ब्रज के भक्त भाग 3 · अध्याय 63

भक्तिमती श्रीकर्मी बाईजी

भक्तिमती श्रीकर्मी बाईजी की प्रेरक हिंदी कथा। जानिए उनके जीवन, भक्ति और साधना से जुड़े महत्वपूर्ण प्रसंग।

भक्तिमती श्रीकर्मी बाईजी
भक्तिमती श्रीकर्मी बाईजी — ब्रज के भक्त भाग 3

भक्तिमती श्रीकर्मी बाईजी का यह भक्त-चरित्र ब्रज की साधना, श्रद्धा और जीवन से जुड़े प्रसंगों को सामने लाता है। नीचे कथा को अलग-अलग विषयों में व्यवस्थित किया गया है।

जन्म, परिवार और प्रारम्भिक जीवन

सियाजी उन्हें रात्रिमें कभी-कभी दर्शन देती। एक बार श्रीरमेश बाबाने जानना चाहा कि मौनी बाबा रातको कुञ्जोंके बीच क्या करते हैं। वे रात १२ बजे एक झाड़ीमें छिपकर बाबाका क्रिया-कलाप देख रहे थे। बाबा उस समय कुछ गुनगुना रहे थे। थोड़ी देरमें उन्होंने देखा कि वे 'सियाजी, सियाजी।' कह अचानक एक ओर भाग पडे। उनका कण्ठ अवरुद्ध हो गया और नेत्रोंसे अश्रु प्रवाहित होने लगे। उन्हें किसी प्रकारका विक्षेप न हो, इस विचारसे रमेश बाबा चुपकेसे वहाँसे चले आये।

सियाजीका बार-बार दर्शन देकर अन्तर्धान हो जाना मौनी बाबा अधिक दिन न बेल सके। उनका विरह दिन पर दिन बढ़ता गया।

विरहके बाद मिलन अवश्यंभावी है। आखिर एक दिन विरह इतना प्रबल हो गया कि भीतरकी विरहाग्निने बाहर प्रकट हो शरीरको ध्वंस कर दिया और बाबा सिद्ध सहचरी देहसे सियाजीसे जा मिले।

भक्तिमती श्रीकर्मठी बाईजी

[ बागड़, राजस्थान/वृन्दावन ]

श्री कर्मठी बाईजी राजस्थानके बागड़ क्षेत्र के किसी ग्रामनिवासी काँथड्या ब्राह्मण श्रीपुरुषोत्तमजी की पत्री थीं। उनका यथार्थ नाम क्या था, पता नहीं। भागवत मुदित जी ने 'रसिक-अनन्यमाल' में लिखा है कि वे विवाह होते ही विधवा हो गई और वैधव्य जीवनके जप, तप, व्रत, शुचि, संयम आदि नियमोंका कठोरता से पालन करते हुए तपोमय जीवन व्यतीत करने लगीं, इसलिए उनका नाम कर्मठी पड़ गया-

विप्र एक पुरुषोत्तम नाम ।

काँथरिया बागर विश्राम ।।

कन्या एक तासु के भई ।

व्याहत ही विधवा हो गई ।।

तप, व्रत, सुचि, संजम में रहै ।

तातें नाम कर्मठी कहै ।।

कर्मठी बाई परम सुन्दरी और भक्तिमती थीं। उनका बाह्य स्वरूप जैसा सुन्दर था, वैसा ही आन्तरिक स्वरूप भी। वे बालकपनसे ही प्रभु के प्रेम में उनमत्त रहतीं। प्रभु जिस पर कृपा करते हैं, उसका सर्वस्व हरण कर लेते हैं। कर्मठी के पति तो पहले ही जाते रहे थे। उनके माता-पिता और सास-ससुर का भी देहान्त हो गया। पतिकुल और पितृकुल दोनों पक्षों में उनका अपना कोई न रहा। नितान्त असहाय हो वे वृन्दावन चली गयीं। श्रीहित हरिवंशचन्द्र जी से दीक्षा ले भजन करने लगीं। वे सूत कात कर जीवन निर्वाह करतीं। श्री हित हरिवंशजी की कृपा से उनकी कर्मनिष्ठा शान्त हो गई। रागानुगा भक्ति का स्रोत उनके हृदय में उमड़ पड़ा।

