ब्रज के भक्त भाग 3 · अध्याय 76

पं० श्रीजगन्नाथप्रसादजी 'भक्तमाली'

पं० श्रीजगन्नाथप्रसादजी 'भक्तमाली' की प्रेरक हिंदी कथा। जानिए उनके जीवन, भक्ति और साधना से जुड़े महत्वपूर्ण प्रसंग।

पं० श्रीजगन्नाथप्रसादजी 'भक्तमाली'
पं० श्रीजगन्नाथप्रसादजी 'भक्तमाली' — ब्रज के भक्त भाग 3

पं० श्रीजगन्नाथप्रसादजी 'भक्तमाली' का यह भक्त-चरित्र ब्रज की साधना, श्रद्धा और जीवन से जुड़े प्रसंगों को सामने लाता है। नीचे कथा को अलग-अलग विषयों में व्यवस्थित किया गया है।

जन्म, परिवार और प्रारम्भिक जीवन

वृन्दावनके प्रेमी भक्तोंमें ऐसा कौन है, जिसका हृदय श्रीजगन्नाथप्रसाद भक्तमालीजीका नाम सुनते ही उनके प्रति प्रगाढ़ भक्ति-भावसे नहीं भर जाता ? जिसने एक बार भी उनके दर्शन किये हैं, उनकी कथा सुनी है, या क्षण भरको भी उनका संग किया है, उसके हृदयमें उनकी स्मृति उसके जीवनकी एक अमूल निधि बनकर रह गयी है। उनके गौर वर्णके दीर्घ कलेवर, सुन्दर श्रीप्तिमान मुखारविन्द, उन्नत ललाट, स्नेह भरी दृष्टि, मधुर स्मित और बालसुलभ अति सरल निष्कपट भावकी स्मृति मानस-पटलपर उदय होते ही भक्तिकी एक लहर अनायास हृदयमें दौड़कर मन और प्राणको शीतल कर देती है। ऐसा क्यों होता है ? इसलिए कि भक्तिके मूर्तिमान स्वरूप ही थे भक्तमालीजी।

भक्तमालीजीका जन्म हुआ सं० १९५५, माघ कृष्णपक्ष १२ को मध्य प्रदेशमें गुना जिलेके अन्तर्गत चाचोड़ा ग्राममें। उनके पिताका नाम था श्रीआशारामजी, माताका श्रीमतीफूलाबाईजी। मिडिल पास करनेके पश्चात् उनकी नियुक्ति अध्यापक रूपमें उसी ग्राममें आठ रुपये महीनेपर हो गयी। भक्तिके प्रबल संस्कार उनमें बालपनेसे ही थे। तभीसे वे ध्रुवको दर्शन देते हुए भगवान्‌के एक चित्रकी बड़े प्रेमसे पूजा करते थे।

उनका भक्तिभाव दिनोंदिन बढ़ता गया। माता-पिताने उनका विवाह कर दिया। फिर भी, उसका उनके भक्तिभावपर कोई असर न पड़ा। अध्याापक बननेके कुछ दिन बाद उनका मन गुरुकी खोजमें वृन्दावन जानेको मचल पड़ा। जिस प्रकार वृन्दावन जाकर उन्हें गुरुकी प्राप्ति हुई, उसका विवरण उन्होंने एक बार लेखकको इस प्रकार दिया था-

'मेरे ऊपर गुरुदेवने अयाचित रूपसे पं० रामकृष्णदास बाबाकी कृपाके माध्यमसे कृपा की। मैं पंडित बाबाकी कृपाको भी उन्हींकी कृपा मानता हूँ। एक बार मेरे मौसेरे भाई श्रीलक्ष्मीदासजी (मौनी बाबा) मुझे अपने साथ वृन्दावन ले आये। वे मुझे पंडित बाबाके पास ले गये। मैं उस समय शिवजीकी आराधना किया करता था। मुझे देखते ही वे बोले- अरे ! इसपर तो शिवजीकी कृपा हो गयी है। लक्ष्मी, इसे टटिया स्थानके महन्थजीसे मन्त्र दिलवा दो।' लक्ष्मीदासजीने श्रीअमोलकरामजीसे कहा। अमोलकरामजीने बाबा भगवानदासजीको पंडित बाबाकी बात कहकर मन्त्र-दीक्षाके लिए राजी किया। उन्होंने ही दीक्षामें भेंट करनेके लिए वस्त्रादिकी व्यवस्था कर दी। मुझसे मूँछें मुड़नेवानेको कहा। मैं बड़े धर्म-संकटमें पड़ गया- मूंछें कैसे मुड़वाऊँ माता-पिताके रहते।

वे क्या कहेंगे?"

