ब्रज के भक्त भाग 3 · अध्याय 60

बालभक्त श्रीओमप्रकाश

बालभक्त श्रीओमप्रकाश की प्रेरक हिंदी कथा। जानिए उनके जीवन, भक्ति और साधना से जुड़े महत्वपूर्ण प्रसंग।

बालभक्त श्रीओमप्रकाश
बालभक्त श्रीओमप्रकाश — ब्रज के भक्त भाग 3

बालभक्त श्रीओमप्रकाश का यह भक्त-चरित्र ब्रज की साधना, श्रद्धा और जीवन से जुड़े प्रसंगों को सामने लाता है। नीचे कथा को अलग-अलग विषयों में व्यवस्थित किया गया है।

जन्म, परिवार और प्रारम्भिक जीवन

उन्हें सन्तों सहित अपने घर प्रसाद पानेको निमन्त्रण दिया। निमंत्रणके दिन वह एक बार वे कुछ सन्तोंके साथ व्रजकी यात्राको निकले। मार्गमें किसी भक्तने सीधा-सामान लेकर उनके पास आया और बोला- 'मैं सामान ले आया हूँ। आप लोग यहीं बनाकर पा लें। मेरा लड़का बीमार हो गया है। उसकी खराब है। पता नहीं कब मर जाय।'

हालत बहुत उन्होंने कहा- 'जहाँ सन्त पधारते हैं वहाँ क्या कोई अमंगल हो सकता है ? इन सन्तोंका चरणामृत ले जाकर पिला दो। वह ठीक हो जायेगा। सन्त और भगवान् वहीं पधारकर प्रसाद पायेंगे।'

उसने ऐसा ही किया। लड़का ठीक हो गया। वह बाजे सहित सन्तोंको प्रसाद पावाने घर ले गया। तबसे वह प्रायः उनकी कुटियापर आकर सन्त-सेवा किया करता।

अन्त समयके निकट आनेपर वे कई महीने पहलेसे फलाहारपर रहने लगे। समय अधिक निकट आनेपर त्यागीजी महाराज (श्रीबिहारीदास बाबा) से भागवत सप्ताह सुना। सन्तोंका दर्शन करनेके उद्देश्यसे शिष्योंसे कहकर भण्डारा करवाया। उनका दर्शनकर और सीतप्रसाद ग्रहणकर धाम पधारे। श्रीजगन्नाथप्रसाद भक्तमालीजीने उनकी धाम-प्राप्तिके उपलक्ष्यमें अपनी ओरसे मण्डप बनवाकर कथाकी व्यवस्था की और भक्तमालकी कथा कह उनके प्रति श्रद्धांजलि अर्पित की।

[ वृन्दावन ]

'भगवान् उसे दर्शन देकर अपने साथ अपने धाम ले गये। वह सीढ़ी-सीढ़ी न चढ़कर कूदकर चला गया!' सिद्ध सन्त श्रीनारायण स्वामीने बालभक्त ओमप्रकाशकी भगवत्प्राप्तिके सम्बन्धमें यह कहा था।

पर, क्या कोई सचमुच कूदकर भगवान्‌के पास जा सकता है ? शास्त्र कहते हैं कि भगवान् परम स्वतन्त्र हैं। हम चाहे कितनी उछल-कूद करें, उनकी अपनी इच्छाके बिना उन्हें नहीं पा सकते। शास्त्रोंका यह कथन सत्य है। पर, यदि कोई भक्त एक छलाँगमें उन्हें पा लेनेका दृढ़ निश्चय कर, उनके ऊपर भरोसा रख

संसाररूपी कारागारकी ऊंची दीवारसे सहसा कूद ही पड़े तो क्या वे भक्तवत्सल अपनी गोदमें उसे भर लेनेको बाध्य नहीं है ?

शास्त्रोंका यह कथन भी सत्य है कि भगवानको प्राप्त करनेके लिए सीढ़ी-दर-सीढ़ी चढ़ना होता है। श्रीरूप गोस्वामीने भक्तिरसामृत-सिन्धुमें श्रद्धा, साधुसंग, भजनक्रिया, अर्थ निवृत्ति आदि भक्तिके जिन सोपानोंका वर्णन किया है, उन्हें एक-एक कर पार करना होता है। * पर, पूर्वजन्मके प्रबल संस्कार या भगवान्‌की विशेष कृपा हो, तो क्या उन्हें एक साथ उसी प्रकार पार नहीं किया जा सकता, जिस प्रकार एकके-ऊपर-एक रखे कमलके पत्तोंको सूईकी नोंकसे एक साथ छेदा जा सकता है ?

सूई उन्हें छेदती है एक-एक करके ही, पर यह कार्य इतनी शीघ्रतासे होता है कि लगता है जैसे उन्हें एक साथ छेद दिया गया। बालभक्त ओमप्रकाशने भी इसी प्रकार एक छलाँगमें भक्तिके सोपानोंको पार कर लिया। उसकी अवस्था १६ वर्षकी थी जब उसने साहसभरी वह छलाँग भरी। पर, उसके शैशवसे ही वह सब लक्षण प्रतीत होने लगे थे, जिनसे लगता था कि वह बहुत दिनों तक धैर्य धारणकर छलाँग मारे बिना रह न सकेगा।

सन् १९२६ में बैसाख मासकी शुक्लपक्ष एकादशीके दिन उसने राजस्थानके टोंक नगरमें टोंक राज्यके एक उच्च कर्मचारी और जमींदार श्रीरामनारायण सक्सेनाके घर जन्म लिया ! घरमें भगवत्कथा, कीर्तन और साधु-सत्संगका वातावरण था। स्वच्छ और सरल हृदयके ओमप्रकाशको ध्रुव और प्रह्लादकी कथाएँ सुन भगवान्में अटल विश्वास हो गया। वह स्वप्नमें और ध्यानमें उनके सान्निध्यका उपभोग करने लगा।

