ब्रज के भक्त भाग 3 · अध्याय 57

कर्ता श्रीकृष्णदास बाबाजी

कर्ता श्रीकृष्णदास बाबाजी की प्रेरक हिंदी कथा। जानिए उनके जीवन, भक्ति और साधना से जुड़े महत्वपूर्ण प्रसंग।

कर्ता श्रीकृष्णदास बाबाजी
कर्ता श्रीकृष्णदास बाबाजी — ब्रज के भक्त भाग 3

कर्ता श्रीकृष्णदास बाबाजी का यह भक्त-चरित्र ब्रज की साधना, श्रद्धा और जीवन से जुड़े प्रसंगों को सामने लाता है। नीचे कथा को अलग-अलग विषयों में व्यवस्थित किया गया है।

भजन-साधना और नाम-स्मरण के प्रसंग

[ गोवर्धन, राधाकुण्ड ]

कर्ता श्रीकृष्णदास बाबाजीका बँगाली शरीर था। नित्यानन्द परिवारमें वे दीक्षित थे। पर गोवर्धनके सिद्ध कृष्णदास बाबा उसके शिक्षा-गुरुमें थे। उन्हींके आनुगत्यमें भजन कर वे भी उन्हींके समान सिद्ध हो गये थे। इसलिए गोवर्धनमें मानसीगंगाके किनारे सनातन गोस्वामीको भजन कुटीके निकट, जिस स्थानमें रहकर वे भजन करते थे, वह आज भी सिद्ध बाबाकी ठौरके नामसे प्रसिद्ध है। उन्हें कर्ता बाबा इसलिए कहते कि उस समयका व्रजका साधु-समाज उन्हींके आदेश-निर्देशके अनुसार चलता था।

पर, उन्हें 'गुटिकावाले बाबा' के नामसे लोग अधिक जानते हैं, क्योंकि सिद्ध श्रीकृष्णदास बाबाने साधकोंके श्रीकृष्णकी अष्टकालीन लीला स्मरणके लिए जिस संस्कृत गुटिकाका निर्माण किया था, उसका उन्होने बँगलामें विस्तार किया और उसी रूपमें गुटिका आजकल साधकोंको उपलब्ध है।

बाबा १०४ वर्ष तक इस लोकमें विराजमान रहे। उन्होंने अपनी लम्बी आयुका एक क्षण भी व्यर्थ नहीं जाने दिया। सदा तन-मनसे भगवत्सेवा और साधु-सेवामें संलग्न रहकर भक्तोंके लिए एक आदर्श उपस्थित किया। स्वयं अपने

लिए उन्होंने अपने समयका कम-से-कम उपयोग किया। अपने लिए उनके पास इतना भी समय न रहता कि वे नित्य मधुकरीको जाते। वे दो-तीन दिनमें एक बार मधुकरीको जाते और उसीसे कई दिनका काम चला लेते। भगवत्सेवाके उपरान्त उनके पास जो समय बचता वह साधुओंके लिए चिथेडे गूंथकर गुदड़ी बनानेमें या उनके लिए गुटिकाकी नकल करनेमें बीतता। पर, शरीरसे बाहरके किसी काममें लगे रहते हुए भी वे मनसे राधाकृष्णकी अष्टकालीन मानसिक सेवामें तल्लीन रहते। कभी-कभी मानसिक सेवामें इतना डूब जाते कि बाहरकी सुध-बुध बिलकुल खो बैठते और बाहरका काम-काज सब रखा रह जाता।

एक बार बँगालका कोई बड़ा कीर्तनिया आया वृन्दावनमें साधुओंको कीर्तन सुनाने। वृन्दावनके कर्ता बाबाको सुनाओ। उन्हें यदि अपने कीर्तनसे प्रसन्न कर सके तो समझना कि तुम्हारा परिश्रम सफल हुआ।' उसने गोवर्धन जाकर बाबासे कीर्तन सुननेकी प्रार्थना की। उन्होंने विनम्रतापूर्वक कहा- 'मेरे पास समय ही कहाँ, जो तुम्हारा कीर्तन सुनूँ।' उसने जब बहुत आग्रह किया तो बोले- 'अच्छा, मैं तिलक करता हूँ, उतनी देर तुम कीर्तन सुना दो।

व्रजभूमि और तीर्थ से जुड़ी घटनाएँ

बाबाने द्वादश तिलकोंके लिए हथेली जल लेकर राधाकुण्डकी रज घिसना शुरू किया और कीर्तनियाने अपना कीर्तन। कीर्तनका विषय था राधाकृष्णका प्रथम मिलन। उस समय प्रातः के ८ बजे थे, जब कीर्तन प्रारम्भ हुआ। कीर्तन ४ बजे तक चलता रहा। बाबा मानसिक रूपसे राधा-कृष्णके प्रथम मिलनकी लीलाका दर्शन करते हुए उसमें इतना डूब गये कि वे बराबर तिलकके लिए रज घिसते ही रहे। उनका हाथ कभी रुक जाता, कभी चलने लगाता। कीर्तन समाप्त हो गया, पर उनका तिलक करना बाकी रहा।

उस समयके व्रजके सभी महात्मा अपने शिष्योंको अष्टकालीन-लीला-स्मरणकी शिक्षाके लिए बाबाके पास भेज दिया करते। पर बाबा हर किसी को लीला-स्मरणकी शिक्षा न देते। उसीको देते, जिसकी विषयासक्ति दूर हो गयी होती, इसलिए वे अपने पास रखकर कुछ दिन उसकी परीक्षा करते।पी

