ब्रज के भक्त भाग 2 · अध्याय 1
श्रीसखीचरणदास बाबाजी
श्रीसखीचरणदास बाबाजी की प्रेरक हिंदी कथा। जानिए उनके जीवन, भक्ति और साधना से जुड़े महत्वपूर्ण प्रसंग।

श्रीसखीचरणदास बाबाजी का यह भक्त-चरित्र ब्रज की साधना, श्रद्धा और जीवन से जुड़े प्रसंगों को सामने लाता है। नीचे कथा को अलग-अलग विषयों में व्यवस्थित किया गया है।
जन्म, परिवार और प्रारम्भिक जीवन
[ राधाकुण्ड ]
मणिपुर प्रान्तके लोगोंका व्रजसे विशेष सम्बन्ध रहा है। राधाकुण्डमें बहुत दिनों तक मणिपुरिया महात्माओंकी ही प्रधानता रही है। आज भी यहाँ बहुत-से भजननिष्ठ मणिपुरिया महात्मा भजन करते हैं।
इसका एक इतिहास है। श्रीनरोत्तम ठाकुर महाशयके समयसे मणिपुरके राजा और प्रजा श्रीमन्महाप्रभुके सम्प्रदायकी नरोत्तम ठाकुर महाशयकी शाखाके अनुगत रहे हैं। अँग्रेज जब भारतमें अपने प्रभावका विस्तार कर रहे थे, उस समय श्रीकुलचन्द्र महाराज मणिपुरके राजा थे। वे भी गौड़ीय भक्त थे। वे बड़े पराक्रमी थे। आक्रमणकारी अँग्रेज सेनाओंको उनके सामने कई बार मुँहकी खानी पड़ी थी। अन्तमें उन्हें पराजित करनेके लिए उन्हें एक चाल चलनी पड़ी थी। वे जानते थे कि राजा गो-भक्त हैं। किसी परिस्थितिमें भी गो-हत्या करना उनके लिए सम्भव नहीं। इसलिए, उन्होंने अन्तिम बार गाय-बछड़ोंके समूहको आगे कर उनके ऊपर आक्रमण किया। उन्होंने गो-हत्या करनेके बजाय पराजय स्वीकार की। अँग्रेज उन्हें और उनके कर्मचारियोंको बन्दी बनाकर दिल्ली ले गये।
राजासे अँग्रेजोंने पूछा- 'आप कहाँ रहना पसन्द करेंगे ?' उन्होंने राधाकुण्डमें रहनेकी इच्छा प्रकट की। तभी अंग्रेजोंने राधाकुण्डमें गोपकुआँके पास राजाके रहनेके उपयुक्त एक मकान और मन्दिरका निर्माण कर दिया। राजा अपने कुछ कर्मचारियोंके साथ वहाँ रहने लगे। तभीसे राधाकुण्ड मणिपुरी भक्तोंके लिए भजनका प्रमुख स्थान बन गया।
मणिपुरके बहुतसे परिवारोंमें अब भी यह प्रथा है कि १०-१२ वर्षकी अवस्थामें ही वे अपने बालकोंको श्रीनरोत्तम ठाकुर महाशयके परिवार में दीक्षित करा देते हैं। श्रीसखीचरण बाबाके साथ भी ऐसा ही हुआ। वि० संवत् १९४२ फाल्गुनी कृष्णपक्ष त्रयोदशीको उनका जन्म हुआ। जब वे १०-१२ वर्षके थे. उनके माता-पिताने उन्हें श्रीनरोत्तम ठाकुर महाशयके परिवारके किसी व्यक्तिसे दीक्षित करवा दिया। पर उनके साथ यह घटना एक लौकिक रीतिके रूपमें ही घटकर नहीं
लिया। तभीसे उन्हें उसके लिए उपयुक्त समयकी प्रतीक्षामें श्रीनरोत्तम ठाकुरका यह रह गयी। उन्होंने तभी घर-द्वार छोड वृन्दावन जाकर भजन करनेका निश्चय कर पद बार-बार गाते सुना जाने लगा
