ब्रज के भक्त भाग 3 · अध्याय 88
भक्त श्रीभोलानाथजी (भोरीसखी)
भक्त श्रीभोलानाथजी (भोरीसखी) की प्रेरक हिंदी कथा। जानिए उनके जीवन, भक्ति और साधना से जुड़े महत्वपूर्ण प्रसंग।

भक्त श्रीभोलानाथजी (भोरीसखी) का यह भक्त-चरित्र ब्रज की साधना, श्रद्धा और जीवन से जुड़े प्रसंगों को सामने लाता है। नीचे कथा को अलग-अलग विषयों में व्यवस्थित किया गया है।
जन्म, परिवार और प्रारम्भिक जीवन
[ वृन्दावन ]
यमुना-तट है और सन्ध्याकी बेला। अस्ताचलगामी सूर्यकी अरुणिम किरणें - वृन्दावनके आकाशपर अपनी लालिमा बिखेरकर यहाँके अनुराग-भरे वातावरणकी
सुपर है। अपने-अपने घोसलोंमें जा छिपे हैं। चारों ओर नीरवता छायी हुई है। बीच-बीची पड़ रही है किसीकी दर्दभरी चीख। कोई दूरके उन रमुटों बैठा राधे! हा करुणामयी !' कहकर रोदन कर रहा है। कभी वह किसी आन्तरिक वेदासेटपटाता हुआ भूमिपर लुण्ठित होने लगता है. कभी घुटनोंमें सिर देकर बैठ जाता है. कभी उत्तरीयसे आँसू पोछने लग जाता है। पर वह जितनी बार आँसू पोछता है उतनी बार फिर उसका मुख और वक्ष आँसुओंमे सराबोर हो जाता है।
सन्ध्याकालीन स्नानको आये घाटपर कुछ व्यक्ति हैं। उनका ध्यान उधर नहीं जा रखा है; क्योंकि वे कई वर्षोंसे बराबर यह दृश्य देखते आ रहे हैं। वह व्यक्ति नित्य वहाँ इसी प्रकार बैठा रोता और तड़फड़ता दीखता है।
रोते तो बहुत-से लोगोंको देखा गया है। पतिके मरनेपर पत्नीका रोदन देखा गया है, पुत्रके मरनेपर माँका रोदन देखा गया है। जन्मभरकी किसी कृपणकी कमायीके सहसा लुट जानेपर उसका रोदन देखा गया है। उस रोदनका देर-सबेर विराम अवश्य हो जाता है। पर यह कैसा रोदन, जो रुकने ही नहीं आता, अपितु तीव्रसे तीव्रतर होता जाता है !
इसका एक इतिहास है, जो सं० १९४७ के आषाढ़ मासकी कृष्ण षष्ठीको आरम्भ हुआ। इस दिन मध्यप्रदेशके भेलसा नगरमें श्रीछेदालालजीके पुत्र
श्रीभोलानाथजीका जन्म हुआ। वे जन्मसे ही भगवद्भक्त थे, पर उनकी भक्ति पूर्णरूपसे प्रकाशमें आयी उनकी किशोरावस्थामें, जब वे गुरुकी खोजमें घरसे निकल पड़े। बहुत खोज करनेपर वे नरसिंहपुर जिलेके जंगलोंमें भटकते हुए पाये गये। उन्हें उनके बड़े भाई श्रीबैजनाथजीके पास ले जाया गया, जो कोलारस, जिला शिवपुरीमें नाजिर थे। बैजनाथजीने उन्हें कोलारसके गोपालजीके मन्दिरके सेवाधिकारी पण्डित गोपीलालजीसे राधावल्लभीय सम्प्रदायकी दीक्षा दिलवा दी।
गुरुजीने आज्ञा की विवाह करनेकी। विवश हो उन्हें विवाह करना पड़ा, पर गृहस्थमें भी उनका भजन अबाध गतिसे चलता रहा। प्रभु अपने भक्तको सभी स्थितियोंमें उसके भजनमें अनुकूलता प्रदान करनेकी कृपा करते हैं। उन्होंने अध्ययन-अध्यापन करते हुए बी.ए. की परीक्षा पास की। छतरपुर-नरेश श्रीविश्वनाथसिंहने उनकी प्रतिभा और भक्तिसे प्रभावित हो उन्हें धार्मिक श्रामर्शदाताके रूपमें अपने पास रख लिया। इस रूपमें उनका कार्य था केवल भक्त श्रीभोलानाथजी (भोरीसखी)
स्वाध्याय करना और निर्दिष्ट समयपर राजा साहबके पास जाकर धर्म-चर्चा करना।
राजा साहबके पास ग्रन्थोंका अच्छा संग्रह था। वे सब ग्रन्थ भोलानाथजीके काम आये। उन्होंने विभिन्न भारतीय दर्शनों और वाणी-ग्रन्थोंका गम्भीर अध्ययन किया। इसी बीच उन्होंने वकालत पास की। कुछ दिनोंके लिए कोलारस गये, भाईके पास रहकर वकालत करने, पर प्रभुकी भक्तिमें रमा हुआ उनका मन वकालतमें न रम सका। वे राजा साहबके निमन्त्रणपर फिर छतरपुर वापस चले गये। धीरे-धीरे छतरपुरसे भी उनका मन उखड़ गया। वे हर समय वाणी-ग्रन्थोंका पाठ करते, उनमें वर्णित राधा-कृष्णकी दिव्य लीलाओंका चिंतन करते और व्रजके सुमधुर प्रेम-रसमें सदा पगे रहते। इसी समय व्रज-प्रेमरससे परिपूरित उनके हृदय-गह्वरसे उन सरस पदपदावलियोंका निर्झर फूट पड़ा, जिनकी रचना उन्होंने 'भोरी सखी के नामसे की है।