"मैं बिना किसीसे कुछ कहे-सुने घर लौट गया, पर पंडित बाबाका कृपा-आशीर्वाद तो निष्फल हो नहीं सकता था। अपने-आप ही ऐसी स्थिति बन गयी, जिससे मुझे मूँछे मुड़वानी पड़ीं। चार महीने बाद मेरी माताजीका स्वर्गवास हो गया। मुझे उनकी अस्थियाँ गंगामें विसर्जन करने सोरों घाट जाना पड़ा। लौटते समय मैं वृन्दावन गया और अमोलकरामजीसे मिला। उन्होंने देखते ही कहा- 'अरे तू भाग क्यों गया था ?י

'मैंने उनसे भाग जानेका कारण बताकर क्षमा माँगी और कहा- 'अब कृपाकर दीक्षा दिलवा दीजिये'। मैं श्रीस्वामीभगवानदासजी महाराजसे दीक्षा लेकर धन्य हुआ।'

दीक्षा-ग्रहणके बाद जब कभी सम्भव होता भक्तमालीजी वृन्दावन चले जाया करते। पर उनका वेतन उस समय भी केवल दस रुपये प्रतिमाह था। अर्थका अभाव बना ही रहता। वृन्दावन जाना बहुत कम सम्भव होता। एक बार जब राधाष्टमीका उत्सव निकट था, वे वृन्दावन जानेके लिए विशेष रूपसे उत्कण्ठित हो पड़े। टिकटके लिए पर्याप्त पैसे नहीं थे तो भी घरसे निकल पड़े। कोटा स्टेशनसे तीन आनेका अगले स्टेशनका टिकट लेकर गाड़ीमें बैठ गये। रास्तेमें टिकट-कलेक्टर टिकट चेक करने आया। ये जिस बेंचपर बैठे थे, उसपर तीन और आदमी बैठे थे। टिकट-कलेक्टरने एक-एक कर उन तीनों आदमियोंके टिकट चेक किये। ये गुरु महाराजका ध्यान करते हुए चुपचाप बैठे रहे। न जाने क्यों टिकट-कलेक्टर इन्हें छोड़ दूसरे आदमियोंका टिकट चेक करने लगा और दूसरे स्टेशनपर डिब्बेसे उतर गया।

भक्तों के साथ मिलन और सत्संग

जब गाड़ी मथुरा पहुँची तो ये गुरुदेवका नाम लेते हुए स्टेशनके बाहर आ गये। वहाँ भी उनसे किसीने टिकट नहीं माँगा।

बिना टिकट यात्रा करना कानूनके विरुद्ध है। इसके लिए भक्तमालीजीको दण्ड मिलना चाहिए था। टिकट-कलेक्टरोंने इसकी अनदेखी कर सरकारी नियमके विरुद्ध कार्य क्यों किया ? उत्तर यह है कि सरकारके भी सरकार भक्तोंके भगवान् हैं। सरकारी मशीनरीके कल-पुरजे भी उन्हींकी दी हुई शक्ति और प्रेरणासे चलते हैं। उनके समदर्शी होते हुए भी भक्तोंके प्रति उनका पक्षपात सर्वविदित है। गीतामें उन्होंने स्वयं इसे स्वीकार किया है।*

कुछ दिन बाद भक्तमालीजी सपत्नीक वृन्दावन आकर स्थायी रूपसे यहाँ रहने लगे। उन्होंने पं० रामप्रसादजी त्रिवेदीसे संस्कृत पढ़ी और श्रीम‌द्भागवतका अध्ययन किया। टोपीकुञ्जके महन्थ माधवदासजीसे नाभाजीके भक्तमालका अध्ययन किया। कुछ ही दिनोंमें वे श्रीमद्भागवत और भक्तमालकी कथाएँ कहने लगे। कथाएँ वे बड़े सीधे, सरल भावसे कहते। उनकी कथाओंमें शब्दाडम्बर या पांडित्य प्रदर्शनकी चेष्टा बिलकुल न होती। कथा कहते-कहते वे तन्मय और भाव-विभोर हो जाते। श्रोता भी उनके साथ भाव-समुद्रमें डुबकियाँ खाने लगते। भक्तमालके वे विशेषज्ञ माने जाते। उनकी भक्तमालकी कथा कहीं-न-कहीं नित्यप्रति होती रहती। इसलिए 'भक्तमाली' शब्द उनके नामके आगे जोड़ा जाने लगा और वे साधारणतः इसी नामसे पुकारे जाने लगे। उनका असली नाम बहुत कम लोग जानते।

