ब्रज के भक्त भाग 3 · अध्याय 75

भक्तिमती श्रीगोपी माँ

भक्तिमती श्रीगोपी माँ की प्रेरक हिंदी कथा। जानिए उनके जीवन, भक्ति और साधना से जुड़े महत्वपूर्ण प्रसंग।

भक्तिमती श्रीगोपी माँ
भक्तिमती श्रीगोपी माँ — ब्रज के भक्त भाग 3

भक्तिमती श्रीगोपी माँ का यह भक्त-चरित्र ब्रज की साधना, श्रद्धा और जीवन से जुड़े प्रसंगों को सामने लाता है। नीचे कथा को अलग-अलग विषयों में व्यवस्थित किया गया है।

जन्म, परिवार और प्रारम्भिक जीवन

[ वृन्दावन ]

भक्तिमती गोपी माँका जन्म अयोध्यामें हुआ। लाहौर में भाटीद्वार कन्या पाठशालामें सिलाई-कटाईकी अध्यापिकाके रूपमें उन्होंने नौकरी की। उनका जीवन बड़ा सादा और सात्विक था। उन्हें जो वेतन मिलता उसमें से थोड़ा-सा अपने निर्वाहके लिए बचाकर बाकी गरीब-दुःखियोंकी सेवामें खर्च कर देतीं। अध्यापन कार्यके बाद जो भी समय मिलता उसे भगवद्-भजनमें व्यतीत करतीं। पं० श्रीजगन्नाथप्रसादजी 'भक्तमाली'

अध्यापन-कार्यसे अवकाश ग्रहणकर वे आयोध्या चली गयीं। वे रामभक्ता थीं। रामजीकी सेवा-पूजामें पूर्णतः संलग्न रहकर समय बिताने लगीं, पर न जाने कैसे उनका मन श्रीकृष्णने चुरा लिया। उनके कर्ण श्रीकृष्णकी मधुर बाँसुरीकी धुन सुननेको, और नेत्र उनकी रूपमाधुरीका पान करनेको सहसा मचल उठे। वे अयोध्यामें अधिक न रह सकीं। रामजीके चरणामें प्रणाम् कर और उनसे क्षमा प्रार्थना कर वृन्दावनके लिए चल पड़ीं।

सेवा, प्रसाद और समर्पण की घटनाएँ

वृन्दावनमें गोपीनाथ बाजारमें आठ आने महीनेपर एक कोठरीमें रहकर श्यामसुन्दरका भजन करने लगीं। एक बार उन्हें ज्वर हुआ। बहुत दिन हो गये उससे जूझते, पर उसने पीछा न छोड़ा। वे बहुत दुर्बल हो गयीं। उठना-बैठना भी दूभर हो गया। उनके पास सेवाके लिए कोई न था। वे श्रीकृष्णको उलाहना देने लगीं- 'यदि मैं अयोध्यामें होती तो मेरे परिवारवाले मेरी सेवा करते। तुम्हारे लिए मैंने घर छोड़ा, परिवार छोड़ा, अयोध्या जैसी जन्मभूमि छोड़ी और अपने इष्ट श्रीराम तकको छोड़कर तुम्हारे चरणोंकी शरण ली। पर तुम ऐसे निकले कि मेरी ओर दृष्टिपात तक नहीं करते!' यों कहते-कहते वे सो गयीं। श्रीकृष्णने स्वप्नमें दर्शन देकर अपने हाथसे उन्हें दूध पिलाया और मलाई खिलायी।

कथा का अंतिम प्रसंग और प्रेरणा

उनकी आँखें खुलीं तो मलाईका कुछ अंश मुखमें शेष था और दूधका कुल्हड़ पासमें पड़ा था।

इस घटनाके पश्चात् भी वे कुछ दिन जीवित रहीं। आजसे लगभग ३५-३६ वर्ष पूर्व उन्हें परमधामकी प्राप्ति हुई।

सेवा और समर्पण — जीवन-संदेश

सेवा का मूल्य केवल बाहरी कार्य में नहीं, बल्कि उसके पीछे के निष्कपट भाव में भी होता है। इस चरित्र के प्रसंगों को पढ़ते समय सेवा के इसी भाव पर विचार किया जा सकता है।

कथा का सार

भक्तिमती श्रीगोपी माँ की कथा भक्ति, विनम्रता और साधना पर मनन करने का अवसर देती है। इस संग्रह में अन्य भक्तों के जीवन-प्रसंग भी पढ़ें।