जब वह पाँच वर्षका ही था एक दिन टोंकका आकाश टिड्डी-दलसे छा गया। उसे देख उसकी नानी दुःखमें भरकर कहने लगीं- 'हाय ! यह क्या ? यह टिड्डी-दल तो सारी फसलोंका सफाया कर देगा। लोग भूखों मरेंगे।' ओमप्रकाशसे नानीका दुःख न देखा गया। वह बोला- 'नानी, दुःखी मत हो। मैं अभी श्रीकृष्ण भगवान्से कहकर टिड्डियोंको भगाये देता हूँ।'

* भक्तिके विभिन्न सोपानोंका विस्तृत विवरण देखें परमार्थ-प्रकाशन, राधारमण मार्ग, वृन्दावनसे प्रकाशित लेखकका 'भक्ति-विज्ञान' नामक ग्रन्थ, अध्याय ४।

वह उस स्थानपर जा बैठा जहाँ नानी ठाकुर-सेवा किया करती थी और ठाकुरसे मन-ही-मन प्रार्थना करने लगा। ठाकुरने उसकी सुन ली। देखते-देखते टिड्डी-दल न जाने कहाँ अन्तर्धान हो गया। टोंक और न हुई। क्षेत्रकी कोई क्षति न और उसके आसपासके किसी

कुछ बड़े होनेपर ओमप्रकाशजीको जयपुरके महाराजा के सौजन्यसे हार्ड स्कूलमें अच्छी शिक्षाके लिए भरती किया गया। उम्र के साथ भगवान्‌में उनका विश्वास और भक्तिभाव बढ़ता गया। जयपुरके आधुनिकतम वातावरणको बकाचौंधसे चौधिया जानेके बजाय वे अपने ही दिव्यप्रकाशसे दिशाओंको आलोकित करने लगे। उनके सम्पर्कमें आनेवाले विद्यार्थियोंमें एक नयी चेतनाका संचार हुआ। उन्हें लेकर उन्होंने एक मुमुक्षु-मण्डलका निर्माण किया। मुमुक्षु-मण्डलके विद्यार्थी उन्हें अपना आदर्श मान उनका

यथाशक्ति अनुसरण करने लगे। ओमप्रकाशजी सदाचार, अर्थात क्रिया और विचारोंकी शुद्धतापर बहुत अधिक बल देते। उन्होंने सदाचारकी कसौटीके रूपमें दो चार्टीका निर्माण किया, जिनपर प्रतिदिन अपनी क्रियाओं और विचारोंके अनुसार अपने-आप को नम्बर देकर और सप्ताहान्तमें उन्हें जोडकर वे और उनके साथी अपनेको पास या फेल घोषित करते और प्रति सप्ताह पहलेसे अधिक नम्बरोंसे पास होनेकी चेष्टा करते। यह बात उन्होंने छपवाकर अपने साथियोंमें बाँट दिये थे।(2)

चार्टमें उन्होंने ब्रह्मचर्यको सर्वाधिक पूर्णाङ्क दिये थे। उसके पश्चात् सत्य और अहिंसा आदिको, जिससे स्पष्ट है कि वे ब्रह्मचर्यको कितना महत्त्व देते थे। जब वे सातवीं कक्षामें थे, उन्हें स्वामी शिवानन्दकी लिखी पुस्तक 'ब्रह्मचर्य ही जीवन है' प्राप्त हुई थी। इससे वे अत्यधिक प्रभावित हुए थे। तभीसे वे अपने जीवनको इस पुस्तकमें लिखे सिद्धान्तोंके अनुसार ढालनेकी चेष्टा करने लग गये थे। वे कहा करते थे कि मनुष्य-जीवनका लक्ष्य है ईश्वर-प्राप्ति। ईश्वर-प्राप्ति भजन बिना नहीं होती और भजनकी नींव है संयम और सदाचार। ईश्वर-भक्तिका बीज असदाचारकी ऊसर भूमिपर नहीं जमता। उसके लिए चाहिए सदाचारकी उर्वर भूमि, भगवत्कृपाकी वृष्टि और साधु-सत्संगकी खाद और खेती करनेवाला होना चाहिए उद्यमी, भजनशील।

दस-बारह वर्षकी अल्पावस्थामें ही ओमप्रकाशजीकी जैसी मानसिक स्थिति थी, उसे देखकर कोई यही कहेगा कि वे बालरूपमें एक महापुरुष थे। किसी व्यक्तिकी मानसिक दशा जाननेका एक अच्छा उपाय है उसके कमरेको देखना

कौन-कौन-सी पुस्तकें रखीं हैं? खूँटीपर वस्त्र किस प्रकारके टँगे हैं ? बाकी जिसमें वह रहता है। उसकी दीवारोंपर कैसी तस्वीरें टंगी है ? आलमारीमें

साज-सज्जा कैसी है ? सब मिलाकर वह विलासिताकी झलक देता है या सादगी

की ? ओमप्रकाश हॉस्टलमें जिस कमरे में रहते थे, उसमें कुछ पुस्तकों, आधी बाँहकी दो-एक कमीजों और दो-एक धोती और अँगोछोंके सिवा और कुछ था ही नहीं। पुस्तकोंमें पाठ्य-पुस्तकोंके अतिरिक्त अनेकों धार्मिक पुस्तकें थीं जिनमें

