित होऊँगा।**
दशमीके दिन प्रातःकालसे ही शिष्य और वैष्णवगण बाबाके दर्शनके लिए आने लगे। सबको उन्होंने प्रीतिजनक वाक्योंसे आनन्दित किया। सन्ध्या-समय शिष्योंसे कहा- 'तुम लोग वीरत्वकर मुझे किसी औषधिका प्रयोग न कराना। केवल मधुर हरिनाम सुनाना।' मध्यरात्रिमें हरिदाससे बोले- 'नाड़ी देखकर बताओ तो मेरे शरीरकी कैसी अवस्था है?
नाड़ी देखकर हरिदासने कहा- 'आप तो स्वयं ही जानते हैं। मैं क्या बताऊँ ?'
'अच्छा तो थोड़ा स्थिर भावसे लेट जाऊँ कहकर मौन हो गये। शिष्यगण मधुर स्वरसे 'श्रीकृष्णचैतन्य प्रभु नित्यानन्द' नामका कीर्तन करने लगे। थोड़ी देर बाद उनके शिष्य श्रीप्रेमदासने पूछा- 'बाबा, क्या आप सचमुच हमें छोड़कर चले जायेंगे ?'
उन्होंने कहा- 'हाँ' और फिर मौन हो गये। दूसरे दिन निशान्तमें और एकादशीके प्रारम्भमें मधुर कीर्तनकी ध्वनिके बीच वे अपने पार्थिव शरीरको छोड़
बाबाका आशय यह था कि श्रीकृष्ण लीलाकी तरह श्रीश्रीनिताइ-गौरकी प्रत्येक लीला नित्य है। इसलिए श्रीवास-आँगनमें उनका कीर्तन भी नित्य है।
नाराजके भजनके सम्बन्धमें दो बातोंका उल्लेख कर देना साधकोंके लिए उपयोगी सिद्ध देहसे श्रीवास-आँगनमें निताई-गौरांगके कीर्तनमें जा सम्मिलित हुए । बाबाजी होगा, जो उन्होंने अपने शिष्य श्रीमत्कुन्ञ्जबिहारीदास बाबाजीसे कहीं थीं। एक तो लाभप्रद सिद्ध नहीं हुआ। इन लीलाओं के चिन्तनसे उनकी इन्द्रियाँ चंचल होने लगीं। यह कि मधुररसकी लीलाओंका स्मरण उन्हें अपने साधक-जीवनके प्रारम्भमें उन्होंने लीला-चिन्तन छोडकर केवल नाम जप, शास्त्राध्ययन, कथा और कीर्तनमें मनोनिवेश किया, जिससे उनका हृदय शुद्ध हुआ और धीरे-धीरे लीला-चिन्तनका अधिकार प्राप्त हुआ।
दूसरी बात उन्होंने श्रीकुञ्जबिहारीदास बाबाजीसे यह कही कि उन्होंने एक ऐसे सिद्ध महात्माका सग किया जो गौडीय होते हुए भी शान्तरसके उपासक थे। उनके संगके प्रभावसे उनका शान्तरसकी ओर झुकाव हो गया और मधुररस लगभग छूट गया। मधुररसमें फिरसे प्रवेश करना उनके लिए दुष्कर हो गया। चार-पाँच वर्षतक लगातार उन्होंने अथक परिश्रम किया। श्रीरूप गोस्वामीकी स्तवमाल और श्रीरघुनाथदास गोस्वामीकी स्तवावली आदि मधुररसके ग्रन्थोंका लगातार अनुशीलन किया, तब कहीं शान्तरसका आवेश छूटा और मधुररसके अनुकूल चित्तमें भूमिका बन सकी। इससे स्पष्ट है कि विजातीय भाववाले महात्माका संग, चाहे वह एक सिद्ध महात्माका ही क्यों न हो, साधकके लिए हानिकारक होता है।
श्रीअद्वैतदास बाबाजी महाराज अपने शिष्योंको प्राथमिक अवस्थामें अष्टकालीय-लीला-चिन्तन करनेको मना करते। वे नाम-जपपर ही पूरा बल देते और कहते कि नाम कल्पतरु है। नामकी कृपासे साधकके हृदयमें लीलाकी स्फूर्ति आप ही होती है। नाम-जपके सम्बन्धमें उन्होंने डॉ० अमरनाथ सेनसे कहा था- 'नाम करते समय श्रीमन्महाप्रभुका ध्यान करना चाहिये। तात्पर्य यह कि भावसे महाप्रभु नाम करते हैं उसी भावसे नाम करना चाहिये। महाप्रभुका भाव है विरहिणी राधाका। साधकको भी श्रीकृष्णके अभावमें उनके विरहके भावसे हो स्नहपूर्वक नाम करना चाहिये। महाप्रभुका ध्यान करनेसे यह भाव सुलभ हो जाता है।*
दो और बातें वे अपने शिष्योंसे कहा करते, जो साधकोंके लिए उपयोगी
वी चकवेके * श्रीजीव गोस्वामीने भी भागवत ६ २.२० श्लोककी टीकामें इसी प्रकार भाव व्यक्त करते हुए कहा है कि नाम-जप स्नेहपूर्वक करना चाहिये। वृहद्भागवतामृत श्लोक ३.१६७ में लिखा है कि आर्तभावसे करना चाहिये, जिस प्रकार बातक मेधके नि
आर्त स्वरमें रट लगाती हैं।
उनके चक्क
और कीर्तन कर रहे है. वह उनका साथ दे रहा है। इस प्रकार करते समय साधकक्य मनोभाव यह होना चाहिये कि बौनित्यानन्द कीर्तन करनेसे शीघ्र प्रेमकी प्राप्ति होती है।
२. मधुरसके साधकको जानना चाहिये कि मैं राधारानीकी दासी हूँ। मेरा संसार धरानका संसार है। संमारके सभी कार्य करते समय उसका मनोभाव होना चाहिये कि मैं राधारानीका ही कार्य कर रही हूँ।
प्रेम और भक्ति — जीवन-संदेश
ईश्वर-प्रेम की अनुभूति भक्त-साहित्य का एक महत्त्वपूर्ण विषय है। इन प्रसंगों को श्रद्धा, संवेदनशीलता और समर्पण के संदर्भ में पढ़ा जा सकता है।
कथा का सार
श्रीअद्वैतदास बाबाजी की कथा भक्ति, विनम्रता और साधना पर मनन करने का अवसर देती है। इस संग्रह में अन्य भक्तों के जीवन-प्रसंग भी पढ़ें।