वे हर समय यहाँ तक कि सूत कातते समय भी श्रीकृष्ण का स्मरण और उनके नाम का कीर्तन करतीं; श्रीकृष्ण के प्रेम में सदा पगी रहतीं। गुरु-कृपा से उन्होंने अल्पकाल में ही सिद्धि प्राप्त कर ली।

वनमें फूल खिलता है और मुरक्षा कर गिर पड़ता है। उसके सौंदर्य और सौरभ को कौन जानता है ? ऐसे ही भारत की पुण्य भूमि में न जाने कितने भक्तों का जन्म होता है। वे अपने आडम्बरशून्य एकान्त जीवन में साधन कर सिद्ध होते हैं और दिव्य धाम को चले जाते हैं। उनका नाम तक भी कोई नहीं जानता। कर्मठी बाई का भी यही हुआ होता, यदि उनके जीवनमें एक विशेष घटना न घटी होती।

उस समय सम्राट अकबर के भांजे अजीज बेग मथुरा जिले के हाकिम थे। उनके भाई हसन बेग मथुरा के शासन-प्रबन्ध में उनकी सहायता करते थे। एक दिन हसन बेग वृन्दावन का निरीक्षण करने गये। वे जब यमुना तट की शोभा का दर्शन कर रहे थे, उनकी दृष्टि पड़ी यमुना में स्नान करती एक परम रूपवती युवती पर। दृष्टि उस पर टिकी रह गई। जब वह युवती स्नान कर जाने लगी, उनका लोलुप मन भी उनके साथ चला गया। उन्होंने अपने कुछ अनुचरों को भी उसके पीछे भेज दिया पूछताछ कर उसके सम्बन्ध में पूरी जानकारी ले आने को।

भक्तों के साथ मिलन और सत्संग

अनुचरों ने आकर कहा- 'सरकार, उसका नाम कर्मठी बाई है। उसके घरवाले सब मर चुके हैं। यहाँ अकेली रहती है। सूत कात कर जीवन निर्वाह करती है।।। माझी ग

हसन ने प्रसन्न होकर कहा- "तब तो बात बन गई। उसे थोड़ा प्रलोभन देकर ही वस में किया जा सकेगा।"

"नहीं सरकार वह गरीब है तो क्या, बड़ी भक्तिमती है। दिन-रात भजन-किर्तन करती है। उसे किसी प्रकार के प्रलोभन से वश में नहीं किया जा सकता। उसके त्याग-वैराग्य और सतीत्व की यहाँ सभी लोग प्रशंसा करते हैं।" भक्तिमती श्रीकर्मठी बाईजी

यह सुन हसन का हर्ष विषाद में बदल गया। वह कुछ सोचने लगा। थोडी देर बाद उसने पूछा- "अच्छा वह रहती कहाँ है?"

"वह यमुनातट से कुछ ही दूर एक कुटिया में अकेली रहती है।"

"तो ठीक है." कह हसन ने मन-ही-मन एक षड्यन्त्र की रचना कर डाली। षड्यंत्र को पूरा करने का भार उसने दो कुलटा नारियों पर डाल दिया।

दूसरे दिन वह दोनों भक्त का वेष बना कर यमुना-स्नान करने के बहाने उसी घाट पर गई, जिस पर कर्मठी स्नान किया करतीं। यमुना-स्नान कर तिलकादि लगाकर वे उस समय कर्मठी बाई के निकट गयीं, जब वे स्नान कर अपनी कुटिया को जाने को प्रस्तुत हुई। उसे अपना परिचय देते हुए कहा- "हम दोनों बाल-विधवा हैं। वृन्दावन में अमुक स्थानपर रहकर भजन करती हैं। आप शायद कर्मठी बाई हैं। हमने आपकी बहुत प्रशंसा सुनी है। हम आपके सत्संग का लाभउठाना चाहती है।"

