ब्रज के भक्त भाग 3 · अध्याय 79
श्री ए० सी० भक्ति वेदान्त स्वामी प्रभुपाद महाराज
श्री ए० सी० भक्ति वेदान्त स्वामी प्रभुपाद महाराज की प्रेरक हिंदी कथा। जानिए उनके जीवन, भक्ति और साधना से जुड़े महत्वपूर्ण प्रसंग।

श्री ए० सी० भक्ति वेदान्त स्वामी प्रभुपाद महाराज का यह भक्त-चरित्र ब्रज की साधना, श्रद्धा और जीवन से जुड़े प्रसंगों को सामने लाता है। नीचे कथा को अलग-अलग विषयों में व्यवस्थित किया गया है।
जन्म, परिवार और प्रारम्भिक जीवन
[ वृन्दावन ]
परमहंस परिव्राजिकाचार्य श्रील ए०सी० भक्तिवेदान्त स्वामी प्रभुपाद का जन्म १ सितम्बर १८९६ को कलकत्ता में हुआ। आपका नाम अभयचरण डे था। १९२० में आपने दर्शनशास्त्र, अँग्रेजी व अर्थशास्त्र के विषयों में कलकत्ता विश्वविद्यालय से अपनी शिक्षा पूर्ण की। इसके तुरन्त बाद ही श्रील प्रभुपाद एक बहुत बडी रासायनिक संस्था के मैनेजर बन गये । १९२२ में कलकत्ता में उनकी अपने गुरु महाराज श्रील भक्ति सिद्धान्त सरस्वती गोस्वामी महाराज से प्रथम भेंट हुई जिन्होंने भारत, बर्लिन (जर्मनी) लन्दन इत्यादि शहरों में चौसठ गौडीय वैष्णव मठों की स्थापना की थी। श्रील भक्ति सिद्धान्त सरस्वती महाराज को ये सुशिषित नवयुवक प्रिय लगे और उन्होंने वैदिक ज्ञान के प्रचार के लिये अपना जीवन उत्सर्ग करने की इनको प्रेरणा दी।
श्रील प्रभुपाद उनके शिष्य बने और ग्यारह वर्ष बाद १९३३ में प्रयाग (इलाहाबाद) में विधिवत् उनसे दीक्षा-प्राप्त की ।
श्रील् प्रभुपाद ने अपने संस्मरण का उल्लेख करते हुए बताया कि कैसे वह सर्वप्रथम अपने आध्यात्मिक गुरु से मिले । मैं जब सबसे पहले अपने गुरु महाराज के पास गया तो उन्होंने मेरे विषय में कहा, "यह लड़का मेरे प्रवचन बहुत ध्यानपूर्वक सुनता है और उठकर चला नहीं जाता। मैं इसे अपना शिष्य बनाऊँगा।" यह मेरी सर्वप्रथम विशेषता थी या आप इसे कुछ भी कह लें। मैं यही जानना चाहता था कि गुरु महाराज प्रवचन कब करेंगे। मैं सुनने के लिए बैठ जाता और सुनता रहता चाहे समझ पाता या नहीं। बाकी लोगों के चले जाने पर मैं बैठा रहता । इसलिये उन्होंने कहा, "यह लड़का सुनने में रुचि रखता है।" चूँकि मैने ध्यानपूर्वक गम्भीरता से श्रवण किया है मैं कीर्तन को बहुत महत्त्व देता हूँ। जिसने भलीभाँति श्रवण किया है वही भलीभाँति बता सकता है।রেন।
सन् १९३३ में इलाहाबाद में श्रील् प्रभुपाद ने अपने गुरु महाराज से दीक्षा ली और श्रील् भक्ति सिद्धान्त सरस्वती महाराज के इस नश्वर संसार से विदा लेने के कुछ दिन पहले ही आपको विशेष रूप से पाश्चात्य जगत् में अँग्रेजी भाषा में कृष्णा भावना का प्रचार करने की आज्ञा मिली
श्रील प्रभुपाद ने बताया कि पहले तो उन्होंने अपने गुरु द्वारा दी गई आज्ञा पर महाराज के पिताजी श्रील भक्ति विनोद ठाकुर द्वारा लिखित भगवद्गीता की व्याख्या गम्भीर रूप से विचार नहीं किया। एक बार आप श्रील भक्ति सिद्धान्त सरस्वती। भवनामृत के प्रचार का बीड़ा उठाया था। श्रील भक्ति विनोद ठाकुर महाराज ने एक पढ़ रहे थे। श्रील भक्ति विनोद ठाकुर महाराज ने ही इस युग में सबसे पहले कृष्णण स्थान पर लिखा था कि जैसे इस पराधीन जीवन में कोई भी व्यक्ति अपने देह से अपनी आत्मा को पृथक नहीं कर सकता उसी प्रकार एक शिष्य अपने जीवन से अपने आध्यात्मिक गुरु का आदेश पृथक नहीं कर सकता।
