ब्रज के भक्त भाग 2 · अध्याय 5
स्वामी श्रीस्वामिनीशरणजी
स्वामी श्रीस्वामिनीशरणजी की प्रेरक हिंदी कथा। जानिए उनके जीवन, भक्ति और साधना से जुड़े महत्वपूर्ण प्रसंग।

स्वामी श्रीस्वामिनीशरणजी का यह भक्त-चरित्र ब्रज की साधना, श्रद्धा और जीवन से जुड़े प्रसंगों को सामने लाता है। नीचे कथा को अलग-अलग विषयों में व्यवस्थित किया गया है।
दिव्य अनुभूति और कृपा के प्रसंग
[ मोरकुटी, बरसाना ]
जिस समय स्वामी भगवानदासजी टटिया-स्थानमें भजन करते थे, उसी समय बरसानेमें श्रीजीके मन्दिरके निकट पहाड़ीकी चोटीपर 'मोरकुटी' नामकी एक छोटी-सी कुटियामें श्रीकृष्णदासजीके शिष्य और टटिया-स्थानके महन्त
श्रीराधाप्रसादजीके प्रशिष्य श्रीस्वामिनीशरणजी भजन करते थे। यह कल्पना करना मुश्किल है कि इस निर्जन कुटीमें, जिसके निकट जलकी कोई व्यवस्था नहीं है. और जो पक्की ईंटोंकी बनी होनेके कारण और चारों ओर पथरीली पहाडीसे घिरी मैके कारण गर्मीमें भट्टीकी तरह तपती है. कोई रह सकता है। पर, इस कुटीके कारण इसका नाम 'मोरकूटी' पडा है। सम्भवतः वह मधुर स्मृति ही पीछे इस स्थानपर घटी श्यामा-श्यामकी एक मधुर लीलाकी स्मृति है, जिसके स्वामिनीशरणजीके मन और प्राणको शीतल कर उन्हें कुकूटीकी तपनको सहन करनेके योग्य बनाती रही होगी।
लीला इस प्रकार है। श्यामजीने एक मोर पाला। उसे नृत्यकी शिक्षा दी। एक दिन वे श्यामसे बोलीं- 'प्यारे, एक बात कहूँ, करोगे ?'
'नहीं करनेका प्रश्न ही कहाँ प्यारी' प्यारेने उत्तर दिया।
'तो तुम मेरे मोरके साथ नृत्य करो, देखें कौन अधिक अच्छा नृत्य करता
'अच्छा, तो बताओ हमारे दोनोंके बीच मध्यस्थ कौन होगा ?'
'मध्यस्थ ललिता होगी।'
'तू निष्पक्ष रहेगी ?' श्यामने ललिताकी ओर मुड़कर उससे पूछा।
'हाँ प्यारे, बिलकुल निष्पक्ष', ललिताने उत्तर दिया।
'तो ठीक है, मैं तैयार हूँ' श्यामने अपनी फेंट कसते हुए कहा।
श्यामाजीने मोरपर अपना हस्त-कमल रखा। हस्त-कमलका स्पर्श पाते ही ३ नाचने लगा। श्यामने भी नाचना शुरू किया। कोकिलने अलापना और पपीहेने सुर मिलना शुरू किया। मेघ गरजकर मृदंग बजाने लगा। दामिनी दमक-दमककर कनीमें दीप दिखाने लगी। तभी श्यामाने नृत्यसे रीझ श्यामको हँसते-हँसते कण्ठसे लगा लिया-
नाचत मोर संग श्याम, मुदित श्यामाहि रिझावते ।
तैसिय कोकिल अलापत, पपहिया देत सुर ।
तैसोंइ मेघ गरज मृदंग बजावत ।
तैसिय श्याम घटा निशि-सी कारी ।
तैसिहँ दामिनी कौंधै दीप दिखावत।
श्रीहरिदासके स्वामी श्यामा रीझ श्याम हँसि कण्ठ लगावत ।।
श्यामने ललितासे कहा- 'बता सखी, किसका नृत्य अच्छा ?' ललिताने कहा- 'प्यारे, तुम्हारा भी अच्छा, मोरका भी अच्छा। पर, मोरने एक फिरकैयां तुमसे अधिक दी।'
इस प्रकार श्यामकी हार हो गयी। उनका मुख कुछ उदास हो गया। पर जब श्यामाने उन्हें कण्ठसे लगाया तो वह खिल गया।
