ब्रज के भक्त भाग 3 · अध्याय 89

गोस्वामी श्रीगल्लूजी महाराज

गोस्वामी श्रीगल्लूजी महाराज की प्रेरक हिंदी कथा। जानिए उनके जीवन, भक्ति और साधना से जुड़े महत्वपूर्ण प्रसंग।

गोस्वामी श्रीगल्लूजी महाराज
गोस्वामी श्रीगल्लूजी महाराज — ब्रज के भक्त भाग 3

गोस्वामी श्रीगल्लूजी महाराज का यह भक्त-चरित्र ब्रज की साधना, श्रद्धा और जीवन से जुड़े प्रसंगों को सामने लाता है। नीचे कथा को अलग-अलग विषयों में व्यवस्थित किया गया है।

जन्म, परिवार और प्रारम्भिक जीवन

[ वृन्दावन |

ललित किशोरीजीने 'अभिलाष माधुरी' में अपने एक पदमें गोस्वामी श्रीगल्लू-सी रति-मति प्राप्त करनेकी अभिलाषा व्यक्त की है-

कबहुँक ऐसी बननि बनैगी।

गोस्वामी श्रीगल्लूजी-सी मेरी, मति रति रूप सनैगी ।।

रुचि है नाचित छाडि जुगल, जस ना रसना कछु और भनेगी ।

ललित किशोरी सुलभ जबै तै, पतित उधारन यनै पर्नेगी ।।

ललित किशोरीजी स्वयं उच्चकोटिके भक्त थे। गल्लूजी जैसी रतिमति प्राप्त करनेकी उनकी अभिलाषासे स्पष्ट है कि गल्लूजी महाराज उस समयके व्रजके सर्वोच्च भक्तोंमें-से थे और साधक-भक्त उन्हें अपने आदर्श रूपमें देखते थे।

उनका जन्म ज्येष्ठ कृष्ण ८, सं० १८८४ को श्रीवृन्दावनमें श्रीराधारमण मन्दिर के सेवाइत श्रऔरमणदयालु गोस्वामीके पुत्ररूपमें हुआ। श्रीरमणदयालु गोस्वामी अधिकतर फर्रुखाबादमें रहते थे। वहाँ उनके बहुत-से शिष्य-सेवक थे। वहीं रहकर पल्लूजीने विद्याध्ययन किया।

प्रारम्भसे ही गल्लूजीकी मानसिक स्थिति साधारण लोगोंसे बहुत भिन्न थी। वे सदा सत्यमें प्रतिष्ठित रहते थे। स्वप्नमें भी मिथ्या नहीं बोलते थे। वृथा वाक्य उनके मुखसे कभी किसीने नहीं सुना। दैन्य और विनयकी वे मूर्ति थे। लोभ उन्हें छूकर भी नहीं गया था। अपना सर्वस्व देकर भी वे दूसरोंकी सेवामें सदा तत्पर रहते थे।

इन सब गुणोंके मूलमें थी उनकी भगवद्-भक्ति। उसीके ये शाखापल्लव, फूल और फल थे। ऐसा कौन-सा सद्‌गुण है, जो भक्तिरूपी वृक्षपर स्वभावतः नहीं फलता ? भक्ति गल्लूजी महाराजकी नैसर्गिक सम्पत्ति थी। मूल्य वे भक्तिकी कसौटीपर आँकते थे। इसलिए संसारमें उनकी आसक्ति बिलकुल नहीं थी। संसारको वे भगवत्सेवाका साधन मात्र मानते थे।

पर दुर्भाग्यवश उनका अपना संसार भगवत्सेवा के बहुत अनुकूल न था। उनके पिताजीकी आर्थिक स्थिति अच्छी न थी। उनपर वृन्दावनमें बहुत-सा कर्ज हो गया था। इसीलिए वे वृन्दावन छोड़कर फर्रुखाबाद रहने लगे थे। गल्लूजीके भक्ति-भावमें इससे अधिक प्रतिकूलता और क्या हो सकती थी कि उन्हें पिताके अणके कारण अपने इष्टके धामसे बाहर रहना पड़े।