इस समयके उनके पद व्रजवासीकी उनकी उत्कट अभिलाषासे परिपूर्ण हैं-
कब बसिहौं ब्रज बीथिन माँही।
जहें नित डोलत युगल लाड़िले, दिये विमल गलबाहीं ।
मगन चलत डगमग पग धावत, छिन छिन पन्थ भुलाहीं ।।
ठहर-ठहर मुख कञ्ज विलोकत, मंद-मंद मुसकाहीं ।
फहरत अञ्चल-चञ्चल, कुण्डल परत कपोलन छाहीं ।।
कोटि मनोज अंग छवि मिल-मिल, चौगुन होत सदाहीं ।
दिव्य अनुभूति और कृपा के प्रसंग
भोरी किशोरी तन-मन अकुलत, देखन ढग ललचाहीं ।।
अभिलाषाने प्रार्थनाका रूप धारण किया-
दीजै मोहि बास व्रज माहीं ।
जुगल नामकौ भजन निरन्तर, और कदम्बन छाहीं ।।
व्रज-बासिनके जूठन टूका, अरु जमुनाकौ पानी ।
रसिकनकी सत-संगत दीजै, सुनिवौ रसभरी बानी ।।
ब्रजेश्वरीने भोलानाथजीकी प्रार्थना सुन ली। उनकी पत्नी और एकमात्र पुत्रका
परलोक गमन तोया और उनका वृन्दावन जानेका मार्ग प्रशस्त हो गया। वे
वृन्दावनमें ज
और करते
ये राधारानीकी अहैतुकी कृपाका भरोसा लेकर। भरोसा
उनका अपना तो कुछ बल था ही नहीं। उनका कोई पुण्य
२६४/भी ऐसा नहीं था जिसका वे भरोसा करते। ऐसोंको, जिनका कोई अवलम्ब न हो, वही तो हैं एकमात्र निबाहनेवाली -
श्रीराधा इक आस हमारी ।
सबल सबै बलके बल जागत, अबलनिको बल ते सुकुमारी ।। समरथ तैर चले भव सागर, पोचनको तोहि सोच सदा री। परके उड़ चले ब्याध विलोकत, वेपरकी तू राखिवे हारी ।। भाग्यवान निज भाग्य सराहत, भाग्यहीन कों आस तिहारी । पुण्य करत सो शुभ फल पावत, पतितन को तू पावन प्यारी ।। सब विधि सौं अवलम्ब न जाकै, तू नित ताहि निवाहन हारी । भारी भाग्यहीन अति खोटी, सबल स्वामिनी सिरपर प्यारी ।।
भोलानाथजी भाई श्रीशम्भुनाथजी, एडवोकेट उन्हें खर्च भेजते रहे और वे निश्चिन्त हो अपनी साधनामें लगे रहे। कुछ दिन बाद शम्भुनाथजीका देहान्त हो गया। खर्च आना बन्द हो गया। भोलानाथजीकी अपनी मानसिक स्थिति ऐसी थी नहीं कि जीविका-उपार्जनके लिए कुछ कर सकते। किसीसे कुछ माँगना भी उनके स्वभावके अनुकूल न था। जब स्वामिनी सिरपर हों, तो किसीसे माँगने-जाँचनेका प्रश्न ही क्या ? उन्हें एक युक्ति सूझी। सेवाकुञ्जमें यात्री बन्दरोंको चने डाल जाया करते थे। वे अच्छे चने सब खा जाते, ठुड्डी छोड़ देते। उन चनोंकी ठुड्डी खाकर वे क्षुधाकी निवृत्ति करने लगे।
भला स्वामिनी कब तक अपने प्यारे भक्तको ठुड्डी खाते देख सकती थीं ? उन्होंने श्रीराधाबल्लभके मन्दिरके सेवाइतको स्वप्नादेश किया- 'भोरी सखी सेवाकुञ्जमें चनोंकी ठुड्डी खाकर रह रही है। उसे मेरा प्रसाद नित्य दे दिया करो।'
स्वामिनीकी कृपासे भोरी सखीके प्रसादकी सुन्दर व्यवस्था हो गयी। उसे बढ़िया-से-बढ़िया प्रसादी द्रव्य नित्य आरोगनेको मिलने लगे। पर भोरी सखी स्वामिनीकी इतनी-सी कृपासे भुलावेमें आनेवाली थोड़े ही थी। इससे तो उसका प्रणय-रोष ही बढ़ना था। वह लगी उलटा उलाहना देने- 'तुम्हारी इस कृपासे मेरा क्या होना है ? तुमने आज तक कभी मुझसे यह भी पूछा कि मैं सचमुच चाहती क्या हूँ ? किसलिए गोद पसारकर तुम्हारे द्वारपर खड़ी चिल्ला रही हूँ ? मेरा असली दुःख क्या है ?
