ब्रज के भक्त भाग 3 · अध्याय 98
पण्डित रामकृष्ण दास बाबाजी
पण्डित रामकृष्ण दास बाबाजी की प्रेरक हिंदी कथा। जानिए उनके जीवन, भक्ति और साधना से जुड़े महत्वपूर्ण प्रसंग।

पण्डित रामकृष्ण दास बाबाजी का यह भक्त-चरित्र ब्रज की साधना, श्रद्धा और जीवन से जुड़े प्रसंगों को सामने लाता है। नीचे कथा को अलग-अलग विषयों में व्यवस्थित किया गया है।
जन्म, परिवार और प्रारम्भिक जीवन
[ वृन्दावन]
बालक रामप्रतापकी आयु उस समय चार या पाँच वर्ष की थी। जयपुरके श्रीगोविन्ददेवके मन्दिरके प्रांगणमें वह नित्य खेलने जाया करता। खेलके साथी थे गोविन्दजीके सेवाइत श्रीकिशोरीमोहन गोस्वामीके बालक कृष्णचन्द्र और राधाचन्द्र। गोविन्दजीपर तो नित्य उसकी दृष्टि पडती ही। वह सोचता - यह भी एक गोस्वामी-बालक है। इसे वे सबसे अधिक प्यार करते हैं। तभी उसे इतने अच्छे-अच्छे कपड़े, गहने और मोर-मुकुट आदि पहनाते हैं, इसकी आरती उतारते हैं, इसे खेलनेको बाँसुरी और अच्छे-अच्छे खिलौने देते हैं। कितना अच्छा होता यदि यह भी मेरे साथ खेला करता, पर यह तो कभी मन्दिरसे बाहर निकलता ही नहीं !
उस दिन न जाने क्यों श्रीकृष्णचन्द्र और राधाचन्द्र खेलने नहीं आये। रामप्रताप प्रांगणमें खड़ा अपने दोनों हाथोंमें गोलियाँ खड़खड़ाता हुआ गोविन्दजीकी ओर निहार रहा था। पर, गोविन्दमें किसी प्रकारकी प्रतिक्रिया नहीं हो रही थी। वह उनके सामने अपनी रंग-बिरंगी गोलियोंसे स्वयं खेलने लगा। खेलते-खेलते कभी एक रंगकी गोली उठाकर उन्हें दिखाता, कभी दूसरे रङ्गकी।
आखिर गोविन्दजीको लोभ हो ही आया। सोचा, सामने थालमें रखी अपनी सोनेकी गोली लेकर उतर पड़ें सिंहासनसे और आँगनमें जाकर जुट जायें रामप्रतापके साथ खेलमें, पर जायें कैसे? उन्हें पुजारी और दरबानका भय जो था।
उसी समय प्रभुकी इच्छा देख उनकी अघटन-घटन-पटीयसी योगमाया शक्तिने अपने प्रभावका विस्तार किया। पुजारी और द्वार-सेवकादि किसी कार्यसे बाहर चले गये। दरबानको शौचका वेग हुआ। वह भी बाहरका फाटक बन्द कर चला गया।
अवसर देख गोविन्दजी अपनी गोली ले आँगनमें उतर पडे और लगे रामप्रतापके साथ खेलने। कुछ देर बाद दरबानको आते देख वे फिर सिंहासनपर जा विराजे। अपनी गोली तो ले ही गये, रामप्रतापकी भी ले भागे।
रामप्रतापने 'मेरी गोली, मेरी गोली ।' कह चीख-चीखकर रोते हुए गोविन्दका पीछा किया। द्वारिक पीछेसे भागता आया और उसे भीतर जानेसे रोक दिया।
उसी समय गोस्वामीजी आये शृङ्गार-आरती करने। रामप्रतापको रोते देख उन्होंने उससे रोनेका कारण पूछा। उसने कहा- 'गोविन्दा मेरी गोली लेकर भाग आया है।' उन्होंने विस्मयकी हँसी हँसते हुए कहा- 'अच्छा, रुको। मैं देखता हूँ।'
वे जैसे ही मन्दिरके भीतर गये, उन्होंने देखा कि गोविन्दजीकी सोनेकी गोलीके साथ एक और गोली भी थालमें रखी है। वे आश्चर्यमें डूब गये। उनका शरीर रोमांचित हो गया। उन्होंने मन-ही-मन रामप्रतापके भाग्यकी सराहना की और गोली लाकर उसे दे दी।
रामप्रतापको दैवी सम्पत्ति परम्परासे उत्तराधिकारमें प्राप्त थी। उसके पितामह राजस्थानके कामठ ग्राममें रहते थे। वे श्रीरामानुज सम्प्रदायके वैष्णव थे और 'श्रीनारायणकवच' में सिद्ध थे। सभी शास्त्रोंका उन्हें अच्छा ज्ञान था। जयपुर महाराज श्रीरामसिंहजी उनके गुणोंसे मुग्ध थे। उन्होंने उन्हें जयपुर बुलाकर युवराजके अध्यापकके रूपमें उनकी नियुक्ति कर दी थी। राजमहलके निकट उनके लिए एक गृहका निर्माण कर दिया था और दो गाँव जागीरमें उनके नाम लिख दिये थे।
जयपुरमें उनके एक पुत्रका जन्म हुआ। नाम हुआ श्रीलक्ष्मीनारायण। लक्ष्मीनारायणको थोड़े ही समयमें सर्वशास्त्रव्युत्पन्न और सर्वगुणसम्पन्न देख पिताके आनन्दकी अवधि न रही। पर, वे अधिक दिन इस आनन्दका उपभोग न कर सके। लक्ष्मीनारायणको अल्पावस्थामें ही असहाय छोड़कर नित्यधामको चले गये।
पिताके अन्तर्धानके पश्चात् लक्ष्मीनारायणको तीव्र वैराग्य हुआ। वे घर छोड़कर वनमें चले गये। श्रीराम जानकीके दर्शनकी लालसासे राम-मन्त्रका जप और ध्यान करने लगे। कहते हैं कि एक दिन अश्वारोही रामचन्द्रने भ्राताओंके साथ उन्हें दर्शन दिये और विवाह करनेका आदेश देकर अन्तर्धान हो गये। इष्टदेवकी आज्ञा शिरोधार्य कर लक्ष्मीनारायण घर लौट गये।
महाराज रामसिंह प्रसन्न हो उनके लिए योग्य कन्याकी खोज करने लगे। उसी समय वल्लभकुलकी एक दौहित्र-सन्तानको रामचन्द्रका स्वप्नादेश हुआ - 'तुम
अजके भक्त
अपनी कन्या कमलाका विवाह श्रीलक्ष्मीनारायण जोशीसे कर दो।' कमलादेवीका लक्ष्मीनारायणसे विवाह सम्पन हुआ।
शुभ सम्वत् १९१४, भाद्र मासमें कमलादेवीने एक पुत्र प्रसव किया। पुत्रका नाम रखा श्रीरामप्रताप।
कदाचित् प्रतापी रामप्रतापका जन्म कराना ही था श्रीरामचन्द्रकी लक्ष्मीनारायणके विवाहकी योजनाका मुख्य उद्देश्य। रामचन्द्रके मनोभीष्टकी पूर्तिके पश्चात् एक दिन लक्ष्मीनारायण नित्य कृत्यके समय ध्यान करते-करते समाधिस्थ हो गये। उनकी समाधि चिर-समाधि सिद्ध हुई।
रामप्रतापकी अवस्था उस समय ३ वर्षकी थी। वर्ष-दो वर्ष बाद ही उसकी गोविन्दजीसे मैत्री हो गयी। साथ ही फूट पड़ा उनके साथ खेल-कूदका आनन्दमय उत्स। गोविन्दजीकी स्फूर्तिमें वह कभी-कभी उन्मादग्रस्त बालककी तरह घण्टों अकेले बैठा रहता। यह देख उसकी माँ और ताईको चिंता होने लगी। ताई कई दिन तक निकटके हनुमानजीके मन्दिरमें धरना देकर पड़ी रहीं। आदेश मिला - 'चिंता न करो। बालक पागल नहीं है। वह भगवानका नित्य परिकर है।'
एक दिन रामप्रताप पतंग उड़ा रहा था। किसीने पतंग काट दी। वह भूमिपर लोट-पोट हो रोने लगा। उसी समय गोविन्दजी भागे आये। उसे बहुत-सी डोर और पतंगें देकर चले गये। रामप्रताप प्रसन्न हो घर गया। माँने इतनी सारी डोर और पतंगें देखकर कहा- 'ये कहाँसे लाया रे ?'
'गोविन्दाने दी है', उसने हँसते हुए उत्तर दिया। माँको शंका हुई कि वह गोविन्दजीके जगमोहनसे भेंटके पैसे चुराकर डोर पतंग लाया है। उसकी ताड़ना-भर्त्सनाकी और मन्दिरमें जाकर खेलनेकी मनाही कर दी।
कुछ बड़े होनेपर रामप्रतापजीका खेल-कूदमें आवेश जाता रहा और विद्याध्ययनमें आवेश हो आया। अतिशय मेधावी होनेके कारण उन्होंने दस-ग्यारह वर्षकी अवस्थामें ही पाणिनीके सूत्र, सारस्वत व्याकरण और अमरकोष कण्ठस्थ कर लिये। उर्दू और बँगला भाषाएँ भी सीख लीं।
ग्यारह वर्षकी अवस्थामें उपनयन संस्कारके पश्चात् सावित्रीदाता छोटेलाल राजपुरोहितने उन्हें सावित्री पुरश्चरण करनेका आदेश किया। यथारीति पुरश्चरण करनेके पश्चात् सावित्रीके दर्शन हुए। सावित्री उन्हें वृन्दावन जानेका आदेश देकर अन्तर्धान हो गयीं।
तभीसे वे घर छोडकर वृन्दावन जानेका प्रयत्न करते रहे। परन्तु माँ और राज-सरकार द्वारा बाधित होनेके कारण उनके प्रयत्न विफल होते रहे। तेरह वर्षकी अवस्थामें किसी प्रकार वे वृन्दावन जानेमें सफल हुए। वहाँ श्रीगोविन्ददेवके मन्दिरके निकट गोविन्दजीके गोस्वामियोंके आश्रममें रहने लगे।
अध्ययनमें उनका आवेश अब भी जारी रहा। उन्होंने रंगजीके मन्दिरके श्रीगोपीलाल गोस्वामीजीसे हरिभक्तिविलास और श्रीनीलमणि गोस्वामीजीसे श्रीसुदर्शन शास्त्रीसे न्याय, करौलीकुञ्जके श्रीनृसिंहदासजीसे श्रीमद्भागवत्, षटसंदभादि भक्ति-ग्रन्थोंका अध्ययन किया। पद संदर्भका अध्ययन करते समय वे नित्य गोपेश्वर महादेवको पचास अध्याय श्रीमद्भागवत्के सुनाते। बीस वर्षकी अवस्थामें उनहोंने अध्ययन समाप्त किया।
वृन्दावन जानेके पूर्व उनका जयपुरके श्रीनृसिंहदासजीसे परिचय हो चुका था।
नसिंहदासजी तैलंगदेशीय ब्राह्मण और षट्दर्शनाचार्य 'थे। वे सामवेदगान और वीणावादनमें सुनिपुण थे। उनका कण्ठ स्वर गन्धर्वोके समान था। श्रीगीतगोविन्द और श्रीकृष्णकर्णामृतादिके गानेमें वे आविष्ट हो जाया करते थे। एक दिन श्रीगोविन्दजीने उन्हें स्वप्नमें दर्शन देकर कहा- 'मैं तुम्हारे मुखसे सामवेद गान सुनना चाहता हूँ, पर तुम पहले वृन्दावन जाकर श्रीनित्यानन्दास बाबाका शिष्यत्व ग्रहण कर आओ।' स्वप्नादेश प्राप्तकर नृसिंहदासजी संसार त्यागकर वृन्दावन चले गये। सिद्ध बाबासे दीक्षा और वेष ग्रहणकर वे जयपुर गये। गोविन्दजीको सामवेद-गान सुनाया। उनका सामवेदगान और वीणावादन सुन जयपुराधिपति श्रीरामसिंह और श्रीकिशोरीमोहन गोस्वामी मुग्ध हो गये। उन्होंने आग्रहकर उन्हें जयपुरमें ही रख लिया।
रामप्रताप वृन्दावनमें अध्ययन करनेके समय बीच-बीचमें माँके आग्रहसे जयपुर जाया करते और श्रीनृसिंहदासजीका सत्संग करते। उनके सत्संगसे सिद्ध श्रीनित्यानन्ददास बाबाजीके प्रति उनकी विशेष श्रद्धा हो गयी। अध्ययन समाप्त होनेपर उन्होंने उनसे दीक्षा और वेष ग्रहण किया। वेशका नाम हुआ श्रीरामकृष्णदास, पर उनके असाधारण पाण्डित्यके कारण लोग उन्हें 'पण्डित बाबा' कहकर पुकारने लगे।
गुरुदेवकी आज्ञासे उन्होंने गोवर्धन जाकर सिद्ध श्रीकृष्णदास बाबाजीसे स्मरणमनन-सम्बन्धी शिक्षा प्राप्त की। तत्पश्चात् बरसाने रहकर भजन करने लगे।
बरसानेमें प्रसिद्ध कीर्तनिया श्रीगौरचरणदास बाबाजी रहते थे। उनसे वे बड़ी तालका बिहागड़ा कीर्तन सीखने लगे। कीर्तन सीखनेमें उनका आवेश बढ़ता गया। भजनमें आवेश कम होता गया। गुरुदेवको जब इसका पता चला, उन्होंने कीर्तन
बन्द कर भजनमें लग जानेका आदेश किया। पर, बहुत चेष्टा करनेपर भी उनका भजनमें मन न लगा। तब उन्होंने गुरुदेवकी आज्ञासे उद्धवक्यारी में रत्नसिंहासनके सामने बाई ओरके कदम्बके नीचे एक आसनपर सत्रह दिन तक बैठे रहकर अष्टादशाक्षर मन्त्रका पुरश्चरण किया। पहले तीन दिन उन्होंने दूधके अतिरिक्त और कुछ भी ग्रहण नहीं किया। उसके पश्चात् बारह दिन तक केवल जल ही लिया। पीछे जल भी छोड़ दिया। लय-विक्षेपरहित मनसे मन्त्र जप करते रहे। सत्रहवें दिन राधा-कृष्णके साक्षात् दर्शन हुए।
इस घटनाकी पुष्टि एक बार उन्होंने शेषावस्थामें स्वयं अपने मुखारविन्दसे की थी। तब वे वृन्दावनमें दाऊजीके बगीचेमें रहते थे। एक दिन वे बगीचेमें टीनके छप्परके नीचे चुपचाप लेटे थे। निकट बैठे श्रीप्रियाशरण बाबाजी, श्रीकृपासिन्धुदास बाबाजी, श्रीललितमोहन गोस्वामी आदि आपसमें धीरे-धीरे बाबा द्वारा किये गये पुरश्चरणके बारेमें बात कर रहे थे। किसीने कहा- पुरश्चरणमें उन्हें श्रीकृष्ण और दाऊजीके दर्शन हुए। उसी समय वे बोल पड़े- 'हट्, प्रिया-प्रियतमके।'
प्रिया-प्रियतमने दर्शन देते समय कहा- 'बाबा, हम तोते प्रसन्न हैं। बोल तू कहा चाहे ?'
