ब्रज के भक्त भाग 3 · अध्याय 91

भक्त श्रीनवलकिशोर दासजी

भक्त श्रीनवलकिशोर दासजी की प्रेरक हिंदी कथा। जानिए उनके जीवन, भक्ति और साधना से जुड़े महत्वपूर्ण प्रसंग।

भक्त श्रीनवलकिशोर दासजी
भक्त श्रीनवलकिशोर दासजी — ब्रज के भक्त भाग 3

भक्त श्रीनवलकिशोर दासजी का यह भक्त-चरित्र ब्रज की साधना, श्रद्धा और जीवन से जुड़े प्रसंगों को सामने लाता है। नीचे कथा को अलग-अलग विषयों में व्यवस्थित किया गया है।

भक्ति-प्रेम और विरह की अनुभूति

[ नन्दगाँव ]

नन्दग्राममें नन्दबाबाका मन्दिर है। लगभग सवासौ वर्ष पूर्व उसकी अवस्था जीर्ण-शीर्ण थी। उसके जगमोहनके पत्थरका पुराना फर्श ऊबड़-खाबड़ हो रहा था।

स्थलालको उ में दौड-भाग करते कष्ट होता था। उन्होंने सोचा कितना अच्छा होता यदि यह चिकना संगमरमरका होता। सोचा, तो सोचते ही फर्श वैसा हो नियन्ता श्रीभगवानके लिए कोई बड़ी बात थी ? जिनकी अपटन-घटना-पटीयसी सह गया ? नही! क्यों नहीं ? यह भी क्या अखिलब्रह्माण्डके अधिपत्ति और माण्डौंका सृजन करनेकी क्षमता रखती है. वह क्या इस छोटे-से कार्यको नहीं कर माया-शक्ति उनके इक्षण मात्रसे परिचालित हो एक ही पलमें अनन्तकोटि सकती थी ? कर सकती थी, पर कर सकते हुए भी हाथ पर हाथ रखे कुछ न करनेको विवश थी।

विवशताका कारण ? कारण यह कि यहाँ वजमें उसके प्रभुका दूसरा आवेश है। यहाँ वे प्रभु नहीं. नन्द-यशोदाके दुलाल हैं. श्रीदाम, सुदामादिके सखा है. पिकाओंके माखनचोर गोपाल और रासबिहारी हैं। यहाँ उनका एकमात्र लक्ष्य है उनके प्रेम-सेवा-रसका आस्वादन कर अपने रसिकशेखरत्वको सार्थक करना, अपनी प्रेम-रसकी निरन्तर बढती हई भूखके लिए सामग्री जुटाते रहना। यहाँ वे खाते-पहनते वही हैं. जो उनके प्रेमीभक्त प्रेमसे उन्हें देते हैं. रहते भी वहीं हैं जहाँ वे उन्हें प्रेमसे रखते हैं, चाहे वह सोनेका महल हो, या फूसकी झोपड़ी। उन्हें वैकुण्ठमें ऐसी झोंपड़ी भी कहाँ नसीब होती है, जिसे उनके किसी भक्तने प्रेमसे तैयार किया हो, जिसका कण-कण उसके प्रेम-रससे सिक्त हो।

यहाँ उनकी सभी शक्तियाँ उनसे दूर जा खड़ी होती हैं, जिससे उनके सान्निध्यसे उनका यह आवेश भंग न हो जाय और उनके प्रेमरसास्वादनमें बाधा न पड़ जाये।

संगमरमरका फर्श नन्दके लालाके किसी प्रेमी भक्तकी प्रेम-सेवासे ही बन सकता था। उसने सोचा कोई ऐसा भक्त आ जाय तो उससे कहूँ। उसे किसीसे अपने लिए कुछ कहनेमें या उससे कुछ माँगनेमें शर्म तो है नहीं। पर, वह माँगता है अपने रक्तोंसे ही। भक्तोंको छोड़ उस बिचारेका और है ही कौन ? जो उसकी सुने, वही तो हैं उसके नाते-रिश्तेदार, भाई-बन्धु और सखा। उन्हें ही वह अपना मानता है। अपनोंसे कुछ माँगनेमें शर्मकी बात ही क्या है ?