गीता-प्रेसके साहित्य और रामकृष्ण परमहंस तथा स्वामी विवेकानन्द आदिसे सम्बन्धित साहित्यकी प्रधानता थी। पर उनकी दीवारोंपर बीसों कार्डबार्ड लटके थे, जिनपर बड़े-बड़े अक्षरोंमें कुछ श्लोक, दोहे और उपदेशात्मक वाक्य लिखे थे। उनमें से कुछ इस प्रकार थे-

(१) चलती चक्की देख के, दिया कबीरा रोय । दो पाटन के बीच आ, साबित बचा न कोय ।।

(२) सर्व धर्मान् परित्यज्य मामेकं शरणं व्रज । अहं त्वा सर्वपापेभ्यो मोक्षयिष्यामि मा शुचः ।।

(३) भक्तका योग-क्षेम भगवान् करते हैं।

(४) मुझे किस बातकी चिन्ता है, जब कि आप मेरे हैं । हटाया दिल को दुनिया से, बने सब भाँति तेरे हैं ।।

(५) मन में लागी चटपटी, कब निरखूँ घनश्याम । नारायण भूल्यो सभी, खान-पान विश्राम ।।

(६) बैठे हैं तेरे दर पै तो कुछ करके उठेंगे । या दर्श ही हो जायेगा, या मर के उठेंगे ।।

इससे स्पष्ट है कि महाराजा हाई स्कूलमें पढ़ते समय ही उन्होंने भगवान्के चरणोंमें पूर्ण आत्मसमर्पण कर दिया था और उनका दर्शन करनेका दृढ़-संकल्प कर लिया था। उस समयकी अपनी एक कवितामें उन्होंने अपने आत्मसमर्पणका भाव बड़े सुन्दर ढंगसे व्यक्त किया था-

मैं किस खेतकी मूली ।

मेरा भार लिया जब तुमने । अपने ऊपर प्यारे ।। मुझको फिर अब क्या चिन्ता है। तुम हो सोचन हारे ।।

कहता जा सो करता जाऊँ । भला-बुरा न गिनता ।۱۱ हानि लाभकी तो है रहती। स्वामीको ही चिन्ता ।।

पाप कहे तो वह भी कर लें। कहे चढ़ जा शूली ।। पाप लगेगा कर्त्ता ही को। मैं किस खेतकी मूली ।।

भगवान् दर्शन करनेके अपने दृढ संकल्पकी बात भी उन्होंने अपनी एक वितामें व्यक्त की थी-

कानमें आवाज आयी ।

ओम तुमने आज क्यों ब्रह्माण्ड में हलचल मचायी ।।

दर्शन भी कोई खेल है।

दिल को मजबूती से रखना, अन्त तक यदि दृढ़ रहा तो । होगा बेशक पास वरना, याद रख तू फेल है ।।

ओमजी कोई फेल होनेवाले बालक थे ? फेल वही होते हैं जो कमजोर होते वे तो श्रीकृष्णपर अपना सारा भार छोड़कर उनके बलसे बली थे। तभी न होंने 'मेरी अकड़' शीर्षक यह कविता लिखी थी -

कृष्ण ! तेरे बल पर मैं अकड़ें ।

उड़ता पंछी देख मनोहर, कहूँ मैं नीचे आ जा ।

आता है या नहीं, कि तुझको वहीं आयके पकड़ें ।। कृष्ण ।।

कहूँ बादलोंसे सब मिलकर मेरे आगे नाचो ।

नाचोगे या नहीं कि तुमसे लाठी लेकर झगड़ें ।। कृष्णा ।।

सूरज चढ़ता देख गगनमें, कहूँ कि मत बढ़ आगे ।

ठहरेगा या नहीं कि तुझको वहीं आके जकड़ें ।। कृष्णा ।।

श्रीकृष्णके बलसे बली होकर ओमजी चाँद और सूरजको नहीं, श्रीकृष्ण अको ललकारनेकी सामर्थ्य रखते थे। सुनिये उनकी यह ललकार-

याद रखो तुम याद रखोगे, ऐसा तुमसे बदला लूँगा ।

कभी पकडमें आये तो मैं. सब हिसाब पूरा कर लूँगा ।।

नकहेंगा भुज पाश कठिनमें प्राण ! न फिर भगने पाओगे ।

भजन-साधना और नाम-स्मरण के प्रसंग

छलिया भूल सभी चालाकी, अपनी पल भरमें जाओगे ।।

तभी छुटोगे जब कि कहोगे, मुसका तुम जीते मैं हारा ।

उरकी धड़कन धड़कनमें मैं सुनता प्रिय संगीत तुम्हारा ।।

तुम्हें पकड़नेका कोई प्रिय ! साधन मेरे पास नहीं है।

इसीलिए क्या मनमानी, सच कहना यह बात नहीं है ।।

यही सही मैं क्यों दुःख पाऊँ, दो दिनकी ही बात रही है।

आज पवनने चुपकेसे आ, श्रवण निकट यह बात कही है ।।

बाँध तुम्हें सकती है मेरी, गरम-गरम आँसूकी धारा ।

उरकी धड़कन-धड़कनमें मैं, सुनता प्रिय-संगीत तुम्हारा ।।

ओमजीने हाई स्कूलकी परीक्षा प्रथम श्रेणीमें पास की। उनके मित्र चन्दमलजीने उनसे पूछा- 'आप फर्स्ट डिवीजनमें कैसे पास हुए ?'