वे बोले- 'मैं तो गुरुनकी आज्ञा ते भजन कर रह्यौ हूँ। जानूँ नायँ कहा चाहूँ। तुम दोउनकी प्रसन्नता छाँड़कै और चाहियेकौ कहा है ?'
प्रियाजीने मुस्कराते हुए कहा- 'बाबा, राघवकी गुफा में भजन कियौ कर।' इतना कह दोनों अन्तर्धान हो गये।
तबसे बाबा पूछरीमें राघवकी गुफामें रहकर भजन करने लगे। वे प्रातः २ बजे भजनमें बैठते और अपराह्न २ बजे तक लीला स्मरणमें तल्लीन रहते। अपराह्नमें गुफासे बाहर निकलते। उस समय साधु-महात्माओंकी भीड़ वहाँ जमा रहती। पाठ-कीर्तन, इष्ट-गोष्ठी आदिका क्रम चलता रहता।
कुछ दिन बाद बाबाका भजनावेश इतना बढ़ गया कि समयका ध्यान रखकर भजनमें बैठना और उठना उनके लिए सम्भव न रहा। वे कब भजनमें बैठेंगे और कब उठकर बाहर आयेंगे, यह कोई न जानता। अक्सर दो-तीन दिन लगातार गुफामें बैठे भजन करते रहते। दो-तीन दिन बाद एक बार गुफासे निकल मधुकरीके लिए बाहर जाते। परिणाम यह हुआ कि गुफाके सामने जो नित्य अपराह्नमें लोगोंकी भीड़ लग जाया करती, यह समाप्त हो गयी।
इसी बीच एक बार उनकी माँ आयर्थी जयपुरसे उन्हें देखने। तीन दिन तक उन्हें गुफाके बाहर प्रतीक्षामें बैठे रहना पड़ा। तीसरे दिन जब वे बाहर निकले, उन्होंने उनकी ओर भूक्षेप भी नहीं किया। वे सीधे मधुकरीको चले गये। माँने रो-रोकर उन्हें पुकारते हुए कुछ दूर पीछा किया। उन्होंने फिर भी पीठ मोडकर उनकी तरफ न देखा। माँ असह्य पीडा हृदयमें लेकर जयपुर लौट गयीं।
माताके चले जानेके बाद उनका चित्त अस्थिर रहने लगा, भजनमें बाधा आने लगी। उन्होंने सोचा कहीं कुछ अपराध हो गया है। वे गये सिद्ध कृष्णदास बाबाके पास और उनसे इसका कारण जानना चाहा। उन्होंने कहा- 'गर्भधारिणी माँके प्रति तुम्हारा अपराध हुआ है। वे तुम्हारे व्यवहारसे दुःखित होकर चली गयी हैं। इसीसे तुम्हारा भजन नहीं हो पा रहा है।'
पण्डित बाबाने तब माँको चिट्ठी लिखकर बुलाया और पूछरीमें अपने पूर्वाश्रमके यजमान श्रीभगवान् वैश्यके घर उन्हें रखकर उनकी सेवा करने लगे। माताकी सेवामें लगे रहनेके कारण उनका भजनमें आवेश कम होने लगा। उसी समय उड़ीसासे श्रीकृष्ण चैतन्य नामके एक बालकने आकर उनका आश्रय लिया। उन्होंने भदावलीके बाबाजीके गुरु श्रीप्रभुपादजीसे उसे दीक्षा दिलवायी और अपने पास रखकर भजन-शिक्षा देने लगे। माँकी सेवामें भी उसीको नियुक्त कर दिया। सात-आठ वर्ष पीछे माँके अन्तर्धान होनेपर वे फिर निर्विघ्न भजन करने लगे।
कुछ दिन बाद गौड़ीय-वैष्णव सम्प्रदायमें श्रीमन्महाप्रभुके मन्त्रको लेकर वाद-विवाद छिड़ गया। मन्त्रके पक्षमें थे पण्डित बाबाके काका-गुरु गोवर्धनके सिद्ध श्रीकृष्णदास बाबाजी, श्रीराधारमणके सेवाइत श्रीगोपीलाल गोस्वामी प्रभृति और विपक्षमें थे उनके जेठागुरु श्रीबलरामदास बाबाजी, विद्यागुरु श्रीनीलमणि गोस्वामी, राधाकुण्डके महन्त नैयायिक श्रीजगदानन्ददासजी प्रभृति। दोनों पक्षोंमें गुरुवर्गक होनेके कारण वे बड़े धर्म-संकटमें पड़ गये। उन्होंने सोचा कि इस वाद-विवादमें न पड़ना ही ठीक है। इसलिए वे गुफा छोड़कर बरसानेकी मोरकुटीमें जाकर रहने लगे। आठ वर्ष तक वहाँ एकान्तमें भजन करते रहे।
विवाद मिट जानेपर फिर गुफामें आकर रहने लगे। दस वर्ष तक उसमें रहे। माघ मासमें एक दिन वे कोयलोंकी सुलगती अँगीठी लेकर गुफामें गये और भीतरसे दरवाजा बन्द कर लिया। दूसरे दिन प्रातः जब वे सोकर उठे, तो देखा कि वे गुफाके बाहर खुलेमें सो रहे हैं। किसने कैसे और बन्द गुफाके भीतरसे उन्हें निकालकर
उनके भक्त
बाहर लिटाया, उनकी समझमें न आया। लोगोंने बताया कि कोयलेकी गैसमे मूर्ख आ जाती है और मृत्यु होनेके सम्भावना होती होती है, तब उन्होंने जाना कि मूच्छित अवस्थामें किसी दिव्य शक्तिने उन्हें बाहर लिटा दिया था।
बजमें दिव्य शक्तियाँ इस प्रकार निष्किञ्बन महात्माओंकी सहायता करते अक्सर देखी गयी हैं, पर दुष्टोंका प्रकोप भी यहाँ कम नहीं रहा है। एक बार पूलरीके गंगाजीके मन्दिरमें किसी उत्सवमें पुए बाँटे गये। दो चोर पुओंके लोभसे पण्डित बाबाकी गुफापर आये। उन्होंने सोचा, उनके पास पुए अवश्य भेजे गये होंगे। उन्होंने गुफाके बाहर बुलाकर उनसे पुए माँगे। वे बोले- 'पुआ मेरे पास नाँय। मैं तो मधुकरीके अतिरिक्त कछु लऊँ नाँय।'
तब एक चोरने कुद्ध हो लाठी मारी। उनके सिरसे रक्त बहने लगा। दूसरा गुफाके भीतर गया। उसे पुए न दीखे तो बहुत पछताया। बाबाके सिरमें अपने हाथसे पट्टी बाँधी और उनसे क्षमा प्रार्थना कर चला गया।
पण्डित बाबा सभी सम्प्रदायोंके आचार्योंका उतना ही सम्मान करते, जितना अपने सम्प्रदायके आचार्योंका। एक बार बल्लभ सम्प्रदायके कोई आचार्य जतीपुरा पधारे। उन्होंने पण्डित बाबाकी गुफापर जाकर किसी दिन उनके दर्शन करनेकी इच्छा प्रकट की। किसीने पण्डित बाबाको इसकी सूचना दे दी। वे
बोले- 'वे आचार्य होकर मेरे पास आयेंगे? मैं ही जाकर उनके दर्शन करूंगा।' उसी दिन उन्होंने स्वयं जाकर उन्हें दण्डवत् प्रणाम किया और उनसे आशीर्वादकी प्रार्थना की।
पर, सम्प्रदायिकाता इतनी अन्धी होती है कि उनके जैसे उदार और निर्दोष पुरुषसे भी द्वेष किये बिना नहीं रहती। एक बार किसी सम्प्रदायके कुछ कट्टरपंथियोंने श्रीरूप-सनातनको अपने सम्प्रदायके अनुगत बताकर उनकी हेयता
प्रकट की। बाबाने प्रमाण सहित उनकी बातका खण्डन किया। उन्हें यह बात इतनी बुरी लगी कि उन्होंने बाबाको मार डालनेका षड्यन्त्र किया। वे जतीपुरामें गोवर्धनके तटपर उनके मधुकरीके रास्ते में छिपकर खड़े हो गये, पर जब बाबा मधुकरीके लिए गुफासे निकले, षड्यन्त्रकारियोंने देखा कि एक व्याघ्र पालतू
कुकीतरह उनके - यह व्याप यानको दाहिनी ओर गोस्वामियोंको समाजमें छिप गया। मधुकरीसे लौटते समय वह फिर इनके पीछे-पीछे बलने लगा। उन्हें गुफा तक पहुंचाकर कहीं चला। यह देखकर
उन्हें विस्मय और भय हुआ। उन्हेंनि सदाके लिए बाबाके प्रति हिंसा और द्वेषका भाव त्याग दिया। उन्हें एक सिद्ध महापुरुष जानकर वे उनके प्रति श्रद्धा और भक्ति करने लगे।
एक दिन एक और आश्चर्यजनक घटना घटी। दोपहर के समय एक विषधर सर्प उनकी छाती और गलेसे लिपट गया। बाबा निश्चेष्ट बैठे भजन करते रहे। थोडी देर में वह अपने-आप चला गया। रात्रिमें उन्हें सुनायी पडी एक ध्वनि। किसीने कहा- तुम इस गुफासे चले जाओ।' उसी समय उन्होंने गुफा छोड दी और
कुसुमसरोवरके निकट श्यामकुटीमें जाकर रहने लगे। इसी समय श्रीधीरेन्द्रनाथ चक्रवर्ती नामके
एक असाधारण प्रतिभा और भक्तिभाव सम्पन्न नवयुवक पण्डित बाबाकी शरणमें आकर रहने लगे।
धीरेन्द्रनाथकी आयु इस समय लगभग २० वर्षकी थी। वे बगालके एक बड़े जमींदारके लडके थे और कलकत्तेके स्कॉटिश चर्च कालेजके बड़े प्रतिभाशाली और होनहार विद्यार्थी। प्रबल कृष्णानुरागके कारण वे अपने परिवारके अतुलनीय वैभवको तृणवत् त्यागकर और अपने गुरुदेव, कलकत्तेके प्रसिद्ध महात्मा सिद्ध श्रीरामदास बाबाजी महाराजसे आज्ञा लेकर वृन्दावन चले आये थे। वृन्दावनमें कालीयदहके सिद्ध श्रीजगदीशदास बाबाजी महाराजके आनुगत्यमें भजन कर रहे थे। जगदीशदास बाबाने उनकी तीव्र मेधाशक्ति और असाधारण भजनानुराग देखकर जान लिया था कि उनके द्वारा भविष्यमें वैष्णव समाजका बहुत उपकार होगा। इसलिए उन्होंने उन्हें पण्डित बाबाके पास रहकर शास्त्राध्ययन और भजन करनेकी आज्ञा दी थी।
पण्डित बाबाने उन्हें ग्वाल-पोखुरामें रहनेका आदेश दिया। वे नित्य ग्वालपोखुरासे अपराह्न चार बजे उनके पास जाते और ग्रन्थलोचना करते। उन्होंने उनके निकट श्रीमद्भागवत्, षट्-सन्दर्भ आदि अनेक भक्ति-ग्रन्थोंका अच्छी तरह अध्ययन और मनन किया।
कुछ ही दिनोंमें उनकी कृपासे उन ग्रन्थोंमें उनकी तदाकार वृत्ति हो गयी। वे जैसे उनका अभिन्न स्वरूप ही बन गये। पण्डित बाबाने उन्हें कलकत्ते जाकर श्रीरामदास बाबाजी महाराजसे विधिवत् वैराग्य आश्रम ग्रहण करनेका आदेश किया। वे जाकर वैराग्य-आश्रमकी दीक्षा ले आये। नाम हुआ श्रीगौरांगदास। पण्डित बाबावेः आदेशसे वे नित्य अपराह्नमें उनकी गोष्ठीमें भक्ति-ग्रन्थोंका पाठ करने लगे। दूर-दूरसे श्याम-कुटीमें इन नवीन बाबाजीका पाठ सुनने महात्मा आते और उसे
सुनकर अपूर्व तृप्ति लाभ करते। ग्रन्थ तो उनके सामने नामको ही रखे रहते। उन्हें बिना देखे उनके श्लोकों और विभिन्न सम्प्रदायोंके आचार्योंकी वाणियोंका निर्झर उनके मखसे अवाधगतिसे बहता रहता। उनके अश्रु कम्प और पुलकादि सात्विक भावोंसे परिपुष्ट उनकी कथा श्रोताओंको एक अनिवर्चनीय भाव-सागर में
डुबो देती। कथा कहते-कहते बीच-बीचमें कथा-सम्बन्धित लीलाकी उन्हें इस प्रकार विस्फूर्ति होती कि वे समाधिस्थ हो जाते। श्रोतागण बैठे रहते इस प्रतीक्षामें कि कब उनकी भाव-समाधि भंग हो और कथामृतकी वृष्टि फिर होने लगे।
श्रीगौरांगदास पण्डित बाबाजीके परिवारके अभिन्न अङ्ग बन गये। पण्डित बाबा उनसे पितृवत् स्नेह करते। वे भी उनके प्रति अनन्य श्रद्धा और भक्तिका भाव रखते। उनकी गुरुवत् प्रेम-सेवा कर अपार सुखका अनुभव करते।
एक बार बंगालके एक विरक्त बाबाजीने केलेके फूलके रसका ठाकुरजीको भोग लगाकर पण्डित बाबासे प्रसाद ग्रहण करनेका आग्रह किया। पण्डित बाबाने प्रसाद ग्रहणकर उसकी बार-बार प्रशंसा की। यह देख गौरांगदासजीकी इच्छा हुई कि वे भी केलेके फूलका रस बनाकर पण्डित बाबाको प्रसाद ग्रहण करायें।