पर एक गुण और भी है उसमें। यदि उसे कोई अपना न दीखे, तो किसीको अपना बना लेनेमें, उससे मैत्री कर लेनेमें या कोई न कोई नाता जोड़ लेनेमें उसे देर नहीं लगती। ऐसा कुछ जादू है उसके पास, ऐसी कोई मोहिनी शक्ति है उसमें कि जिस किसीके सामने वह एक बार आ जाता है, वह सदाके लिए उसका अपना बनकर रह जाता है। इसलिए जिसे वह अपना बनाना चाहता है, उसे बस एक बार

अपनी झलक दिखा देता है। फिर उससे अपना जो काम चाहता है करा लेता है। देखने में तो वह बडा भोला है, जैसे कुछ जानता ही नहीं, पर नखसे शिखा तक इस प्रकारकी चतुराईसे भरा हुआ है।

जिलेके बौधरीका नगला ग्राममें श्रीनवलकिशोर रहते थे। वे गौड़ ब्राह्मण थे और इस बार उसने अपनी इसी चतुराईसे काम लिया। राजस्थानके अलवर रामानुज सम्प्रदायमें दीक्षित थे। विष्णु भगवान्‌की उपासना करते थे। उनकी माँ श्रीमती हीरादेवी बड़ी भक्तिमती थीं। वे नन्दलालकी उपासना करती थीं। नन्दलालकी उनपर बड़ी कृपा थी। एक बार वे दुमजलेसे गिर पड़ीं। नन्दलालने उन्हें अपनी गोदमें ले लिया। उन्हें चोट जारा भी नहीं आयी। तभी उन्होंने वृन्दावन जाकर बस जानेका निश्चय किया।

वे वृन्दावन चली गयीं। साथमें श्रीनवलकिशोर और उनकी पत्नी भी गयीं। कुछ दिन बाद हीराबाईको नन्दलालाने नित्यधाममें अपनी सेवामें ले लिया। नवलकिशोरजीपर माँकी भक्ति और वैराग्यका प्रभाव पहलेसे था ही। मकि अन्तर्थानके पश्चात् उनका वैराग्य और भी तीव्र हो गया। उन्होंने अपनी धन-सम्पत्ति सब ठाकुर-वैष्णवोंकी सेवामें लगा दी। फिर पत्नी सहित नन्दग्राम चले गये। वहाँ आशेश्वरपर रहकर भजन करने लगे। एक दिन पत्नीसे कहा- 'यहाँ आशेश्वरपर चोरोंका भय बहुत है। लाओ तुम्हारे आभूषण किसी सुरक्षित स्थानपर रख आऊँ।'

पत्नीने अपने सब आभूषण दे दिये। उन्हें बेचकर नवलकिशोरजीने साधु-वैष्णवोंकी सेवा कर दी। पत्नीने पूछा- 'आभूषण कहाँ रख आये ?'

वे बोले- 'नन्दलालाकी तिजोरीमें।'

पत्नी भक्तिमती थीं। वे समझ गयीं। उन्होंने भी इसपर कोई आपत्ति नहीं की। कुछ दिनों बाद उन्होंने पत्नीको मैके भेज दिया और स्वयं वैराग्यवेश ग्रहणकर अकेले रहने लगे। नैष्ठिक ब्राह्मण होनेके कारण उन्हें छुआछूतका विचार बहुत था। वे मधुकरीमें सूखा अन्न माँग लाते। स्वयं बड़ी शुद्धतासे रसोई बनाते। किसीकी परछाईं भी उसपर न पड़े, इसका विशेष ध्यान रखते। इस प्रकार बड़ी सावधानी और शुद्धतासे तैयार किये हुए भोगको ही विष्णुको अर्पणकर स्वयं प्रसाद ग्रहण करते।

नन्दलाला नवलकिशोरजीकी माँके सम्बन्धसे उनसे भी अपना सम्बन्ध मानते थे। यह तो उनकी रीति ही ठहरी। वे अपने भक्तसे तो सम्बन्ध मानते ही हैं, उसके सम्बन्धियोंसे, पूर्वजों और पितरोंसे, यहाँ तक कि उसकी आनेवाली सन्तानसे और उस भूमि तकसे, जिसमें उसने वास किया है, अपना निजी सम्बन्ध मान लेते