एक बार एक साधु उनके पास आया और लीला-स्मरणकी शिक्षा देनेके लिए उनसे प्रार्थना करने लगा। बाबाने उसका आदर-सत्कार किया और अपने पास रहनेको कहा। वह वहाँ रुक गया। रातमें बाबाने उसे तीन दिनकी मधुकरीकी सूखी रोटी पानीमें भिगोकर खानेको दी और स्वयं किसी कामके बहाने कुछ दूर जाकर श्रीसखीचरणदास बाबाजी

भाव- चेष्टा देख बाबा समझ गये कि उसकी विषयासक्ति अभी नहीं गयी है। उसके उसकी प्रतिक्रिया देखते रहे। मधुकरी देख साधुको ग्लानि हुई। उस समयकी उसकी पास आकर भूलका अभिनय करते हुए बोले- 'अरे! यह मैंने क्या किया ? आपको बासी रोटी दे दी !' उसे ताजी रोटी देकर बासी अपने-आप खा ली। थोड़ा मांसारिक विषयोंमें लोभ बना रहता है, वह रागानुगा भजनका अधिकारी नहीं होता। देर बाद बोले 'अभी आपका जिह्वाका लोभ नहीं गया। मनुष्यका जब तक अभी आप वैधी-भक्तिकी साधना करते रहें। करते-करते जब आपकी विषयोंसे आसक्ति जाती रहे, तभी मेरे पास आयें रागानुगा

भजनकी शिक्षाके लिए।' गोवर्धनके सिद्ध श्रीकृष्णदास बाबाके धाम पधारनेके पश्चात् कर्ता बाबा राधाकुण्ड चले गये। १०-१२ वर्ष वहाँ नूतन घेरेमें रहकर वहीं समाधि ली।

एक बार राधाकुण्डके व्रजवासियों और वहाँक बंगाली साधुओंमें कुण्डको लेकर विवाद छिड़ गया। व्रजवासियोंने कहा- 'हम किसी साधुको कुण्डका जल ही स्पर्श करने देंगे।'

दिव्य अनुभूति और कृपा के प्रसंग

साधु इकट्ठा होकर कर्ता बाबाके पास गये। पूछा- 'हमें क्या करना बाहिए ?'

उन्होंने कहा- 'हम व्रजवासियोंसे झगड़ा क्यों करें ? राधारानीकी इच्छा नहीं है कि हम कुण्डका स्पर्श करें, तो नहीं करेंगे।'

साधुओंने बाबाकी आज्ञा मान ली। कार्तिक, कृष्णपक्ष अष्टमीको राधाकुण्डके सानका विशेष माहात्म्य है। उस दिन राधाकुण्डके जलके लिए बाबाका मन मचल पड़ा। वे कुण्डके तीरपर रघुनाथदास गोस्वामीकी समाधिके पास जाकर राधारानीसे प्रार्थना करने लगे - 'करुणामयी ! हमारे किसी अपराधके कारण ही तुमने कुण्डके नानसे हमें वञ्चित कर रखा है। इसमें तुम्हारा क्या दोष ? पर, आज यदि एक कुल्लू कुण्डका जल किसी प्रकार मिल जाता, तो मैं अपने गात्रपर उसका छींटा कर ही कृतार्थ हो जाता।'

कुछ देर बाद कंजर गाँवके ८-१० व्रजवासी आये। उनके हाथमें लाठी थी। अठियाँ कुण्डके तीरपर रख और कपड़े उतारकर स्नान करनेकी तैयारी करने नंगे। बाबाको उदास बैठा देख उनमें से एकने कहा- 'बाबा, उदास कैसो बैठ्यौ

३) चन्द्रोदय हय गयो। स्नान नाँय करैगो ?'

बाबाने कहा- 'हमारे भागमें स्नान कहाँ ? तुम यदि एक चुल्लू जल ला दो तो बड़ी कृपा होगी।'

'च्यों बाबा, स्नान च्यौं नाई करैगी ?' उसने पूछा।

बाबाने राधाकुण्डके व्रजवासियोंसे बंगाली साधुओंके झगडेकी बात कह सुनायी। तब वे सब कुद्ध हो एक स्वरसे बोले- 'देखें तुम्हें कौन रोकता है स्नान करनेसे' और बाबाको उनके मना करनेपर भी जबरदस्ती ले जाकर कुण्डमें डुबकी लगवाई। राधाकुण्डके व्रजवासी उनसे मोर्चा न ले सके। पर उन्होंने हल्ला-गुल्ला बहुत मचाया। कुंजर गाँवके लोगोंके चले जानेपर दूसरे दिन बंगाली साधुओंसे उनके झगडेकी आशंका बनी रही। रात्रिमें राधारानीने स्वप्नमें उनसे कहा- 'राधाकुण्ड मेरा कुण्ड है। राधाकुण्डके साधु मेरे जन हैं। तुम लोग उनसे द्रोह करते हो, यह ठीक नहीं।

प्रातः सबने एक-दूसरेसे अपने स्वप्नकी बात कही। उन्हें यह समझते देर न लगी कि उन्होंने साधु-महात्माओं और राधारानीके चरणोंमें अपराध किया है। पश्चातापकी अग्नि उनके भीतर सुलगने लगी। उन्होंने कर्ता बाबाके पास जाकर उनसे क्षमा माँगी और बँगाली महात्माओंके प्रति द्रोह रखना बन्द कर दिया।

प्रेम और भक्ति — जीवन-संदेश

ईश्वर-प्रेम की अनुभूति भक्त-साहित्य का एक महत्त्वपूर्ण विषय है। इन प्रसंगों को श्रद्धा, संवेदनशीलता और समर्पण के संदर्भ में पढ़ा जा सकता है।

कथा का सार

कर्ता श्रीकृष्णदास बाबाजी की कथा भक्ति, विनम्रता और साधना पर मनन करने का अवसर देती है। इस संग्रह में अन्य भक्तों के जीवन-प्रसंग भी पढ़ें।