उन्होंने केलेका फूल प्राप्त करनेकी चेष्टा की। ढूँढ़ते ढूँढ़ते राधाकुण्डके रास्तेमें एक मालीके बगीचेमें पहुँचे। वहाँ फूल लगा देख मालीसे उनकी भिक्षा माँगी। उसने मना कर दिया। कुछ मूल्य लेकर भी वह फूल देनेको तैयार न हुआ। तब गौरांगदासको गुरु-सेवाकी प्रबल इच्छाने विवश किया उसकी चोरी करनेको। वे अन्धकारके समय चाकू लेकर बगीचेमें घुस गये और लगे चाकूसे फूल काटने। मालीको कुछ शब्द सुनायी दिया। उसने गुलेलका निशाना मारा। गौरांगदासजी बाल-बाल बच गये। फिर भी उन्होंने फूल काटना नहीं छोड़ा। जब तक माली उधर आये, वे फूल लेकर भाग गये।
दूसरे दिन उन्होंने साग बनाकर ठाकुरजीको भोग लगाया और पण्डित बाबाको समर्पण किया। पण्डित बाबा उस प्रसादका सेवन कर बहुत प्रसन्न हुए।
किसीने गौरांगदास बाबाकी निन्दा करते हुए फूलकी चोरीकी सारी घटना उन्हें सुना दी। उसने सोचा कि वे गौरांगदासपर तीव्र शासन करेंगे। पर वे बोले- 'यदि भक्तमालके लेखक जीवित होते, तो गुरु-भक्तिके उदाहरणमें इस घटनाका उल्लेख अवश्य करते।'
श्रीगौरांगदासजीके प्रति पण्डित बाबाके वात्सल्यकी झलक एक और घटनासे भी मिलती है। वे उन्हें अपने साथ मधुकरीको ले जाया करते। कहीं-कहीं
मधुकरीकी जगह गालियाँ मिलती। एक घरसे तो गालियोंकी मधुकरी बंधी हुई थी। एक दिन गौरामदासजी पण्डित बाबा और अन्य साधुओंकी मण्डलीसे कुछ आगे थे। वे उसी घरमें भिक्षाके लिए गये। जैसे ही बाहर से कहा- 'श्रीराधे, गृहणी बोली- 'फिर आय गयो निपूते ।'
गौरांगदासजी हँसकर बोले- 'तेरी गाली मीठी लगे है मइया। अब तो मधुकरी दे दियो कर।' गृहणीने कुद्ध हो उनके ऊपर थाली फेंक मारी। यह देख पण्डित बाबा पीछेसे चीख पडे-'हमारे छोराको मार दिया, हमारे छोराको मार दियो ।' पण्डित बाबाका शब्द सुन मुहल्लेके लोग वहाँ एकत्र हो गये और उस घरके लोगोंकी भर्त्सना करने लगे। उस दिनसे उन्होंने उस परिवारका बहिष्कार कर दिया। परिवारका मालिक पण्डित बाबाके पास गया और उनसे क्षमा माँगी। परप दयालु बाबाने उससे साधु-वैष्णवोंका कभी अपमान न करनेकी प्रतिज्ञा लेकर उसे क्षमा कर दिया।
इसी समय निम्बार्क सम्प्रदायके एक नवयुवक श्रीप्रियाशरणदासने पण्डित बाबाकी शरण ली। वे उस समय काशीमें पढ़ते थे। आये थे वृन्दावन दर्शन करने। उनसे भी प्रभुको बहुत काम कराना था। उन्हें व्रजमें रखकर उस कार्यके लिए शिक्षा देनी थी, सब प्रकारसे उसके योग्य बनाना था। पर, वे सहजमें पकड़में आनेवाले तो थे नहीं। नयी उम्र जो थी उनकी, और विद्याध्ययन, खेल-कूद, व्यायाम और कुश्तीमें भारी झोंक थी। उन्हें बाँध रखनेके लिए एक सुदृढ़ प्रेम-पाशकी आवश्यकता थी। इसलिए किसी अज्ञात शक्तिने प्रेरणा देकर उन्हें पण्डित बाबाके पास भेज दिया। प्रियाशरण बाबा अक्सर कहा करते कि पण्डित बाबाके प्रेमने उन्हें अपने माता-पिता तकको भुला दिया और वे उनके दर्शन करते ही सदाके लिए उनके बनकर रह गये।
प्रियाशरण बाबा निम्बार्क सम्प्रदायमें दीक्षित थे। पर इससे क्या पण्डित बाबाके प्रेममें कोई अन्तर पड़ना था ? वे उनसे उतना ही प्रेम करते, जितना गौरांगदास बाबासे। उन्हें निम्बार्क सम्प्रदायके अनुसार ही भजन करनेका उपदेश करते, यहाँ तक कि एकादशी आदि व्रतका पालन भी उनसे निम्बार्क सम्प्रदायके अनुसार ही कराते। एकादशीके दिन वे निर्जल व्रत रखते, इसलिए मधुकरीको न जाते, पर यदि निम्बार्क सम्प्रदायके अनुसार एकादशी दूसरे दिन होती, तो उस दिन स्वयं निर्जल रखते हुए भी प्रियाशरण बाबाको साथ लेकर उनके लिए मधुकरीको जाते।
एक बार प्रियाशरण बाबाको माताका प्रकोप हुआ। उस समय जब उन्हें घबराहट अधिक होती तो पण्डित बाबा उन्हें सांत्वना देनेके लिए छातीसे लगाते । दूसरे लोग ऐसेमें उनसे दूर रहनेको कहते, तो भी उनकी अनसुनी कर देते।
एक और नवीन वैष्णव श्रीकृपासिंधुदास बाबाने पण्डित बाबाकी शरण ली। धौ । सम्भवतः इसी कारण प्रभुने कृपासिंधु बाबाको उनके पास भेजा था। वे जैसे बाबा उस समय बहुत बीमार थे। सेवाके लिए एक योग्य सेवककी आवश्यकता सेवाकी मूर्ति ही थे। उनके निकट रहकर तन-मनसे उनकी सेवा करने लगे, पर बाबाको किसी वैष्णवकी सेवा ग्रहण करनेमें संकोच होता था। उन्होंने कृपासिंध बाबाका सेवामें विशेष आग्रह देखा, इसलिए स्वस्थ हो जानेपर उनसे अन्यत्र जाकर भजन करनेको कहा। पर, उनके प्राण-मधुप बाबाके चरणकमलोंमें सदाके लिए लिपट चुके थे। उनके लिए बाबासे दूर होना प्राण त्याग करनेके समान था। वे भी बाबाके पास रह गये। उनके एक अभिन्न अङ्ग बनकर, हर समय परछाईंकी तरह उनके साथ रहकर, उनकी सेवा करने लगे। बाबा उन्हें प्यारसे 'बच्ची' कहा करते।
स्वौलिंगका प्रयोग शायद उन्हें अपने मंजरी-स्वरूपका स्मरण करानेको करते, जिसका उन्हें निरन्तर ध्यान रखनेको कहते। उन्होंने बाबाकी आज्ञासे समूचा गोविन्दलीलामृत कण्ठस्थ कर लिया और उनकी बतायी रीतिके अनुसार अष्टकालीन लीला-स्मरण करने लगे। अष्टकालीन लीला-स्मरणमें वे इतना अभ्यस्त हो गये कि इसमें भी समय-समयपर बाबाकी सेवाकी योग्यता उन्होंने प्राप्त कर ली।
बाबा यूँ तो सदा ही अन्तर्मना रहते और उनका लीलामें अभिनिवेष सोते-जागते, खाते-पीते, चलते-फिरते सभी समय बना रहता। पर, अपने दैनिक कार्यक्रमके अनुसार पूर्वाह्न २ बजेसे मध्याह्न २ बजे तक अपनी कुटियाके भीतर
नाम-जपके साथ लीला-स्मरणमें रत रहते। उसके पश्चात् बाहर निकलकर मन्त्र-जप और पाठ करते। मन्त्र-जपके पूर्व कागजपर बने हुए राधा-कृष्ण और निताई-गौरके चरण-चिह्नोंको मस्तकसे लगाते। मन्त्र जपके समय आवश्यकता पड़नेपर कभी किसीके साथ एक-दो शब्द बोल भी लेते, पर लीला-स्मरणके समय बारह घण्टे उनकी वृत्ति पूर्णतया लीलामें सन्निविष्ट रहती। उस समय कुटियाके भीतर कोई न जाता। कुटियाके बाहर भी किसी प्रकारका शब्द न होता, पर उस
समय भी कभी-कभी वे 'बच्ची' को पुकार लेते। किसी लीला-विशेषमें उनका मन इतना डूब जाता कि आगेकी लीलाकी विस्मृति हो जाती। उस समय कृपासिंधु बाबा
उनकी सहायता करते। इस प्रकार वे बाबाको अन्तरंग और बहिरंग दोनों पकारकी सेवा करते।
कृपासिंधु बाबाकी लाचारी तब होती, जब वे भी बाबाकी ही तरह लीत्या स्मरणमें लवलीन हो अपनी सुध-बुध खो बैठते । एक बार ग्रीष्मऋतमें जब वे बाबाके साथ मधुकरीसे लौट रहे थे, पवनकी गति कुछ तीव हो गयी। मार्गक तरु-करने लगीं। पक्षी कलरव करते हुए अपने-अपने घोसलों को जाने लगे। ऐसे लता बैंकोरे गाने लगे। हलकी हलकी बंद दिन भरके तष्त वातारवरणको सुशीतल वातावरणमें दोनोंके हृदयमें राधा-कृष्णकी किसी मधुरतम लीलाका उद्दीपन हो आया। परिणामस्वरूप दोनों ही बाह्य-स्मृति खो बैठे। वे वृन्दावनके दाऊजीके बगीचेके सुपरिचित मार्गसे भटक गये, जहाँ वे अब वर्षोंसे रह रहे थे, और सुदूर सुन्दरक ग्राममें जा पहुँचे।
सेवा, प्रसाद और समर्पण की घटनाएँ
कृपासिंधु बाबा किस हद तक पण्डित बाबाके अपने अभित्र बन गये, दाऊजीके बगीचेकी ही एक-दो घटनाओंसे स्पष्ट है। पण्डित बाबाकी डाढ़में दर्द हुआ। डॉक्टर आया इलाज करने। उसने पूछा- 'कौन-सी डाढ़में दर्द है, बाबा ?'
'मोएँ मालुम नायँ'- बाबा उत्तर दिया।
'तब किसे मालूम है, बाबा ?'
'बच्चीको मालूम है।'
बच्चीने आकर वह डाढ़ दिखा दी, जिसमें दर्द था।
एक बार बाबा बीमार पड़े। दुर्बलता इतनी हो गयी कि मुखसे कुछ कह सकना भी मुश्किल हो गया। ऐसी अवस्थामें प्यासके मारे गला सूखने लगा। उन्होंने 'आ, आ' कर सेवकोंसे जल माँगा। किसीकी समझमें न आया, बाबा क्या कह रहे हैं। कृपासिंधु बाबा गोविन्दजीके दर्शन और मधुकरीके लिए गये हुए थे। उन्हें रास्तेमें बार-बार प्यास लगने लगी। वे कितना भी जल पियें, थोड़ी दूर जाकर फिर जोरकी प्यास लग आये। उनकी समझमें नहीं आ रहा था कि उन्हें इतनी प्यास क्यों लग रही है। उनकी समझमें तब आया जब वे लौटकर आश्रम गये और बाबाने उनके प्रति भी वैसे ही इशारा किया। उन्हें जल पिलाते ही उनकी अपनी प्यास भी मिट गयी।
जब बाबा राघवकी गुफा या श्यामकुटीमें भजन करते थे, उस समय गोवर्धनमें निष्किञ्चन, भजनानन्दी महात्माओंकी एक बड़ी टोली थी। पण्डित बाबा उस
सन्ध्या मधुकरीको जाते। अपनी-अपनी मधुकरी ले किसी एक स्थानपर बैठकर सब टोलीके केन्द्र थे। वे सभी प्रातः २ या ३ बजे उठकर सारा दिन भजन करते। एक साथ मिल-बाँटकर मधुकरीका सेवन करते। मधुकरी सेवनकर अपना-अपना भजनकी बात कहते-सुनते। बीच-बीचमें हास्य-विनोद भी चलता रहता। बहिरंग झोला धो लेते और रात्रि १२ बजे तक बैठकर इष्ट-गोष्ठी करते। अपने-अपने लोग गोष्ठीमें सम्मिलित न हो सकें, इस उद्देश्यसे नित्य एक स्थानपर न जुटकर कभी कहीं, कभी कहीं जमा होते। एक दिन पहले ही निश्चित कर लेते कि कल मजलिस कहाँ लगेगी।
एक दिन चकलेश्वरके महन्त श्रीसनातनदास बाबाने कहा- 'कल सबको मधुकरी मेरी कुटियापर पानी होगी।' दूसरे दिन सब अपनी-अपनी मधुकरी लेकर वहाँ पहुंचे। सनातनदास बाबाको कोई बहत-से परवल दे गया था। उन्होंने ५ सेर भोग लगाकर पण्डित बाबाके सामने रख दिया। बाबा पाने लगे। वे पाते जा रहे थे परवलमें १ सेर घी डालकर उसका साग बना रखा था। सागका थाल ठाकुरजीका और चटकारे ले-लेकर कहते जा रहे थे- 'वाह ! कैसो स्वादिष्ट है ! ठाकुरने बड़े प्रेमसों पायो है !'