श्रील ए०सी० भक्ति वेदान्त स्वामी प्रभुपाद ने इन शब्दों को बहुत महत्त्वपूर्ण जाना और तभी से आपने अपना सारा जीवन अपने गुरु महाराज के आदेश का पालन करने के लिये समर्पित कर दिया। आगामी वर्षों में श्रील प्रभुपाद ने श्रीमद्भगवद्गीता पर एक टीका लिखी, गौडीय मठ के कार्य में सहयोग दिया तथा १९४४ ई० में बिना किसी की सहायता के एक अँग्रेजी आध्यात्मिक पत्रिका (BACK TO GODHEAD) (भगवत् दर्शन) आरम्भ की। जिसका सम्पादन, पाण्डुलिपी का तैयार करना और मुद्रित सामग्री के पूर्ण शोधन का सारा कार्य वे स्वयं करते थे। उन्होंने एक-एक प्रति निःशुल्क बाँटकर भी इसके प्रकाशन को वर्तमान रखने के लिए संघर्ष किया।
एक बार आरम्भ होकर फिर यह पत्रिका कभी बन्द नहीं हुई और अब वह उनके शिष्यों द्वारा विश्व की ३० से अधिक भाषाओं में विश्व में करोड़ों की संख्या में प्रकाशित कर बाँटी जा रही हैं।
श्रील् प्रभुपाद के दार्शनिक ज्ञान एवं भक्ति की महत्ता पहचान कर "गौड़िया वैष्णव समाज" ने १९४७ ई० में उन्हें "भक्ति वेदान्त" की उपाधि से सम्मानित तथा विभूषित किया। १९५० ई० में चौवन वर्ष की अवस्था में श्रील् प्रभुपाद ने गृहस्थ जीवन से अवकाश लेकर वानप्रस्थ ले लिया। जिससे वे अपने अध्ययन एवं लेखन में संलग्न रह सकें। १९५९ में ६४ वर्ष की आयु में उन्होंने अपने संन्यास गुरु श्रील् केशव महाराजजी से संन्यास की दीक्षा प्राप्त की। और १९६५ में ७० वर्ष की आयु में अपने गुरु द्वारा बताये गये कार्य को पूरा करने के लिए आप न्यूयार्क पधारे।
श्रील प्रभुपाद ने न्यूयार्क जाने से पहले श्री वृन्दावनधाम में रहकर बडीही सात्विक परिस्थितियों में मध्यकालीन ऐतिहासिक श्रील् रूप गोस्वामी व श्रील जीव गोस्वामी महाराज की समाधि व भजनकूटी के पास श्री राधा दामोदर मन्दिर में रहे। श्री ए०सी० भक्ति वेदान्त स्वामी प्रभुपाद महाराज
वहाँ वे अनेक वर्षों तक गम्भीर अध्ययन एवं लेखन में संलग्न रहे। श्री राधा-दामोदर-मन्दिर में ही श्रील प्रभुपाद ने अपने जीवन के सबसे श्रेष्ठ और महत्त्वपूर्ण ग्रन्थ का आरम्भ किया था। यह ग्रन्थ था अठारह हजार श्लोक संख्या के 'श्रीमद भागवत् महापुराण का अनेक ४० खण्डों में अंग्रेजी में अनुवाद और व्याख्या की। जिसको आज उनके शिष्य विश्व की ३० से अधिक भाषाओं में छापकर सारे संसार में प्रचार कर रहे हैं। वृन्दावन में ही श्रील् प्रभुपाद ने अन्य लोकों की सुगम यात्रा (EASY JOURNEY TO OTHER PLANATES) नामक पुस्तिका भी लिखी थी।
श्रीमद्भागवत् महापुराणके आरम्भ के तीन खण्ड प्रकाशित करने के बाद श्रील् प्रभुपाद १९६५ ई० में अपने गुरुदेव का धर्मानुष्ठान पूरा करने के लिए संयुक्त राज्य अमेरिका गये। अन्ततः श्रील् प्रभुपाद ने भारतवर्ष के वैदिक, दार्शनिक और धार्मिक ग्रन्थों के प्रमाणिक अनुवाद, टीकाएँ एवं संक्षिप्त व्याख्या के रूप में साठ से अधिक ग्रन्थ रत्न १०० से अधिक पुस्तकों में प्रस्तुत किये। ये सब ग्रंथ आज उनके शिष्यों द्वारा विश्व की मुख्य मुख्य भाषाओं में करोड़ों की संख्या में छापकर वितरण ही नहीं किये जा रहे, बल्कि विश्वविद्यालयों में शिक्षा का केन्द्र बन रहे हैं। श्रील् प्रभुपाद अपनी पुस्तकें डिक्टोफोन पर बोलकर अपने शिष्यों की सहायता के द्वारा रचते थे।
कभी-कभी वे जीव-कल्याण के लिये सत्य बोध के कारण भगवत् प्रेरणा से ही रची गई हैं। श्रील् प्रभुपाद ने कहा है, "जब मनुष्य को आत्म ज्ञान हो जाता है तो स्वयं ही कई पुस्तकें लिखने में समर्थ हो जाता है।" एक भक्त में यह विशेषता होनी आवश्यक है कि वह काव्यमय हो। श्रील् प्रभुपाद प्रवचन करते हुए, लिखवाते समय श्रीकृष्ण की महिमा गाते हुए, गोष्ठियों या समारोहों में उपदेश देते हुए या कृष्ण भावनामृत आन्दोलन के कार्यक्रम निश्चित करते हुए, सदैव ही श्रीकृष्ण प्रेम में लीन रहते थे। भगवद्गीता के सातवें अध्याय में कहा गया है कि सहस्रों में से कोई बिरले ही सिद्ध हो पाते हैं और ऐसे सिद्धों में से मुश्किल से कोई एक ही व्यक्ति श्रीकृष्ण को जान पाता है।
