ब्रज के भक्त भाग 3 · अध्याय 65

राजर्षि श्रीवनमाली रायबहादुर

राजर्षि श्रीवनमाली रायबहादुर की प्रेरक हिंदी कथा। जानिए उनके जीवन, भक्ति और साधना से जुड़े महत्वपूर्ण प्रसंग।

राजर्षि श्रीवनमाली रायबहादुर
राजर्षि श्रीवनमाली रायबहादुर — ब्रज के भक्त भाग 3

राजर्षि श्रीवनमाली रायबहादुर का यह भक्त-चरित्र ब्रज की साधना, श्रद्धा और जीवन से जुड़े प्रसंगों को सामने लाता है। नीचे कथा को अलग-अलग विषयों में व्यवस्थित किया गया है।

जन्म, परिवार और प्रारम्भिक जीवन

[ राधाकुण्ड, वृन्दावन ।

राजर्षि बनमाली रायबहादुर पूर्व बँगालके पाबना जिलेके अन्तर्गत ताड़ासकी विशाल जमींदारीके अधिपति थे। राजाका उन्हें खिताब था। सन् १८६३ में श्रीगंगाप्रसाद रायके पुत्ररूपमें उनका जन्म हुआ। उनके माता-पिता परम भक्त थे। जब वनमाली राय गर्भमें ही थे, उन्होंने जगन्नाथधामकी पैदल यात्रा की थी। उनके जन्मके कुछ दिन बाद वे उन्हें ताड़ासके अधिपति राजा वनवारीलाला रायको

दत्तकरूपमें देकर स्वयं वृन्दावन चले गये और आजीवन सेवाकुञ्ज मोहल्लेमें रहकर भजन करते रहे।

ताडासके अधिपतिका स्वर्गवास हो गया जब बनमालीबाबूकी उम्र केवल १७वर्षकी थी। जमींदारीका सारा भार उनपर आ पड़ा। उनकी कार्यपटुता देख पाबना जिलेके कमिश्नरने उनके नाबालिग होते हुए भी जमींदारीका सरकारी संरक्षक नियुक्त नहीं किया। जमींदारीका कार्य सम्हालते ही बनमालीबाबू धर्मशाला, कुएँ, पक्के घाट आदि बनवाने और औषधालय, स्कूलादि खोलने जैसे जनहित कार्योंमें लग गये। पर, उनका आन्तरिक जीवन प्रारम्भसे ही साधनामय था। वे ब्राह्म-धर्मसे विशेष रूपसे प्रभावित थे। उसमें दीक्षा लेकर उसके अनुसार उपासना करने लगे।

बनमालीरायका आगेका चरित्र उनके परिवारके रंगीले ठाकुर श्रीराधाविनोदके चरित्रसे जुड़ा है। राधाविनोद एक प्राचीन श्रीविग्रह थे, जिनकी उनके घर बहुत समयसे विधिवत सेवा होती आ रही थी। श्रीविग्रह जाग्रत थे। उनका अपूर्व इतिहास है।

वे ताड़ास स्टेटके अन्तर्गत नवग्रामके अधिकारी श्रीवाञ्छारामजीको अपूर्व ढंगसे प्राप्त हुए थे। वाञ्छारामजी बड़े भक्त थे। नित्य प्रातः सेवा-पूजाके पूर्व स्थानीय कारतोया नदीमें स्नान करने जाया करते थे। एक दिन जब वे स्नान कर रहे थे, उन्हें सुनायी पड़ी किसी मधुर कण्ठकी आवाज। कोई कह रहा था- 'मुझे जलसे निकालो और घर ले चलो।' वाञ्छारामजीने घूम-फिरकर चारों ओर देखा, पर उन्हें कोई न दीखा। आवाज जलके भीतरसे आ रही है, या बाहरसे, वे कुछ स्थिर न कर पाये। स्नान कर घर चले गये, पर वह आवाज उनके कानमें गूँजती रही। दूसरे दिन स्नान करते समय फिर वही आवाज सुनायी दी और फिर पहले दिनकी तरह वे कुछ स्थिर न कर पाये।