आर की ए मन दशा हब। सब छाडि वृन्दावन जाब ।। आर कबे श्रीरासमण्डले । गड़ागड़ि दिब कुतूहले ।। आर कबे गोवर्धन गिरि । देखिब नयनयुग भरि ।। श्यामकुण्डे राधाकुण्डे स्नान । करि कबे जुड़ाव परान ।। हइब निरमले ।। आर कबे जमुना जले । मज्जने साधु संगे वृन्दावन बास । नरोत्तमदास करे आश ।।
'हाय! कब मेरी वह दशा होगी, जब मैं सब छोड-छाड़ वृन्दावन जाऊँगा ) कब रासमण्डलमें जाकर लोटा-पीटा करूंगा ? कब गिरि गोवर्धन नयनभर दर्शन करूँगा? कब श्यामकुण्ड और राधाकुण्डमें स्नानकर प्राणोंको शीतल करूंगा ? कब यमुनामें स्नानकर निर्मल होऊँगा ? कब साधु-जनोंके साथ श्रीवृन्दावन-वासकी मेरी आशा पूर्ण होगी ?'
तभीसे वे वृन्दावनमें वैराग्याश्रम ग्रहणकर भजन करनेके उद्देश्यसे वैराग्यका अभ्यास भी करने लगे। अपना आहार दिन-पर-दिन कम करने लगे। ग्रन्थ-पाठ, सत्संग और कृष्ण-लीला-कीर्तनादिमें अधिकांश समय व्यतीत करने लगे। लीला-कीर्तन-मण्डलीके एक सुनिपुण नायकके रूपमें चारों ओर लोग उनकी प्रशंसा करने लगे।
शकाब्द १८४२ में ३५ वर्षकी अवस्थामें वे गृह त्यागकर व्रज चले गये। राधाकुण्डमें श्रीजीव गोस्वामीके घेरेमें रहकर भजन करने लगे। विरक्त-वेश ग्रहण करनेके लिए उपयुक्त गुरुकी खोज भी उन्होंने तत्काल प्रारम्भ कर दी। पर, किसको गुरु रूपमें वरण करें, यह वे बहुत दिनों तक निर्णय न कर सके। अन्तमें उन्होंने राधारानीकी शरण ली। दिन-रात उनसे प्रार्थना करते हुए उनके निर्देशकी प्रतीक्षा करने लगे। बहुत दिनों तक उनकी ओरसे भी किसी प्रकारका संकेत न मिला। उनकी धारणा थी कि वेशाश्रयके बिना भजनमें तीव्र गतिसे अग्रसर होना सम्भव नहीं। भजनमें प्रगति बिना जीवनका कोई मूल्य नहीं। इसलिए, जब राधारानीने भी गुरुके सम्बन्धमें उन्हें कोई संकेत नहीं दिया, तब वे क्या करते ? उन्होंने अनशन द्वारा जीवन समाप्त करनेका निश्चय किया।
अन्न-जल सब त्याग
दिया। सात दिन बिना अन्न-जलके व्यतीत हो गये। शरीर अत्यन्त दुर्बल हो गया। मानसिक स्थिति ऐसी हो गयी कि निद्रा और जागरण एकसे प्रतीत होने लगे। उसी समय कहना मुश्किल है कि स्वप्नमें या जागरणमें, राधारानीने दर्शन देकर राधाकुण्डमें गोपीनाथजीके मन्दिरके सेवाध्यक्ष श्रीभगवानदास बाबाजीसे वेश ग्रहण करनेका आदेश दिया।
सखीचरणने भगवानदास बाबाजीके चरणोंमें आत्मसमर्पण किया। वेश ग्रहण करनेके पश्चात् उनसे अष्टकालीन भजन-शिक्षा देनेके लिए आग्रह किया। उन्होंने कहा- 'मुझे मन्दिरके सेवा कार्यसे तो अवकाश मिलता नहीं। तुम्हें भजन सिखाऊँ तो कैसे सिखाऊँ ? तुम ऐसा करो। खदिरवन (खैरा) में