१८वें अध्याय में भगवान् श्रीकृष्ण कहते हैं कि उनका सबसे अधिक प्रियभक्त वही है जो श्रीकृष्ण प्रेम के उपदेशों का प्रचार करता है। उससे अधिक मुझे कोई भी प्रिय नहीं'। (भगवद्गीता अध्याय १८।६८-६९ श्लोक)
श्रील् प्रभुपाद के आध्यात्मिक गुरु श्रील् भक्ति सिद्धान्त सरस्वती महाराजजी ने एक बार एक मृदंग का चित्र बनाकर उसके पास ही प्रिटिंग प्रेस का चित्र बनाया। उन्होंने कहा कि मृदंग तो आसपास के कुछ मकानों तक ही सुना जा सकता है. पर
प्रेस की पहुँच तो सारे विश्व में हैं। इसी कारण उन्होंने प्रेस को "महान मृदंग" कहा है। सारे विश्व में मानव समाज की सेवा हेतु इस्कान प्रेस की स्थापना श्रील् प्रभुपाद द्वारा की गई है जहाँ श्रील् प्रभुपाद की पुस्तकों की सुन्दर छपाई दिन रात की जाती है। सन् १९६८ में प्रभुपाद द्वारा व्याख्या (टीका) सहित अनूदित 'भगवद्गीता यथारूप' अँग्रेजी में मैकमिलन कम्पनी द्वारा प्रकाशित की गई। गीता सारे वैदिक साहित्य का सार है। केवल एक यही पुस्तक किसी व्यक्ति को भौतिकवादी प्रकृति के जाल से विमुक्त कर उसे परम् प्रभु श्रीकृष्ण की शाश्वत भक्तिपूर्ण सेवा में लगाने में समर्थ है तथा विश्व की हर समस्या को हल कर सकती है।
"भगवद्गीता एज इट इज" (यानि यथा रूप) की अँग्रेजी में प्रभुपाद द्वारा लिखित मूल हस्तलिपि मैकमिलन द्वारा प्रकाशित पुस्तक से कहीं ज्यादा बड़ी है।
इस वृहद पुस्तक का प्रकाशन इस्कॉन प्रेस द्वारा किया जा रहा है। "टीचिन्स ऑफ लॉर्ड चैतन्य" (श्री चैतन्य महाप्रभु की शिक्षायें) श्रील् प्रभुपाद द्वारा रचित एक अन्य पुस्तक है। इसमें स्वर्ण अवतार श्री चैतन्य महाप्रभु द्वारा दिया गया ज्ञान है। श्री चैतन्य महाप्रभु का जन्म आज से ५०० वर्ष पूर्व भारत के बंगाल में हुआ था और आपने हरे कृष्ण महामंत्र को आज के युग में परम ज्ञान का एक मात्र साधन बताकर उसका प्रचार किया था। "नेक्टर ऑप डिवोशन (भक्ति रसामृत सिन्धु) नामक पुस्तक श्रील् रूप गोस्वामी द्वारा रचित भक्ति रसामृत सिन्धु का व्याख्या सहित सार है। १९६९ में श्रील् प्रभुपाद द्वारा 'कृष्ण नामक एक वृहद ग्रन्थ का प्रकाशन जापान में डाईया पैन कम्पनी द्वारा तीन भागों में छापा गया।
प्रथम संस्करण की ५० हजार प्रतियाँ बहुत शीघ्र ही समाप्त हो गईं। इस पुस्तक में भगवान् श्रीकृष्ण की उन लीलाओं का वर्णन किया गया जो उन्होंन आज से ५००० वर्ष पूर्व इस पृथ्वी पर अवतरित होकर की थीं। "वेदांत सूत्र", श्री चैतन्य चरितामृत का १७ पुस्तकों में श्रील् प्रभुपाद सहित ४० पुस्तकों में टीका सहित अनुवाद किया गया है। श्रील् प्रभुपाद द्वारा रचित यह साहित्य स्वयं श्रीकृष्ण से आरम्भ होने वाली गुरु शिष्य परम्परा से सम्बन्धित होने के कारण प्रामाणिक है। प्रभुपाद के समस्त जीवन का मुख्य उद्देश्य सही रूप से, बिना कोई परिवर्तन किये, कृष्ण भावनामृत का प्रचार करना था। वैदिक साहित्य के अनुसार यह गुरु-शिष्य परम्परा ही परम सत्य का बोध करने में समर्थ है यह बोध-सांसारिक विद्या और मानसिक चिन्तन के परे है।
श्रील् प्रभुपाद के गुरुभाई डॉ० अवध बिहारी लाल कपूरजी को श्रील् प्रभुपाद ने एक अपना बनाया टॉनिक दिया। डॉ० कपूरजी ने कहा, "अभय श्री ए०सी० भक्ति वेदान्त स्वामी प्रभुपाद महाराज
बाबू आपका यह उपहार सिर-माथे पर। इसका मैं उपयोग करूंगा। पर इससे मेरा बनेगा क्या ? यह मेरा देह और देहाभिमान हो तो पुष्ट करेगा। आप मुझे कृष्ण प्रेम का टॉनिक क्यों नहीं देते, जिसका आप अपने अंतःकरण की प्रयोगशाला में हमसे छिपाकर निर्माण करते हैं और अकेले ही पान कर छके रहते हैं ?