तुमने आज लों बात न पूछी, को द्वारे चिल्लाते न पूछी ।
जीवन बीत्यो गोद पसारे, कहा लोभ ललचात न पूछी ।।
मैं नित हौंस भरी कहिबे की, हँसि कबडू कुसलात न पूछी ।
कोटि उपाय किये पै तुमने, का सोचत दिन-रात न पूछी ।।
कैसे कटत दिवस-निसि तेरे, का दुख सूखत गात न पूछी ।
भोरी दीन दुखी आरत सौं, विहॅसि हृदयकी बात न पूछी ।।
मैंने तो अपनी ओरसे सारे नाते तुमसे ही मान रखे हैं, पर तुम भी मुझे अपनी बेरी करके मानती हो, इसमें मुझे सन्देह है-
सब नातौ मैं तुम सौं मानत।
इतनी कबहुँ कहौ हँसि तुमहू, हौ कि नहीं मोहि जानत ।।
कबहूँ मैं गुण बरनत तुम्हरे, कबहूँ बिनती ठानत ।
कहौ कभू सुधि तुमहुँ करति हौ, निज चेरी करति मानत ।।
यदि तुम मुझे अपनी मानतीं, तो अवश्य मेरी सुध लेतीं और पूछतीं- 'भोरी, तू चाहती क्या है ?'
उलाहना सुनकर भी स्वामिनी चुप रहीं। उन्होंने कभी कोई पूछताछ नहीं की।
भोरी सखीने सोचा कि शायद वे समझती हों, पूछनेपर भोरी न जाने क्या माँग ले, इसलिए मैं स्वयं ही बता दूँ, मैं क्या चाहती हूँ। उसने कहा- 'सुनो मैं क्या चाहती हूँ। तुम मिलो या न मिलो, मिलनेकी चटपटी चाहती हूँ। तुम्हारे न मिलनेका हृदयमें दर्द चाहती हूँ, तुम्हारा विरह चाहती हूँ-
भक्ति-प्रेम और विरह की अनुभूति
इतना बात कृपा करि दीजै।
मिलन चटपटी हियमें लागै, विरह ताप तन छीजै ।।
तुम तौ मिलौ मिलौ न कृपा करि, मो चित प्रेम सौं भीजै ।
नयनन नीर बहै निसि-वासर हियौ कठोर पसीजै ।।
भोरी कौ अवलम्ब न दूजौ, टेरि-टेरि कै जीजै ।
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कबहुँ बढ़े विरह दिन दूनौ ।
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बिनु भरि नयन माधुरी देखे, सब जग लागै सूनौ ।।
भी जाड़ बैठियत न्यारे, बात करत घबरावै ।।
विलिसी कहिबो-सुनियो, चित्त कडू न सुहावे ।
सब कहत-सुनत तेरी नाम किशोरी, उमगि नयन भरि आवै ।
लीला ललित विचारत जब-जब हियरा टूटत जावै ।।
विष सम लगे विषय सुख जे तो, मुक्ति-स्वर्ग नहि चाहे ।
मुंदे नयन पुलक तन पुनि-पुनि, लै लै नाम कराह ।।
भोरीकी अभिलाषा इतनी, बार-बार सोई माँगे ।
कौन भाग्य सों कुँवर-किशोरी, प्रीति हियेमें जागै ।।
भोरी सखी बड़ी सयानी थी। वह किशोर-किशोरीको नहीं, उनकी प्रीति चाहती
थी। वह जानती थी ना कि जिस किसीमें उनकी प्रीति होती है, उसके वे सर्वथा अधीन रहते हैं। इसीलिए न, वे अपनी प्रीति सहसा किसीको नहीं देते। भुक्ति-मुक्ति देकर उसे टाल देना चाहते हैं।
भोरी सखीपर श्रीराधा-वल्लभके प्रसादकी कृपा तो नित्य होती रही। पर, इससे न उसके उलाहनेमें कमी आयी, न उसके वैराग्यमें। वह प्रसाद लेकर नित्य यमुना-तटपर चली जाती। प्रणय-रोषमें सारा प्रसाद यमुनामें बहा देती। केवल दो प्रसादी रोटियाँ सूखी चबाकर अपनी क्षुधाकी निवृत्ति कर लेती, फिर चली जाती उन झुरमुटोंमें। वहाँ एकान्तमें बैठी-बैठी आँसू बहाया करती।