तीसरे दिन, जब वे स्नान कर नदीसे निकल रहे थे, आवाजके साथ-साथ उन्होंने अनुभव किया कि कोई वस्तु पानीमें उनके चरणोंसे आ लगी है। उन्होंने हाथ डालकर उसे निकाला तो निकली राधाविनोदकी सुन्दर मूर्ति। उसे देख क्षणभरके लिए वे स्तम्भित और चकित रह गये। फिर उसे हृदयसे लगा लिया। हृदयसे लगाते ही उनका सर्वांग कम्प और पुलकसे व्याप्त हो गया और दोनों नेत्रोंसे बह चलीं प्रेमाश्रुओंकी गंगा और यमुना। उनके पवित्र जलसे अभिषिक्त हो राधाविनोदने न जाने कबकी अपनी साध पूरी की। एएकि

हाय रे, प्रभु ! तुम्हें अपनी साध पूरी करनेके लिए भक्त के चरणोंसे लग राजर्षि श्रीबनमाली रायबहादुर

जानेमें भी संकोच न हुआ ! भक्तकी प्रेम-सेवा अङ्गीकार करनेकी तुम्हारी ऐसी उत्कट लालसा !!

वाञ्छारामजी अपने प्राणधनको अपनी छातीसे लगाकर घर ले आये। सामर्थ्यानुसार उनकी सेवाकी अच्छी-से-अच्छी व्यवस्था की, पर राधा-विनोदजी बडे • विलासी थे। उन्हें नित्य प्रति नयी-नयी वस्तुओंकी आवश्यकता होती। कभी उन्हें तरह-तरहके मिष्ठान्न चाहिये थे, कभी नयी-नयी पोशाक, कभी-कभी तरह-तरहके इत्र-फुलेल आदि । वाञ्छारामजी इन वस्तुओंकी व्यवस्था न कर सकते, तो वे किसी औरसे करवा लेते, या स्वयं कर लेते। उनके प्राकट्य और रँगीलेपनकी खबर चारों ओर फैल गयी थी। दूर-दूरसे लोग उनके दर्शन करने आने लगे थे। वे उन्हें प्रेरणा देकर किसीसे कुछ, किसीसे कुछ सामग्री मँगवा लेते।

न जाने कैसे उन्हें हुक्का पीनेका शौक लग गया। तो वे एक धनी भक्तको स्वप्न देकर उससे एक फरसी हुक्केकी माँग कर बैठे। वह एक बहुत सुन्दर चाँदीकी निगालीदार फरसी हुक्का ले आया। दोनों समय राजभोगके पश्चात् सुगन्धी तम्बाकूकी चिलम भरकर हुक्का उनके सामने रख दिया जाता। कभी-कभी किसी भाग्यवानको उसकी गुड़गुड़ाहट भी सुनायी पड़ जाती।

एक बार राधाविनोदकी इच्छा हुई सरसोंके फूलका साग खाने की। दिन छिपे किसी किसानके खेतमें जाकर वे फूल तोड़ने लगे। किसानको कुछ आहट हुई तो उसने आवाज लगायी - 'कौन है खेतमें ?' जल्दी-जल्दी पीताम्बरके आँचलमें फूल बाँधकर वे भाग निकले। रात्रिमें स्वप्नमें वाञ्छारामजीसे कहा - 'मैने बहुत दिनोंसे सरसोंके फूलका साग नहीं खाया। आज बनाकर भोग लगाना।'

सबेरे उठकर वाञ्छारामजी चिन्ता करने लगे- 'मील-दो-मीलके भीतर तो कहीं सरसोंका खेत है नहीं। कहीं दूर जाकर लाने पड़ेंगे। पता नहीं कहाँ मिलेंगे', पर वह ठाकुरघरमें गये तो देखकर अवाक् रह गये कि सरसोंके फूल ठाकुरके दोनों कानोंमें लगे हैं और कुछ फूल पीताम्बरके छोरमें बँधे हैं! वाञ्छाराम समझ गये कि उन्हें फूलोंके लिए कहीं दूर जानेका कष्ट न करना पड़े, इसलिए ठाकुर स्वयं जाकर कहींसे ले आये हैं। उन्होंने फूलोंका साग बनाकर उन्हें भोग लगाया।