भक्तों के साथ मिलन और सत्संग
श्रील् प्रभुपाद ने हँसकर उत्तर दिया, "श्रीकृष्ण-प्रेम का टॉनिक में अभी तो नहीं बनाता, पर बनाऊँगा। उसका फॉर्मूला (नुस्खा) मुझे मालूम है। अचूक फॉर्मूला है। मैं उसका विश्वभर में प्रचार करूँगा, जिससे हर कोई श्रीकृष्ण प्रेम का टॉनिक बना कर उसका पार कर सके।"
डॉ० कपूरजी ने कहा, "अच्छा टॉनिक नहीं तो नुस्खा ही बताये।" श्रील् प्रभुपाद ने कहा- "नुस्खा किसी से छिपा नहीं। वह श्री चैतन्य महाप्रभु का पेटेंट नुस्खा है जिसका उन्होंने खुलकर प्रचार किया है। काल के प्रभाव से लोग उसे भूल गये हैं। नुस्खा है-
तृणादपि सुनीचेन तरोरिव सहिष्णुना । अमानिना मान देन कीर्तिनीयाः सदा हरिः ।।
"तिनके से भी अधिक अपने को तुच्छ मानो, तरु के समान सहनशील बनो। स्वयं का मान-सम्मान की चाह न कर दूसरों का सम्मान करो और सदा सर्वदा हरि नाम का कीर्तन करो। बस, इतना करो और श्रीकृष्ण प्रेम पा लो। कितना सहज फॉर्मूला है यह श्रीकृष्ण प्रेम पा लेने का।"
उस समय जब श्रील् प्रभुपाद ने विश्वभर में इस फॉर्मूले का प्रचार करने की बात कही थी, तब मैंने इसे गंभीरता से बिल्कुल नहीं लिया था। पर, उनकी अंतरात्मा की आवाज थी, जिसे एक दिन अंतर्राष्ट्रीय कृष्ण भावना-संघ (Inter National Society for Krishna Consciousness) के रूप में चरितार्थ होना था।
श्रील प्रभुपाद धीरे-धीरे अपने आपको इस कार्य के लिए तैयार करने लगे। सन् १९३३ में श्रीपाद-भक्ति सिद्धान्त सरस्वती गोस्वामी महाराज से विधिवत् दीक्षा लेने के बाद १९१९ में भक्ति सिद्धान्त गोस्वामी महाराज ने अपने प्रयाण से दो सप्ताह पूर्व एक पत्र में उनसे फिर "अँग्रेजी जगत् में कृष्ण-भावना का प्रचार" करने का आग्रह किया इससे श्रील् प्रभुपाद को गुरुशक्ति मिली। अँग्रेजी जगत् में प्रचार करने का महत्त्वपूर्ण दायित्व निभाने के लिये यह आवश्यक था कि वे पहले, अपने देश में ही 'कृष्ण-भावना' का प्रचार करते हुए अपने को बना
लेते। इसलिये सन् १९४४ में नाम की अँग्रेजी पत्रिका का सम्पादन और प्रकाशन आरम्भ किया। वे सब ओर से अपनी सारी शक्ति समेटकर केवल प्रचार कार्य में लगा सकें, इस उद्देश्य से सन् १९५९ में गौडिया मठ के श्री केशव अभय चरणारविन्द भक्ति वेदान्त स्वामी। इसके उपरान्त श्रील प्रभुपाद श्री राधा दामोदर मन्दिर वृन्दावन में रहकर अपने गुरु महाराज की इच्छा को पूरी करने के लिये अपने को तैयार करने लगे। यह सब करते करते बहुत समय व्यतीत हो गया और उनकी उम्र ६९ वर्ष की हो गयी फिर भी उनके उत्साह में कमी नहीं आयी। वह अपने निश्चय पर दृढ़ बने रहे। इस उम्र में भी वे विदेशों में जाकर प्रचार करने के कठिनाई अवश्य हुई। विदेश जाने में विलम्ब का एक कारण अर्थाभाव भी था। उनके पास यात्रा तक के लिए धन नहीं था।
दैवयोग से सन् १९६५ में श्री राधा दामोदर की कृपा तथा अपने गुरु महाराज श्रील् भक्ति सिद्धान्त महाराज के आशीर्वाद से उन्हें सिंधिया पानी के जहाज कम्पनी की मालिकिन श्रीमती सुमति मुराजी ने उन्हें जलदूत नामक अपने समुद्री जहाज का टिकट दिलवा दिया। तब वे अमेरिका के लिये चल पड़े। अपने साथ ले चले केवल सात अमेरिकी डॉलर (४० रुपये), कुछ पहनने के पकड़े, श्रीमद्भागवत के अँग्रेजी अनुवाद के प्रथम तीन खण्डों के दो ट्रंक भरे हुए, एक जोड़ी करताल और एक माला झोली तथा इसके साथ पूर्ण विश्वास के साथ अपने गुरु महाराज का आशीर्वाद व भगवान की कृपा इसके अतिरिक्त और कुछ नहीं। न उनके पास अमेरिका में गुजर करने के लिए धन था, न उनका अमेरिका में किसी से कोई विशेष परिचय था।
ऐसी स्थिति में क्या किसी व्यक्ति के मद्य-मांसाहारी यथेच्छाचारी व जुआरी विश्व के लोगों में विशुद्ध वैष्णव धर्म का प्रचार करने का बीड़ा उठाकर चल पड़ने की कल्पना भी की जा सकती है ? ऐसी कल्पना केवल स्वप्न का ही परिचायक हो सकती है, पर पूज्य गुरुदेव श्रील् प्रभुपाद ने अपनी ६९ वर्ष की आयु में यह कल्पनातीत कदम उठाने का साहस किया। यह अपने आप में एक बड़े अचरज व हिम्मत की बात थी। पर इससे भी अधिक अचरज की बात यह हुई कि तीन बार जहाज में व अमेरिका में हृदय का दौरा (HEART ATTACK) होने पर भी उन्हें अपने कार्य में निरन्तर अभूतपूर्व सफलता मिलती रही।
१७ सितम्बर सन् १९६५ को करीब ४० रोज के बाद उनका जहाज बोस्टन बंदरगाह अमेरिका पहुँच तो गया, पर उनका न तो रहने का कोई निश्चित स्थान था न उनके पास अपने निर्वाह के लिए पैसा था। वे काफी समय तक इधर- श्री ए०सी० भक्ति वेदान्त स्वामी प्रभुपाद महाराज
