ब्रज के भक्त भाग 3 · अध्याय 92

मुसलमान भक्त गुलाब सखीजी

मुसलमान भक्त गुलाब सखीजी की प्रेरक हिंदी कथा। जानिए उनके जीवन, भक्ति और साधना से जुड़े महत्वपूर्ण प्रसंग।

मुसलमान भक्त गुलाब सखीजी
मुसलमान भक्त गुलाब सखीजी — ब्रज के भक्त भाग 3

मुसलमान भक्त गुलाब सखीजी का यह भक्त-चरित्र ब्रज की साधना, श्रद्धा और जीवन से जुड़े प्रसंगों को सामने लाता है। नीचे कथा को अलग-अलग विषयों में व्यवस्थित किया गया है।

जन्म, परिवार और प्रारम्भिक जीवन

[ बरसाना ]

बरसानेकी पीलीपोखरसे प्रेमसरोवर जानेवाले रास्तेसे कुछ हटकर वनप्रान्तमे एक पुराना चबूतरा है। लोग उसे गुलाब सखीका चबूतरा कहते हैं। आते-जाते उसपर माथा टेकते हैं।

गुलाब एक गरीब मुसलमान था। बरसानेमें उसका जन्म हुआ था। बरसानेकी जिस रजकी ब्रह्मा आदि भी कामना करते हैं, उसका जन्मसे ही उसे स्पर्श हुआ था। बरसानेके जलवायुसे उसके शरीर, मन और प्राणका गठन हुआ था। बरसानेके व्रजवासियोंका उसे संग मिला था। वह उन्हींके रङ्गमें रङ्गा हुआ था। उन्हींकी तरह बरसानेकी लीला-स्थलियोंकी रज माथेपर लगाता था। होलीके दिनोंमें बरसानेकी रंगीली गलीमें झाड़ लगाकर अपनेको धन्य मानता था।

वह बहुत दीन, भावुक और सरल था। पढ़ा-लिखा कुछ नहीं था, पर सारंगी अच्छी बजा लेता था। श्रीजी (राधारानी) के मन्दिरके प्रांगणमें जो समाज (पदगान) हुआ करता था, उसमें वह सारंगी बजाता था। यही उसकी जीविका थी। श्रीजीके मन्दिरसे उसे नित्य प्रसाद मिल जाता था और महीनेमें दस-पाँच रुपये, जिससे किसी प्रकारका उसका निर्वाह होता था।

उसकी, एक छोटी लड़की थी, जिसे वह प्यारमें 'राधा' कहा करता था। वह जब समाजमें सारंगी बजाता, तो लड़की नाचा करती। बड़ा मधुर और लोभनीय हुआ करता उसका वह नृत्य।

लड़कीसे वह बहुत प्यार करता था। उसके साथ श्रीजीके मन्दिरमें सेवाकर वह बहुत प्रसन्न रहता था। मानो उसे त्रिलोकीकी सारी सम्पत्ति मिली हुई थी। वह और कुछ नहीं चाहता था। वह क्या सोच पाता था कि यह एक स्वप्न है, जिसका M

कभी अन्त होगा ? लडकी बड़ी होकर ब्याह दी जाएगी और वह श्रीजीको सेवाके लिए अकेला रह जायेगा।

पर, वह दिन आते देर न लगी, जब लोग उससे कहने लगे 'गुलाब लडकी सयानी हो गयी है। उसकी शादी कर दे।' वह केवल गुलाबकी तो लड़की थी नहीं, बरसाने भरकी लडकी थी। बरसानेके सभी लोग उससे स्नेह करते थे, उसके भविष्यकी चिंता रखते थे।

पर. जब कोई उसके ब्याहकी बात चलाता तो गुलाबका एक ही उत्तर होता- 'शादी करूँ कैसे ? शादीके लिए तो पैसा चाहिये न।'

एक दिन श्रीजीके मन्दिरके कुछ गोस्वामियोंने उससे कहा- 'तू पैसेकी क्यों चिन्ता करता है ? उसकी व्यवस्था श्रीजी करेंगी। तू लड़का तो देख।'

गुलाबने लड़का देखना शुरू किया। श्रीजीकी कृपासे एक अच्छा लड़का मिल गया। गोस्वामियोंके सहयोगसे राधाका ब्याह हो गया। वह ससुराल चली गयी।

भक्तों के साथ मिलन और सत्संग

राधाके बिदा होते ही गुलाब गुम हो गया। उसकी भूख-प्यास, गाना और बजाना, सब उसके साथ बिदा हो गये। तीन दिन और तीन रात भूखा-प्यासा श्रीजीके मन्दिरके सिंहद्वारपर गुम बैठा रहा। लोगोंको चिन्ता हुई कि कहीं वह पागल न हो जाय। उन्होंने उसे बहुत समझाया, पर किसीके समझाने-बुझानेका कोई असर न हुआ। उसका विरहोन्माद बढ़ता गया। वह सिंहद्वार पर या तो ग्रहग्रस्त-सा गुमसुम बैठा रहता, या राधाका नाम ले-लेकर आहें भरता रहता।

तीसरे दिन रात १२ बजे, जब वह आँखें बन्द किये बैठा था, उसे सुनायी पड़ी अपनी बेटीकी आवाज- 'बाबा, मैं आ गयी। सारंगी नायँ बजायेंगो ? मैं नाचूँगो।'

उस समय वह सो रहा था या जग रहा था, कहना कठिन है। मुँदी हुई आँखोंसे उसने देखा कि वह सारंगी बजा रहा है और बेटी नाच रही है। पर, उसकी पायलोंकी झंकारमें आज मन-प्राणको हर लेनेवाला जैसा आकर्षण है, वैसा उसने पहले कभी नहीं अनुभव किया था। उस झंकारने उसकी अन्तरात्मा तकको झकझोर दिया। उसके भीतर और बाहरकी दोनों आँखें खुल गयीं। उसने देखा कि यह उसकी बेटी राधा नहीं, स्वयं राधारानी हैं, जो उसीकी तरह नृत्य कर रही हैं और यह उन्हींकी पायलोंकी झंकार है, जो उसके कर्णकुहरमें अमृत उड़ेल रही है !