वाञ्छाराम गरीब होते हुए भी बड़े अतिथिसेवी थे। गाँवमें कहींसे कोई नया व्यक्ति आता और उसे कहीं ठहरनेको जगह न मिलती, तो उनका घर उसके लिए खुला रहता। वह वहीं रहता और उसका यथायोग्य सत्कार किया जाता। एक बार

रातमें जब वाञ्छाराम और उनकी पत्नी सो गये थे, तीन अतिथियोंने दरवाजा खटखटाया। वाञ्छारामकी नींद न खुले, इसलिए स्वयं राधाविनोदने एक बालकके रूपमें दरवाजा खोलकर अतिथियोंका स्वागत किया। उन्होंने कहा- 'पिताजी सो गये हैं। यदि कहें तो उन्हें जगाऊँ। नहीं तो आप स्वयं रसोई बना लें, मैं सब व्यवस्था कर दूँ।'

अतिथियोंने कहा- 'उन्हें आराम करने दो। हम रसोई बना लेंगे।'

विनोदजी जानते थे कि अतिथियोंके लिए घरमें पर्याप्त सामग्री नहीं है। इसलिए उन्होंने कहा- 'तो आप थोड़ा विश्राम करें, मैं अभी आता हूँ।'

वे उस बनियेकी दुकानपर गये, जहाँसे वाञ्छाराम सामान खरीदा करते थे और बोले- 'मुझे वाछारामजीने भेजा है और कुछ सामान उधार मँगाया है।

'मैं तो तुम्हें पहचानता नहीं' दुकानदारने कहा।

तब वे अपने हाथका कड़ा उतारते हुए बोले- 'यह कड़ा तुम रख लो। कल वाञ्छारामजीसे हिसाब करके कड़ा लौटा देना।'

दुकानदार राजी हो गया। विनोदजी सामग्री लेकर घर आये। अतिथियोंके रसोई बनानेकी सारी व्यवस्था कर दी। अतिथि खा-पीकर सो गये।

दूसरे दिन प्रातः जब वाञ्छारामने घरमें अतिथियोंको देखा, तो पूछा- 'आप लोग कब आये और किसने दरवाजा खोला ?'

'हम कल रात आये जब आप सो गये थे। आपके लड़केने दरवाजा खोला और उसीने हमारे खाने-पीनेकी व्यवस्था की। हमने आपको जगाना उचित नहीं समझा' अतिथियोंने उत्तर दिया।

वाञ्छारामकी पहले कुछ समझमें न आयी, पर थोड़ी देरमें उनका ध्यान विनोदकी ओर गया - 'कहीं इसने तो नहीं की यह लीला ?' दोपहरको बनियाँ आया कड़ा लेकर, तो सारा रहस्य खुल गया।

विनोदजीको कुछ दिनोंसे अपना अकेलापन खलने लगा था। वे विवाहकी सोचने लगे थे। विवाह कहाँ-किससे करेंगे, शायद यह भी निश्चय कर लिया था। पर मंजिल दूर थी। उस तक पहुँचना आसान नहीं था। दूरी कम करनेके लिए उन्होंने राजा बनवारीलालसे सम्पर्क स्थापित करनेकी बात सोची। गाँवके अपने किसी भक्तको राजा बनवारीलालके पास जानेकी प्रेरणा दी। उसने जाकर उनसे कहा- 'आपके नवग्राममें आपहीके एक कर्मचारी श्रीवाञ्छारामको एक ठाकुर

दिव्य अनुभूति और कृपा के प्रसंग

राजर्षि श्रीबनमाली रायबहादुर

हैं। चारों ओर उनकी धूम मच रही है। दूर-दूरसे लोग दर्शन करने आ रहे हैं। आप प्राप्त हुए हैं, जो बडे जाग्रत और कौतुकी हैं। नित्य नयी-नयी लीलाएँ करते रहते नहीं जाएँगे उनके दर्शन करने ?'

'कैसे ठाकुर हैं? कहाँसे आये हैं ? किस प्रकारकी लीलाएँ कर रहे हैं?'

राजाने कौतूहलवश एक साँसमें बहत-से प्रश्न पूछ डाले। भक्तने उनका सारा वृत्तान्त कह सुनाया। राजा उत्कण्ठित हो रानी और अपनी १०-११ वर्षकी लडकी राधाको साथ ले विनोदजीके दर्शन करने पहुँचे।

सब विनोदजीके दर्शनकर मुग्ध हो गये। बालिका राधा एकाएक माँसे चिपककर बोली-'माँ! देखो, ठाकुर मुझे देखकर हँस रहे हैं !'