दूसरे लोग सोच रहे थे कि स्वभावसे स्वल्पाहारी बाबा दो-चार परवल खाकर छोड़ देंगे और वे उनकी प्रसादी ग्रहण करेंगे। पर, वे तो सारे परवल खा गये और वे देखते रह गये ! किसीने कहा- 'बाबाने किसी अपूर्व आवेशमें यह लीला की है।' किसीने कहा- 'उन्हें इस बातका भय था कि हम लोग उनकी प्रसादी ग्रहण करेंगे, इसीसे वे थाल पोंछ-पोंछकर सब खा गये हैं-कहीं कोई किनका लगा न रह जाय।' किसीने कहा- 'नहीं, सनातनदास बाबाने विनोदमें उनके सामने पाँछ-छः सेर परवलोंसे भरा थाल रख दिया था। उन्होंने भी विनोदमें उनकी चुनौती स्वीकार कर उन्हें पराजित किया है।'
सन् १९१८ में पण्डित बाबाको इंफ्लुएंजाने बुरी तरह आ घेरा। उस समय श्रीकामिनि कुमार घोष, श्रीदीनशरणदास और श्रीगौरांगदास बाबाजी आदि विशेष आग्रह कर उन्हें वृन्दावन ले गये। वहाँ श्रीमदनमोहनकी बगीचीमें रहकर उन्होंने स्वास्थ्य लाभ किया। वृन्दावनमें आठ वर्ष तक वे कभी कहीं, कभी कहीं, रहते रहे। जिन-जिन स्थानोंमें वे रहे, मदनमोहनकी बगीचीके अतिरिक्त मुख्य है टट्टी-स्थान, क्यारी बन, दिल्लीकी धर्मशाला, मिर्जापुरकी धर्मशाला और करौलीकुञ्ज। सन् १९२६ में वे दाऊजीके बगीचे चले गये और जीवनकी शेष घड़ी तक वहीं रहे।
दाऊजीके बगीचे में आनेके कुछ ही दिन बाद १४ वर्षीय श्रीविष्णुदास बाबा भी अपने गुरुदेव, सूर्यकुण्डके श्रीयदुनन्दनदास बाबाकी आज्ञासे उनकी शरणमें आ गये। जिस दिन वे आये धूप तेज थी। सूर्यकुण्डसे वृन्दावन तक वे पैदल चलकर आये थे और बगीचीके कुएँके चबूतरेपर लेट रहे थे। उसी समय पण्डित बाबा लौटे थे. रास्ते में ही बुखार आ गया था। दाऊजीकी बगीची पहुँचते-पहुँचते इतना थक गये शौचसे। उन्हें देख विष्णुदासने दण्डवत् प्रणाम् किया और बाबा उन्हें भीतर ले गये अपनी कुटियामें। कृपासिंधु बाबासे कहा- 'रोटी लै आ जाके खायबेको।'
बिष्णुदास बाबा बोले- 'बाबा मुझे ज्वर है।'
'कछ नाय. ठीक हय जायगो' कह बाबाने अपने सामने बिठाकर रोटी खिलायी। फिर बोले- 'चल मधुकरीको ।'
विष्णुदासका हाथ पकड़ वे मधुकरीके लिए उन्हें अपने साथ ले गये। उनका ज्वर और थकावट पण्डित बाबाके हाथ पकडते ही जाने कहाँ चले गये।
उस दिनका पकड़ा हुआ विष्णुदासका हाथ उन्होंने अन्त तक नहीं छोड़ा। विष्णुदास बाबाके साथ रहकर, उनकी सेवामें कृपासिंधु बाबाका हाथ बंटाते रहे।
जब विष्णुदास बाबाके पास आये थे, वे अक्षर भी नहीं पहचानते थे, पर बाबाकी कृपासे वे इतना पढ़ गये कि गोविन्द-लीलामृत उन्हें पढ़कर सुना सकें। वे अन्त तक उन्हें गोविन्दलीलामृत नित्य सुनाते रहे।
एक दिन जब वे उनके साथ मधुकरीसे लौट रहे थे, वे और बाबा रास्तेमें दाऊजीके बगीचेसे कुछ दूर पुलियापर बैठ गये। वैसाखका महीना था। सूर्यास्त हो चुका था। अन्धकारमें पुष्प-पल्लवरहित पेड़ोंके झुरमुट दिगम्बर वैरागियोंके झुण्ड सरीखे कुछ-कुछ दीख रहे थे। उसी समय हठात् विष्णुदासको प्रतीत होने लगा कि वातावरणमें एक अपूर्व स्निग्धता और शीतलता छायी हुई है और कदम्बके पुष्पोंकी दिव्य सुगन्धसे दिशाएँ महक उठी हैं। उन्होंने चमत्कृत हो बाबासे कहा- 'बाबा, यह क्या ? ग्रीष्मका वातावरण सहसा बदला-सा जान पड़ रहा है ! शरदऋतुकी-सी शीतलता और बसन्तकी-सी कदम्बके फूलोंकी महक लग रही है !'
बाबाने कहा- 'यही तो वृन्दावनका वास्तविक स्वरूप है। इसमें छहों ऋतुएँ सदा एक साथ विराजमान रहती हैं। वृन्दावनने कृपाकर तुम्हें अपने अप्राकृत स्वरूपकी एक झलक दिखायी है। साधकोंके प्रति वृन्दावन बीच-बीचमें ऐसी कृपा करते रहते हैं। उन्हें चाहिये कि इसे किसीसे प्रकट न करें !'
नवदीपके अदितीय विद्वान, नित्यानन्द वंशके परम भागवत श्रीप्राणगोप प्रभुपादसे पण्डित बाबाका घनिष्ट सम्बन्ध था। दोनों एक-दूसरेका यथोचित सम्म करते। एक-दूसरेको पाकर प्रेममें विह्वल हो जाते। प्राणगोपाल गोस्वामी का करते- 'मेरी माँके देहान्तके पश्चात् मुझ निराश्रयको पण्डित बाबाके प्रेमने आय दिया। मुझे उनसे माँ-जैसा ही प्रेम मिला।'
पण्डित बाबा प्राणगोपाल गोस्वामीप्रभुका कितना आदर करते, यह एक दिनकी घटनासे स्पष्ट है। बहत दिन इंफ्लुएंजासे बीमार रहनेके कारण वे बहुत दुर्बल हो गये थे। लोगोंने उनसे दूध पीनेका आग्रह किया, पर उन्होंने किसीकी २ सुनी। उन्होंने ४० वर्षसे दूध नहीं लिया था। सबने प्राणगोपाल प्रभूसे प्रार्थना की कि उनका दूध न पीनेका आग्रह छुटवानेका प्रयास करें। वे स्वयं दूधका गिलास लेकर गये और उनके मुखसे लगाकर कहा- 'इसे आपको पीना होगा।' बाबाने कहा- 'जब स्वयं नित्यानन्द प्रभु पिलायेंगे तो क्यों नहीं पियूँगा।' उन्होंने बच्चेको तरह उनके हाथसे दूध पी लिया।
प्राणगोपाल गोस्वामी प्रति वर्ष एक बार वृन्दावन आते। एक महीने वहाँ रहकर पण्डित बाबाको श्रीमद्भागवतादि ग्रन्थोंका पाठ सुनाते। पण्डित बाबा आधे घण्टे पूर्व ही उनके पाठमें जा बैठते।
एक बार वृन्दावनके कुम्भके अवसरपर प्राणगोपाल गोस्वामी वृन्दावन आनेको थे। न जाने क्यों बाबाको उनके सम्बन्धमें चिंता हो गयी। वे बार-बार सेवकको बुलाकर कहते 'देख आ, प्रभु अभी आये कि नहीं। वे कुशलसे तो है।' पर, गोस्वामीप्रभु ! एक दिन देरसे आये। बमरौली स्टेशनपर उनकी गाड़ी लड़ गयी। उनके आगे और पीछेके दोनों डिब्बे चकनाचूर हो गये। सैकड़ों लोग मारे गये, पर उनके रिजर्ल्ड डिब्बेमें, जिसमें वे और अनेक भक्त बैठे थे, किसीकी विशेष क्षति नहीं हुई। प्रभुके सिरमें मामूली-सी चोट आयी।
वृन्दावन पहुँचते ही उन्होंने सीधे बाबाके स्थानपर जाकर उन्हें दण्डवत् की। बाबा कुछ बोले नहीं।
प्राणगोपालने कहा- 'बाबाकी चिंताने मेरी और मेरे साथियोंकी रक्षा की। नहीं तो क्या यह सम्भव था कि हमारे डिब्बेके आगे और पीछेके डिब्बोंमें बैठे यात्री मौतके घाट उतरें और हम मौतके मुँहमें जाकर भी निकल आयें।
पण्डित बाबाके पाण्डित्यका प्राणगोपाल गोस्वामी भी लोहा मानते थे। वे सबकी शंकाओंका समाधान करते, पर उन्हें कोई शंका होती. तो उसका समाधान पण्डित बाबा ही करते। वे कहा करते 'मुझे जब कोई शंकाएँ होती. तो मैं उन्हें नोट कर रखता, पण्डित बाबासे उनका समाधान करानेके उद्देश्यसे। पर, जब जाकर उनके निकट बैठता, या अपनी कथामें उन्हें सम्मुख बैठे देखता, तो उनसे बिना प्रश्न किये ही उन शंकाओंका समाधान अपने-आप हो जाता। इतना ही नहीं, उनके सात्रिध्यमें कथा कहते समय मुझे नये-नये रहस्यमय सिद्धान्तोंकी आश्चर्यमय स्फूर्ति
होती।' पण्डित बाबाकी इस शक्तिका और भी कई लोगोंने कई बार अनुभव किया। स्वयं उनके न्यायके गुरु षड्दर्शनाचार्य श्रीसुदर्शन शास्त्री कहा करते 'मेरो दर्शनशास्त्रकी गुत्थियाँ पण्डित बाबाके सान्निध्यमें अनायास सुलझ जाती हैं।
पण्डित बाबाके अप्राकट्यके पश्चात् एक बार श्रीमद्भागवत्के अद्वितीय पण्डित और आगरा विश्वविद्यालयके रजिस्ट्रार श्रीश्यामसुन्दरजीने जयपुरके एस.पी. भक्तप्रवर श्रीकाशीप्रसादजीसे कहा- 'अब ऐसा कोई नहीं, जो मेरी श्रीमद्भागवत्-सम्बन्धी शंकाओंका संतोषजनक ढङ्गसे समाधान कर सके। पण्डित बाबाके तो सामने बैठते ही शंकाओंका अपने-आप समाधान हो जाता।'
सामने बैठनेकी तो दूर, यहाँ तक देखा गया है कि यदि कोई अपनी शंका लेकर उनके पास जाता और वे उपस्थित न होते, तो भी वे अदृश्यरूपसे उसका - समाधन कर देते। एक बार, जब पण्डित बाबा वृन्दावनमें मदनमोहनकी तिबारीमें रहते थे और गौरांगदास बाबा उनके निकट शाहजहाँपुरकी बगीचीमें रहते थे, और गौरांगदासजीको ब्रह्मसूत्रके प्रथम पादके तेरहवें सूत्र 'आनन्दमयोऽभ्यासात्' की टीकामें कुछ शंका हुई। उन्होंने मदनमोहनकी तिबारीमें पण्डित बाबाकी गुफाके सामने जाकर उनसे उन पंक्तियोंका वास्तविक अर्थ समझानेको कहा। पण्डित बाबाने गुफाके भीतरसे उत्तर देते हुए गौरांगदासजीकी शंकाका समाधान किया और कहा- 'समझे ?'
गौरांगदासजीने उत्तर दिया 'हाँ, बाबा।'
पण्डित बाबाने फिर कहा- 'समझोगे क्यों नहीं? सुबोध हो न।'
गौरांगदासती प्रसन्नचित्त अपनी कुटियाकी तरफ लौटने लगे। उसी समय उन्होंने देखा कि पण्डित बाबा मधुकरी कर श्रीअमोलकराम शास्त्रीके साथ गुफाको लौट रहे हैं। उन्हें आते देख वे अवाक् रह गये। प्रणाम्कर बोले- 'आप अभी तो गुफाके भीतरसे मेरी शंकाका समाधान कर रहे थे। अब इधरसे कैसे आ रहे हैं ?'