उन्होंने इस प्रतिकूलताको दूर करनेका सङ्कल्प किया, पर यह कार्य आसान तो था नहीं। उनकी उम्र अभी नौकरी या व्यवसायके लायक तो थी नहीं, जो वे ऐसा कुछ कर पिताजीका ऋण चुका सकते। फिर नौकरी या व्यवसाय उनके स्वभावके अनुकूल भी कब था ? वे एक ही कार्य कर सकते थे। वह था हरि-कथा कीर्तन। इसलिए उन्होंने कथा कहना आरम्भ किया। पहली कथा उन्होंने १० वर्षकी उम्रमें कही लखनऊमें साह बिहारीलालजीके घर। उनके पुत्र, प्रसिद्ध साहित्यकार श्रीराधाचरण गोस्वामीने लिखा है कि उस कथामें ५००) की भेंट चढी. जो उस समयके लिए एक बहुत बड़ी रकम थी। उससे ऋणका कुछ अंश चुका दिया गया।

अल्पावस्थामें ही एक सच्चे भक्त और सुनिपुण कथावाचकके रूपमें उभरते हुए गल्लूजीने भक्तजनोंके हृदयमें अपना विशिष्ट स्थान बना लिया। यह देख उनके ही कुटुम्बके एक व्यक्तिको उनसे ईर्ष्या होने लगी। उन्होंने विष दे दिया। उस समय उनकी अवस्था १६ वर्षकी थी। विषका पता चल गया। उसके निवारणका शीघ्र उपाय किया गया और उनके प्राणकी रक्षा हो गयी। परिवारके लोगोंने विष - खिलानेवाले व्यक्तिकी पुलिसमें रिपोर्ट करना चाहा, पर गल्लूजीका हृदय इसे गँवारा न कर सका। उन्होंने बहुत अनुनय-विनयकर उन्हें उनके विरुद्ध कोई कार्यवाही न करनेको राजी किया। इसके पश्चात् वे जन्म भर उनका यथोचित सत्कार करते रहे।

गल्लूजीका विवाह उनके पिताजीने सं० १९०१ में कर दिया, जब उनकी अवस्था केवल १७ सालकी थी। विवाहके कुछ ही दिन बाद उनकी पत्नीका देहान्त हो गया। पिताजीने दूसरा विवाह फर्रुखाबादकी ही एक कन्यासे कर देना चाहा। गल्लूजी दूसरे विवाहके पक्षमें न थे। जब पिताजीने आग्रह किया तो वे बोले- 'यदि मेरा वास्तविक कल्याण चाहते हैं, तो दुबारा गार्हस्थ्यकी बेड़ियाँ न पहनाइये। यदि पहनानी ही हों, तो लोहेकी क्यों, सोनकी पहनाइये। विवाह सम्बन्ध फर्रुखाबादमें न कर वृन्दावनकी किसी लड़कीसे कीजिये, जिससे कम-से-कम उसके सम्बन्ध वृन्दावन जाना-आना होता रहे।' पिताने उनकी बात मान ली। विवाह वृन्दावनमें श्रीजगन्नाथ मिश्रकी कन्या श्रीसूर्यादेवीसे कर दिया।

सेवा, प्रसाद और समर्पण की घटनाएँ

गल्लूजीने धीरे-धीरे कथाओंमें प्राप्त भेंटके माध्यमसे पिताजीका सारा ऋण चुका दिया। पिता-पुत्रके वृन्दावन जानेका मार्ग अब प्रशस्त हो गया। दोनों वृन्दावन जाकर रहने लगे। RA

प्रजके भक्त

वृन्दावन जाते समय रास्ते में लुटेरे गाड़ी में घुस आये। गल्लूजीका एक बवय पुस्तके है। यह तुम्हारे कामकी नहीं हैं। इन्हें छोड जाओ और जो चाहो सो जिसमें बहुमूल्य ग्रन्थ थे, लेकर जाने लगे। उन्होंने कहा- भड़या, इसमें केवल आओ।' तुटेरे पुस्तकें छोड़ गये, बाकी सारा सामान ले गये।

वृन्दावन आनेके पश्चात् गल्लूजीके जीवनमें एक नये अध्यायका शुभारम्य हुआ। श्रीराधारमणजीसे उनका प्रौतिका सम्बन्ध दिनोंदिन दृढ़तर होता गया। बौराधारमणजीके मन्दिरके ४० सेवाइत थे, जो बारी-बारीसे उनकी सेवा करते थे। सारी सेवा करते ही थे। बाकी दिनोंमें भी मङ्गला (प्रात:कालीन आरती) की सेवा इनकी सेवा प्रति ढाई वर्ष बाद आती थी। तब तो यह प्राण खोलकर श्रीराधारमणको यह दूसरे लोगोंसे माँग लेते थे। दूसरे लोग खुशीसे उन्हें यह सेवा दे देते थे, कुछ इसलिए कि इस सेवाके लिए उन्हें प्रातः ४ बजे स्नानादिकर मन्दिरमें जाना कष्टकर प्रतीत होता था, कुछ इसलिए कि इनके प्रीति-भरे आग्रहकी वे अवहेलन नहीं कर पाते थे। मङ्गलाकी सेवा जैसे इन्होंके नाम लिख गयी थी।