'चल पगली,' माँने हँसकर उसके गालपर चपत मरते हुए कहा।

'नहीं, माँ! देखो न!' बालिकाने फिर कहा। माँने फिर हँसते हुए उसकी बातको टाल दिया।

पर, विनोदकी हँसीने बालिकाको ऐसा मोह लिया कि वह घर जाकर भी उन्हें न भूल सकी। सोते-जागते, खाते-पीते, खेलते-कूदते हर समय उनकी मधुर स्मृति उसके हृदय-पटलपर जागकर एक अपूर्व आलोड़नकी सृष्टि करती रहती।

कई बार फिर राजा साहब उसके आग्रहपर उसे लेकर उनके दर्शन करने गये। धीरे-धीरे उनके भीतर भी लड़कीका भाव संक्रमित हुआ। उन्हें भी सोते-जागते उनकी याद आने लगी।

एक दिन उनके दर्शन करते समय बालिकाने पितासे कहा- 'पिताजी ! विनोदजीको अपने घर ले चलो न। मेरा मन करता है अपने हाथसे इन्हें अच्छी तरह सजाया करूँ और इनकी सेवा किया करूँ।'

बालिकाने जैसे राजासाहबके मनकी बात चुरा ली। वे बोले- 'बेटी, सोचता तो मैं भी हूँ कि विनोदजीको अपने घर ले चलूँ, पर वाञ्छारामजी ले जाने दें तब न।' वाञ्छारामजी पास खड़े थे। राजासाहबने लड़कीकी बातका उत्तर देते हुए उनकी ओर ऐसे दृष्टिपात किया था, जैसे वे उनसे विनोदजीको ले जानेकी अनुमति चाह रहे हों।

'सरकार, मैं तो आपका सेवक हूँ और विनोदजीका भी। मैं ले जाने देने और न ले जाने देनेवाला कौन हूँ? आप जानें और विनोदजी।' कह वाञ्छारामजीने बात

देवर था

टाल दी। वे क्या अपनी प्राण-प्यारे विनोदको अपनेसे विलग होनेकी बात कभी सोच सकते थे ?

पर रात्रिमें स्वप्नमें विनोदजीने आज्ञा की 'मुझे राजाके घर जाने दो। मैं तुम्हारी सेवासे प्रसन्न हूँ। अब राजाकी सेवा ग्रहण करना चाहता हूँ। तुम दुःख न करना। तुम्हें शीघ्र मेरी प्राप्ति होगी।'

हैं। 3

तब वाञ्छारामजी क्या करते ? उन्होंने राजाको सूचना भेज दी। राजासाहब सूचना प्राप्त करते ही भाव-विभोर हो गये - विनोदजीकी इस अधमपर इतनी कृपा!'

उन्होंने तत्काल रानीसाहिबा और बेटी राधिकाको यह शुभ सम्बाद जा सुनाया। राधा खुशीसे नाच उठी। रानीकी खुशीकी भी सीमा न रही। राजमहलमें एक अपूर्व आनन्दका उत्सव अनायास फूट पड़ा।

विनोदजीकी पधरावनीका विशाल आयोजन किया जाने लगा। शुभ मुहूर्तमें बाजे-गाजे और हाथी-घोड़ोंके साथ पालकीमें विनोदजीने महलमें प्रवेश किया। उनके महलमें प्रवेश करते ही बनवारीनगरका स्वरूप बदल गया। विनोदजी वहाँक जन-जीवनके केन्द्र बन गये। उन्हें लेकर नित्य नये-नये उत्सव और रास-रंग होने लगे।

बालिका राधाको भी अपनी साध पूरी करनेका अवसर मिला। वह बड़े प्रेमसे उनकी सेवा करने लगी। सेवाका भार तो मुख्यरूपसे पुजारीपर ही रहता, पर किस दिन उन्हें कौन-सी पोशाक पहनानी होगी, किस दिन किस प्रकारका भोग लगाना होगा, यह वही निर्णय करती। उनके लिए फूल-माला गूंथकर और फूलोंके तरह-तरहके आभूषण बनाकर उनका फूल-श्रृंगार भी वही करती। विनोदजी उसकी सेवासे बहुत प्रसन्न रहते, पर कभी-कभी उसके साथ छेड़-छाड़ भी कर देते।