श्यामा-श्यामकी इस लीलाका स्मरणकर स्वामिनीशरणजी हर समय 'श्यामा-खाने-पीनेकी भी सुध उन्हें मुश्किलसे रहती। जिह्वाके स्वादकी तो वे परवाह ही न श्याम, श्यामा-श्याम' रटते हुए कुटीमें भजन करते। वे हर समय आवेशमें रहते। करते। भिक्षामें जो मिल जाता एक साथ मिलाकर पका लेते। जिह्वा बस 'श्यामा-श्याम' नामके रसका आस्वादनकर छकी रहती। जीवनके अन्तिम १३ वर्ष उन्होंने अन्न बिना ही बिताये। उन दिनों वे केवल छाछ और फलपर रहते। फिर भी उनमें इतना बल था कि अपने कन्धेपर रखे एक बाँसके दोनों सिरोंपर दो पानीसे भरे बडे मटके लटकाये पहाडीपर स्वछन्द इस प्रकार चढे चले जाते. जैसे उनके ऊपर कोई भार ही न हो। एक बार उन्हें एक जहरीले साँपने काट लिया, पर उनपर उसका कोई असर न हुआ।
सेवा, प्रसाद और समर्पण की घटनाएँ
अपनी कुटियामें वे कुछ चना-चबैना, गुड़ और मूँगफली अवश्य रखते, जिससे अभ्यागतोंकी सेवा करते। एक बार उनकी कुटियामें चोर आये। बाबाने उनसे कहा- 'भैया, मेरे पास चना-चबैना छोड़ और है ही क्या ? फिर जो है सो तुम्हारा ही है। तुम जो चाहो सो ले जाओ। इसमें संकोचकी क्या बात है ?'
चोर गुड़, मूँगफली और चनेकी हड़िया तो खालीकर ही गये, उनका लोटा, बाल्टी और कम्बल आदि, जो भी दीखा सब ले गये। दूसरे दिन उन चोरोंके घर भी चोरी हो गयी। तब उन्हें बड़ा पश्चाताप हुआ। उन्होंने बाबाके पास जाकर दण्डवत् की और उनसे क्षमा माँगी। बाबाने कहा- 'क्षमा किस बातकी भाई ? वह सब तो मैंने ही तुम्हें दिया था। तुम जबरदस्ती थोड़े ही ले गये थे। अब उसे चोर ले गये तो ले जाने दो। चिन्ता क्या है ? श्रीजी बड़ी कृपालु हैं, और देंगी।'
पण्डित रामकृष्णदास बाबा स्वामिनीशरणजीके गुणोंसे मुग्ध थे। कभी-कभी स्वामिनीशरणजी वृन्दावन जाकर पण्डित बाबाके निवास स्थान दाऊजीकी बगीचीके निकट 'बाराद्वारी' नामके निर्जन स्थानमें रहते थे। उस समय दोनोंका एक-दूसरेके स्थानपर जाकर मिलना-बैठना और इष्ट-गोष्ठी होता था। श्रीहित स्वामिनीशरणजी
एक बार कलकत्तेके एक सेठ पण्डित बाबाके दर्शनको गये और बहुतसे फलफूल उन्हें अर्पण किये। वे मधुकरी छोड़कर और कोई वस्तु, विशेष रूपसे अस्वीकार कर दी। तब सेठ स्वामिनीशरणजीके पास गये और उन्हें वही फल भेंट के बाहर के किसी व्यक्तिकी वस्तु, ग्रहण नहीं करते थे। इसलिए उन्होंने वह भेंट किये। उन्होंने उन्हें ग्रहणकर प्रेमसे ठाकुरका भोग लगाया। दैवयोगसे थोडी देर बाद पण्डित बाबा वहाँ पहुँच गये। पण्डित बाबाको उन्होंने प्रसाद रूपमें उसीमें से कुछ
फल देते हुए कहा- 'यह आज कलकत्तेके एक सेठ लाये थे।' बाबाने उन्हें स्वीकार कर लिया। किसीने उनसे कहा- 'यही फल तो आपने पहले लौटा दिये थे।'
बाबाने कहा- 'मैंने सेठके फल लौटाये थे, पर यह तो एक सन्तका प्रसाद है जो मैंने ग्रहण किया है।'
यह प्रसिद्ध है कि स्वामिनी शरण बाबाको मोरकूटीपर ललिताजीके दर्शन हुए थे। उनकी कुटियामें उन्हें दर्शन देते हुए ललिताजीका एक चित्र भी रहा करता था।
टटिया-स्थानके मुखिया श्रीनवेलीशरणजी, श्रीअमोलकराम शास्त्री, श्रीलक्ष्मीदासजी मौनी और श्रीव्रजवासिनदासजी जैसे महात्मा उनके शिष्य थे।
गुरु-सान्निध्य और आध्यात्मिक शिक्षा