कर्मठी ने कहा- "मैं न तो प्रशंसा के योग्य हैं और न ही सत्संग की, पर मेरे द्वारा यदि आपकी कुछ सेवा बन सके तो उसके लिए

प्रस्तुत हूँ।" दोनों बातें करती-करती कर्मठी के साथ उसकी कुटिया तक चली गयीं। कर्मठी ने उन्हें आदरपूर्वक बैठाया और उनके साथ धर्मालाप किया।

वे कुलटा नारियाँ नित्य इसी प्रकार यमुना-स्नान करने जायँ और कर्मठी बाई के साथ उसकी कुटिया पर जाकर सत्संग किया करें। धीरे-धीरे कर्मठी बाई का असे स्नेह हो गया। एक दिन वे कर्मठी बाई की कुटिया पर विलम्ब से पहुँची। कर्मठी बाई ने पूछा - "आज इतना विलम्ब कैसे हुआ ?"

उन्होंने कहा- 'हमारे घर एक बहुत बड़े महात्मा आये हुये हैं। उन्हीं की सेवा में विलम्ब हो गया।"

"तो बहनों उन महात्मा के दर्शन मुझे नहीं कराओगी क्या ?" कर्मठी ने उत्सुकता से पूछा।

"क्यों नहीं, क्यों नहीं ? कल यमुना स्नान कर तुम्हें ले चलेंगे अपने घर।"

दूसरे दिन उन स्त्रियों में से एक कर्मठी को अपने साथ ले जाने के लिए यमुना तट पर आयी, दूसरी ने जा कर हसन को इस बात की सूचना दी। पहली स्रो कर्मठी को अपने घर ले गयी। भीतर प्रवेश करते ही उसने कर्मठी से रुा- "अरे! महात्माजी तो यहाँ हैं नहीं, लगता है आस-पास कहीं चले गये हैं।

तुम यहाँ रुको, मैं अभी उन्हें देख कर लाती हूँ।" इतना कह वह बाहर चली गई और घर का दरवाजा बाहर से बन्द कर गई। उसी समय शिकार को फंसा देख हसन दूसरे कमरे में से निकल कर कर्मठी को देखता हुआ उसके सामने आ खड़ा हुआ। उसने कहा - "सुन्दरी, जिस महात्मा से तुम मिलने आई हो वह में ही है। मैं कितना शक्तिशाली महात्मा हूँ, यह तुम इस बात से ही समझ सकती हो कि मैं सम्राट अकबर का भांजा हसन बेग हूँ। तुम्हारी जो भी मनोकामना हो मैं तत्काल पूरी कर सकता हूँ। बताओ तुम क्या चाहती हो ? मैं तुमसे प्रेम करता हूँ। ऐसी कोई वस्तु नहीं, जो मैं तुम्हें नहीं दे सकता। तुम यदि एक बार कह दो - 章 तुम्हारी हूँ, तो मैं अपना सर्वस्व भी तुम्हारे ऊपर न्यौछावर कर सकता हूँ।

भजन-साधना और नाम-स्मरण के प्रसंग

तुम्हारा सौंदर्य और यौवन भगवान ने तुम्हें यूँ ही बरबाद करने के लिए नहीं दिया। मैं तुम्हें अपने हृदय की रानी बनाना चाहता हूँ, बोलो तुम क्या चाहती हो ?"