थोसोकनाथ गोस्वामीको भजन-कुटीमें श्रीनरोत्तमदासजी महाराज और पिसाएकीकदम्बखण्डीमें बोराधिकादासजी महाराज रहते हैं। यह दोनों मणिपुरके उच्चकोटिके भजनशील व्यक्ति हैं। दोनों सिद्ध कृष्णदास बाबाकी भजनशैलीसे भजन करते हैं। दोनों जैसे एक प्राण, दो देह हैं। तुम इन दोनों से श्रीकृष्णदास बाबाकी गुटिकाके अनुसार भजनकी पद्धति सीख ली।'
सखीचरण बाबाने ऐसा ही किया, पर उनसे भजन-पद्धति सीखनेमें उन्हें बड़ा कष्ट उठाना पड़ा। वे रात दो बजेसे उठकर भजन करते थे। राधाकुण्डसे अपना आसन छोड़कर रातमें कहीं न जानेका उन्होंने संकल्प कर रखा था। यदि वे कहीं जाते भी तो रात होते-होते राधाकुण्ड अवश्य लौट आते। उस समय राधाकुण्डसे खदिरबन जानेके लिए गाँव-गाँवमें होते हुए १५-१६ मीलका चक्कर लगाना पड़ता था। खदिरवनसे कदम्बखण्डी और भी दो-तीन मील आगे थी। सखीचरण बाबा पैदल चलकर इतनी दूर जाते और रात होनेसे पहले लौट आते। कभी-कभी भजन करते-करते रातमें २ या ३ बजे उन्हें कोई शंका होती, तो उसी समय उनके स्थानको चल पड़ते।
उन्होंने सिद्ध बाबाकी गुटिका पूरी कण्ठ कर ली। पर उन्हें उससे सन्तोष न हुआ, क्योंकि श्रीनरोत्तमदासजी महाराजके पास जो गुटिका थी, वह बिलकुल शुद्ध नहीं थी।
सखीचरण बाबा शुद्ध गुटिकाकी खोजमें लग गये। किसीने उनसे कहा कि काम्यवनमें सिद्ध श्रीकृष्णदास बाबाके एक नाती चेला हैं। उनके पास बहुत सी प्राचीन गुटिकाएँ हैं। उन्होंने राधाकुण्डसे २६ मील दूर जाकर उनसे एक अच्छी
गुटिका देनेकी प्रार्थना की और उसकी नकलकर उसे शीघ्र लौटा देनेको कहा। उन्होंने कहा- 'मैं ले जानेको नहीं दूँगा। तुम यहीं बैठकर नकल कर सकते हो।'
बाबाने कहा- 'मेरा नियम है रात्रिमें राधाकुण्ड छोडकर अन्य किसी स्थानपर न रहनेका। आप करुणामय हैं। जिससे मेरे नियमकी रक्षा हो, ऐसा करनेकी कृपा करें।'
काम्यवनके बाबाने कहा- 'अच्छा दो-तीन दिन बाद आना। मैं निकाल रखूँगा।'
दो-तीन दिन बाद फिर उन्होंने काम्यवनकी लम्बी यात्रा की और गुटिका ले उससे अच्छी दूसरी गुटिका ले आये। उससे भी सन्तोष न हुआ, तो फिर जाकर आये। पर उसमें भी सन्देह होनेके कारण, उसे लौटा आये। उनसे अनुनय-विनयकर उससे और अच्छी गुटिकाके लिए प्रार्थना की। काम्यवनके बाबाने कहा- 'अच्छा, तो तुम सबसे अच्छी प्रति चाहते हो ! उसे मैं किसीको देता नहीं। तुम्हारी उत्कण्ठा देख तुम्हें दे रहा हूँ। १५ दिनके भीतर लौटा अवश्य देना।'
सेवा, प्रसाद और समर्पण की घटनाएँ