उन्होंने उत्तर दिया - 'यह कोई मुश्किल बात नहीं। तुम भी फर्स्ट डिवीजनमें पास होना चाहते हो तो यह लो।' उन्होंने कॉपीमें से अपना छपाया एक चार्ट निकालकर दिया और बोले- 'इसके अनुसार कार्य करो। इससे शरीर पवित्र होगा और मन भी। मन पवित्र होनेसे आचरण स्वयं पवित्र होने लगेगा। फर्स्ट डिवीजन प्राप्त करनेके लिए बहुत पढ़नेकी आवश्यकता नहीं। आवश्यकता है सदाचारकी और ब्रह्मचर्यका पूरी तरह पालन करनेकी। इससे मेधाशक्ति बढ़ती है और थोड़ी पढ़ाई से ही बहुत-सा काम हो जाता है।'

हाई स्कूलकी परीक्षा पास कर ओमजी १५ जुलाई १९४१ को आगरे चले गये। आगरा कॉलेजमें इण्टरमीडिएट फर्स्टयिअरमें दाखिला लिया। एक बार उन्होंने चाँदमलजीसे कहा था- 'मैंने आगरा कालेजमें एडमीशन इसलिए लिया कि वहाँ गीता-क्लास होती है।'

आगरा पहुँचकर उन्होंने भगवान्‌का दर्शन करनेके अपने दृढ़-संकल्पके अनुसार अपने भजनकी गति इतनी तीव्र कर दी कि उनके साथियोंका उनके साथ कदम-से-कदम मिलाकर चलना असम्भव हो गया। वे उन्हें कोसों पीछे छोड़ गये। उस समयकी उनकी मानसिक स्थिति और उनकी भजन-पद्धतिपर प्रकाश डालते हैं उनके कुछ पत्र, जो उन्होंने अपने साथियोंको लिखे थे। उनके कुछ अंश इस प्रकार है

२-६-४१

रामकरण

तुम दो बार आये, परन्तु मैं साधनामें रत रहनेके कारण तुमसे मिल न सका। समझा होगा बाबू साहब अब अपने आगे किसीको गिनते ही नहीं। बड़े आये के साधु-महात्मा ! मुझसे इतना चिढ गये कि बात भी नहीं करना चाहते।

सो कुछ नहीं। मैं अहंकारी नहीं हो गया। मुझे बेकार बात करना अच्छा नहीं ममता। जिस अमूल्य वस्तुको प्राप्त करनेमें मैं लगा हूँ, उसके लिए मैं तुम्हें ही बड़ी-से-बड़ी वस्तुको त्याग सकता हूँ।

मैं नाम-जपका महत्त्व जान चुका है। अब एक मिनट भी उसके बिना खर्च करना चाहता। अब आओ तो ऐसे समय आना जब मैं पढ़ाई करता हूँ, पर केले आना और बहस करने या डींग हाँकने मत आना। मुझसे व्यर्थकी कोई बात करना, जैसे आजकल करते हो और मना करनेपर भी नहीं मानते। ऐसी बात झोगे तो मैं उठकर चल दूँगा।

आजकल छुटिटयाँ हैं। इसलिए मैं १८ घण्टे जप करता हूँ। और सब सामोंमें केवल ६ घण्टे देता हूँ। मेरी परिस्थिति समझकर ही मेरे पास आना।

- ओम

आगरा

२४-७-४१

प्रिय रामकुमारजी

मैं अन्य साधनोंको उपयोगी न मानकर केवल नाम-जपको ही स्त्रीष्ठ मानता हूँ। मैंने स्वयं अनुभव किया है। इसलिए विशेष जोर देता हूँ।

पहली सीढ़ी पारकर अब दूसरीपर आ पहुँचा हूँ। मुझे अपनेको पूर्णतासे भेंट करनेके बाद अब कुछ करना नहीं पड़ता। जो काम हाथमें लेता हूँ, वह आप पूर्ण है जाता है।

तुम चौबीस घण्टेमें कम-से-कम ३ घण्टे निकाल लो। नाम-जपकी ऐसी भूख कालो कि बिना जपके चैन ही न पडे, जैसे एक नशेबाजको बिना नशेके चैन नहीं हिता। यह बात मानकर मित्र चाँदमलने लाभ उठाया है।

भजन आत्माकी खुराक है। इसलिए, संकल्प करो कि नियमित भजन कभी नहीं छोडेगे और चाहे कोई बुरा माने या भला अपना समय व्यर्थ बातचीतमें खराब न करोगे; क्योंकि

विषय, भोग, निद्रा, हँसी, जगत प्रीति बहु बात । नारायण हरि भजनमें, यह पाँचों न सुहात ।।

- ओम

आगरा

१-८-४१

प्रिय रामकुमारजी

जब तक दिलमें आग नहीं लगी तब तक कोई आगे नहीं बढ़ सका। प्रेमका प्याला जब तक छलकता नहीं, तब तक भजनका आनन्द नहीं।

भगवान् तो तब प्रसन्न होते हैं, जब सब ओरसे प्रतिकूलता होनेपर भी तुम पूरी शक्ति लगाकर भजन करो। जपके आरम्भके बाद थोड़े ही दिनोंमें आपकी सब कठिनाइयाँ उड़ती चली जायेंगी, मार्ग साफ होता जाएगा। यह मैं स्वयं अपने अनुभवसे कहता हूँ। मेरी अवस्था आपसे कम खराब नहीं है। जैसे लोगोंमें मैं यहाँ रहता हूँ, वैसे लोगोंमें शायद गाँधीजी भी इग्लैण्डमें न रहे होंगे। लेकिन मैं साफ-साफ देख रहा हूँ कि जिस तरह आकाशमें हवाई जहाज चलता है, वैसे ही अपने मार्गपर मैं चला जा रहा हूँ। आप भी निर्भय होकर बढ़े।' जब दृढ़तासे नाम-जप करेंगे तो भयानक विषैले सर्प भी आपके सामने आकर झुक जायेंगे।