राधाका विनोदजीके प्रति अनुराग बढ़ता गया और विनोदजीकी उसके साथ छेड़-छाड़। वे कभी उसके कपड़ोंसे जूठे हाथ पोंछ देते, कभी उसपर पानकी पीक डाल देते। एक दिन जब वह उन्हें माला पहना रही थी, उन्होंने उसका आँचल पकड़ लिया और बोले- 'मेरे साथ ब्याह कर ले।' उसने यह बात माँसे कही, तो उन्हें विश्वास न हुआ।

कुछ दिन बाद उसे बुखार आया। ठाकुरने माँसे स्वप्नमें कहा- 'राधा बचेगी नहीं, पर तुम दुःख न करना। मैं उसे अङ्गीकार करूँगा। तुम्हारे बगीचेमें जो सूखा राजर्षि श्रीबनमाली रायबहादुर

देवदारका वृक्ष है. उसकी लकडीसे उसकी एक प्रतिमा बनवाकर मेरे साथ उसका ब्याह कर दो।

तब उन्होंने समझा कि सचमुच विनोदजी उनकी लडकीसे ब्याह करना चाहते लीलाकी चिन्ता करते-करते अश्रू विसर्जन करने लगे। यह कहना कठिन है कि हैं। उन्होंने राजा साहबसे स्वप्नकी बात कही। दोनों रंगिया विनोदकी इस नयी उनके अश्रू आनन्दके थे, या विषादके। उन्हें यह जानकर दुःख हो रहा था कि उनकी लाड़ली बचेगी नहीं। पर, वे यह जानकर सुखी हो रहे थे कि विनोदजी उनके

जमाई बनेंगे और उनकी राधा प्रतिमा रूपमें घर जमाईके साथ घरमें ही रहेगी। प्रतिमा बनानेका कार्य प्रारम्भ कर दिया गया। जैसे-जैसे प्रतिमा बनती गयी, राधाकी दशा बिगडती गयी और ज्योंही वह बनकर तैयार हई, राधा न रही।

एक ओर उसके दाह-संस्कारकी तैयारी होने लगी, दूसरी ओर उसके विवाह की। शुभ मुहूर्तमें बड़ी धूम-धामसे उसके साथ विनोदजीका विवाह सम्पन्न हुआ। शायद तभीसे विनोदजीका नाम राधा-विनोद पड़ा और वे जमाई-ठाकुरके नामसे प्रसिद्ध हुए। आज भी वृन्दावनमें विनोद और विनोदिनी सुखसे विराज रहे हैं और जिस तिथिको उनका विवाह हुआ था, उस तिथिपर मन्दिरमें उत्सव मनाया जाता है।

बनमालीरायने जबसे स्टेटका कार्यभार सम्हाला राधाविनोदकी सेवामें शिथिलता आ गयी थी। पुजारी द्वारा नित्यकी नियमित सेवा तो चल ही रही थी, पर सेवाके नामपर लकीर ही पीटी जाती थी। बनमालीराय स्वयं उससे उदासीन रहते थे। कभी उधर दृष्टिपात भी नहीं करते थे। इसलिए पुजारी और अन्य लोगोंको भी सेवामें उत्साह नहीं होता था।

बनमालीराय ब्राह्म-धर्ममें दीक्षित होनेके कारण मूर्ति-पूजामें विश्वास नहीं करते थे। ब्राह्म-धर्म ईश्वर, ब्रह्म और उपासना सब कुछ मानते हुए भी ईश्वरके श्रीविग्रहको नित्य नहीं मानता। इसलिए श्रीविग्रहकी रागमयी सेवाका उसमें कोई स्थान नहीं।

बनमालीरायकी श्रीमूर्तिके प्रति उपेक्षाके बादल एकाएक छँट गये, जब एक दिन पाबनाके राजमार्गपर राग और प्रेमकी घनीभूत मूर्ति प्रभु जगद्वन्धुके उन्हें दर्शन हुए।