उन्होंने नवलकिशोरजीसे फर्शकी सेवा करानेका विचार किया। पर इसमे उन्हें स्वाभाविक रूपसे कुछ संकोच था, क्योंकि नवलकिशोरजी तो उनसे अपना कोई विशेष सम्बन्ध मानते नहीं थे। वे विष्णुके उपासक थे। नन्दलालाकी नगरीमे राहते थे। उनके मन्दिर में जाकर उनके भी दर्शन कर लिया करते थे, यह और बात थी। केवल इतनेसे उनका उनसे प्रेमका कोई विशेष सम्बन्ध तो बनता नहीं था।

व्रजभूमि और तीर्थ से जुड़ी घटनाएँ

तो नन्दके लालाने उनपर अपना जादू चलानेको बात सोची। एक दिन वे एक बजमाईक घर मधुकरीको गये। वह जानती थीं कि यह बाबा मधुकरीमें रोटी नहीं लेते, आटा ही लेते हैं। वह गयी भीतरसे आटा लाने बरामदे में उसके दो छोटे-छोटे बालक सामने रखी थालीमें-से महेरी खा रहे थे। नवलकिशोरजीने देखा कि उनके साथ बैठे उसी थालीमें से श्रीकृष्ण और बलराम भी खा रहे हैं। उनके हाथ और मुँह उन व्रज-बालकोंकी जुठी महेरीसे सने हुए हैं और वे उनकी (नवलकिशोरजीकी) ओर देख-देख जैसे उन्हें चिढानेको आँखें मटकाते हुए उसमें लम्बे-लम्बे हाथ मार रहे हैं।

नवलकिशोर चकित, स्तम्भित और सम्मोहित-से एकटक उनकी ओर देखते रह गये। व्रजमाई आयी मधुकरी लेकर और हाथ बढ़ाकर बोली- 'ले बाबा ।'

पर, बाबा तो अपनी सुधि खो चुके थे। उनकी प्राकृतिक आँख और कान जड़ हो चुके थे। उन्हें व्रजमाई दीखती होती और उसके शब्द उनके कानमें पड़ते होते, तब न वे अपनी झोली उसके आगे बढाते। वे तो वैसे ही खडे अपलक नेत्रोंसे श्रीकृष्ण-बलरामकी रूपमाधुरीका पान कर रहे थे। व्रजमाईने उनकी यह मुद्रा देख ऊँबे स्वरमें कहा - 'भिक्षा ले न बाबा, कहा देख रह्यौ है बालकनकी ओर ?'

तब कहीं बाबाने चौंककर देखा आटेकी मुट्ठी भरे सामने खड़ी व्रजमाईको। वे कुछ क्षण मौन रहे। फिर बोले-

M

'मइया, यह मधुकरी रहने दे। मुझे बालकोंकी थालीमें-से थोड़ी महेरी दे दे।'

'कहा बाबा ? महेरी, बालकनकी जूठी! तू कहा आज बाबरो हय गयौ है ? आन दिना तो सच्ची रोटिउ नाय लेतो। आज बालकनकी जूठी महेरी माँग रह्यौ है?'

व्रजमाईके लिए इससे बड़ी अचम्भेकी बात और क्या हो सकती थी ? वह क्या जनती थी कि वह भीतर गयी और आयी, इतनेमें ही बाबाका सब कुछ

उलट-पलट हो गया। उनपर नन्दके लालाका जादू असर कर गया। वे अब पहलेके से नैष्ठिक ब्राह्मण नहीं रह गये. जो किसी द्रव्यपर किसीकी परछाई पद जानेसे भी उसे दुषित मानते थे और किसी औरका पकाया द्रव्य प्रसादी हो तो भी उससे परहेज करते थे। उन्होंने अब समझ लिया कि व्रजका ठाकुर शुद्धता द्रव्यकी नहीं, प्रेमकी मानता है। वह प्रेमका ठाकुर है। नेमसे नहीं, प्रेमसे रीझता है।

बाबाने कहा- 'मइया, मैं बावरा नहीं हुआ है। मेरा बावरापन अब छूट गया है। देरी मत करे। महेरी दे दे। बाबाके नेत्रोंसे अश्रुधार प्रवाहित हो रही थी और उनका कण्ठस्वर अवरूद्ध हो रहा था।

ब्रजमाईने समझा बाबा सचमुच बावरा हो गया है। वह चुपचाप खड़ी रही। बाबाने स्वयं लपककर थालीमें महेरीकी मुट्ठी भर ली।

वे महेरी खा रहे थे, व्रजमाई देख रही थी। खाते-खाते वे किसी अप्राकृत आस्वादनके आनन्दका अनुभव कर रहे थे। आनन्दाश्रुओंसे उनका मुख और वक्ष भींग रहा था !