कर्मठी भयभीत और आतंकित-सी एक कोने में सिमट कर खड़ी-खड़ी सब सुनती रही। उसने जब कोई उत्तर न दिया तो हसन उसकी ओर बढ़ने लगा। उस समय उसने भगवान् को स्मरण किया। स्मरण करते ही उसमें न जाने कहाँ का बल आ गया। वह सिंहनी की तरह गरज उठी- "नीच, नराधम, खड़ा रह वहीं, नहीं तो भस्म कर दूँगी!" उसकी गरज से आकाश काँप गया। हसन का कलेजा भी एक बार दहल गया। पर दूसरे क्षण जैसे ही वह उसे आलिंगन करने को आगे बढ़ा, उसने देखा कि वह कर्मठी को नहीं एक खूंखार सिंह को आलिंगन करने जा रहा है। उसके सामने उस सुन्दरी की जगह, जिसे वह अपने बाहुपाश में लपेटना चाहता था, सिंह के रूप में उसका काल मुँह बाये खड़ा है। वह उसे देख गुस्से में गुर्रा रहा है, जैसे वह उस पर झपटकर उसे अपने पैने दाँतों और नुकीले पंजों से चीर देने जा रहा है।

वह भयके मारे भागा दरवाजे की ओर। पर भाग कर जाता कहाँ ? दरवाजा बाहर से बन्द था। वह लगा दरवाजा पीट-पीटकर चिल्लाने, पर दरवाजा कोई खोले, उसके पहले ही उसका पाजामा बिगड़ गया और वह मूर्छित हो भूमि पर गिर गया।

न जाने कब तक हसन वहाँ मूर्छित हो पड़ा रहा। जब उन कुलटा नारियों ने आकर दरवाजा खोला तब भी वह मूर्छित था। पर उस समय न वहाँ कर्मठी थी, न सिंह। दोनों नारियों ने चेष्टा कर हसन को सचेत किया। सचेत होने पर भी वह भय के मारे काँप रहा था और इधर-उधर देख रहा था। देख-देख कर चीख पड़ता था और बेहोश हो जाता था। न जाने साक्षात या भयके मारे कल्पनामें उसे वही सिंह भक्तिमती श्रीनजियाबाईजी

बार-बार दीख जाता था और वह बार-बार मुर्छित हो जाता था। बहुत देर बाद वह कर्मठी मानवी नहीं. देवी है. उसके क्षमा किये बिना उसके जीवन की रक्षा नहीं। पर कुछ स्वस्थ हुआ, तब अपने किये पर पश्चाताप करने लगा। वह सोचने लगा कि कर्मठी एकाएक लोप कैसे हो गई ? अब वह कहीं है भी या नहीं? है तो उसके निकट जाने पर कहीं सिंह फिर प्रकट होकर उसे खा तो नहीं जायेगा ? यह प्रश्न एक साथ उसके दिमाग में घूमने लगे। उसने उन्हीं दोनों नारियों को आज्ञा दी फिर उसके पास जाकर उसका सम्बाद ले आने की।

वे दोनों कुलटायें भी भयभीत थीं और कर्मठी के पास जाने का साहस नहीं कर पा रही थीं। पर हसन की आज्ञा की अवहेलना भी नहीं कर सकती थीं। डरते-डरते उसके पास गयीं। उसे प्रणाम् कर दूर ही बैठ गयीं। उसने उनके प्रति ऐसा व्यवहार किया. जैसे उसे उस सारी घटना का स्मरण ही नहीं और उसके मनमें किसी प्रकार का क्रोध भी नहीं। उन्होंने लौटकर हसन को सम्बाद दिया, तो हसन बहुत-सा धन लेकर कर्मठी के पास गया। कर्मठी से क्षमा माँगकर धन उसे देना बाहा। पर धन उसने स्वीकार नहीं किया। किसी नारी पर कुदृष्टि न डालने का वचन लेकर उसे क्षमा कर दिया।

प्रेम और भक्ति — जीवन-संदेश

ईश्वर-प्रेम की अनुभूति भक्त-साहित्य का एक महत्त्वपूर्ण विषय है। इन प्रसंगों को श्रद्धा, संवेदनशीलता और समर्पण के संदर्भ में पढ़ा जा सकता है।

कथा का सार

भक्तिमती श्रीकर्मी बाईजी की कथा भक्ति, विनम्रता और साधना पर मनन करने का अवसर देती है। इस संग्रह में अन्य भक्तों के जीवन-प्रसंग भी पढ़ें।