सजल और विस्फारित नेत्रोंसे उनकी ओर एकटक देखते हुए उसने

वजके भक

कहा- 'बेटी' और जैसे ही कुछ और कहनेकी चेष्टा करते हुए, स्नेहसे काँपते और डगमगाते वह अग्रसर हुआ उनकी ओर, वे भागों मन्दिरकी ओर, और यह भागा उनके पीछे-पीछे।

इसके पश्चात् गुलाबको किसीने कभी नहीं देखा। उसके अकस्मात बरसानेसे अदृश्य हो जानेकी बात सबके लिए एक पहेली बनकर रह गयी। लोगोंने समझा कि उसने लड़कीके विरहमें देह त्याग दिया।

कई दिन बाद मन्दिरके एक गोस्वामी श्रीजीकी शयन-आरती कर अपने घर लौट रहे थे। रास्ते में झरमुटोंके पीछेसे आवाज आयी 'गोसाईंजी, गोसाईजी ।'

उन्होंने उलटकर पूछा- 'कौन ?'

'मैं, तिहारो गुलाब' कहता हुआ गुलाब झुरमुटोंमें से निकल पड़ा।

उसे देख गोस्वामीजी अवाक् ! 'तू तो मर गया था ?' उन्होंने साहस बटोरते हुए कहा।

गुलाबने सिंहद्वारपर श्रीजीके दर्शनकी घटना सुनाते हुए कहा- 'मुझे श्रीजीने अपने परिकरोंमें ले लिया है। अभी शयनके पूर्व मैं उन्हें सारंगी सुनाकर आ रहा हूँ। यह लीजिये उनकी प्रसादी पानकी बीड़ी।'

दिव्य अनुभूति और कृपा के प्रसंग

इतना कह उसने गोस्वामीजीको श्रीजीके प्रसादी पानकी बीड़ी दे दी। वे यह देखकर चकित रह गये कि बीड़ी वही थी, जो वे श्रीजीके भोगमें अभी रखकर आये थे।

गोस्वामीजीने पूछा- 'तो तू अब रहता कहाँ है ?

उसने वही स्थान बताया, जहाँ वह चबूतरा है। चबूतरा उस समयके गोस्वामियोंने उसकी स्मृतिमें वहाँ बनवा दिया था।

गुलाबपर राधारानीकी कृपाके सम्बन्धमें विचार करनेका हमें अधिकार नहीं।

पर रह-रहकर हृदयमें एक प्रश्न जागता है। उस मुसलमानने ऐसा कौन-सा पुण्य किया था, कौन-सा ऐसा जप-तप, साधन या सेवाका कार्य किया था, जिसके फलस्वरूप श्रीजीने उसपर ऐसी कृपा की? यदि कहें कि वह श्रीजीके मन्दिरमें सारंगी बजानेकी सेवा करता था, तो यह उसकी जीविका ही थी। वह सारङ्गी अपना पेट पालनेके लिए बजाता था, न कि श्रीजीको प्रसन्न करनेके लिए। यदि कहो कि वह श्रीजीके मन्दिरके सिंहासनद्वारपर तीन दिन तक बैठा रोता रहा था 'राधा' नाम ले-लेकर, तो वह तो अपनी लड़की राधाका नाम लेकर उसके लिए रोया था, न

श्रीअद्वैतदास बाबाजी

कि राधारानीके लिए। उसके हृदयमें जो तड़प थी, वह अपनी लडकीके विरहकी थी। राधारानीका विरह उसे कब इतना सताया था ? कब उनके दर्शनकी उसे इतनी टपटी हुई थी ?

इस प्रश्नका उत्तर शायद यह है कि राधारानीकी कृपा प्राप्त करनेके लिए किसी जप-तप या साधन-विशेषकी आवश्यकता नहीं। आवश्यकता है केवल उनकी कृपा चाहनेकी और अपने-आपको उसे ग्रहण करनेके योग्य बना लेनेकी। उनका कृपा-वारिधि तो स्वभावतः उच्छलित होता रहता ही है। पर, हमारे हृदय-कलशमें जगह कहाँ रहती है उसका एक बिन्दु भी ग्रहण करनेकी। वह तो लबालब भरा हुआ होता है अगणित दोषों और अपराधोंकी कीचडसे। गुलाब निर्दोष, निष्कपट और निरपराध था। उसके ऊपर राधारानीकी कृपा उमड़ पड़नेके लिए इतना ही पर्याप्त था कि वह उनके मन्दिरका मिरासी था और उनके द्वार पर बैठा रो रहा था उनका भरोसा लेकर। करुणामयी उसे अपने द्वार पर इस तरह रोते कब देख सकती थीं ?

प्रेम और भक्ति — जीवन-संदेश

ईश्वर-प्रेम की अनुभूति भक्त-साहित्य का एक महत्त्वपूर्ण विषय है। इन प्रसंगों को श्रद्धा, संवेदनशीलता और समर्पण के संदर्भ में पढ़ा जा सकता है।

कथा का सार

मुसलमान भक्त गुलाब सखीजी की कथा भक्ति, विनम्रता और साधना पर मनन करने का अवसर देती है। इस संग्रह में अन्य भक्तों के जीवन-प्रसंग भी पढ़ें।