- ओम

आगरा

१३-८-४१

प्रिय रामकुमारजी

बहुत-सी ऐसी अनुभवकी बातें हैं, जिन्हें मैं किसीसे बता नहीं सकता। इतना अवश्य बताना चाहता हूँ कि भगवान्‌के साथ हर समय रहनेसे मैं उनकी आदत जान गया हूँ। वह यह कि भगवान् बहुत काम या विश्राम नहीं चाहते। वह तो केवल आग ही लगी देखना चाहते हैं। वे पहले तो साधकके सामने बहुत-सा काम रख देते

।। उसे देखते ही जो नाम मात्रके साधक हैं, वे पीछे हट जाते हैं। पर जो सच्चे साधक हैं, जो भगवानसे मिलनेके लिए जान हथेलीपर लिए रहते हैं, वे सहायता करते हैं। उन्हें वे रास्ते में ही फल भी देते हैं। यह एक भेदकी बात है। कठिनाइयोंकी परवाह न कर दुःख सहते हुए आगे बढ़ते जाते हैं। भगवान् उनकी

- ओम

आगरा

३०-८-४१

प्रिय रामकरणजी

दैनिक कार्य-चार्टके अनुसार करो और नाम जप नित्य पूरा करो। पढाईक अतिरिक्त जो भी समय बचे व्यर्थ खर्च न कर नाम जप करो। मैं अब तक ७४७५ माला जप कर चुका है। महामन्त्रमें १६ नाम हैं और हर मालामें १०८ दने। इस प्रकार कुल १२९१६८०० नामोंका जप हो चुका है।

मेरे ऊपर इस जपसे महान कृपाएँ होने लगी हैं। मुझपर पूरी रोशनी होनेवाली है। मेरा अगला कदम बड़ा जबरदस्त होगा। आज्ञा प्राप्त हो चुकी है। मैं बहुत हल्दी बदल रहा हूँ। इस थोड़े दिनोंमें मैं इतना बदल गया हूँ कि शायद तुम मुझे पहचान भी न पाओ। मैं प्रेमविहीन जीव आगे नहीं बढ़ सकता, पर श्रीकृष्ण स्वयं ही मेरी ओर बढ़े चले आ रहे हैं।

मैं अब तक तुम्हें सदुपदेश देता रहा। अब श्रीकृष्णपर तुम्हें छोड़ दिया। उनकी जैसी इच्छा होगी वैसा साधन तुमसे करा लेंगे।

मेरी अन्तिम प्रार्थना (रोकर, गिड़गिड़ाकर, हाथ जोड़कर, पैरों पड़कर आपसे, हर छोटे-बड़े, अच्छे-बुरे, जाने-अनजानेसे) - मैं श्रीकृष्ण-प्रेमकी भीख माँगता हूँ। पही आशीर्वाद चाहता हूँ। भीख अवश्य दें।

भिखारी

ओम

नाम-जपकी साधनाके फलस्वरूप ओमप्रकाशकी विरह ज्वाला बढ़ती गयी। थे जब पराकाष्ठापर पहुंची, उनका श्रीकृष्णके बिना जीना असम्भव हो गया। वह

जीवन किस कामका जिसमें श्रीकृष्ण-सुधारूपी संजीवनी निरन्तर पान करने और उनकी रसमयी लीलाओंमें योग देनेका सौभाग्य न हो। उन्होंने श्रीकृष्ण-विहीन जीवनको अनशन द्वारा समाप्त करनेकी ठान ली। रामकरणजीको अपने ३०-८० ४१ के पत्रमें उन्होंने यह कहकर इसका संकेत किया कि 'मेरा अगला कदम बड़ा जबरदस्त होगा।' उन्होंने यह भी संकेत किया कि इसके लिए उन्हें श्रीकृष्णको आज्ञा प्राप्त हो चुकी है।

२० सितम्बर १९४१ से उन्होंने भोजन छोड दिया। २६ सितम्बर १९४१ को वृन्दावनमें यमुना किनारे अक्रूर घाटसे भी कुछ आगे चामडदेवीके निकट सुनसान स्थानमें शरीर त्याग देनेके उद्देश्यसे चले गये। जानेके पूर्व उन्होंने तीन पत्र लिखे, जिनके कुछ अंश यहाँ उद्धृत हैं-

(पहला पत्र भ्राता विष्णुनारायणजीके नाम)

आगरा

ता० २६-९-४१

प्रिय भाई साहब,

...मैं अब संसार त्यागकर जा रहा हूँ।' आप श्रीकृष्ण-प्राप्तिका मुझे आशीर्वाद दें। मेरी यही प्रार्थना है कि आप भी नामका खूब जप करें। जब नाम-जप करेंगे तो भगवान् स्वयं समय-समयपर आपको उपदेश करते चलेंगे।

- ओम

(दूसरा पत्र घरके सब लोगोंके नाम)

सबके चरणोंमें प्रणाम्,

......मेरी केवल यही अभिलाषा है कि श्रीकृष्णकी सखा-मण्डलीका एक सदस्य बनकर उनकी लीलाओंका वैसा ही आनन्द प्राप्त करूँ, जैसा गोप और गोपियोंने किया था। श्रीकृष्ण अब भी हर क्षण मेरे साथ रहते हैं और मेरा हर काम उनकी आज्ञासे होता है। लेकिन, अब केवल इतनेसे तसल्ली नहीं होती।...