पण्डितबास दिये। बोले- 'देखो, बजभूमि चिन्तामणि है। यहाँ बहुत-से सिद्ध महापुरुष अनुराग साधकोंके प्रति अलक्षित रूपसे कृपा किया करते हैं।'
गौरांगदास बाबाने मन-ही-मन कहा- 'आप जो भी कहें। जिन सिद्ध महापुरुषने मेरे ऊपर कृपा की, मैं जानता हूँ, वे कौन हैं।'
पण्डित बाबा अपने पाण्डित्य, तीक्ष्ण बुद्धि और अनुभवोंका प्रयोग किसीके किसके साथ वाद-विवाद करते। पर, उनका सत्संग करनेवाले सभी व्यक्ति ऊपर अपना मत लादनेके लिए कभी न करते। न ही वे मत-मतान्तर लेकर जिनका मत किसी शास्त्रीय सिद्धान्तपर उनसे भिन्न होता. कालान्तरमें स्वयं ही उनका मत स्वीकार करनेको बाध्य होते।
श्रीमन्महाप्रभुके स्वरूपके सम्बन्धमें प्राणगोपाल गोस्वामीका मत पण्डित बाचाके मतसे कुछ भिन्न था। पण्डित बाबाके अनुसार महाप्रभु थे राधा-कृष्णके मिलित तनु। प्राणगोपाल गोस्वामी के अनुसार वे थे केवल राधाके भाव और कान्तिसे आच्छादित श्रीकृष्ण। दोनोंको इस मतभेदका पता न था, पर कृपासिंधु बाबा इसे जानते थे। वे चाहते थे, प्राणगोपाल गोस्वामी भी बाबाके मतको स्वीकार कर लें, तो इसका अच्छा प्रचार हो। पर, उन्हें इसकी जानकारी करायी जाय कैसे, यह एक समस्या थी। वे इतने बड़े पण्डित थे और बाबा समेत सभी गौड़ीय-वैष्णव उनका इतना सम्मान करते थे। उनसे सीधे तो इस बातकी चर्चा की नहीं जा सकती थी।
उन्होंने एक उपाय सोचा। गौर पूर्णिमाके अवसरपर शृङ्गारवटमें प्राणगोपाल गोस्वामीकी अध्यक्षतामें सभा होनेको थी। उसमें महाप्रभुके सम्बन्धमें कई लोगोंके भाषण होने थे। उन्होंने श्रीललितमोहन गोस्वामीको भी सभामें बोलनेको तैयार किया। उनका नाम वक्ताओंकी सूचीमें जोड़ दिया गया।
सभामें श्रोताके रूपमें बाबा भी उपस्थित थे। ललितमोहन गोस्वामीके बोलनेकी बारी आयी। उन्होंने जैसे ही कहा- 'श्रीमन्महाप्रभु राधा-कृष्णके मिलित विग्रह है' प्राणगोपाल गोस्वामीने डाँटकर कहा- 'बैठ जाओ। तुम कुछ नहीं जानते।'
ललितमोहन गोस्वामीको बैठ जाना पड़ा। बाबा उसी समय सभासे उठकर चले गये, पर उन्होंने कभी प्राणगोपाल गोस्वामीसे इस विषयमें चर्चा नहीं की। उन्हें श्रीललितमोहन गोस्वामीके सम्बन्धमें चिंता अवश्य हो गयी। उन्होंने रात्रिमें किसी व्यक्तिको भेजा उनके घर यह पूछ आनेके लिए कि उन्होंने प्रसाद ग्रहण किया है या नहीं
दो-तीन साल बाद प्राणगोपाल गोस्वामीने वृन्दावनके कुम्भके अवसरपर स्वयं उस मतका प्रतिपादन किया, जिसपर उन्होंने ललितमोहन गोस्वामीको डाँट बतायी थी। जब किसीने उनसे इस सम्बन्धमें पूछा, तो वे बोले- 'भवति विज्ञतमः क्रमशो जनः' अर्थात् आदमी सीख-सीखकर धीरे-धीरे ही ज्ञानवान होता है।
पण्डित बाबाके सम्बन्धमें साधारण धारणा थी कि वे स्वभावके बड़े कर्कश है। गरीब-अमीर, छोटे-बडे, स्त्री-पुरुष किसीको भी खरी-खोटी सुनानेमें नहीं चूकते। पर वे खरी-खोटी सुनाते तभी जब कोई विषयकी बात लेकर उनके पास जाता या वैष्णव-सदाचारके विरुद्ध कोई कार्य करता। इस कारण सभी सम्प्रदायके साधुओंको उनके शासनका भय रहता।
राधाकुण्डमें एक सहजिया मार्गका साधु रहता था, जिसमें स्त्री-संग साधनाका प्रधान अङ्ग माना जाता है। उसने श्रीगौरांगदास बाबाको अपना साथी बनानेके लिए उनका चरित्र भ्रष्ट करनेकी एक योजना बनायी, पर योजना सफल न हई। उसे बहुत लज्जित होना पड़ा। उसे इस बातका भय हो गया कि यह बात पण्डित बाबा तक पहुँच जायगी और उसका व्रजमें रहना असम्भव हो जायेगा। उसने सोचा, मैं पहले ही जाकर पण्डित बाबाके कान भर दूँ। वह गया उनके पास और बोला- 'बाबा आप गौरांगदासको बहुत अच्छा समझते हैं। आप नहीं जानते कि वह छिपकर स्त्रीसंग करता है।'
सुनते ही पण्डित बाबाके क्रोधकी सीमा न रही। उन्होंने कहा- 'दुष्ट ! एक परम वैष्णवको लांछित करते तुझे लज्जा नहीं आती ? जानता नहीं इसका परिणाम क्या होगा ? जा, तू कुत्तेकी तरह भँक-भैंककर मरेगा।'
सचमुच कुछ ही दिनों बाद उसे पागल कुत्तेने काटा और वह कुत्तेकी ही तरह भूक-भैंककर मर गया।
पण्डित बाबाके साथ प्रियाशरण बाबा मधुकरीको जाया करते। एक व्रजवासीके घर जाकर पण्डित बाबा बाहर खड़े रहते। प्रियाशरण बाबा भीतर जाकर रोटी माँग लाते। घरकी नवविवाहिता पुत्रवधू उन्हें रोटी दे दिया करती। एक दिन रोटी देते समय उसके पैरका अँगूठा उनके पैरके अँगूठेसे स्पर्श कर गया। प्रियाशरण बाबाने इसपर कुछ ध्यान नहीं दिया, पर दूसरे और तीसरे दिन भी ऐसा ही हुआ। तब बाहर निकलकर प्रियाशरणजीने बाबासे कहा- 'बाबा, कलसे इस घरमें मधुकरीको नहीं आयेंगे।' पूछनेपर जब उन्होंने कारण बताया, तो बाबासे न
रहा गया। उन्होंने घरके भीतर जाकर सबके सामने नववधूको फटकारते हुए कहा- तू हमारे छोरानको बिगाड़बेकौ आयी है।'
कानपुरके एक बड़े सेठका देहान्त हो गया। सेठानी आयी बाबाके पास अपने लड़केके साथ। बोली- 'बाबा, सेठजी तो चले गये।'
बाबा बोले- 'चले गये तो कहा भयो ? तू भी जायेगी। जे (सेठानीका लड़का) भी जायगो। मैं हूँ जाऊँगो।'
सेठानीको भय लगा कि बाबाने उसे और उसके लडकेको ऐसे कह दिया। वह चली गयी और बाबाके पास फिर कभी नहीं आयी। उसने सोचा होगा, बाबा इतने बडे महात्मा हैं, पर शिष्टाचार नहीं जानते। दो शब्द सहानुभूतिके भी नहीं कह सके। पर, बाबाके पास इतना अवकाश कहाँ. जो दुनिया भरका रोना-धोना सर्ने और दुनिया भरसे सहानुभूति प्रकट करें। उन्होंने सच्ची बात कह दी। यदि वे भी कहते दुनिया देखी तो सच्ची बात कहता कौन ? बाबाके तीखे वाक्योंका सेठानीपर कितना असर हुआ और उसकी मोह-निद्रा गयी या नहीं, यह तो वह जाने। पर बाबाने अपना कर्तव्य कर दिया। यदि सेठजी भक्त होते, या सेठानी भक्तिमती होती, तो निश्चय बाबाका व्यवहार दूसरे प्रकारका होता।
एक बहिरंग व्यक्ति आया वृन्दावन घूमने-फिरने। जैसे उसने पर्यटकोंके लिए आकर्षक अन्य स्थानोंको देखा, वैसे ही बाबाको भी देखकर चला गया। दूसरे दिन फिर आया और बोला- 'बाबा, कल देश जाना है।'
बाबा बोले- 'तो तैने मेरो माथो खरीद लियो है? देश जा, चाहे भाड़में जा। हमें कहा करनो है।'
एक मायाका कीट भाड़में से निकलकर बाहर आये और बाहरकी जल-वायुका सेवन किये बिना, बाहरके लोगोंसे बाहरकी कुछ बात पूछे बिना फिर भाड़में चला जाय, तो बाबाको उससे क्या लेना-देना ? वह बाबाका माथा वृथा क्यों खाये ? एक मरुस्थलका प्यासा व्यक्ति आये झरनेके पास और बिना उसके शीतल जलका सेवन किये उससे कहे- 'मैं जा रहा हूँ मरुस्थल,' तो झरना उससे और क्या कहे ? यही न कि 'जा भाड़में।'
इसका मतलब यह नहीं कि बाबा स्वभावसे अशिष्ट या अभद्र थे। उन्हें जागतिक शिष्टाचारका कपटतापूर्ण व्यवहार नहीं आता था। जो जैसा व्यक्ति होता था, उसके प्रति उनकी वैसी स्वाभाविक प्रतिक्रिया होती थी। देश जानेकी बात एक
बार ललितमोहन गोस्वामीने भी उनसे कही थी, मार्गमें जब वे मधुकरी लेकर लौट जयगो ?' ललितमोहन गोस्वामी प्राकृत भक्त थे और किसी विवशताके कारण रहे थे। तब उन्होंने कहा था- 'तो ऐसेई चलो जायगो। कुटिया माऊँ नायें वृन्दावन छोड़कर कुछ दिनोंको बाहर जा रहे थे। उन्हें बाबा कुटियापर बुलाकर प्रेमसे आशीर्वाद दिये बिना कैसे भेज देते ?
पण्डित बाबाके पास जो जिज्ञासु या भक्त आते. उन्हें वे प्रेमसे बैठाते। साधु, संन्यासी, गोस्वाममियों और व्रजवासियोंको आसन देते। पर, जो लोग कोई सांसारिक वासना लेकर आते. उन्हें पास फटकने भी न देते। एक व्यक्तिने आकर दूरसे लम्बी दण्डवत् की और बैठ गया। बाबाने पास बैठे श्रीललितमोहन गोस्वामीसे कहा- 'कह दे दर्शन हय गये जाये।'
बार-बार कहनेपर वह चला गया। दूसरे दिन फिर आया और उसी प्रकार बार-बार कहनेपर चला गया। तीसरे दिन आते ही अपने कोई सांसारिक दुःखकी बात कहते हुए बोला- 'बाबा कृपा करो।'
बाबाने उसे फटकार कर भगा दिया। पहले दिन ही उनकी पैनी दृष्टिने देख लिया था कि वह न तो कोई भक्त है और न ही जिज्ञासु।
पण्डित बाबाकी एक विशेषता यह थी कि उनकी अपने सम्प्रदायके प्रति जितनी निष्ठा थी, उतना ही अन्य सम्प्रदायोंके प्रति उनका दृष्टिकोण उदार था। उन्हें चारों सम्प्रदायके उपासना-मूलक साधन-ग्रन्थों और साधन रहस्योंका पूरा ज्ञान था। सभी सम्प्रदायोंके साधु, महात्मा और पण्डित उनके प्रति आदर और श्रद्धाका भाव रखते थे। सभी उनसे शिक्षा ग्रहण करते थे।
श्रीनिम्बार्क सम्प्रदायके पण्डित अमोलकराम शास्त्री और श्रीहंसदासजी, रामानुज सम्प्रदायके सुप्रसिद्ध श्रीसुदर्शनाचार्यजी षड्शास्त्री, श्रीदुलारीप्रसाद शास्त्री, श्रीगणपति शास्त्री; रामानन्द सम्प्रदायके बाबा संकर्षणदासजी; पुष्टिमार्गके मथुरा-निवासी सुप्रसिद्ध पाठक एवं वक्ता श्रीपुरुषोत्तमभट्टजी महाराज; श्रीश्रीनित्यानन्द वंशके प्रभुपाद प्राणगोपाल गोस्वामी जैसे पण्डित और महात्मा तथा राजर्षि वनमालीराय जैसे प्रमुख भक्त सदा उनके मुखसे भजन-रहस्य और शास्त्र-सिद्धान्त सुननेको उत्सुक रहते थे।
पण्डित बाबाने दीक्षा किसीको नहीं दी, पर उनके शिष्य बहुत थे। जो लोग उनका सत्संग करते थे, उनसे उपदेश ग्रहण करते थे, उनसे शास्त्र या भजनकी बात पूछते थे, वे चाहे जिस सम्प्रदायके हों, चाहे जिससे दीक्षित हों, उन्हें अपना गुरु
मानते थे। जैसे गौरांगदास बाबाजी, श्रीप्रियाशरणदासजी, श्रीकृपासिंधुदासजी, विष्णुदासजी श्रीकेशवदासजी, श्रीललितमोहन गोस्वामीजी आदि। इनमें कुछ ऐसे भी थे जो उनके सिवा और किसीको गुरुरूपमें जानते ही न थे, जैसे ठाकुर कुशलसिंहजी, (गौजगढ़) और ठाकुर हरीसिंहजी, (निमोड़िया)।
श्रीकुशलसिंहजी, गीजगढ़, जयपुर स्टेटके जागीरदार और जयपुर हाईकोर्टक चौफ जस्टिस थे। वे बड़े निर्भीक, धर्मात्मा और विद्वान थे। उस समयके राजपूतोंमें श्रीद्वारिकाधीशका अवतार माना जाता है। उन्हें ऐसे महात्माकी खोज थी, जो उनका ऊँचा स्थान था। वे बाबा रामदासके अनन्य भक्त थे. जिन्हें मारबाडमे भगवात् प्राप्तिके ठीक पथपर उन्हें आरूढ़ करा सके। उन्होंने पण्डित बाबाके दर्शन कर उनसे पथ-प्रदर्शन करनेकी प्रार्थना की।
पण्डित बाबाका नियम था कि जब कोई जिज्ञासु भजन-पथका निर्देश करनेकी प्रार्थना लेकर उनके पास जाता, तो वे उससे पूछते कि वह किस सम्प्रदायका व्यक्ति है. कौन-से भगवत्-स्वरूपमें उसकी निष्ठा है और यदि वह दीक्षित है तो उसके गुरु कौन है, जिससे वे उसके अनुरूप ही भजनोपदेश कर उसके भावकी पुष्टि कर सकें।
कुशलसिंहजीसे भी उन्होंने यही प्रश्न किये। उन्होंने कहा- 'मैं न तो कहीं दीक्षित हूँ और न ही मेरा कोई सम्प्रदाय है। रामदेवजीमें मेरी निष्ठा है।'
तब बाबाने उन्हें अकेले रामदेवजीका भजन न करके द्वारिकाधीशके साथ रामदेवजीका भजन करनेका उपदेश किया। कहा- 'एक हाथका चित्र बनवा लो, जिसमें सिंहासनपर द्वारिकाधीश विराजमान हों और सिंहासनके नीचे एक ओर श्रीरामदेवजी हों। उनकी सेवा किया करो।
उन्होंने पूछा 'मन्त्र कौन-सा जपें?' तो उन्होंने कहा- 'सोलह नाम, बत्तीस अक्षरोंवाला महामन्त्र।' साथ ही उन्होंने आदेश दिया- 'विष्णुसहस्रनाम, नारायण कवच, श्रीमद्भागवत् और भक्तमालका नित्य पाठ किया करो।'
कुशलसिंहजीने इसी रीतिसे भजन करना प्रारम्भ कर दिया। दूसरी बार, जब वे वृन्दावन आये, तब उन्होंने लीला-चिन्तनके विषयमें पूछा। बाबाने उन्हें नित्यधाम द्वारिकापुरीमें द्वारिकाधीशकी लीलाका चिन्तन करनेको कहा। इस सम्बन्धमें विस्तृत जानकारी प्राप्त करनेके लिए उन्होंने उन्हें राधारमणजीके गोस्वामी श्रीबनवारीलालजीके पास भेज दिया।
बनवारीलालजीने बाबाकी इच्छानुसार उन्हें उपदेश करना तो प्रारम्भ कर किया? कुशलसिंहजीको निताई-गौर और राधा-कृष्णकी गौडीय उपासनाकी जगह दिया, पर वे दूसरे दिन बाबाके पास गये और बोले- 'बाबा, आपने यह क्या द्वारिकाधीशकी उपासना बता दी !