पर भक्तामालीजी एक सफल कथावाचक मात्र नहीं थे। वे प्रभुके चिह्नित भक्तोंमें एक विशिष्ट स्थान रखते थे। हरि-कथाको उन्होंने अपनी जीविकाके साधन

रूपमें नहीं अपनाया था। यह उनकी भक्ति-साधनाका ही एक आवश्यक अङ्ग थी। उस रूपमें यह साधन ही नहीं, साध्य भी थी। हरिभक्तके लिए हरिकथा

श्रवण-कीर्तनसे बढ़कर दूसरा कोई कृत्य है ही नहीं, इसलिए कथामें भेंट-पूजाके रूपमें उन्हें जो कुछ मिलता, उसमें उनकी आसक्ति रत्तीभर भी नहीं होती। उसे वे दूसरे लोगोंमें बाँटकर अधिक प्रसन्न होते। कभी ऐसा भी होता कि कथाकी समाप्तिपर वे घर खाली हाथ ही लौटते। इसलिए, उन्हें धनका अभाव बना ही रहता। पर उसके कारण न उन्हें कोई कष्ट होता, न उनका कोई काम रुकने पाता। उनका योग-क्षेम उनके जैसे अपने भक्तोंके लिए अपनी प्रतिज्ञाके अनुसार प्रभु स्वयं वहन करते। उनकी लड़कीके विवाहमें प्रभुने स्वयं भक्तोंको प्रेरणा देकर धन जुटाया था एक दिन वृद्धा स्त्रीने सौ रुपये उन्हें यह कहकर भेजे थे कि श्रीकृष्णने स्वप्नमें उसे उनकी कन्याके विवाहमें सहायता करनेकी आज्ञा की है।

कदाचित् धनाभावके कारण भक्तमालीजी अपने ठाकुरकी वैसी सेवा नहीं कर पाते थे, जैसी वे चाहते थे। इसलिए एक बार श्रीकृष्णने स्वयं उन्हें स्वप्नमें गीताका अपना यह श्लोक पढ़कर सुनाया था-

पत्र पुष्यं फलं तोयं यो में भक्त्या प्रयच्छति । तदहं भक्त्युपहृतम् अश्नामि प्रयतात्मनः ।।

- गीता, ९.२६

भक्तमालीजीके भक्तिभावके कारण वृन्दावनके सभी सन्त उनसे प्रभावित '

दिव्य अनुभूति और कृपा के प्रसंग

और उनके ऊपर कृपा रखते थे। उनमें विशेष रूपसे उल्लेख्य हैं पं श्रीरामकृष्णदास बाबाजी, श्रीबाबा हंसदासजी, श्रीबाबा अवधदासजी, श्रीहरिबाब जी और उड़िया बाबाजी।

सन्तोंकी कौन कहे, स्वयं श्रीकृष्ण उनसे आकृष्ट होकर जब-तब किसी-

किसी छलसे उनके ऊपर कृपा कर जाया करते थे। एक बार जब भक्तमाली जी अपने घरमें बैठे हारमोनियमपर भजन गा रहे थे, एक सुन्दर बालक आकर उन सामने बैठ गया और तन्मय होकर भजन सुनने लगा। भक्तमालीजीने समझा कि वह किसी रासमण्डलीका बालक है, जो उनके भजनसे आकृष्ट हो चला आया है। भजन समाप्त करनेके बाद उन्होंने पूछा-

'बेटा, तुम कहाँ रहते हो ?'

'अक्रूर घाटपर भतरोड़ मन्दिरमें रहता हूँ,' उसने कहा।

'तुम्हारा क्या नाम है ?'

'लड्डू गोपाल।'

'तो तुम लड्डू खाओगे? या पेड़ा खाओगे ?'