इस घटनाके बादसे बाबाकी उपासनाने एक नया मोड़ लिया। उनके मनमें एक नयी उथल-पुथल मचने लगी। वे सोचने लगे- मैंने इतने दिन विष्णु भगवान्‌की उपासना की। उन्होंने एक बार भी दर्शन नहीं दिये, पर इस व्रजके ठाकुरने न भजनेपर भी अयाचित भावसे ऐसी कृपा की! यह कितना दयालु है ! कितना भोला है ! विष्णुकी उपासनामें कितनी मर्यादा है, कितना संभ्रम और संकोच है। पर, यह तो किसी प्रकारके संभ्रम और संकोचको टिकने ही नहीं देता। इसे देखते ही लगता है, जैसे यह कितना जन्म-जन्मका अपना है। जी चाहता है, इसे हृदयसे लगाकर प्रेमाश्रुओंसे अभिषिक्त कर दो और बस करते रहे। कभी भी विलग न करो। विष्णु भगवान् अपने ऊँचे सिंहासनपर विराजमान रहकर दूरसे ही भक्तोंके नैवेद्यको स्वीकारकर प्रसादी उनके लिए छोड़ देते हैं।

पर, यह व्रजके घर-घरमें डोलता-फिरता व्रजवासियोंकी जूठन स्वयं खाता रहता है और उसमें न जाने कितने आनन्दका अनुभव करता है।

फलत बाबा बाह्यरूपसे तो पूर्ववत विष्णुकी ही उपासना करते रहे, पर चिंतनमें नन्दलालको लाड़ लड़ाते रहे। वे विष्णुका ध्यान करना चाहते, तो भी नन्दलाल वहाँ आ विराजते। वे चेष्टा करते, तो भी विष्णुके लिए वहाँ कोई स्थान न पाते। एक बार जब वे नन्दलालके मन्दिरके प्रांगणमें चिंतनमें बैठे थे, उन्होंने देखा M

स्यका लाला वहाँ घुटनों चल रहा है. चलते-चलते रुक जाता है और घटनोंको सहलाने लगता है। चिन्तन करते-करते तंद्रा आ गयी। स्वप्नमें नन्दलालाने बाबा मेरे पायनमें गडे हैं।'

बाबासे नन्दलालाका कष्ट न देखा गया। उन्होंने निश्चय कर लिया कि जैसे हो और जितनी जल्दी हो नन्दलालाके मन्दिरका फर्श चिकने संगमरमरका बनबाना है।

दूसरे दिन वे जोधपुर राज्यमें मकरानाके लिए चल पड़े। वहाँ पहुँचकर भिक्षा माँगी। उसने कहा- 'बाबा, जितने पत्थर चाहो ले जाओ। जिसने तुम्हें भेजा चरके एक बड़े व्यापारीसे नन्दलालाके मन्दिरके लिए संगमरमरके पत्थरोंकी । उसने मुझसे भी स्वप्नमें तुम्हें पत्थर देनेको कह दिया है।'

उस समय जोधपुरसे मथुराके लिए रेलगाडीकी व्यवस्था तो थी नहीं। गाडीसे पत्थर नन्दग्राम पहुँचाये गये। शीघ्र नन्दलालके मन्दिर और जगमोहनमें स्वर संगमरमरका फर्श बनकर तैयार हो गया। जगमोहनके बाहर एक सुन्दर समरमरकी छतरी भी बन गयी। आज भी शरदमें इस छतरीमें नन्दलाल विराजते हैं। एक जगह दीवारके पत्थर में इस घटनाका संक्षिप्त विवरण इस प्रकार अंकित है-