बाबाने कहा- 'देखिये, उनका परिवार परम्परासे राजकीय सेवाओंमें नियुक्त अधिकारी हैं। ऐश्वर्यक वातावरणमें उनका सारा जीवन व्यतीत हुआ है। उनके रहा है। उनके पिता जयपुर दरबारमें मन्त्री थे। वे स्वयं जयपुर राज्यके उच्च जातिगत संस्कार भी उसी प्रकारके हैं। द्वारिकाधीशकी ऐश्वर्यमयी उपासनामें उनकी स्वाभाविक रूचि है। उसके द्वारा ही उन्होंने अभीष्ट फलकी प्राप्ति सम्भव है।'
कुछ दिन बाद कुशलसिंहजीने जयपुर हाईकोर्टके चीफ जस्टिसके पदसे इस्तीफा दे दिया। संसार त्यागकर साधुवेश ग्रहण करनेका निश्चय किया। बाबाके पास आकर अभिप्राय प्रकट किया। बाबाने निषेध करते हुए कहा 'इसकी क्या आवश्यकता है ? क्या घरमें भजन नहीं होता ? समय खराब आ रहा है। हमारी तो गाडी खिंच गयी। पर अब साधु वह सभी काम करेंगे जो गृहस्थी करते हैं। धन जुटायेंगे, मकान बनायेंगे, कपड़े सिलायेंगे और आरामसे रहना चाहेंगे, इसलिए घरपर रहकर भजन करना ही ठीक है।'
कुशलसिंहजीने वेश लेनेका विचार त्याग दिया। वे घरपर रहकर ही भजन करने लगे। महीने-दो-महीनेमें एक बार वृन्दावन आते और एक-दो दिन पण्डित बाबाका सत्संग कर चले जाते।
हरीसिंहजी कुशलसिंहजीके सम्बन्धी थे। वे भी जयपुर स्टेटके निमोड़िया ठिकानेके जागीरदार थे। कुशलसिंहजीके संगसे उनमें भी पण्डित बाबाके आनुगत्यमें भजन करनेकी इच्छा जागी। उनकी मानसिक स्थिति भी ठीक कुशलसिंहजीकी-सी ही थी, इसलिए उन्हें भी बाबाने उसी प्रकार भजन करनेका उपदेश किया।
हरीसिंहजीकी नवविवाहिता पत्नी बहुत बीमार थीं। सब प्रकारकी अच्छी-से-अच्छी चिकित्सा किये जानेपर भी उनकी दुर्बलता दिन-पर-दिन बढ़ती जा रही थीं। अच्छे होनेकी आशा जाती रही थी। वे उन्हें बाबाके पास ले गये और बोले- 'बाबा, मुझे ज्योतिषियोंने दूसरे विवाहका योग बताया है। इनके भी ग्रह बहुत खराब हैं। इनके अन्त समयमें उन्हें जैसा उचित समझें उपदेश कर दें।'
बाबाने कहा- 'ग्रह तो उन्होंके पीछे पडते हैं, जो भगवानसे विमुख होते हैं जो उन्मुख होते हैं, उनकी वे सेवा करते हैं। इनसे कहो श्रीमद्भागवतका पाठ किया करें।'
कहा। 'पाठ करनेकी इनमें शक्ति ही कहाँ' हरीसिंहजीने दुःख प्रकट करते हुए
'तू सुनाया कर' बाबाने आज्ञा की। हरीसिंहजीने पाठ सुनाना आरम्भ किया। तभीसे उनका स्वास्थ्य सुधरने लगा और कुछ ही समय में वे पूर्ण स्वस्थ हो गयी।
बाबासे जब कोई दीक्षाके लिए आग्रह करता, तो वे किसी और व्यक्तिसे दीक्षा दिलवा देते। ठाकुर कुशलसिंहजी और ठाकुर हरीसिंहजीके कई सम्बन्धियोंको उन्होंने वृन्दावनके श्रीछुट्टनलालजी भट्टसे दीक्षित करवाया। ग्वालियरके राजा माधवरावके बड़े भाई श्रीबलवन्त रावको गोपीनाथ बागके श्रीकेशवदेवसे दीक्षा दिलवायी और बहुत-से लोगोंको पूँछरीके बाबा माधवदासजीसे।
कई लोगोंने चालाकीसे बाबाके मुखसे मन्त्र सुनकर उन्हें दीक्षा-गुरु रूपमें वरण करना चाहा, पर वे सफल न हुए। एक संन्यासीने किसी मन्त्रका उल्टा उच्चारण कर कहा 'बाबा, यह मन्त्र ठीक है ?'
उसने सोचा कि बाबा सीधा करके बोल देंगे, तो उसका काम बन जायेगा। पर बाबाने कहा- 'मन्त्र उल्टा क्यों बोलते हो ?' और चुप रहे।
श्रीविष्णुदास बाबाने पूछा- 'बाबा, द्वादशाक्षर मन्त्र कौन-सा है ?
जीवन के अंतिम प्रसंग और स्मृतियाँ
बाबाने कहा- 'अष्टादशाक्षर मन्त्रमें-से अमुक अमुक संख्याके अक्षर निकाल दो। जो शेष रहता है, वही द्वादशाक्षर मन्त्र है।'
श्यामकुटीमें रहते समय एक बार एक मनोरंजक घटना घटी। गोवर्धन थानेके निकट ठाकुर श्रीकृष्णचन्द्रजीकी कोठी थी। वे बाबाके प्रति श्रद्धा रखते थे और उनका सत्संग किया करते थे। एक दिन उनकी पत्नी अपने परिवारकी एक और महिलाके साथ उनके दर्शन करने श्यामकुटी गयीं। वहाँ उन्हें प्यास लगी। देखा बाबाकी कुटियामें पानीका केवल एक पात्र है, सो भी रजका न जाने कबका पुराना करुआ। यदि वे बाबासे कहे तो उसीका पानी पीना होगा। वे प्यासी ही घर लौट गयीं।
स्वामीसे जब उन्होंने यह बात कही तो उन्होंने कहा- 'बाबाके रजके करुएके प्रति घृणा-दृष्टि कर तुमने अच्छा नहीं किया। तुमसे अपराध हो गया।'
पत्नीको बहुत पश्चाताप हुआ। उन्होंने अपने अपराधके प्रायश्चितकी बात इन तो श्रीकृष्णचन्द्रजीने कहा- 'करुएसे क्षमा माँगकर उसका जल पीनेसे तुम्हारे अपराधका शमन हो सकता है।'
वे बाबाकी कुटियापर दूसरे दिन फिर गयीं। दूसरे दिन भी उसी महिलाको साथ ले गयीं। करुएकी तरफ देखकर मन-ही-मन उससे क्षमा माँगी। फिर बोलीं- 'बाबा प्यास लगी है।' बाबाने किसी सेवकको पानी पिलानेको कहा। वह जब करूएसे पानी पिलाने लगा, तो वे उसके चमचमाते हुए चिन्मय स्वरूपके दर्शनकर आश्चर्यचकित रह गयीं।
तत्काल उन्होंने अपने-आपको मन-ही-मन बाबाके चरणोंमें समर्पित करते हुए कहा- 'बाबा कछ भजन बताओ।'
बाबाने कहा- 'कहा भजन बताऊँ?
'कुछ बताओ।'
'तू कौन सम्प्रदायकी है?'
'वल्लभ सम्प्रदायकी है।'
'तेरे सम्प्रदाय माऊँ सबनको एक मन्त्र दियो जाय है, सो कौन-सो हैं? ठकुराइनने साथकी महिलाको इंगित कर दिया। उसने कहा- 'श्रीकृष्णः शरणं मम।'
'जाई मन्त्र जप्यौ कर' बाबाने कहा।
ठकुराइन घर गयीं तो ठाकुर साहबको सारा वृत्तान्त सुनाया और बोलीं- 'अब बताइये, बाबाने भी वही मन्त्र बता दिया जिसमें आपका नाम है। उसे कैसे जपूँ ?'
ठाकुर साहब बोले- 'बाबासे ही पूछ न जाकर।'
वह फिर बाबाके पास गयी और बोली- 'बाबा, तुमने मन्त्र बतायो है, बामें तो चम्पोके चाचाको नाम है। बाको जप मैं कैसे कर सकूँ?' चम्पो उसकी लड़कीका ना था।
बाबाने कहा- 'नायँ कर सके तो 'कृष्ण' की जगह 'चम्पोके चाचा' कह लियो कर।'
"चोखो बाबा 'चम्पोके चाचा शरणं मम' तो मैं खूब जम लऊँगी।" भोली ठकुराइनने प्रसन्न होकर कहा ।
श्रीप्रियाशरणदास बाबाजी आदिसे इस नये मन्त्रकी चर्चा की। सब मिलकर खूब ठाकुर साहबको इसका पता चला, तो उन्होंने श्रीगौरांगदास बाबाजी और हँसे, पर किसीने ठकुराइनसे कुछ न कहा। उन्होंने सोचा सिद्ध बाबाका दिया मन्त्र है। ठकुराइन श्रद्धापूर्वक इसका जप कर रही है। वे बीचमें अड़ंगा डालनेवाले कौन?
पण्डित बाबाका वैराग्य अद्वितीय था। व्रजवासियोंके घरसे मधुकरीम प्राप्त करते और उसके पश्चात् मधुकरीको चले जाते। किसीके निमन्त्रणपर कहीं न रोटीके टूक उनका एकमात्र संबल थे। वे नित्य सन्ध्या समय गोविन्दजीके दर्शन जाते। एक दिन मार्गमें एक ब्रजवासी मिला. जिसके यहाँ वे प्रायः मधुकरीको जाया करते। उसने कहा 'बाबा, मधुकरीको आइयो।'
बाबाने कहा- 'आऊँगा।' वे उसके यहाँ गये, पर उस दिन नहीं, क्योंकि उसने निमन्त्रण देकर बुलाया था। जब कोई विशेष रूपसे निमन्त्रण देता तो मधुकरी भी विशेष ही देता, पर बाबा तो रोटीका एक टूक ही लेते, पूरी रोटी भी नहीं। यदि कोई पूरी रोटी मधुकरीमें देता, तो उसके यहाँ मधुकरीको जाना बन्द कर देते।
बाबाकी कुटियामें लँगोटी, बहिर्वास, रजका करुभा और कुछ ग्रन्थेकि अतिरिक्त और कोई वस्तु न दीखती। यदि भूले-भटके कोई वस्तु आ जाती तो उसे बाबाका कोप खा जाता।
एक बार प्रियाशरण बाबाने एक रजका करुआ पानी भरकर कुटियामें रख दिया। बाबा मधुकरीसे लौटकर आये, तो जैसे ही उनकी दृष्टि उसपर पड़ी, उसे कुटियाके बाहर ले जाकर पटक दिया। क्रोधमें भरकर प्रियाशरण बाबासे बोले-'क्यों रे, करुआ कायकूँ लायी?'
'बाबा, गर्मी पर रही है। आप बार-बार जल माँगौ हो। जा मारे जल भरके राख दियो।'
'जा मारे, कि तोकूँ बार-बार कुआँपर जानो पड़े है, जा मारे? रहन दे, अब तोते जल नायँ मागूँगो। मूरख, जाने नायँ करुआ बालकनको जल पीबेके ताई निमन्त्रण दैके भजनमें विघ्न करैगो ?'
एक बार बाबाको किसी बीमारीके कारण मकरध्वज लेनेकी आवश्यकता पड़ी। उनके सेवक बाबा श्यामसुन्दरदासजी मकरध्वज घोटकर दिया करते। बाबाको यदि मालूम पड़ जाता कि उनके स्वास्थ्यके लिए एक वैष्णवको इतना
परिश्रम करना पड़ता है. तब वे मकरध्वज लेना स्वीकार न करते। इसलिए वे खरल और लोढी छिपाकर रखते और घोटनेका काम भी जब करते तब बाबा शौचको गये होते। किसी प्रकार लोढी टूट गई। उन्होंने ठाकुर कुशलसिहजीसे कहा कि छोटी लोढी ले आनेको। दूसरे दिन बाबाने देखा कि ठाकुर कुशलसिंहजी श्यामसुन्दरदासको कागजमें लिपटी कोई चीज दे रहे हैं। उनके चले जानेपर उन्होंने
श्यामसुन्दरदाससे पूछा- 'कुशलसिंह कहा दै गयो ?' 'कुछ नहीं बाबा, मकरध्वज घोटनेके लिए एक-सी लोढी।'
'छोटी-सी लोढी !' कहते हुए बाबाका मुँह गुस्सेसे तमतमा गया। वे उठ खडे हुए। करुण उठाया, मधुकरीका झोला कन्धेपर डाला और कूटिया छोडकर चले जानेका उद्यम करते हुए बोले- 'तू लोढी लेकर रह। मैं चला।'
श्यामसुन्दरदासने बाबाके चरण पकड़ लिये और रोकर बोले- 'बाबा मुझसे अपराध हुआ, क्षमा करें। मैं मर जाऊँगा।'
'तो जा लोढ़ी अभी देकर आ।'
श्यामसुन्दरदास उसी समय कुशलसिंहजीको लोढ़ी लौटा आये। तब उनका गुस्सा शान्त हुआ।
बीमारीकी अवस्थामें बाबाको साटीफुड लेनेको कहा गया। साटीफुड बीमारोंके लिए बहुत हल्का पथ्य है, जो बंगालमें मिलता है। मुंगेरके राजा श्रीरघुनन्दनसिंह बाबाके पास आया करते। किसीने उनसे कहा कि बाबाको साटीफुड बताया गया है, पर वे उसे लेना नहीं चाहते। आप मँगवा दें तो शायद ले लें। राजा साहब बड़े वैष्णव-सेवी महापुरुष थे। सेवाके ऐसे अवसरोंकी खोजमें स्वयं रहते थे। उन्होंने एक पूरा टिन साटीफुडका मँगवाकर बाबाके पास भेज दिया। कृपासिंधुदास बाबाने उसे कुटियाके पास बाहर चबूतरेपर रखवा दिया। बाबाकी आज्ञाके बिना तो वे उसे भीतरला नहीं सकते थे। बाबासे उसके विषयमें कहा तो तो कृपासिंधु बाबापर क्रोध करते हुए बोले- 'तूने उसे रखा ही क्यों लिया? उसी समय वापस क्यों नहीं कर दिया ?'