आखिर भोरीके धैर्यका बाँध टूट चला। उसने जान लिया कि स्वामिनी उसे सभी प्रकारसे पतित जानकर उसपर कृपा नहीं कर रहीं। तब वह मर जानेकी सोचने लगी-
अब मोहि कछु ऐसी जान परै।
हौं जु पतित सब भाँति अभागी, स्वामिनि नहिं निज ढरनि ढरै ।।
काँपत देह त्रास हिय भारी, अब न चित्त छिन धीर धरै ।
साधन नेम न ठौर ठिकानौ, व्याकुल द्वार पै दीन रटै ।।
कहाँ कृपा करिके अलबेली, भोरी शठ कित जाइ मरै ।।
भोरी सखी सयानी होते हुए भी सचमुच भोरी थी। वह यह नहीं जान रही थी वामिनीकी कृपा उसपर पहले ही भरपूर है। वह जिस प्रीतिकी प्रार्थना करती
थी, जिस विरह-वेदनाकी आकांक्षा करती थी, वह तो उन्होंने उसे दे ही रखी है, पर इसमें उसका दोष ही क्या था ? प्रीतिका स्वरूप ही ऐसा है। प्रीति जितनी होती है. उतना ही उसका अभाव प्रतीत होता है। जितना हृदय उससे भरपूर होता है, उतना ही खाली जान पड़ता है। तभी न भक्त भोरीकी तरह प्रीति-दाता स्वामिनीसे सदा शिकायत करता रहता है
देखत-देखत दिन सब बीते ।
तुम अटूट अनुरागकी दाता, हम अजहूँ रीतेके रीते ।।
पर जो भी हो, भोरी जब मरनेकी सोचने लगी, स्वामिनीका हृदय काँप गया। उन्होंने सन्मुख न आकर पीछेसे ऐसा सोचनेको उसे मना किया। तब उसे अवसर मिला यह कहनेका-
जो पै जिवावौ तो ऐसे जियावौ।
करुणाधाम कृपाल कृपानिधि, सन्मुख मृदु मुसकावौ ।।
मोहन प्रान जीवन धन सरबस, सो सो हृदय समावौ ।
मुदित सम्हारत कच मुख छूटे, कर गहि हृदय जुड़ावौ ।।
तुम बिन और लखौं नहि काहू, दृग छबिमें अटकावौ ।
नित नव छबि नव रूप माधुरी, एग पुट भरि-भरि प्यावौ ।।
भोरी दीन दुखारी श्रीहित चरणन सुबस बसावौ ।।
अन्तमें भोरीने आषाढ़ शुक्ला ६, सं० १९८८ को ४२ वर्षकी अल्पावस्थामें अपने मरनेका हठ पूरा किया और स्वामिनीने जिलानेका। वे उसकी बाँह पकड़कर उसे ले गयीं निजधामको ।*
* पदावलियोंके अतिरिक्त भोलानाथजी अपनी दो बड़ी कृतियाँ भी छोड़ गये हैं- ब्रह्मसूत्रपर हिन्दीमें भाष्य और 'सुधर्म बोधिनी' की टीका। पदावलियोंका सङ्कलन 'प्रेमकी पीर' के नामसे आचार्य श्रीललिताचरण गोस्वामी द्वारा प्रकाशित किया गया है।
प्रेम और भक्ति — जीवन-संदेश
ईश्वर-प्रेम की अनुभूति भक्त-साहित्य का एक महत्त्वपूर्ण विषय है। इन प्रसंगों को श्रद्धा, संवेदनशीलता और समर्पण के संदर्भ में पढ़ा जा सकता है।
कथा का सार
भक्त श्रीभोलानाथजी (भोरीसखी) की कथा भक्ति, विनम्रता और साधना पर मनन करने का अवसर देती है। इस संग्रह में अन्य भक्तों के जीवन-प्रसंग भी पढ़ें।