एक ओरसे मधुर मृदंगोंकी आकाशभेदी ध्वनि और सुरताल करतालोंकी झंकारके साथ सैकड़ों कीर्तनकारी भक्तोंकी बीच जगद्वन्धु सुन्दर भावविभोर

अवस्थामें नृत्य करते आ रहे थे. दूसरी ओरसे राजसी ठाठ-बाटमें सुसज्जित हाथोंकी पीठपर बैठे सिपाहियों, बन्दूक्चियों और लाव-लश्करके साथ राजा बहादुर।

दूरसेही कनक-पुतलीके समान अलौकिक रूप-छटा बिखेरते हुए जगबन्धुके भाव-भूषित विग्रहको देख राजा बहादुरका राज-गौरव जाने कहाँ विलीन हो गया। वे हाथीसे उतर पड़े। नंगे पैर चलकर कीर्तन-मंडलीमें जा मिले। एक सम्मोहित व्यक्तिकी तरह कीर्तन-मण्डलीके साथ दोनों भुजायें उठाकर नाचते-गाते तब तक चलते रहे, जब तक उसने विश्राम नहीं लिया। विश्रामके पश्चात् वे महापुरुषको दण्डवत् कर और बनवारीनगरमें अपने घर पदधूलि देनेकी कृपा करनेकी प्रार्थना कर घर लौट आये।

सेवा, प्रसाद और समर्पण की घटनाएँ

लौट तो आये, पर उन्हें लगा कि वे अपने-आपको उन महापुरुषके पास ही छोड़ आये हैं। उनके मानस-पटलपर वे बार-बार उदय-होकर एक अपूर्व आलोड़नकी सृष्टि कर रहे हैं। उनका ब्रह्म-भाव दूर होता जा रहा है और भक्ति-भावका उन्मेष होता जा रहा है। वे ब्रह्मोपासनाके मरुस्थलको पारकर भक्ति महारानीके मन्दिरके सदर दरवाजेपर आ खड़े हुए हैं।

उन्हें मन्दिरमें प्रवेश कुछ दिन बाद मिला, जब बन्धु सुन्दरने उनके घर पधारकर कई दिन तक रागमार्गका उन्हें उपेदश किया। तब वे समझे कि भगवान् केवल मर्यादा, पूजा और प्रार्थनाके ही नहीं, प्रीतिके भी पात्र हैं। वे मर्यादा और पूजाके भूखे उतना नहीं, जितना प्रीतिके भूखे हैं। प्रीति उभय-मुखी है। केवल भक्त ही भगवान्से प्रीति करता हो, सो नहीं। भगवान्‌भी भक्तसे प्रीति करते हैं। वे उसे पानेके लिए, उसे अपनानेके लिए उसके पीछे-पीछे डोलते रहते हैं। तभी वे गोपवेश वेणुकर हैं। वेणुसे वे भक्तोंको बुलाते हैं और उनके साथ नाना प्रकारका क्रीड़ा-विलासकर उन्हें सुखी करते हैं और स्वयं सुखी होते हैं।

जिनके कर्ण मायाके प्रभावसे बधिर हैं, जो उनका बंशीरव-सुन नहीं पाते, जिनके दिव्य चक्षु मूँदे हैं, जो उनके सच्चिदानन्दनघन विग्रहको देख नहीं पाते, उनके लिए वे स्वयं मूर्तिरूपमें उतरकर उनतक आते हैं और उनकी प्रेम-सेवा ग्रहण करते हैं। भक्तको उनकी गरज उतनी नहीं, जितनी उन्हें भक्तकी गरज है।

बनमालीरायका मन राधाविनोदकी ओर फिरा और वे उनकी सेवा और देख-भाल करने लगे। उन्होंने उनके श्रृंगार और भोगादिकी उत्तम-से-उत्तम व्यवस्था कर दी, पर उनकी हुक्केकी सेवा यह समझकर बन्द कर दी कि वह अशास्त्रीय है। राजर्षि श्रीबनमाली रायबहादुर