सेवा, प्रसाद और समर्पण की घटनाएँ

देखो

कृष्णदयाल

जीवनके

उद्धार

बैठके ।

हित । रच्यो महल नन्दलाल नौल हृदा में सोढा बिछवायो नन्दलाल सिंगमर निज महलमें । देखो कृष्णदयाल दई बड़ाई नवलको ।।

नवलकिशोरजी अब पहलेकी तरह स्वपाकी तो रहे नहीं, पर नन्दग्रामके बाहर अब भी वे किसी औरके हाथका न खाते। एक बार वे मथुरा गये हुए थे। साथमें थे - अके शिष्य श्रीजुगलकिशोर। जुगलकिशोरको उन्होंने भेजा अपने ठाकुरकी रसोईक निए थी लाने। उन्होंने एक परचूनियेकी दुकान पर धी माँगा। उसने कहा-

'ले जाओ बाबा।'

'पर मेरे पास पैसे नहीं हैं।'

जुगलकिशोरजीने कहा 'कोई बात नहीं। ठाकुरजीकी घीकी सेवा मेरी तरफ से हो जायेगी।'

भी देने के बाद बनियेने कहा- 'बाबा, मेरे कोई सन्तान नहीं है। तुम्हारे गुरुदेव सिद्ध-महात्मा है। उनसे कहना कुछ कृपा करें।'

भोले-भाले और उदार स्वभावके जुगलकिशोरने झट कहा- 'अच्छा अच्छा, हो जायेगी कृपा।'

वे लौटकर आये, तो नवलकिशोरजीने पूछा- 'घी कहाँसे लाये ?"

उन्होंने सारा वृत्तान्त ज्यों-का-त्यों कह सुनाया। नवलकिशोरजीको गुस्सा आया। उन्होंने उनकी पीठपर चिमटा मारा और कहा- 'मूर्ख, कृपा बेचता फिरता है। कृपाका रोजगार करता है। आज मेरी कृपा बेची, कल मुझे बेच आयेगा। चला जा यहाँसे। मैं तेरा मुँह नहीं देखना चाहता।'

जुगलकिशोर उनके चरणोंमें गिरकर रोते हुए बोले- 'बाबा ! क्षमा करें। अब ऐसा नहीं करूंगा। बनियेसे जाकर कह दूँगा- अपना धी वापस ले लो। बाबा तुम्हारे लिए कुछ नहीं करेंगे।'

नवलकिशोरजीका गुस्सा कुछ शान्त हुआ। वे बोले- 'अब तू वचन दे ही आया है, तो नन्दलाल उसपर कृपा अवश्य करेंगे। पर, बनियेने तुझे ठग लिया। थोडे-से घीके बदले लड़का ले लिया। जा, कह उससे जाकर - लड़का होनेपर नन्दलालकी गुलाबजलकी सेवा नित्य उसीको करनी होगी।'

जुगलकिशोरने जाकर उससे ऐसे ही कह दिया। वह सुनकर ऐसा प्रसन्न हुआ जैसे, उसे सन्तान सुनते ही प्राप्त हो गयी हो। नन्दलालकी गुलाबजलकी सेवा उसने तुरन्त आरम्भ कर दी। कुछ ही दिनोंमें उसके लड़का हुआ। नाम रखा 'नमो।'

सन्तान होनेपर उस परचूनियेने नया काम पत्थर आदिका शुरू किया। फर्मका नाम रखा 'नवलकिशोर-जुगलकिशोर।' कंस टीलाके नीचे यह फर्म दोनों महात्माओंके नामसे कई पीढ़ियाँ बीतनेपर आज भी वर्तमान है।

नवलकिशोर जो कुछ भी करते, उसमें लक्ष्य होता केवल नन्दलालको सेवाका। एक दिन 'छोटे मिसर' नामके एक गोस्वामी बालकने उनसे कहा-'बाबा, तू तो सिद्ध है न! बता मेरी मुट्ठीमें क्या है ?'