उस समय भक्तमालीजीके पास लड्डू नहीं, पैड़े ही थी, इसलिए उन्होंने इस प्रकार पूछा। बालकने भी हँसकर कहा- 'पेड़ा खाऊँगा।'

भक्तमालीजीने पेड़े लाकर दिये। वह पेड़े खाता हुआ और भक्तमालीजीकी ओर हँसकर देखता हुआ चला गया। पर, जाते समय अपनी जादूभरी मुस्कान और चितवनकी अपूर्व छवि भक्तमालीजीके हृदयपर अंकित करता गया। सारा दिन और सारी रात उसकी छवि उन्हें व्यग्र किये रही। तरह-तरहके विचार उनके मनमें उठते रहे। ऐसा सुन्दर बालक तो कभी देखा नहीं। वह रासमण्डलीका बालक ही था, या कोई और ? घरमें ऐसे आकर बैठ गया जैसे घर उसीका हो, कोई भय नहीं, संकोच नहीं। भजन तन्मय होकर ऐसे सुनता रहा, जैसे उसे न जाने कितना रस मिल रहा हो। कहीं वे भक्तोंके भगवान् ही तो नहीं थे, जो नारदके प्रति कहे गये अपने इन वचनोंको चरितार्थ करने आये थे- 'मद्भक्ताः यत्र गायन्ति तत्र गायन्ति तत्र तिष्ठामि नारद।' जो भी हो बालक अपना नाम और पता तो बता ही गया है।

कल उसको खोज करनी होगी।

दूसरे दिन प्रातः होते ही भक्तमालीजी भतरोड़में अक्रूर मन्दिर जा पहुँचे। पुजारीसे पूछा- 'यहाँ लड्डू गोपाल नामका कोई बालक रहता है ?'

पुजारीने कहा- 'लड्डू गोपाल तो हमारे मन्दिरके ठाकुरका नाम है। और कोई बालक यहाँ नहीं रहता।'

यह सुनते ही भक्तमालीजी सिहर उठे। उनके नेत्र डबडबा आये। आँसू पोंछते हुए उन्होंने कहा- 'कल एक सुन्दर बालक मेरे पास आया था। उसने अपना नाम लड्डू गोपाल बताया था और निवास स्थान अक्रूर मन्दिर। मैने उसे पेड़े खानेको दिये थे। पेड़े खाकर वह बहुत प्रसन्न हुआ था। कहीं आपके ठाकुरने ही तो यह लीला नहीं की थी ?'

'भक्तमालीजी ! आप धन्य हैं। हमारे ठाकुरने ही आपपर कृपा की, इसमें सन्देह नहीं। इन्हें पेड़े बहुत प्रिय हैं। कई दिनसे पेड़े चुक गये थे। मैं बाजार नहीं जा पाया था, इसलिए पेड़ोंका भोग नहीं लगा सका था।'

भक्तमालीजीने मन्दिरके भीतर जाकर लड्डू गोपालके दर्शन किये। दण्डवत् प्रणाम् कर प्रार्थना की 'ठाकूर ! कृपा बनाये रखना। बार-बार उसी प्रकार आकर दर्शन देते रहना।'

पता नहीं फिर कभी लड्डू गोपालने उसी रूपमें उनपर कृपा की या नहीं। पर, एक बार वे अयोध्या गये थे। देर रात्रिमें वहाँ पहुंचे थे। इसलिए स्टेशनके बाहर खुलेमें सो रहे थे। प्रातः उठते ही किसी आवश्यक कार्यके लिए कहीं जाना था, पर सबेरा हो गया था। नींद नहीं खुल रही थी। लड्डू गोपाल जैसा ही एक सुन्दर बालक आया और उनके तलुओंमें गुलगुली मचाते हुए बोला- 'उठो, सबेरा हो गया।' भक्तमालीजी हड़बड़ाकर उठे। उस बालककी एक झलक ही देख पाये थे कि वह अदृश्य हो गया।

प्रेम और भक्ति — जीवन-संदेश

ईश्वर-प्रेम की अनुभूति भक्त-साहित्य का एक महत्त्वपूर्ण विषय है। इन प्रसंगों को श्रद्धा, संवेदनशीलता और समर्पण के संदर्भ में पढ़ा जा सकता है।

कथा का सार

पं० श्रीजगन्नाथप्रसादजी 'भक्तमाली' की कथा भक्ति, विनम्रता और साधना पर मनन करने का अवसर देती है। इस संग्रह में अन्य भक्तों के जीवन-प्रसंग भी पढ़ें।