उधर भटकते हये पार्कों में कीर्तन व भगवद्गीता का उपदेश अमेरिकन को करते रहे। श्रीमद्भागवत् महापुराण की प्रतियों की बिक्री कर किसी प्रकार अपना गुजारा करते रहे।
कुछ दिन हिप्पियों (समाज से बहिष्कार व्यक्तियों) के निमंत्रण पर न्यूयॉर्क में उनके गढ़ में भी रहे। एक वर्ष बाद उन्होंने न्यूयॉर्क कें टाम्किन पार्क में एक पेड के नीचे नियमित रूप से हरे कृष्ण महामंत्र का कीर्तन करना आरंभ किया। बहुत से तरुण जो अपनी दुःखमयी परिस्थितियों से मुक्त होने के लिए किसी नये पथ का अन्वेषण कर रहे थे, आकर बैठ जाते और उनके साथ कीर्तन करते। वे उन्हें गीता पर भाषण देते और उनमें महाप्रसाद वितरण करते। उनकी संख्या धीरे-धीरे रोजाना बढ़ती गई। एक दिन न्यूयॉर्क के प्रसिद्ध समाचार छपा कि भारत से आया एक संन्यासी बड़ी संख्या में युवकों को अपनी ओर आकर्षित कर रहा है। यह हरे कृष्ण आन्दोलन के अमेरिका में पैर जम जाने का प्रथम संकेत था।
इसके पश्चात् श्रील् प्रभुपाद के बहुत से शिष्य बन गये उनके प्रथम शिष्य अधिकतर हिप्पी ही थे, लेकिन कुछ पढ़े लिखे तथा जिज्ञासु भी थे। उन्हें वैदिक संस्कृति और सदाचार का कुछ भी ज्ञान न था। उनके लिए तरह तरह के अपराध करते रहना स्वाभाविक था तथा पाप के चार खम्भे-मांस खाना, हर प्रकार का व्यसन करना, व्यभिचार करना तथा जुआ खेलना तथा गंदे रहना उनके जीवन का मुख्य अंग था। श्रील् प्रभुपाद उनके अपराधों को सहन करते तथा प्यार के साथ उन्हें समझाते कि अपने बहुमूल्य मनुष्य जीवन को इस प्रकार नष्ट न करो। पर, श्रील् प्रभुपाद ने उन विदेशियों के सिद्धान्त, संस्कृति, खान-पान और रहन-सहन से किसी प्रकार का समझौता नहीं किया।
अपितु उनसे मांस-मदिरा और हर प्रकार के मादक द्रव्य छुड़वाकर और उनके लम्बे लम्बे बाल कटवा करके उन्हें चुटिया, तिलक, कण्ठी आदि से सुसज्जित कर विशुद्ध वैष्णव और कृष्णभक्त बना दिया। भक्ति वेदान्त महाराज के शिष्यों की संख्या तेजी से बढ़ती गयी। वे श्रील् प्रभुपाद के प्रति अनन्य निष्ठा और भक्ति रखते। उन्हें प्रभुपाद कहकर पुकारते। उनकी आज्ञा का जी-जान से पालन करते। उनके सहयोग से उन्होंने अमेरिका में कई आश्रमों मन्दिरों की प्रतिष्ठा की और अन्तर्राष्ट्रीय कृष्णभावना संघ (Inter National Soci-ety For Krishna Consciousness) की स्थापना की। उन्हें दूसरे दूसरे देशों में जाकर प्रचार करने की आज्ञा दी।
१९६८ में श्रील प्रभुपाद ने अपने तीन अमेरिकन गृहस्थ शिष्यों व उनकी धर्मपत्नियों को लन्दन में मन्दिर खोलने के लिये भेजा। उनके नाम थे- श्री मुकन्ददास धर्मपत्नी जानकी देवी दासी, श्री गुरु दास धर्मपत्नी यमुना देवी दासी, और श्री श्याम सुन्दर दास, धर्मपत्नी मालती देवी दासी। वे रोजाना लन्दन के व्यस्त बाजार में ऑक्सफोर्ड स्ट्रीट पर महामंत्र का कीर्तन करते। इस लेख के प्रस्तुतकर्ता से उनकी प्रथम भेंट उनके घर के मन्दिर में हई।
उन्होंने बताया कि वे श्रील ए०सी० भक्ति वेदान्त स्वामी प्रभुपाद के शिष्य हैं तथा उनकी आज्ञा से लन्दन में संकीर्तन द्वारा श्री चैतन्य महाप्रभु और श्रीराधाकृष्ण का एक चित्र भी उपहार में मुझे दिया और प्रार्थना की कि मैं लन्दन में उनके गुरु महाराज की इच्छा पूरी करने के लिये मन्दिर की स्थापना के लिये जगह दिलाने में मदद करूँ। इस प्रकार लगातार प्रयत्न करने पर हमें जुलाई १९६९ में लन्दन शहर के बीचोंबीच (BURY PLACE) (बरी प्लैस) पर एक तिमंजला स्थान मन्दिर व रहने के लिये ५०० पौंड मासिक किराये पर मिल गया। जहाँ पर १४ दिसम्बर १९६९ को श्रीराधाकृष्ण मन्दिर की स्थापना कर दी गई। मन्दिर की स्थापना से ४ महीने पहले श्रील् प्रभुपाद स्वयं लन्दन पधारे तथा स्वयं सभी व्यवस्था की देखभाल करते रहे।
श्रील् प्रभुपाद से उनके प्रथम भारतीय शिष्य क्षीरोदकशायी विष्णुदास (केदारनाथ गुप्ता) की पहली मुलाकात अगस्त १९६९ में हुई। श्रील् प्रभुपाद लन्दन से ४० मील की दूरी पर (COUNTRY SIDE) (गाँव में) एक लैनिन स्टेट में ठहरे। सबसे पहले उन्होंने लन्दन में ९ रोज तक श्रीमद्भागवत का अपना प्रवचन शुरू किया। पहले दिन करीब २००-२५० सज्जन सुनने के लिये आये और दूसरे दिन करीब १५० आदमी और धीरे-धीरे संख्या कम होती गई। ४ दिन के बाद एक पढ़े-लिखे अंग्रेज सज्जन ने श्रील् प्रभुपाद से प्रश्न किया कि स्वामीजी आप कितना सुन्दर भाषण ४ रोज से दे रहे हैं, लेकिन देख रहा हूँ कि रोजाना आनेवालों की संख्या कम होती जा रही है, इसका क्या कारण है?