उस समय श्रीकृष्णसुन्दरराय प्रभु नामके एक सिद्ध महात्मा उनके घर रहा ध्यानमें राधाविनोदजीको अर्पण कर दिया करते थे, इसलिए मन्दिर में हक्केकी सेवा करते थे। वे भी बडे रसिक थे और हक्का पिया करते थे। हुक्का पीनेके पहले बन्द किया जाना राधाविनोदको बहत नहीं खला। वे राय प्रभुके पास जाकर अपनी तलब मिटा लिया करते। राय प्रभु हुक्का पीते-पीते लीला-स्मरणमें डूब जाते। हुक्का पीनेका कार्य अभ्यासवश अपने-आप चलता रहता। कभी-कभी उन्हें यह भी पता न रहता कि चिलममें आग है या नहीं, नलीसे धुआँ निकल रहा है या नहीं। हुक्का पीनेकी गति भी धीमी पड़ जाती। दस-दस मिनटके बाद नली मुँहमें देते। उस बीच विनोदी राधाविनोद अच्छी तरह दम लगा लेते।

पर सन् १८९२ के कृष्णपक्षकी द्वादशीके दिन राय प्रभुने अपनी लीला समाप्त की। तबसे अमावस्या तक चार दिन राधाविनोदने किसी प्रकार बिना हुक्केके गुजार दिये। अमावस्याके दिन उनसे न रहा गया। उस दिन राजभोगके पश्चात् पुजारी उनके सामने बैठा हरिनाम कर रहा था। नाम करते-करते तन्द्रा आ गयी। तब उन्होंने स्वप्नमें उससे कहा- 'मेरा हुक्का भर लाओ। इन लोगोंने हुक्का बन्दकर रखा है। दूसरी जगह जाकर पी लिया करता था। वहाँ भी चार दिनसे बन्द है।'

सन्ध्या समय बनमालीरायके मन्दिरमें प्रवेश करते ही पुजारीने उनसे सब बात कही। उन्होंने पुजारीके कहनेपर हुक्केकी व्यवस्था तो कर दी। पर उनके मनमें शंका बनी रही - 'क्या सचमुच विनोद हुक्का पीते हैं ?'

'एक दिन जगद्वन्धु प्रभु बनमालीरायकी राजबाड़ीमें विनोदजीके मन्दिरके बगलवाले कक्षमें ठहरे हुए थे। भोगके पश्चात् उन्होंने बनमाली रायको अपने पास बुलाकर कहा- 'आइये, आज कौतुकी विनोदके हुक्का पीनेकी लीलाका आस्वादन करें।' इतना कह वे राजर्षिको लेकर मन्दिरके जगमोहनमें जा बैठे। कुछ देर बाद बोले- 'देखो, विनोद हुक्का पी रहे हैं। गुड़-गुड़ शब्द हो रहा है।' बन्धु सुन्दरकी कृपासे राजर्षिके दिव्य कर्ण खुल गये। हुक्केकी गुड़गुड़ाहट सुनते-सुनते आनन्दातिरेकके कारण उनका देह शिथिल पड़ गया। नेत्रोंसे अश्रु-बिन्दु टपकने लगे। बाह्य-ज्ञान जाता रहा। वे एक अननुभूतपूर्व भाव-समाधिमें डूब गये।

'इसके बादसे उनकी श्रीविग्रहमें चिन्मय-बुद्धि इतनी दृढ़ हो गयी कि कथा-प्रसंगमें भी कोई ऐसी बात कहता, जिससे जान पड़ता कि श्रीविग्रह केवल एक मूर्ति हैं, तो उन्हें मर्मान्तक वेदना होती * ।'

* श्रीश्रीबन्धुलीला-तरंगिनी, पृ० १९३।

इतना ही नहीं। इसके पश्चात् श्रीराधाविनोदकी अपने हाथसे प्राणभर सेवा करनेके लिए वे बेचैन हो उठे। सेवाका अधिकार प्राप्त करनेके उद्देश्यसे किसी योग्य गुरुसे दीक्षा लेनेकी सोचने लगे। सन् १८९७ में वृन्दावन जाकर अद्वैतवंशके श्रीराधिकानाथ गोस्वामी प्रभुसे दीक्षा ली।