यदि कभी ऐसा होता कि कोई सेवाइत उन्हें मङ्गलाको सेवा न देता, तो उसका कारण ओराधारमणकी अपनी इच्छा ही जानकर कहते- 'आज मों पै श्रीजीको क अपराध बन गयौ है, जाई सों सेवा नाँय दीनी।' उस दिन वे मन्दिरके बाहर झाड़ लगाकर ही अपने-आपको सन्तुष्ट कर लेते। झाडू लगाते जाते और श्रीजीके प्रति प्रणय-आक्षेप करते जाते- 'तुम्हारे घरको कुत्ता। तुम ठुकराओ तो ठुकराओ। जाऊँगो कहाँ। द्वारपर पड्‌यौ रहकै सेवा तुम्हारी ही करूंगो।'

श्रीराधारमणके राजभोग के पश्चात् वे सेवाइतसे राधारमणजीकी एक प्रसादो रोटी की भिक्षा माँग लिया करते। यह भी उनका दैनिक नियम था। एक बार एक कर्कश स्वभावके गोस्वामीने उन्हें फटकारते हुए कहा- 'रोज-रोज आ जाता है रोटी माँगने। तुझे लज्जा नहीं आती। जा रोटी नहीं मिलेगी।' गल्लूजीने इसका बुरा न मानकर गोस्वामीजीसे कुछ नहीं कहा। उनकी दृष्टिमें गोस्वामीजीका दोष ही क्या था ? रोटी देना न देना तो राधारमणजीकी अपनी इच्छापर निर्भर करता था। सेवाइतको इतनी स्वतन्त्रता कहाँ, जो उनकी इच्छाके विरुद्ध उनके प्रसादकी एक कणिका भी किसीको दे सके ? इसलिए जब भी उन्हें प्रसादी रोटी न मिलती उनका कहना-सुनना, अभ्यर्थना और अभियोग, जो कुछ होता, राधारमणके प्रति हो ता। वे उनसे कहते हुए चले जाते- 'मैं तो तुम्हारा टहलुआ हूँ।

मांगबो तुआको काम, देनो तुम्हारो। देओ, न देओ-तुम्हारी मरजी।'

राधारमणजी भी, यदि गल्लूजीकी सेवामें कभी कोई त्रुटि हो जाती, तो स्वप्नमें उनसे शिकायत किये बिना न रहते।

वृन्दावन आनेके बाद गल्लूजीका बाहर जाकर कथा कहनेका क्रम कुछ दिन (श्रीललिताकिशोरीजी) और साह फुन्दनलाल (श्रीललितमाधुरीजी) उनमें गुरुबुद्धि जारी रहा। वे लखनऊ अक्सर जाया करते। लखनऊके साह कुन्दनलाल रखते। उन्हें वे हरिकथा सुनाते और उपासना-सम्बन्धी उपदेश देते। उनके वहाँ पधारनेपर उनमें जो हर्ष और उल्लासकी लहर दौड़ जाती उसका संकेत ललितकिशोरीजीकी एक रचनासे मिलता है. जिसकी प्रारम्भिक पक्तियाँ इस प्रकार हैं-

व्रजभूमि और तीर्थ से जुड़ी घटनाएँ

गोस्वामी आज यहाँ गल्लूजी आये हैं, वाहवा है, अजी वाहवा है ।

स्वामिनी कृपासे भये मेरे मन भाये हैं, वाहवा है, अजी वाहवा है ।।

काशी, शाहजहाँपुर और भतरपुर आदि शहरोंमें भी उनकी श्रीमद्भागवत् महापुराणकी कथाएँ होती रहतीं। भरतपुरके सरकारी मन्दिरोंमें जब वे कथा कहने जाते, तो बाजारमें उनकी सवारी निकलती। दोनों ओरसे दण्डवत् और जय-जयकारकी ध्वनिके कारण सवारीका निकलना मुश्किल हो जाता।

उनकी कथाकी एक विशेषता यह थी कि वे कथा व्रजभाषामें कहते और फारसीके एक शब्दका भी प्रयोग न करते। एक बार उन्हें कथामें किसी प्रसङ्ग‌में बन्दूक छोड़नेकी बात कहनी थी। वे 'बन्दूक' शब्दका प्रयोग नहीं करना चाहते थे। उन्होंने कहा- 'लौह नलिकामें श्यामचूर्ण प्रवेश करके अग्नि जो दीनी, तो भड़ाम शब्द भयो।'