ऊँच-नीच, भले-बुरे सबमें अपने इष्टका अधिष्ठान जान श्रीस्वामिनी शरणजी सबसे एक-सा प्रेम करते थे। निन्दा किसीकी नहीं सुनते थे। पण्डित रामकृष्णदास बाबाको जब उनके निकुञ्ज पधारनेका संवाद मिला, तो उन्होंने कहा- 'जगत्से समताका जहाज उठ गया।' श्रीहित स्वामिनीशरणजी
[ वृन्दावन ]
श्रीहित स्वामिनीशरणजीका जन्म काशीके निकट रामगढ़में हुआ। पिताजी राम-उपासक थे, इसलिए उनपर भी प्रारम्भिक संस्कार राम-भक्तिके पड़े। १० वर्षकी अवस्थामें वे श्रीभगवान्के दर्शन करनेके उद्देश्यसे घरसे निकल पड़े। १२ वर्ष तक वन-प्रान्तोंमें भ्रमण करते हुए 'सियाराम' नामका उच्चारण करते रहे। २२ वर्षकी आयुमें वे व्रज पहुँचे। वहाँ रासलीला देखकर बहुत प्रभावित हुए।
उनके हृदय-पटलपर सियारामकी जगह राधा-कृष्णने ले ली। वे बरसाने जाकर भजन करने लगे। १२ वर्ष तक बरसाने रहे।
बरसानेमें राधारानीके सान्निध्यमें भजन करते-करते अन्तमें उनकी अनन्य निष्ठा हो गयी। वे राधावल्लभ सम्प्रदायमें विधिवत् दीक्षा लेकर राधाजीको ऐकान्तिकी भक्ति करनेकी बात सोचने लगे। राधावल्लभ सम्प्रदायमें छोटी सरकारके गोस्वामी श्रीमोहनलालजीके प्रति वे विशेष रूपसे आकर्षित हुए और उनसे दीक्षा देनेकी प्रार्थना की।
गोस्वामीजी राधामें उनकी अनन्य निष्ठा देखकर प्रसन्न हुए और उन्हें दीक्षा देकर राधावल्लभीय उपासनामें परिनिष्ठित किया।
राधावल्लभ सम्प्रदायमें राधानामकी उपासनाकी विशिष्टता है। राधानामको साक्षात् राधाका रूप मानकर उनकी वैसे ही सेवा-पूजा की जाती है, जैसे श्रीविग्रहकी की जाती है। स्वामिनीशरणजीने अविचलरूपसे राधा-नाम-की उपासना की। कहते हैं कि श्री राधाके विरहमें उनके वक्ष-स्थलपर राधा-नाम प्रकट हो गया, जिसे सभी लोग देखकर चमत्कृत हुए।
राधा-नाम वे तमाल-वृक्षकी सूखी डालपर लिखकर भक्तोंको सेवा-पूजाके लिए दिया करते। उन्होंने जयपुरमें विशेषरूपसे राधा-नामका प्रचार किया। जयपुरके श्रीसरसमाधुरीजीसे उनका घनिष्ट सम्बन्ध था। आज भी जयपुरमें उनके बहुत-से भक्त हैं, जो प्रतिवर्ष उनकी जन्म तिथि पौष शुक्लपक्ष द्वितीयापर ७ दिनका उत्सव बड़ी धूमधामसे मनाया करते हैं।
एक बार मदनटेरके निकट नन्दरामजीके बगीचेमें उनकी कुटियापर चोर आये। वे उस समय कुटियाके बाहर जा खड़े हुए और बोले- 'कुटियामें सब कुछ तुम्हारा है। वाणीग्रन्थ छोड़कर और जो चाहो ले जाओ।' चोर सब ले गये, पर वाणी-गन्थ को उन्होंने स्पर्श भी नहीं किया।
उन्होंने 'हितानन्द-सागर' आदि कुछ ग्रन्थोंकी रचना की। जिनमें है हितस्वामिनी-पच्चीसी', 'हितचालीसा' और कुछ फुटकर पद प्रकाशित हैं।
उनके बहुत-से शिष्य हुए, जिनमें श्रीसन्तदासजीका नाम विशेष रूपसे उल्लेखनीय है।
प्रेम और भक्ति — जीवन-संदेश
ईश्वर-प्रेम की अनुभूति भक्त-साहित्य का एक महत्त्वपूर्ण विषय है। इन प्रसंगों को श्रद्धा, संवेदनशीलता और समर्पण के संदर्भ में पढ़ा जा सकता है।
कथा का सार
स्वामी श्रीस्वामिनीशरणजी की कथा भक्ति, विनम्रता और साधना पर मनन करने का अवसर देती है। इस संग्रह में अन्य भक्तों के जीवन-प्रसंग भी पढ़ें।