तबसे वे राधाविनोदकी प्रेम-सेवामें इतना तल्लीन हो गये कि सांसारिक किसी कार्यमें मनोनिवेश करना उनके लिए असम्भव हो गया। भाग्यसे उन्हें श्रीकामिनीकुमार घोष जैसे निपुण और विश्वासी मैनेजर मिल गये थे। उनके ऊपर स्टेटका सारा कार्य छोड़ वे राधा-विनोदसे लाड़-लड़ाने में लग गये। संसारसे, यहाँ तक कि अपने सगे-सम्बन्धियोंसे भी वे राधा-विनोदके सम्बन्धसे ही सम्बन्ध मानने लगे। उन्हें यदि कोई 'पिताजी', 'चाचाजी' या 'भाईजी' कहकर पुकारता, तो वे उत्तर न देते। उन्हें 'हरिकृष्ण' कहकर पुकारना होता।

कुछ दिन बाद वे व्रज चले गये। वहाँ वृन्दावन और राधाकुण्डमें दो विशाल भवनोंका निर्माण किया, जो 'ताड़ास मन्दिर' और 'राजवाड़ी' के नामसे प्रसिद्ध हैं। वे कभी राधा-विनोदको लेकर राधाकुण्डमें रहते, कभी वृन्दावनमें।

उनका सारा समय श्रीराधा-विनोद और साधु-वैष्णवोंकी सेवामें व्यतीत होता। साधु-वैष्णवकोंकी सेवाके उद्देश्यसे उन्होंने कई महत्त्वपूर्ण कार्य किये। औषधालय खोलकर साधु-वैष्णवों और व्रजवासियोंकी चिकित्साकी व्यवस्था की। भक्तिविद्यालयकी स्थापना कर और छात्रोंको छात्रवृत्ति देकर उन्हें शास्त्र पढ़ानेकी व्यवस्था की। छापाखाना खोलकर चार लाख रुपयोंकी लागतसे अष्टटीका सहित श्रीमद्भागवत और अन्य भक्ति ग्रन्थोंका मुद्रण करवाया और उनका साधु-वैष्णवोंमें निःशुल्क वितरण किया।

बनमालीराय व्रजमें आकर यहाँके साधु-वैष्णव-जन-जीवनके केन्द्र बन गये। उनके निवास-स्थानपर सदा साधु-समाज जुटा रहता। राधाविनोदको लेकर तरह-तरहके राग-रंग, उत्सव और इष्ट-गोष्ठियाँ होती रहतीं। उस समय व्रजमें सिद्ध महात्माओंकी जैसे बाढ़ आयी हुई थी। उनमें से शायद ही कोई ऐसा रहा हो, जिसका उन्होंने निकटसे संग न किया हो और जिसके अपने जीवनसे उनका व्यक्तित्व किसी-न-किसी प्रकारसे जुड़ न गया हो, जिसकी उनके ऊपर कृपा-दृष्टि न हुई हो। पर कुछ विशिष्ट महात्माओंकी कृपा उन्हें विशेष रूपसे प्राप्त हुई। वे थे श्रीराधिकानाथ गोस्वामी प्रभु, प्रभु जगद्वन्धु, श्रीधामपुरीके श्रीराधारमणचरण दास श्रीराधामोहनदास बाबाजी

बाबाजी महाराज (बड़े बाबा), श्रीविजयकृष्ण गोस्वामी, श्रीगौरकिशोर शिरोमणि, श्रीश्रीरामहरिदास बाबाजी, श्रीकृष्णसुन्दरराय प्रभु, श्रीहरिसुन्दर भौमिक भुजा, श्रीजगदीशदास बाबा और श्रीरामकृष्णदास पण्डित बाबा। इन सब महात्माओंके कृपा-आशीर्वादके फलस्वरूप उन्हें श्रीराधाविनोदके निज-धाममें उनकी नित्य-सेवाकी अनायास प्राप्ति हुई।

प्रेम और भक्ति — जीवन-संदेश

ईश्वर-प्रेम की अनुभूति भक्त-साहित्य का एक महत्त्वपूर्ण विषय है। इन प्रसंगों को श्रद्धा, संवेदनशीलता और समर्पण के संदर्भ में पढ़ा जा सकता है।

कथा का सार

राजर्षि श्रीवनमाली रायबहादुर की कथा भक्ति, विनम्रता और साधना पर मनन करने का अवसर देती है। इस संग्रह में अन्य भक्तों के जीवन-प्रसंग भी पढ़ें।