श्रील् प्रभुपाद ने उत्तर दिया कि मैंने (Grocery) खाने-पीने की दुकान खोली है जहाँ पर सारे दिन ग्राहक आते जाते हैं। मैंने तो जवाहारात का वितरण शुरू किया है। जहाँ पर सारे दिन ग्राहक आते जाते हैं। मैंने तो जवाहारात का वितरण शुरु किया है, जहाँ पर कुछ ही ग्राहक उनको खरीदने आते है, लेकिन शाम को खाने-पीने की वस्तुओं से कहीं अधिक पैसा जवाहारात वाला कमा लेता है जबकि उसके यहाँ पर बहुत कम ग्राहक आते हैं। इस तरह यदि आप जैसे मुझे दो ग्राहक मिल गये तो मुझे पूर्ण संतोष होगा। श्री ए०सी० भक्ति वेदान्त स्वामी प्रभुपाद महाराज
धीरे-धीरे कार्य बढता या और श्रील प्रभुपाद ने १७ दिसम्बर १९६९ को क्षीरोदकशायी विष्णुदास (केदारनाथ गुप्ता) वे उनकी धर्मपत्नी कीर्ति माँ दासी (कमला गुप्ता) को अपना प्रथम भारतीय शिष्य बना कर ४ अन्य विदेशियों को अपना शिष्य बनाया। इसके पश्चात शीघ्र ही पेरिस, जर्मनी तथा अन्य यूरोप के देशों में हरेकृष्ण का आन्दोलन फैल गया तथा सभी समाचार-पत्रों में चर्चा का विषय हो गया।
दीक्षा के पश्चात् क्षीरोदकशायी विष्णुदास ने श्रील् प्रभुपाद से प्रार्थना की कि आप अपने सभी शिष्यों के साथ भारत की यात्रा करें ताकि इनको देख कर जो भारतवासी पाश्चात्य सभ्यता पर आकर्षित हो रहे हैं इनको भी शिक्षा मिले कि संसार के लोग सनातन धर्म की शिक्षा को अपना रहे हैं तथा भारतवासी उसको छोड़कर विदेशी सभ्यता को अपना रहे हैं। श्रील् प्रभुपाद को यह सुझाव अच्छा लगा तथा उन्होंने आज्ञा की कि अगले वर्ष एक चार्टर जहाज का प्रबन्ध करके करीब ५० अमेरिका और यूरोप के भक्तों को भारतवर्ष भेजने का प्रबन्ध करो।
गुरु-सान्निध्य और आध्यात्मिक शिक्षा
अक्टूबर १९७० में यह कार्य किया गया और ५० भक्तों को भारतवर्ष भेजा गया जहाँ पर बम्बई, कलकत्ता, दिल्ली इत्यादि में स्कॉन सेन्टर खोले गये और ९ रोज बड़े-बड़े शहरों में प्रभुपाद द्वारा श्रीमद्भागवत् पर प्रवचन किया गया। इस प्रकार भारतवर्ष में भी बड़ी तेजी से हरेकृष्ण आन्दोलन अपने पैर जमाने लगा। आज ४० से अधिक स्थानों पर मन्दिर, आश्रम, गुरुकुल तथा अतिथिगृह स्थापित कर दिये गये हैं तथा सभी बड़े-बड़े शहरों में स्कॉन के सेन्टर खोले जा रहे हैं। जिसमें मुख्य बम्बई, कलकत्ता, मद्रास, हैदराबाद, दिल्ली, वृन्दावन व मायापुर इत्यादि हैं।
इस प्रकार देखते देखते इंग्लैंड, आयरलैंड, अमेरिका, जर्मनी, फ्रांस, स्पेन, इटली, रूस, अफ्रीका, आस्ट्रेलिया, न्यूजीलैंड, साऊथ अमेरिका, भारतवर्ष, फिलीपीन्स, जापान, बंगलादेश, ईरान तथा यूरोप के अनेक देशों में स्कॉन के ३०० से अधिक मन्दिर व आश्रमों की स्थापना हो गई है। सभी देशों में बड़ी संख्या में प्रभुपाद के शिष्यों ने जाकर अनेक नये शिष्य बनाये हैं। वे सभी जगह सड़कों पर खोल करताल के साथ नाचते-कूदते, महामन्त्र का कीर्तन करते, श्री चैतन्य महाप्रभु के प्रेमभक्ति धर्म का प्रचार करते और भक्तिवेदान्त स्वामी प्रभुपाद द्वारा लिखी १०० से अधिक पुस्तकों को ३० भाषाओं में छापकर विश्वभर में वितरण कर रहे हैं।
यह सब श्रील् प्रभुपाद की तपस्या, त्याग व साधना का ही फल है जिसके कारण भगवान की शक्ति उनके सब कार्य को कुशलता से चला रही है।
श्रील प्रभुपाद कहा करते थे कि मैं इस जगत् से चला जाऊँगा, लेकिन मेरी पुस्तको के द्वारा काफी समय तक भक्त लोग मुझे याद करेंगे। भक्तों को कभी-कभी सड़को पर भीड इकट्ठा कर लेने के कारण उन्हें जेल भी जाना पड़ता था। रूस में शुरू-शुरू में हरेकृष्णा आन्दोलन से सम्बन्धित लोगों को भी कई साल तक जेल के रखा या और वहाँ की सरकार ने परेशान होकर भक्तों को पागलों के साथ रख दिया जहाँ पर भक्त लोग दिन रात कीर्तन करते थे जिसके कारण पाल भी ठीक हो गये और रूस सरकार ने भक्तों को ढाई साल के बाद छोड दिया और हरेकृष्ण आन्दोलन पर से प्रतिबन्ध उठा लिया। आज लाखों भगवद्गीता तथा पुस्तकें रूसी भाषा में छप कर वितरण की जाती हैं तथा रूस से प्रतिवर्ष अनेक भक्त मायापुर वृन्दावन धाम की यात्रा व परिक्रमा के लिये आते हैं।