मेरी अभिलाषा जानकर प्रभुने ध्यानमें मुझसे इन्हीं गर्मियोंकी छुट्टीमें कहा था - तुम जैसा आनन्द चाहते हो वैसा एक महीनेके अन्दर सम्भव है, यदि एक परीक्षाके लिए तुम तैयार हो जाओ तो, लेकिन वह केवल एक राय थी, आज्ञा नहीं।

मैंने परीक्षा देने के लिए आप लोगोंसे पूछा, तो आप लोग डर गये और आपने सम्मति नहीं दी। मैं समझ गया कि आप लोगोंके बीचमें रहकर मैं यह कार्य पूरा गी कर सकता, इसलिए मैंने विचार छोड़ दिया। पर हृदयमें आग सुलगती रही। आत्मा कहती रही कि तूने एक बहुत बड़ा मौका हाथसे खा दिया, श्रीकृष्णको कृपाको ठुकरा दिया, पर श्रीकृष्णकी कृपा सीमाबद्ध नहीं। उन्होंने जब देखा कि रायका कुछ असर नहीं हुआ, तो प्रेमपूर्वक आज्ञा दी। अब मुझे बह्माण्डको सारी शक्तियाँ भी परीक्षा देनेके मेरे निश्चयसे मुझे नहीं हटा सकती, क्योंकि स्वयं श्रीकृष्ण मेरे साथ हैं। बस ।

'मैं चला ढूँढ़ने तुमको प्रिय तुम्हें साथमें लेकर।'

परीक्षा क्या है ? यह मुझे मालूम है, पर बतानेकी बात नहीं। इतना अवश्य संकेत कर सकता है कि जहाँ श्रीकृष्णको छोडकर मेरा कोई न हो, जहाँ कोई यह पूछे- तुमने कुछ खाया या नहीं ? तुम सोये या नहीं ? बस वहाँ मेरी परीक्षा होगी। परीक्षा भी ऐसी मजेदार होगी कि परीक्षक परीक्षार्थीकी प्रतिक्षण मदद करेगा, या यूं कहें कि परीक्षक स्वयं परीक्षा देगा। परीक्षार्थी तो निमित्त मात्र रहेगा।

मेरी यह बात सुनकर मोहके कारण आप लोग घबड़ाये। कोई कहेगा यह पागल हो गया है, कोई कहेगा किसीके बहकायेमें आ गया है। पर आप लोग धैर्य धारणकर शान्त रहकर देखें कि क्या होता है। कहीं अपनी ऊटपटाँग बातोंसे सदाके लिए मुझसे हाथ न धो बैठें। यदि आप मोहसे ग्रसित हैं तो मेरे महान शत्रु हैं। अपने सुखके कारण मेरी अधोगति चाहते हैं। मैं माता, पिता, भाई, बन्धु उसीको समझता हूँ, जो अपने क्षणिक सुखके कारण पुत्रको अमर पदसे वञ्चित न करे।..

परीक्षा, धैर्य और वैराग्य का प्रसंग

मुझे केवल यही कहना है कि आप लोग दुःख न करें न मुझे खोजें। मुझे व्रतसे हटाना श्रीकृष्णकी आज्ञाका विरोध करना होगा।

एक पत्र रामकुमारजीके लिए भी भेज रहा हूँ। यह उन्हें अवश्य दे दें और भगवान्से मेरे लिए यों प्रार्थना करें-'हे प्रभु! हम अपने बच्चेको आपके चरणोंमें अर्पण करते हैं। आप अपने इस शरणागतकी रक्षा करें।...

(तीसरा पत्र रामकुमारजीके नाम)

आगरा

२६-९-४१

प्रिय भाई साहब रामकुमारजी

आप दिव्य वृन्दावनके उस आनन्दसे अपरिचित हैं, जो वहाँ निरन्तर बरस रहा है। साधारण नेत्रोंसे उसे देखा नहीं जा सकता। मैने नाम-जपके प्रभावसे और ही नेत्र पाये हैं। उन्हीं नेत्रोंसे देख सका हूँ। उस आनन्दके आगे अब दुनिया अच्छी नहीं लगती।

मैंने बिना भोगे ही उन विषयोंको ठोकर मार दी है, जिनमें आप फँसे हैं। मेरा यह त्याग उस लकड़हारेका-सा है जिसने राज्यकी प्राप्तिके लिए कुल्हाड़ी का त्याग किया।

'प्राण दिये सों हरि मिलें तौ लै लीजौ दौर । ना जाने या बीचमें ग्राहक आवै और ।।'

बहुत सस्ता सौदा है। बस अब बिदा। जा रहा हूँ सदाके लिए।

- ओम

ओमप्रकाशजीके भाई-बन्धु, माता-पिता सब इन पत्रोंको पढ़कर बेहद चिन्तित हुए। सबने आगरा, मथुरा और वृन्दावनके पास जहाँ-तहाँ उन्हें ढूँढ़ने की चेष्टा की, पर कहीं उनका पता न चला।

ओमजीको यमुना-किनारे उस निर्जन स्थानमें निराहार भजन करते एक महीना हो गया। एक महीने बाद साहू बाबा नामक एक किसानके कानमें दूरसे किसीके 'हा कृष्ण ! हा कृष्ण!' कह रोनेकी आवाज आई। आवाजका पीछा करते हुए वह ओमजीके पास पहुँचा। पूछा- 'क्यों रो रहे हो बेटा ? तुम्हें क्या कष्ट है ?