बाबाने कहा- 'बता दूँगा, पर नन्दलालकी सेवा करनी पड़ेगी।'

उसने सेवाका वचन दिया। बाबाने तत्काल नन्दलालका चिन्तन किया। देखा उनके ओष्ठ लाल हैं। वे बोले- 'लालाके होठ लाल हो रहे हैं। तेरे हाथमें गुलकांक (बिम्बफल) है।' वह बालक जब तक जीवित रहा नन्दलालकी सेवा रुपयेकी सेवा नित्य करता रहा।

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हरियाणाके सेठ भगवानदास बेरीवाला एक धनाढ्य व्यक्ति थे। उनका काम कुछ खराब हो गया था। ऊंटपर चढ़कर वे नन्दग्राम आये और नवलकिशोरनीको कृपा प्राप्त करनेके उद्देश्यसे उनसे अपनी सारी स्थितिका वर्णन किया। उन्होंने कहा- 'नन्दलालकी सेवा करोगे, तो तुम्हारी उन्नति होगी।' वे नन्दलालको सेवा करने लगे। तभीसे उनकी उन्नति होने लगी। आजतक उनके परिवारके लोग नन्दलालकी सेवा करते आ रहे हैं। उनके पौत्र श्रीरतनलाल बेरीवालाने ही नन्दलालके मन्दिरका जीर्णोद्धार किया, उसे उसका वर्तमान रूप दिया।

भगवानदासजीने पीछे नवलकिशोरजीको अपना शिक्षा-गुरु मानकर उनसे मानसी-सेवाकी शिक्षा ग्रहण की। नवलकिशोरजीकी तरह वे भी मानसीसेवामें सिद्ध हो गये। उन्हें भी नन्दलालके दर्शन होने लगे। उनके पौत्र रतनलालजी भी बड़े भक्त और साधु-वैष्णव सेवी थे। उन्होंने श्रीसनातन गोस्वामीके 'वृहद्भागवतामृत' का हिन्दी अनुवादकर मुद्रित कराया और उसका निःशुल्क वितरण किया।

श्रीनवलकिशोर बाबा नन्दलालके लिए नित्य दस लड्डू अपने हाथसे बनाकर पुजारीको दिया करते। उसमें से आठ प्रातः बालभोगमें उसे दिये जाते और दो रातको यशोदा माँके पास रख दिये जाते, जिससे यदि रातको उसे भूख लगे, तो खिला दें। तभीसे नन्दलालके लड्डू-भोगका यह नियम चला, जो आज भी जारी है।

नवलकिशोरजीका नन्दलालके प्रति वात्सल्यभाव था, पर अन्तमें श्रीराधाजीके प्रेमकी महिमा जान वे कान्ताभावके उपासक हो गये। इस सम्बन्धमें मन्दिरके जगमोहनकी दीवारपर उनका एक पद अंकित है, जिसकी दो पंक्तियाँ इस प्रकार

राधिकाजू प्रेम सुन्यो पढ्यो अमित कथा । नौल लियौ सोई नेम मिल्यो श्याम श्रीपद कृपा ।।

उनका एक हस्तलिखित ग्रन्थ भी है, जो नन्दग्रामके गोस्वामी श्यामजीके पिताके पास सुरक्षित है। उससे उपरोक्त कई घटनाओंके अतिरिक्त यह बात भी प्रमाणित होती है कि वे कान्ताभावमें सिद्ध थे। उसकी कुछ पंक्तियाँ इस प्रकार हैं-

तब ते बड़ भाग्यिनि भई मोहि अपनायी नाथ । नाते वातो मान करि पुरषा किये सनाथ ।।

प्रगट वृन्दावन ल्याये मोहि रखि करि उरमाल ।

करि सब मन की रुचि मेरे पति नन्दलाल 11

नन्दगाँवमें आशेश्वरपर, जहाँ नवलकिशोरजी भजन करते थे. उनको समाध है। समाधिपर सम्वत् १९३७ विक्रम खुदा हुआ है।

प्रेम और भक्ति — जीवन-संदेश

ईश्वर-प्रेम की अनुभूति भक्त-साहित्य का एक महत्त्वपूर्ण विषय है। इन प्रसंगों को श्रद्धा, संवेदनशीलता और समर्पण के संदर्भ में पढ़ा जा सकता है।

कथा का सार

भक्त श्रीनवलकिशोर दासजी की कथा भक्ति, विनम्रता और साधना पर मनन करने का अवसर देती है। इस संग्रह में अन्य भक्तों के जीवन-प्रसंग भी पढ़ें।