यह चमत्कार भगवत नाम का श्रील् प्रभुपाद ने दिखाया।
इस प्रकार पृथ्वी के कोने-कोने में वैष्णव धर्म और महाप्रभु के नाम के प्रचार के सम्बन्ध में महाप्रभु की यह भविष्यवाणी सत्य रूप में फलीभूत हो रही है जो उन्होंने इन शब्दों में की थी-
पृथ्वी पर्यन्त जत् आछे देश ग्राम ।
सर्वत्र प्रचार हइबेक मोरा नाम ।।
(चै०भा० २।४।१२६)
श्रील् प्रभुपाद के भारतवर्ष आने पर डॉ० अबधबिहारी लाल कपूर ने एक बार अपने भाषण में कहा था कि भारतवर्ष से अनेक प्रचारक उपदेशक प्रचार करने के लिये विदेश गये, लेकिन जो कार्य श्रील् प्रभुपादने किया वह और किसी ने नहीं किया। क्योंकि सभी प्रचारकों ने अपने भाषणों में वहां के लोगों को डालडा (नकली घी) खिलाया, जबकि श्रील् प्रभुपाद ने विदेशी लोगों को असली घी खिलाया जिसके कारण उन पर प्रभुपाद के कहने का असर हुआ और अनेक भगवान के विशुद्ध भक्त बन गये। उन्होंने हर प्रकार से लोगों को समझाया कि श्रीकृष्ण ही भगवान हैं जैसा कि ब्रह्माजी ने अपनी पुस्तक ब्रह्म संहिता में कहा है-
ईश्वर परम कृष्णा सच्चिदानन्द विग्रह । अनादि आदि गोविन्दम सर्व कारण कारणम् ।।
श्री भक्ति वेदान्त स्वामी महाराज वे स्वयं विश्व में श्रीकृष्ण-प्रेम का प्रचार करने के लिए चौदह बार विश्व भ्रमण किया। वे जहाँ भी जाते वैदिक संस्कृति के
प्रचार केन्द्र के रूप में श्री राधाकृष्ण के मन्दिरों और आश्रमों की स्थापना करते। उनके प्रचार कार्यक्रम के मुख्य अंग होते प्रवचन, नृत्य-कीर्तन, भगवत प्रसाद वितरण और स्वरचित ग्रन्थों का वितरण और सब को समझाते कि हर जीव श्रीकृष्ण का नित्य दास है और भगवान ही सब के आश्रयदाता हैं। ग्रंथों में सर्वाधिक प्रधानता थी भगवद्गीता, श्रीमद् भागवत, ईशोपनिषद, श्री चैतन्य चरितामृत, भक्तिरसामृत सिन्ध आदि की। प्रभुपाद द्वारा ७० से अधिक ग्रंथों का अंग्रेजी में टीका सहित अनुवाद किया गया और अब उनके शिष्यों द्वारा विश्व की तीस प्रमुख भाषाओं में उनका अनुवाद कर विश्व के कोने-कोने में उनका वितरण किया जा रहा है। सब मिलाकर करीब १० करोड से अधिक ग्रंथों का विश्व में वितरण किया जा चुका है।
श्रील् भक्ति वेदान्त स्वामी प्रभुपाद को शैशव-काल में श्री जगन्नाथ की रथ-यात्रा का जो शौक उन्हें अपने पिताजी द्वारा मिला उसको उन्होंने जारी रखा और प्रथम १९६८ में एक वृहद् रूप देकर सैनफ्रान्सिसको (अमेरिका) में रथयात्रा महोत्सव हजारो भक्तों के साथ मनाया। उसके बाद लन्दन में यह उत्सव १९६९ में पहली बार मनाया गया। आज हर वर्ष विश्व के सभी देशों में यह उत्सव प्रतिवर्ष मनाया जाता है। प्रभुपाद ने यह परिपाटी डाल दी जिसमें प्रतिवर्ष लाखों व्यक्ति हिस्सा लेते हैं तथा सबको भगवत् प्रसाद वितरण किया जाता है।
१९७२ में श्रील् प्रभुपाद ने लन्दन में अपने प्रथम भारतीय शिष्य क्षीरोदक शायी विष्णुदास के घर में श्री राधा गोविन्द जी विग्रह की स्थापना की और उसी वर्ष १९७२ में प्रभुपाद ने इल्लास, टेक्सस में गुरुकुल विद्यालय की स्थापना द्वारा पश्चिम देशों में प्राथमिक और आध्यात्मिक शिक्षा की वैदिक प्रणाली का सूत्रपात किया, तब से उनके निर्देशन के अनुसार प्रभुपाद के शिष्यों ने सम्पूर्ण विश्व में १२ से अधिक गुरुकुल खोले हैं तथा अन्य गुरुकुल खोलने की योजना है जहाँ पर वैदिक रीति के अनुसार ५ वर्ष के बालक की शिक्षा शुरू की जाती है। श्रीवृन्दावन धाम का भक्ति वेदान्त स्वामी गुरुकुल इनमें सर्वप्रमुख है। १९७२ में श्रील् प्रभुपाद ने बम्बई, दिल्ली, वृन्दावन में नये मन्दिरों की स्थापना की।
श्रील् प्रभुपाद ने श्री धाम मायापुर, पश्चिम बंगाल में एक विशाल नगर बसाकर अन्तर्राष्ट्रीय केन्द्र के निर्माण की प्रेरणा दी जहाँ पर हजारों की संख्या में प्रतिवर्ष विश्व से भक्त श्री गौर पूर्णिमा पर आकर एक विशाल उत्सव १० रोज तक मनाते हैं। इसी प्रकार श्री वृन्दावन धाम में भव्य कृष्ण बलराम मन्दिर और