'मुझे कोई कष्ट नहीं। केवल श्रीकृष्णके दर्शन न मिलनेका कष्ट है। मैंने उनके दर्शन न मिलने तक अनशन करनेका व्रत लिया है।' ओमप्रकाशजीने उत्तर दिया।

किसान ओमप्रकाशकी बात सुनकर अवाक् ! उसने बहुत समझा-बुझाकर उनका व्रत तोड़वानेकी चेष्टा की, पर उसे सफलता न मिली। धीरे-धीरे सारे वृन्दावन और मथुरामें यह बात फैल गयी। चारों ओरसे लोग ओमप्रकाशके दर्शन करने आने लगे। यमुनातटका वह निर्जन स्थान अब कोलाहलसे परिपूर्ण हो गया।

टंगवा दिया, जिसमें लिखा था-फैसकी कुटिया बनवा दी, जिसमें वे रहने लगे। कुटियाके बाहर उन्होंने एक बोर्ड ओमजीके भजनमें बाधा पडने लगी। प्रभुकी प्रेरणासे किसीने उनके लिए एक

'मैं दर्शन देने योग्य नहीं। आप लोगोंक शोर-गुलसे मेरे भजनमें विघ्न होता है। आप यहाँ न आया करें। एकान्तमें मेरा मनोरथ शीघ्र सफल होगा। आप मुझे आशीर्वाद दें।'

मथुरामें ओमप्रकाशके चाचा रहते थे। वे भी आये। उनसे उन्होंने कहा- 'चाचाजी अब आप टोंक तो चिट्ठी लिखेंगे ही। कृपाकर माताजी और पिताजीको लिख दें कि यदि वे मेरा कल्याण चाहते हैं तो यहाँ न आएँ। माताजी मेरी हालत देख नहीं सकेंगी। मुझे व्रत तोडनेको मजबूर करेंगी। फिर मैं कहींका भी न रहूँगा।'

उन्होंने ऐसा ही किया।

शीघ्र ओमप्रकाशके भ्राता श्रीविष्णुनारायण और उनके मित्र टोंकसे आ गये। उस दिन व्रतका ५४ वाँ दिन था उनकी दुर्बलता देख विष्णुनारायण रो पड़े। उन्होंने थोड़ा दूध लेनेका आग्रह किया, तब ओमप्रकाशने कहा- 'इस दुनियाका एक बूँद भी दूध पीनेसे मेरा करा-धरा सब मिट्टीमें मिल जायेगा। दूध तो मैं श्रीकृष्णकी कामधेनु गायका ही पियूँगा, जब वे स्वयं अपने हाथसे पिलायेंगे।'

तुमने ऐसा कठोर व्रत क्यों लिया ? क्या भगवान्‌को प्राप्त करनेका दूसरा कोई साधन नहीं है ?' विष्णुनारायणजीने पूछा।

'मैं क्या करूँ श्रीकृष्णकी यही आज्ञा है' ओमजीने उत्तर दिया।

'तुम्हारे पास केवल एक कम्बल है। और न कुछ ओढ़नेको है, न बिछानेको। यहाँ यमुना किनारे ठण्ड बहुत है। तुम अपने साथ और कपड़े क्यों नहीं लाये ?'

'श्रीकृष्णकी आज्ञा प्राप्त होते ही मैं जैसा बैठा था, वैसा ही चला आया। केवल एक श्रीकृष्णका चित्र, चश्मा और माला अपने साथ लाया। सो चश्मा और चित्र कोई उठा ले गया। एक दिन ठण्ड बहुत लग रही थी। जब रातको आँखे खुलीं तो यह कम्बल बिछा पाया। अब श्रीकृष्णकी कृपासे मुझे न ठण्ड लगती है, न भूख और न निद्राही मुझे सताती है। मैं हर समय जप करता हुआ श्रीकृष्णके ध्यानमें तल्लीन रहता हूँ। मुझे किसीसे बातें करना भी अच्छा नहीं लगता।'

'तुम दुर्बल बहुत हो गये हो। बोलनेमें भी तो कष्ट होता होगा।'

'दुर्बल तो मैं शरीरसे ही हो रहा हूँ। मुझे जो आत्मबल प्राप्त हो रहा है, इसे आप इन आँखोंसे नहीं देख सकते।'

व्रतके ६० वें दिन चान्दमलजी आये। उन्होंने उनके मुखपर ऐसा तेज देखा, जिसे देख कोई नहीं कह सकता था कि उन्होंने ६० दिनसे कुछ खाया नहीं हैं। उन्होंने पूछा- 'आपका साधन कब तक और चलेगा ?'

ओमजीने कहा- 'मेरी परीक्षा तो खत्म हो चुकी है। परीक्षामें उत्तीर्ण भी हो चुका हूँ। परीक्षाफल दो-चार दिनमें निकलनेवाला है।... मेरी नाव पार पहुँच गयी है। पर तुम सँभल कर रहना। तुम्हें अभी बहुत कुछ करना है।'

श्रीहरि बाबा और व्रजके अन्य महात्माओंने भी अन्त तक बहुत चेष्टा की ओमप्रकाशको समझा-बुझाकर उनका व्रत छुड़वानेकी, पर वे सभी असफल रहे।

श्रीनारायण स्वामीके प्रति ओमप्रकाशजी गुरु-बुद्धि रखते थे; क्योंकि उनकी लिखी पुस्तक 'एक सन्तका अनुभव', जो गीता प्रेससे प्रकाशित हुई थी, पढ़कर और उसमें लिखी रीतिसे साधना कर उन्हें बड़ा लाभ हुआ था। उनके दर्शन करनेकी उनकी लालसा अभी तक पूरी नहीं हुई थी। दैवयोगसे वे भी इसी समय वृन्दावन आ गये। और ओमप्रकाशका सारा वृत्तान्त सुन वे भी उनके पास गये और उनसे व्रत तोड़ देनेको कहा। ओमजीने उनसे पूछा- 'यह आप राय दे रहे हैं, या आज्ञा ? यदि आज्ञा दे रहे हैं तो मुझे स्वीकार है, पर भगवान्‌की आज्ञा इसके विरुद्ध है।'

'भगवान्‌की आज्ञाके विरुद्ध मैं आज्ञा नहीं दे सकता। केवल अपनी राय दे सकता हूँ।'