कृपासिंधु बाबाने उसी समय उसे वापस भिजवा दिया। राजासाहबने फिर लौटा दिया और विनयपूर्वक पण्डित बाबासे उसे ग्रहण करनेको कहला भेजा। एक बार फिर उस पीपेने बाबाकी कुटियाके बाहर उसी पत्थरके चबूतरेको सुसज्जित किया। न जाने कब तक वहाँ पड़ा-पड़ा बाबाकी कृपाकी प्रतीक्षा करता रहा, पर बाबाने उसपर भू क्षेप भी न किया।
उनके भक
बजवासीको छोड अन्य किसीके द्वारा लायी हुई वस्तु बाबा ठाकुर-सेवाके लिए भी कभी अङ्गीकार न करते। एक बार सिन्धी भक्तने ठाकुर-सेवाके लिए चन्दनको लकड़ी लाकर सामने रखी। बाबाने कहा- 'यह तो हमारे पास है। इसे किसी औरको देना। जब उसने आग्रह किया तो बोले- 'भाई तुम समझते नहीं, यह हमारी परिपाटी नहीं है।
एकादशीके दिन बाबा और उनके आश्रममें जो भी रहते सब निर्जल व्रत करते। द्वादशी के दिन किसी वजवासीके यहाँसे प्रसाद आ जाता। वहीं सब लोग ग्रहण करते। एक बार द्वादशी के दिन अपराह्न ३ बजे तक प्रसाद कहींसे न आया। उसी समय चार आदमी आये बिहारीजीके भोगकी एक पीपा रबडी और बहुत-सा पूरी-कचौडी आदि लेकर। कृपासिंधु बाबासे बाले- 'यह हरगुलालजीने भेजा है।' भूखे मारे मुरझाए जा रहे बाबा लोगोंमें जैसे जान आ गयी।
कृपासिंधु बाबाने कुटियाके भीतर जाकर बाबासे कहा- 'हरगुलाल सेठने पूरी, रबड़ी आदि बहुत-सा सामान भेजा है।'
बाबाने कहा- 'लौटा दो।' प्रसाद लौटा दिया गया। सेठ हरगुलालजीको मार्मिक कष्ट हुआ। वे स्वयं आये बाबाके पास और बोले- 'बाबा' बिहारीजीका प्रसाद क्यों लौटा दिया ?'
बाबाने कहा- "बिहारीजीका प्रसाद कहाँ? तुम्हारे आदमियोंने तो कहा 'हरगुलालजीने भेजा है।'
लेते ? हरगुलालजी व्रजवासी तो थे नहीं। उनके नामसे आयी हुई सामग्री वे कैसे
बाबा हर किसी मन्दिरके ठाकुरका प्रसाद भी ग्रहण न करते। विशेष रूपसे उन मन्दिरोंका प्रसाद नहीं लेते, जहाँ किसी राजा या विषयी आदमीके द्रव्यसे सेवा होता।
ठाकुर कुशलसिंहजी एक बार जयपुरसे गोविन्दजीका प्रसाद और उनकी प्रसादी माला लाये। माला बाबाने प्रेमसे धारण कर ली, पर प्रसादका एक कण लेकर बाकी वैष्णवोंमें बाँट दिया। कुशलसिंहजीसे कहा- 'फिर कभी मत लाना। गोन्दिजीका प्रसाद गोविन्दजी ही हजम कर सकते हैं।'র চিত
एक बार राजर्षि वनमाली रायने अपने ठाकुर श्रीविनोदलालका प्रसाद भेजा। उसकी भी एक कणिका लेकर बाकी वितरण कर दिया। रात्रिमें ठाकुर
आयसे उनका भोग करता था। विनोदलालजीने स्वप्नमें कहा- 'तूने हमारा प्रसाद क्यों नहीं लिया? यह जायदाद तो मेरी है।' ठाकुर विनोदलालजीके नाम कुछ सम्पत्ति लिखी हुई थी। उसीकी
दूसरे दिन बाबा ग्वालपोखरासे पैदल ही वृन्दावनमें विनोदलालजीके मन्दिरकी ओर चल दिये और भी भर पेट विनोदलालजीका प्रसाद ग्रहणकर धन्य हुए। इसके बाद फिर कभी उन्होंने श्रीविनोदलालजीको शिकायत करनेका अवसर नहीं दिया।
राधाकुण्डके महन्त श्रीनरहरिदासके पास नहीं बाहरसे परवल आये। उन्होंने कुछ बाबाके पास भेज दिये। बाबाने कृपासिंधुदासजीसे कहा- 'नरहरिसे कहला दो परबल-फरबल न भेजा करे।'
पासमें बैठे एक व्रजवासीने कहा- 'परबल तो अच्छी चीज है बाबा। बड़ो गुन करें है।'
बाबा बोले- 'अरे बाहरकी चीज जो है।
'बाहरकी चीज ते कहा होय है बाबा?'
'तू भजन करे है? भजन करे तो मालूम पड़े कहा होय है।'
एक बार राजा बलवन्तसिंह आये अपनी माँके छः लाख रुपयेके आभूषण लेकर पण्डित बाबाको देने। पण्डित बाबाने समझाया कि उस धनसे उनका और वैष्णवोंका अनिष्ट होगा। वे समझ गये और आभूषण वापस ले गये। उसी पैसेसे उन्होंने वृन्दावनमें ग्वालियर मन्दिरका निर्माण करवाया।
कानपुरके एक सेठकी पत्नी आयीं एक लाख रुपये लेकर और बोलीं- 'बाबा, इसे ग्रहणकर ठाकुर-मन्दिरके निर्माण आदिमें लगानेकी कृपा करें।'
बाबा ने कहा- 'यह काम मुझसे नहीं होगा' और उसे उड़िया बाबाके पास जानेकी सलाह दी। वह भी मान गयीं और धनसे उड़िया बाबाके यहाँ मन्दिर बन गया।
एक और राजासाहब आये राजसी ठाट-बाटमें अशफियोंकी थैली लेकर। बाबाको दण्डवत् कर थैली उनके सामने रखा और जमकर बैठ गये । बाबाके समझानेपर भी न माने। बाबाने क्रोधमें चीख-चीखकर गाली देते हुए उनसे वहाँसे चले जानेको कहा । इसका भी उनपर कुछ असर न हुआ। तब आबार हो उन्होंने कहा-'तू नहीं जाता, तो ले मैं अपना माथा कूटता हूँ।' जैसे ही उन्होंने माथा कूटनेका उपक्रम किया, वे थैली लेकर चले गये।
उनके भक्त
बोलतो बाबाको महात्मा समझकर उनकी सेवाके उद्देश्यसे उनके पास गया एक बासी पण्डितसे उनका स्नेह था। उन्होंने उनसे सारी बात कही और था, पर वे मुझे देखते ही बरस पड़े। न जाने कितनी गालियाँ सुनायीं और अपमान किया। अच्छे महात्मा रहे।'
पण्डितने कहा- 'दोष बाबाका नहीं, आपका है। आपने पहले ही अपराध किया है। अब उनके प्रति दोषोरोपण कर एक और अपराध कर रहे हैं। यदि उनके प्रति आपके ऐसे विचार बने रहे, तो आपका अमंगल होगा। आप मेरे साथ बाबाके पास चलें और मैं जैसे कई वैसे करें, तो आप देख लेंगे कि वे कैसे महात्मा हैं और उनके प्रति अपराधजनक भावनासे मुक्त हो जायेंगे।
राजासाहब सहमत हो गये। दूसरे दिन पंडितजीके कहनेसे राजा उनके साथ गये साधारण वेशमें. कण्ठी-तिलक और माला-झोलीके साथ। दोनों दण्डवत् कर बैठ गये। बाबाने पण्डितजीको आसन दिया और उनका कुशल-क्षेम पूछा।
थोडी देर और और बातें करनेके बाद पण्डितजीने कहा- 'मैने सुना कल एक राजाने आपको बहुत दुःख दिया। उसका कितना अमंगल होगा।'
बाबाने कहा-'नहीं, अमंगल नहीं। वे बड़े अच्छे थे। राजा होकर मेरी गालियों थीं। सुनते रहे। कुछ भी नहीं बोले। मैंने तो उनका मंगल करनेके लिए गालियाँ दी यदि वे धनको छोड़ जाते, तो उससे वैष्णवोंकी वृत्ति दूषित होती। चोर-डाकू आकर उन्हें पीडित करते। उसका दोष राजाको लगता और उनका अमंगल होता, पर उन्होंने तो मेरी बात मान ली। फिर अमंगल कैसे ?
सुनते ही राजाके हृदयका मैल धुल गया। वे बाबाके चरणोंमें गिरकर रोते हुए बोले- 'बाबा वह मूर्ख राजा मैं ही हूँ। मैं ने आपके चरणोंमें अपराध किया। मुझे क्षमा करें।'
दैन्यमें पण्डित बाबा 'तृणादपि सुनीचेन' की सजीव मूत्ति थे। वे दूसरोंको यथोचित सम्मान देते, पर उनका कोई सम्मान करता, तो उसका विरोध करते। कथा-कीर्तनादिमें कहीं जाते, तो जहाँ जगह देखते वहीं बैठ जाते। किसीकी हिम्मत न होती, जो उन्हें ले जाकर आगे बिठा दे।
यदि कभी कोई उनकी अवहेलना करता, तो उसका बुरा न मानते। राधारमण मन्दिरके प्रसिद्ध गोस्वामी बनवारीलालजीसे उनका सख्य भाव था। सम्मान भी दानों एक-दूसरेका बहुत करते थे। एक बार मधुकरीके समय पण्डित बाबा
कृपासिंधुदासजीको साथ ले उनके घर गये। बाहरसे आवाज देकर बहुत देर तक बैठा देखकर भी एक रहस्यमय उद्देश्यसे बिना बोले कहीं चले गये। पर, उनके प्रतीक्षा करते रहे। बनवारीलालजी महाराज बाहर निकले और उन्हें चौखण्डीपर उदेश्यकी पूर्ति न हई। दूसरे दिन फिर उसी समय बाबा वहाँ गये और बिना किसी मनोमालिन्यके हँसी-खुशी बहुत देर उनसे बातें करते रहे।
बाबा कभी किसीको अपना पैर न छूने देते। एक बार वे बिहारीजीके दर्शनकर मन्दिर के पीछे चबूतरेपर बैठे थे। एक नवयुवकने उनके चरण छू लिये। वे उसके चरण छनेको हए. वैसे ही वह उनके चरण पकड़ कर सीधा लेट गया। वृद्ध बाबाका कुछ बस न चला, तो उसकी पीठपर मुक्के मारने लगे।
बिहारके एक व्यक्तिके पेटमें दर्द रहता था। बहुत इलाज करनेपर भी नहीं जा रहा था। उसे स्वप्नमें किसीने पण्डित बाबाका नाम और पता बताकर कहा- 'उनकी चरणरज माथेसे लगानेसे दर्द चला जायेगा।'
वह वृन्दावन पहुँचा। उस समय पण्डित बाबा मधुकरीको गये हुए थे। लौटते समय वनखण्डीपर उनसे भेंट हुई। उसने चरण स्पर्श करना चाहा, तो उन्होंने डाँट दिया। बेचारा बहुत दुःखी हुआ। पीछे कृपासिंधु बाबाकी बतायी युक्तिके अनुसार शौचको जाते समय बाबाके पड़े चरण-चिह्न-से उसने चुपकेसे एक चुटकी रज उठाकर माथेसे लगा ली। उसी समय उसका दर्द जाता रहा।
बिहारके एक और सज्जनको वैसी ही व्याधि हुई। वे भी गये बाबाकी चरणरज लेने। उन्होंने बाबासे अपनी व्यथा कही और चरणरजके लिए प्रार्थना की। बाबाने कहा-'मेरी चरणरज लेनेसे नहीं, अपनी चरणरज देनेसे तुम्हारी व्यथा दूर हो सकती है।' इतना कह उन्होंने उनके चरण स्पर्श कर हाथ सिरपर फेर लिये। उसकी भी व्यथा जाती रही।
एक बार लोगोंने देखा कि कलकत्तेके श्रीरामदास बाबाजी महाराजने उनके चरण स्पर्श किये, तो उन्होंने कोई आपत्ति न की। पीछे किसीने कहा-'बाबा, आपने इतने बड़े महात्मासे तो चरण छुआ लिये, फिर हमसे छुआनेमें क्यों आपत्ति करते हैं?