अन्तर्राष्टीय अतिथि गृह तथा गुरुकुल और गौशाला का निर्माण किया गया है। श्रील प्रभुपाद के आदेश के अनुसार उनके शिष्य क्षीरोदकशायी विष्णुदास द्वारा वृन्दावन धाम में एक वानप्रस्त आश्रम की स्थापना की गयी है। ये वे केन्द्र है जहाँ पाश्चात्य या भारतीय लोग वैदिक संस्कृति का मूल रूप से प्रत्यक्ष अनुभव कर सकते हैं। बम्बई में भी श्री राधारास बिहारी मन्दिर के रूप में १७ एकड़ भूमि पर एक विशाल सांस्कृतिक एवं शैक्षणिक केन्द्र का विकास हो चुका है। किन्तु श्रील प्रभुपाद का सबसे बड़ा योगदान उनके ग्रन्थ हैं। ये ग्रन्थ विद्वानों द्वारा अपनी प्रामाणिकता, गंभीरता और स्पष्टत के कारण अत्यन्त मान्य है। अनेक महा विद्यालयों में उच्चस्तरीय पाठ्य ग्रंथों के रूप में प्रयुक्त हैं।
श्रील प्रभुपाद की रचनाएँ विश्व की अनेक भाषाओं में अनूदित है। १९७२ में केवल श्रील् प्रभुपाद के ग्रन्थों के लिये स्थापित "भक्तिवेदान्त बुक ट्रस्ट, भारतीय धर्म और दर्शन के क्षेत्र में विश्व का सबसे बड़ा प्रकाशक हो गया है। इस ट्रस्ट का एक अत्यधिक आकर्षक प्रकाशन श्रील् प्रभुपाद द्वारा केवल १८ मास में पूर्ण की गई उनकी एक अभिनस कृति है जो बंगाली धार्मिक महाग्रन्थ श्री चैतन्य चरितामृत का करीब १०००० पृष्ठों को सत्रह खण्डों में अनुवाद टीका सहित प्रकाशित किया गया है।
बारह वर्षों में अपनी वृद्धावस्था की चिन्ता न करते हुए परिव्राजक (व्याख्यान-पर्यटक) के रूप में श्रील् प्रभुपाद ने विश्व के छहों महाद्वीपों की चौदह परिक्रमाएँ की, इतने व्यस्त कार्यक्रम के रहते हुए भी श्रील् प्रभुपाद की उर्वरा लेखनी अविरल चलती रहती थी। उनकी रचनाएँ वैदिक दर्शन, धर्म, साहित्य और संस्कृति के एक यथार्थ पुस्तकालय का निर्माण करती है। १४ नवम्बर सन् १९७७ को पूज्य पाद श्री भक्ति वेदान्त स्वामी प्रभुपाद महाराज ने वृन्दावन में अपना शरीर छोड़कर नित्यधाम की यात्रा की। अपने शेष जीवन के ११ वर्षों में ही उन्होंने विश्व भर में कृष्ण प्रेम, कृष्ण नाम संकीर्तन और भारतीय धर्म और सस्कृति का प्रचार करने में जैसी सफलता प्राप्त की वैसी उनके पहले केवल बौद्ध धर्म के प्रचारक सम्राट अशोक ने की थी।
पर, अशोक के पास एक विशाल साम्राज्य और अपार जन-धन की अतुलनीय शक्ति थी, श्री भक्तिवेदान्त महाराज के पास ऐसी कौन-सी शक्ति थी, जिसके कारण उनका प्रचार इतना सफल हुआ ? निस्संदेह उनके पास भी श्रीकृष्ण की अपनी शक्ति थी। श्रीकृष्ण ने उन्हें अपनी शक्ति देकर इस कार्य के लिए ही भूतल पर भेजा था। उसके बिना इतने अल्पकाल में इतना महान् कार्य करना असंभव था। श्री चैतन्य चरितामृत में उल्लेख है कि श्री ए०सी० भक्ति वेदान्त स्वामी प्रभुपाद महाराज
कलि कालेर धर्म कृष्ण-नाम संकीर्तन ।
कृष्ण-शक्ति बिना नहे वार प्रवर्तन ।।
श्री भक्ति वेदान्त महाराज के शिष्यों ने उनके स्मारक के रूप में करोड़ो रुपये खर्च करके संगमरमर की समाधि श्रीवृन्दावन धाम में बनाई तथा वैस्ट वरजीनिया में जिस स्थान पर वे रहते थे प्रभुपाद का स्वर्ण महल (PRABHUPADA PALACE OF GOLD) के नाम से एक ऐसी भव्य इमारत का निर्माण किया है जिसे (EIGHTH WONDER OF THE WORLD विश्व का आठवाँ चमत्कार) कहा जाता है। ताजमहल की तरह उसे भी दूर-दूर से लोग देखने जाया करते हैं। लॉसएन्जिलिस में एक विचित्रालय (MUSEUM) की स्थापना की गई है, जहाँ पर भगवान श्रीकृष्ण और श्री चैतन्य महाप्रभु की दिव्य लीलाएँ कम्प्यूटर द्वारा प्रदर्शित की जाती हैं। श्रील् प्रभुपाद ने जगत गुरु के नाम से एक बार फिर भारत का नाम विश्व में रोशन किया है। समाज उनके इस अनुपम सेवाकार्य का चिर ऋणी रहेगा।
आशा है हम सब उनके दिखाये गये मार्ग पर चलकर अपना जीवन सार्थक बना सकेंगे।
गुरु और साधना — जीवन-संदेश
गुरु के प्रति श्रद्धा और साधना में निरंतरता भक्ति-परंपरा के प्रमुख विषय हैं। इस चरित्र को पढ़ते समय यह देखना उपयोगी है कि सीख और आचरण किस तरह एक-दूसरे से जुड़ते हैं।
कथा का सार
श्री ए० सी० भक्ति वेदान्त स्वामी प्रभुपाद महाराज की कथा भक्ति, विनम्रता और साधना पर मनन करने का अवसर देती है। इस संग्रह में अन्य भक्तों के जीवन-प्रसंग भी पढ़ें।