इतना कह नारायण स्वामी चले गये। व्रतके ६९वें दिन एक सज्जनने ओमजीसे कहा- 'नारायण स्वामीको आप गुरु मानते हैं, तो उनकी राय भी उनकी आज्ञाके तुल्य है। उसे न मानकर आप उनकी अवज्ञा कर रहे हैं। आपको ऐसा नहीं करना चाहिए।'

'अच्छा, तो नारायण स्वामीजी कल प्रातः अपने हाथसे मुझे दूध पिला सकें तो पिला दें।' ओमजीने तत्काल उत्तर दिया।

सब लोग यह सुनकर बहुत प्रसन्न हुए। नारायण स्वामीको सूचना दी गयी। वे दूसरे दिन प्रातः ओमप्रकाशजीके सामने ही गायका ताजा दूध दुहाकर उन्हें पिलानेकी व्यवस्था करने लगे। वृन्दावनमें द्रुतगतिसे यह खबर फैल गयी। सबेरा

भक्त ओमप्रकाशको दूध पीते हुए दर्शन करने। येते ही लोगोंकी भीड़ अकुर घाटकी ओर जाने लगी ६९ दिनके उपवासके पश्चात्

पर, उनके और नारायण स्वामीके वहाँ पहुँचनेके पूर्व ही ओमजी अपना व्रत पूरा कर चुके थे। नारायण स्वामीकी जगह शायद नन्दलाल उन्हें अपने हाथसे अपने कामधेनुका दूध पिलाकर अपने धाम ले जा चुके थे।

ओमजीकी भगवत्प्राप्तिके सम्बन्धमें कुछ लोग शंका करते हैं। उनका कहना है कि भगवान् हठसे नहीं प्रेमसे मिलते हैं। हठीसे वे दूर रहते हैं, प्रेमीके अधीन रहते हैं। प्रेमी 'माम एकं शरगं ब्रज' वाली उनकी बात मानकर, उनके प्रति पूर्णरूपसे अपने आपको समर्पित कर, उन्हें अपने आप उसकी प्रेमरज्जूमें बँध जानेको विवश करता है। हठी अपनी बात उनसे मनवाकर, उन्हें अपने प्रति समर्पित करवाकर, उन्हें जबरदस्ती बाँध लेनेकी चेष्टा करता है। भगवान् इतने सस्ते नहीं, जो किसीके हठसे मिल जाये। हठ करना आसान है, प्रेम करना कठिन है।

पर ओमप्रकाशका हठ कोरा हठ नहीं था। उसके पीछे उनकी नाम-साधना थी और उनका प्रेम। उनका हठ उनके प्रेमका ही परिणाम था। वे श्रीकृष्ण-प्राप्तिकी तीव्र उत्कण्ठाके कारण अपना धैर्य खो बैठे थे। जैसे भी हो श्रीकृष्णको तत्काल पा लेनेके लिए बेचैन हो उठे थे।

शंकाका विषय ओमप्रकाशकी भगव‌द्माप्ति इतना नहीं है, जितना उनके प्रति श्रीकृष्णकी अनशन करनेकी आज्ञा। यदि ओमप्रकाशने स्वयं अपने पत्रोंमें और वरिष्ठ व्यक्तियोंसे अपनी बात-चीतमें गम्भीरतापूर्वक इसका स्पष्ट उल्लेख न किया होता, तो हमारी यह शंका स्वाभाविक होती। भक्तवत्सल, करुणा-मूर्ति भगवान्की अपने भोले-भाले बाल-भक्तके प्रति यह कैसी आज्ञा ! पर ओमप्रकाशजीकी इस सम्बन्धमें अपनी उक्तियोंके रहते इसपर शंका करनेका कोई अवकाश नहीं रहता। कम-से-कम यह तो मानना ही पड़ता है कि ओमप्रकाशने सच्चे हृदयसे भगवान्की आज्ञा मानकर ही अनशन किया। भले ही उन्होंने भगवत्प्राप्तिकी अपनी प्रबल आकांक्षाके फलस्वरूप अपने आत्माको ही श्रीकृष्णकी आवाज समझ लिया हो, जो उनके जैसे तन-मनसे समर्पित साधककी स्थितिमें स्वाभाविक थी।

जो भी हो, इस बालभक्तने प्रभुमें अटल विश्वास, उनके लिए सर्वस्व त्याग और उनकी प्राप्तिके साधनमें दृढ़ताका जो आदर्श उपस्थित किया उससे साधक अवश्य प्रेरणा ग्रहण करेंगे। भजन-साधनमें इस प्रकारका दृढ़व्रती होना अपने-आप में साधककी सर्वोच्च अवस्थाका द्योतक है। गीता में भगवान् श्रीकृष्णने कहा है-

येषां त्वन्तगतं पापं जनानां पुण्यकर्मणाम् ।

ते द्वन्द्वमोहनिर्मुक्ता भजन्ते मां दृढव्रताः ।। (गीता ७-२८)

जिन पुण्य कर्मोंको करनेवाले पुरुषोंका पाप नष्ट हो गया है और जो रागद्वेषादि द्वन्द और मोहसे मुक्त हो गये हैं, वे ही दृढ़व्रती होकर मेरा भजन करते हैं।

नाम-स्मरण और एकाग्रता — जीवन-संदेश

नाम-स्मरण, भजन और एकाग्रता के प्रसंग साधना की निरंतरता की याद दिलाते हैं। यहाँ वर्णित जीवन-अनुभवों से पाठक अपनी साधना के लिए प्रेरणा ले सकते हैं।

कथा का सार

बालभक्त श्रीओमप्रकाश की कथा भक्ति, विनम्रता और साधना पर मनन करने का अवसर देती है। इस संग्रह में अन्य भक्तों के जीवन-प्रसंग भी पढ़ें।