बाबा बोले- 'अरे, रामदासजी महात्मा हैं। वे यदि कहें चरण छुआओ तो छुआने होंगे, कहें चरण छुओ, तो छूने होंगे।'
पर, एक बार तो उन्हें गोकुलानन्दके मन्दिरके श्रीनवद्वीपदास बाबाके कीर्तनमें ऐसा आवेश हुआ कि व समस्त रात्रि संकीर्तन सुनते रहे और अन्तमें इतना भाव
ही अपनी चरणरजका सदावत लगा दिया और उपस्थित भक्तगण चिराभिलाषित उस विहल हो गये कि स्वयं ही पैर फैलाकर बोले 'लेओ, लेओ।' उन्होंने जैसे अनजाने अलभ्य वस्तुको प्राप्तकर धन्य हुए।
पण्डित बाबाने अपनी जानकारी में किसीको अपना फोटो नहीं लेने दिया। कासगंजको तेल मिलके मालिक एक सेठजीने गुप्तरूपसे उनका फोटो लेनेकी व्यवस्था की। एक दिन जब वे पाठ सुनकर कालीदहके नयारघेरासे लौट रहे थे. उन्होंने भार्गमें तीन स्थानोंपर फोटो लेनेकी व्यवस्था कर रखी थी। एक कैमरा नृसिंहटेकरीके चबूतरेपर फिट था। बाबा जैसे ही उनके निकट पहुँचे, विष्णुदास बाबाने उन्हें सचेत कर दिया और उन्होंने उत्तरीयसे अपना मुख बँक लिया। दूसरी बार एक आमके बगीचेमें उनका फोटो लेनेकी चेष्टा की गयी। वहाँ भी विष्णुदास बाबाको कैमरा दीख गया और उन्होंने बाबाको सचेत कर दिया। बाबाने पहलेकी तरह मुख बँक लिया। तीसरी बार जब उनका फोटो लेनेकी चेष्टा की जाने लगी तब उन्होंने दौड़ लगा दी और अपनी कुटियामें पहुँच कर साँस ली।
बाबाकी इच्छाके विरुद्ध उनका फोटो इस चेष्टासे उन्हें जो उद्वेग हुआ उसे उन्होंने तो सह लिया, पर प्रभुको यह बात सहन न हुई। परिणाम यह हुआ कि तेल मिलवाले सेठजीकी मिल बन्द हो गयी और वह फोटोग्राफर तो संसारसे ही चल बसा। प्रभु अपने प्रति किये गये अपराधको क्षमा भले ही कर दें, पर अपने भक्तोके प्रति किये गये अपराधको क्षमा नहीं करते।
बाबाने अपनी अलौकिक शक्तिका अपनी इच्छासे कभी प्रयोग नहीं किया। यदि कभी किसी परिस्थिति विशेषमें उनके माध्यमसे कोई अलौकिक घटना घटी तो चतुरीईसे या अपनी दैन्योक्तिसे उसे ढँकनेका प्रयत्न किया। एक बार श्रीप्राणगोपाल प्रभुकी माँकी तिरोभाव-तिथिके उपलक्ष्यमें बाबाके आश्रममें उत्सव था। प्राणगोपाल गोस्वामीने वैष्णव-सेवाके लिए २००) रुपये भेजे थे। उसके अनुरूप निश्चित संख्यामें वैष्णवोंको आमन्त्रित किया गया था। उसी दिन श्रीरामदास बाबाजी महाराज पधारे कलकत्तेसे। उन्होंने कहला भेजा कि वे सन्ध्या समय अपनी भक्तमण्डली सहित दाऊजीकी बगीचीमें जाकर गौर-गदाधर-मिलन-कीर्तन करेंगे।
बाबाकी आज्ञा थी कि जब कभी आश्रममें कोई उत्सव हो, तो उस समय जो भोग लगे वह आश्रममें आये सभी लोगोंमें वितरण किया जाय, किसीकी उपेक्षा न की जाय। रामदास बाबाजी महाराज प्रतिवर्षकी भाँति इस बार भी आये थे
आवश्यक था। जो सामग्री थी. उसमें इतने लोगोंको पूरा पड़ना असम्भव था। -तीन सौ बंगाली भक्तोंकी मण्डलीके साथ। उन्हें सबको प्रसाद वितरण करना सिंधु बाबा आदिके लिए यह चिंताका विषय था। पर, आश्चर्य कि उतनी ही सामग्रीमे सब लागोंने भरपेट भोजन कर लिया। पीछे बाबाने कहा- 'यह लोग जो आये थे, सब बहुत थोडा खानेवाले थे।'
बाबा की भजन-पद्धतिमें लीला स्मरण और नाम जपकी प्रमुखता थी। शेष अवस्थामें भी वे रात्रि २ बजेसे उठकर लीला स्मरण करते। पर, नाम जप तो जैसे उनकी जीवन-धाराका स्वाभाविक अङ्ग ही बन गया था। निद्राकी अवस्थामें भी उन्हें नाम-जप करते स्पष्ट सुना जाता था। उनकी एक ऊँगली जो नाम जपके समय झोलीसे बाहर सीधी रहती है, जप करते-करते ऐसी हो गयी थी कि उसे मोड़ा नहीं जा सकता था। प्रसाद पाते समय भी उसका प्रयोग नहीं होता था। वह जैसे नामको ही पूर्णतया समर्पित थी।
एक बार महामहोपाध्याय श्रीप्रमथनाथ तर्कभूषणने उनसे पूछा- 'बाबा, कलिमें नाम-जप इतना महत्त्व क्यों है?'
उन्होंने उत्तर दिया- 'कलिमें यज्ञ नहीं हो सकता, क्योंकि द्रव्य शुद्ध नहीं है। योग, ज्ञान आदिसे भगवत्-प्राप्ति नहीं हो सकती, क्योंकि जन्म शुद्ध नहीं है। पूजा-अर्चनादिसे भी चरम फलकी प्राप्ति मुश्किलसे होती है, क्योंकि उसमें विधि-निषेध है। केवल नामसे चरम फलकी प्राप्ति सम्भव है, क्योंकि उसमें विधि-निषेध नहीं है।'
नाम-जपकी चर्चा करते समय वे श्रद्धापूर्वक एक वल्लभकुलकी बाईका जिक्र किया करते, जो समय गोवर्धनमें धौला-मन्दिरके पास एक पेड़पर रहती थी। वह दिनमें पेड़पर रहती, रातको नीचे उतर जाती। हर समय आर्त स्वर से 'गोकुलेश, गोकुलेश' कहा करती। मधुकरीको भी कहीं न जाती।
गुरु-सेवा और वैष्णव-सेवाको पण्डित सबसे अधिक महत्त्व देते। श्रीविग्रह-सेवासे भी गुरु-सेवाको उत्तम मानते। वैष्णव-सेवा के दृष्टान्त-स्वरूप वे एक मणिपुरिया बाबाका जिक्र करते, जो गुफाके भीतर एक गड्ढे में रहा करते। सोते बिलकुल नहीं। आटेकी मधुकरी करते और रोटी बनाकर साधुओंमें वितरण करते।
तनिक भी कष्ट न झेलना पड़ता। पर, वे अन्याभिलाषिताशून्य एकान्तिक भजनके बाबा कई बार गम्भीर रूपसे बीमार हुए। वे यदि प्रभुसे प्रार्थना करते, तो उन्हें तो उन्हें तनिक भी कष्ट न झेलना पड़ता। पर, वे अन्याभिलाषिताशून्य एकान्तिक भजन के TEX
मूर्तस्वरूप थे। उन्होंने अपने जीवनमें अपने रोग-धोग या सुख-दुःखके लिए कभी अपने इष्टको न तो स्वयं याद किया, न अपनी जानकारीमें किसी औरको ही याद करने दिया।
एक बार उनकी डाढमें असहा वेदना हई। श्रीकामिनीकुमार घोषके पुत्र डॉक्टर गौरपद घोषको बुलाया गया दाँत उखाडनेके लिए। उन्होंने जैसे ही 'जयगौर' कहकर दाँत उखाड़ना चाहा, बाबा उठकर दूर जा खडे हए। बोले-'मुर्ख ! मेरे दाँतके लिए गौरको कष्ट देगा। जा तुझसे दाँत नहीं निकलवाऊँगा।' वे वेदना सहन करते रहे। पर दाँत नहीं निकलवाया। गम्भीर बीमारीकी स्थितिमें भी उन्हें 'हा राधे!' 'हा कृष्ण!' 'या 'हा गौर!' कहते कभी नहीं सुना गया।
पण्डित बाबा अब अगभग ८० वर्षके हो रहे थे। उनकी दुर्बलता बढ़ती जा रहीं थी। फिर भी भजन-सम्बन्धी सारे नियमोंका पालन विधिवत् चलता रहा। वही जाना, नित्य गोविन्दजीको दर्शन करना, एकादशी आदि तिथियोंपर निर्जल व्रत २ बजे रातमें उठना, अपराह्न २ बजे तक भजनमें संलग्न रहना, नित्य मधुकरीको रखना, आचार्योंकी तिथियोंपर पानी हो या तूफान, उनकी समाधियोंपर जाकर दण्डवत् करना, इत्यादि।
धीरे-धीरे मधुकरीका मार्ग संक्षिप्त होता गया। अन्तमें दुर्बलता इतनी बढ़ गयी कि नियम रक्षाके लिए थोड़ी दूर भी मधुकरीके लिए जाना सम्भव न रहा। जब तक वे दाऊजीके बगीचेके फाटक तक भी जा सके, इस नियमका पालनकर अन्य बाबा लोगों द्वारा लायी गयी मधुकरीके दो-एक टूक लेते रहे। पर जबसे वे इस योग्य भी न रहे, उन्होंने अनपर निर्वाह करते आ रहे बाबाको बिना मधुकरीका अन्न रुचता कैसे?
अब वे केवल फलोंका रस लेते। निरन्तर तखतपर लेटे रहते। कुटियासे बाहर जाना होता, तो सेवक तखत पकड़कर बाहर ले आते। पर, ऐसी अवस्थामें भी उनके मनमें किसी प्रकारकी दुर्बलता नहीं आयी। उसमें पहले जैसी ही स्फूर्ति थी। नाम-जप सब समय चलता रहता था। कभी-कभी विनोद भी कर बैठते थे।
एक दिन जब उन्हें तखतपर बाहर ले जाया जा रहा था, वे स्वयं कहने लेग 'राम नाम सत्य है!' लोगोंने इसे निरा विनोद ही समझा। पर, लगता है कि उन्होंने इस प्रकार अपने अन्त समयके निकट होनेका संकेत कर दिया।
बाबाकी अस्वस्थताका समाचार प्राप्त कर ठाकुर कुशलसिंहजी और ठाकुर हरीसिंहजी आये जयपुरसे। चिकित्साकी हर सम्भव व्यवस्था की जाने लगी।
लिए उन्होंने गूलरकी छालके पानीसे गरारे करनेको कहा। बाबाने वनके किसी कलकतेसे एक योग्य वैद्यको बुलाया गया। बाबाके गलेमें तकलीफ थी, जिसके की छाल लानेके लिए निषेध कर दिया। वजके बाहरसे छाल लायी गयी और सभी आवश्यक उपचार किये जाने लगे।
अष्टकालीन लीला-कीर्तन करानेकी। एक मास पर्यन्त उनका कीर्तन होता रहा। इसी बीच बाबाने आज्ञा को गोवर्धनके श्रीगदाधरदास बाबाजीको बुलाकर बाबा हर समय लीलाके आवेशमें रहने लगे।
ठाकुर कुशलसिहजी और ठाकुर हरीसिंहजी जयपुर वापस चले गये। जाते समय ठाकुर हरीसिंहजीने बाबाके निकट खड़े होकर मन-ही-मन प्रार्थना की कि यदि स्वास्थ्य अधिक खराब होने लगे तो उन्हें दोनोंको सूचना अवश्य भिजवा दें।
एक दिन सन्ध्या समय प्रायः सभी बाबाके प्रियजन उन्हें घेरकर बैठे थे। बाबाने कहा-'देखो, मेरा शरीर न रहे, तो फिर यहाँ मत रहना। बगीचा छोड़कर चले जाना।'
किसीने पूछा- 'बाबा, आपकी समाधि ?'
'समाधि-वमाधि कुछ नहीं! तुम लोगोंका भजन ही होगा मेरी समाधि।'
'उत्सव ?'
'उत्सव भी नहीं। उस तिथिको सब मधुकरी ले आना और एक जगह बैठकर पा लेना। मैं अपने गुरुकी तिथिपर उत्सव करता, तो एक दिन पहले किसी व्रजवासीसे कह देता-'थोड़ा हलुआ बना लेना, भोग न लगाना?' हलुआ यमुनापर ले जाता। तुलसी छोड़कर गोविन्दका भोग लगाता और गुरुको निवेदन कर बच्चोंको बाँट देता।'
फिर अपने आश्रमके नयी उम्रके साधकोंकी ओर देखते हुए बोले- 'इन्हें स्त्रियोंसे बचाना।'
दूसरे दिन राधाष्टमी थी। बाबाका निर्जल व्रत था। कृपासिंधु बाबाको बुलाकर उन्होंने कहा- 'मेरा गला सूख रहा है। थोड़ा पुराने घीकी मालिश कर दे।'
कृपासिंधु बाबाने- 'थोड़ा पंचामृत ले लीजिये। आपका शरीर बहुत दुर्बल है।'
'नहीं, नहीं रे ।'
'तो बाबा एक टुकड़ा मिसरीका ही ले लीजिये।'
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'तेरे हाथ जोहूँ, मेरा बत मत तोड़े।'
आदिने कुछ लेनेके लिए आग्रह किया। बाबाने फिर हाथ जोडकर मना कर दिया एकादशी के दिन फिर निर्जल व्रत। फिर कृपासिंधु बाबा और प्रियाशरण और बत न तोडनेके अपने संकल्पपर प्राणकी बाजी लगाकर भी स्थिर रहे।
दो-तीन दिन बाद उन्होंने कृपासिंधु बाबासे कहा 'कुशलसिंह और हरीसिंहको तार देकर बुला लो।'
कृपासिंध बाबाने इसपर ध्यान नहीं दिया। शायद इसकी आवश्यकता ही नहीं समझी। दूसरे दिन फिर बाबाने पूछा- 'उन लोगोंको तार दे दिया।'
इसके बाद बाबा मौन हो गये। वे समाधिस्थ रहने लगे। तार भेज दिया गया।
द्वितीयाके दिन वे एकदम बोल पडे- 'बच्ची, देख प्रिया-प्रियतम आये हैं।
कृपासिंधू बाबाने पूछा- 'बाबा, प्रिया-प्रियतम अकेले हैं या आपका मञ्जरी-स्वरूप भी साथ है?'
'स्वरूप भी है।' बाबाने उत्तर दिया।
'महाप्रभु भी हैं?'
थोड़ी देर चुप रहकर वे बोले- 'महाप्रभु भी हैं।' प्रियाशरण बाबाने पूछा- 'बाबा, बलदाऊजी भी हैं क्या?'
'बलदाऊ यहाँ कहाँ' कह वे चुप हो गये।
चतुर्थीक दिन चेतन अवस्थामें उन्होने कहा बच्चीसे- 'रजका चबूतरा बनाकर मुझे उसपर लिटा ले।'
बाबाके मुखसे यह शब्द सुनते ही जैसे सबके प्राण उड़ गये। प्राणहीन अवस्थामें सबने थोड़ी देरमें रमणरेती आदि स्थानोंकी रजकी शय्या बना दी। बाबाको लिटा दिया।
उस दिन कुशलसिंहजी और हरीसिंहजी आ गये थे। कुशलसिंहजी गोविन्दजीकी प्रसादी माला लाये थे। उन्होंनें माला बाबाके गलेमें डाली। मालाका स्पर्श होते ही बाबाने शरीर छोड़ दिया। गोविन्दजी आये मालाके रूपमें और अपने बचपनके साथी रामप्रतापको ले गये अपने धाममें। मालाके रूपमें उन्हें देखा सबने, पर स्वयंरूपमें देखा केवल बाबाने।
श्रीगौरांगदास बाबाजी
गोविन्दाका यह चिरस्वभाव है। वह जिससे प्रीति करता है, उससे निभाता अन्त तक है।
नाम-स्मरण और एकाग्रता — जीवन-संदेश
नाम-स्मरण, भजन और एकाग्रता के प्रसंग साधना की निरंतरता की याद दिलाते हैं। यहाँ वर्णित जीवन-अनुभवों से पाठक अपनी साधना के लिए प्रेरणा ले सकते हैं।
कथा का सार
पण्डित रामकृष्ण दास बाबाजी की कथा भक्ति, विनम्रता और साधना पर मनन करने का अवसर देती है। इस संग्रह में अन्य भक्तों के जीवन-प्रसंग भी पढ़ें।