कथाओंमें भेंटमें प्राप्त किया हुआ धन गल्लूजी सब खर्च कर देते। खर्च भौ अपने या अपने परिवारके ऊपर नहीं, साधु-वैष्णवों और ब्रजवासियोंके ऊपर। ब्रजवासियोंसे, और विशेषरूपसे नन्दग्राम और बरसानाके व्रजवासियोंसे उन्हें विशेष प्रेम था। उनके घर दस-पाँच ब्रजवासी अतिथि रूपमें बने ही रहते। श्रीराधाचरण गोस्वामीजीने लिखा है कि उन्होंने कम-से-कम एक लाख रुपये उपार्जन किया, (जो आजकलके रुपयेकी कीमतके अनुसार लगभग बीस लाख रुपयेके बराबर

होता है) और सब भगवत्-सेवा और परमार्थमें खर्च कर दिया। उनके अपने घरका होता है, वह भगवत्-सेवा और साधु-वैष्णव-सेवामें ही लगना चाहिये। खर्च तो बहुत ही कम था। उनकी धारणा थी कि उन्हें जो धन भगवत्-कथासे प्राप्त अपने उपयोगमें उतना ही आना चाहिये, जितना शरीर धारण करनके लिए आवश्यक हो।

सं० १९३२ में गल्लूजीने वृन्दावनमें अपने निवास स्थानकी चहारदीवारीमे स्वेच्छासे उनके पास आ गये थे, सम्भवतः उनकी प्रेममयी सेवाके लोभसे। वे भी षड्भुज महाप्रभुके मन्दिरकी स्थापना की। श्रीमन्महाप्रभु इस प्राचीन विग्रहके रूपमें बड़े प्रेमसे उनकी सेवा करने लगे।

श्रीराधारमणकी मङ्गला-आरतीका उनका नियम पूर्ववत् चलता रहा। वे राधारमणको मङ्गला-आरतीके पश्चात् महाप्रभुकी आरती करते। दोनों ठाकुरोंमें उनकी प्रीति क्रमशः बढ़ती गयी। अब उनकी सेवा छोड़कर उन्हें और कुछ अच्छा न लगता। उनकी सेवा छोड़ वृन्दावनसे एक दिनके लिए भी बाहर जाना उन्हें कष्टकर प्रतीत होता। सं० १९३७ में उन्होंने वृन्दावनसे कहीं भी बाहर न जानेका सङ्कल्प किया। घरका सारा भार श्रीराधाचरण गोस्वामीपर छोड़, स्वयं आठों प्रहर श्रीराधारमण और श्रीमन्महाप्रभुकी सेवामें लवलीन रहने लगे। मार्ग शीर्ष कृष्ण १ सं० १९४७ को श्रीराधारमणजीने सदाके लिए उन्हें अपने नित्य-धाममें अपनी नित्यसेवामें अङ्गीकार किया।

कहते हैं कि उनके दाह-संस्कारमें उनका सारा शरीर भस्मीभूत हो जानेपर भी उनकी गलेकी कण्ठी ज्यों-की-त्यों बनी रही। लोग प्रसादीके रूपमें उसके दाने ग्रहण करनेके लिए उसपर झपट पड़े। जिसके हाथमें एक भी दाना आया, वह अपने भाग्यको सराहता चला गया।

गल्लूजी व्रजभाषाके अच्छे कवि थे। वे 'गुणमञ्जरी' के नामसे पद-रचना करते थे। उनके 'श्रीराधारमण-पदमञ्जरी' और 'श्रीयुगलछद्म' नामके ग्रंथ प्रकाशित हैं। आज भी श्रीराधारमणके मन्दिरमें विभिन्न तिथियोंपर 'श्रीराधारमण-पदमञ्जरी' के ही पद गाये जाते हैं।

सेवा और समर्पण — जीवन-संदेश

सेवा का मूल्य केवल बाहरी कार्य में नहीं, बल्कि उसके पीछे के निष्कपट भाव में भी होता है। इस चरित्र के प्रसंगों को पढ़ते समय सेवा के इसी भाव पर विचार किया जा सकता है।

कथा का सार

गोस्वामी श्रीगल्लूजी महाराज की कथा भक्ति, विनम्रता और साधना पर मनन करने का अवसर देती है। इस संग्रह में अन्य भक्तों के जीवन-प्रसंग भी पढ़ें।