आये। सखीचरण बाबा गुटिका ले आये। १२ दिनमें उसकी नकलकर उसे लौटा
बाबाका वैराग्यमय शरीर बहुत कृश और दुर्बल था। उनका केवल सात घरोंसे मधुकरी माँगनेका नियम था। व्रजकी प्रथाके अनुसार प्रत्येक घरसे रोटीका एक टूक ही मिलता था। किसी-किसी घरसे वह भी नहीं। इतना स्वल्पाहार करते हुए, इतने दुर्बल शरीरसे बाबाके लिए बार-बार खदिरवन और काम्यवनादिकी लम्बी यात्राकर उसी दिन लौट आना और फिर नित्य-नियमादिकर मधुकरीको जाना असम्भव था। साधारण रूपसे इसकी कल्पना भी नहीं की जा सकती। रनकी असाधारण भजन-निष्ठ और भक्तिकी अचिंत्य शक्तिके कारण ही यह सम्भव हो सका।
इतने कष्टसे अष्टकालीन-लीलाकी गुटिकाका संग्रहकर बाबा बड़े उत्साह और लगनके साथ अष्टकालीन लीला-स्मरणमें संलग्न रहने लगे राधाकृष्णकी भानसिक-सेवामें संलग्न रहते हुए भी उन्होंने बाह्य सेवाकी अवहेलना नहीं की। मणिपुरके श्रीचूड़ाचाँदने राधाकुण्डमें एक नये मन्दिरक निर्माणकर सेवा-भार उनके ऊपर छोड़ रखा था। वे विधिवत् मन्दिर में ठाकुर-सेवा करते हुए मानसिक सेवामें तल्लीन रहते। बीच-बीच में अपने शिक्षा-गुरु श्रीनरोत्तमदास बाबा और श्रीराधिकादास बाबाका खदिरवन और कदम्बखण्डी जाकर सत्संग करते।
इस प्रकार बाह्य और अतः साधनमें एक साथ लगे रहकर बाबा भजनानन्दका रूपसे अनुभव कर रहे थे. उसी समय उनके ऊपर एक वज्राघात हुआ। अचानक नित्य लीलामें प्रवेश कर गये। उनके अभिन्न प्राण श्रीराधिकादास बाबाजी १८५१ शकाब्द, भाद्र शुक्लपक्ष नवमीको उनके शिक्षागुरु श्रीनरोत्तमदासबाचा उनके देहसे लिपटकर रो-रोकर कहने लगे- 'हाय बन्धु ! तुम मुझे बिना बताये ही उन्होंने उनके विरहमें अन्न-जल त्याग दिया और दो दिन बादमें वे भी नित्य-लीलामें ये छोडकर चले गये। तुम्हारे बिना मैं अब इस शरीरको लेकर क्या करूँगा ?' प्रवेश कर गये।
दोनों शिक्षा-गुरुओंके सहसा अन्तर्धानके पश्चात् गुरु-विरह रूप महादावानल सखीचरण बाबाके हदयको दग्ध करने लगा। वे भी उनके बिना जीना निरर्थक जान अन्न-जल त्यागकर राधारानीसे प्रार्थना करने लगे - 'स्वामिनी! मेरे गुरुवर्गको जब तुमने अपने चरणोंमें ले लिया, तो इस दीनपर भी कृपा करो। वे दोनों मुझे अपराधी जान छोड़कर चले गये हैं। मैं अब इस अपराधी शरीरको लेकर क्या करूँगा ? मुझे भी अपने चरणोंमें स्थान देनेकी कृपा करो, स्वामिनी।' वे एक मास तक नित्य केवल एक चम्मच गिरिधारीका चरणामृत लेकर स्वामिनीसे इस प्रकार प्रार्थना करते रहे। उनका शरीर अति जीर्ण और शुष्क होकर मरणासन्न हो गया। संगी-साथी उनकी प्राण त्यागनेकी अन्तिम अवस्था जान कीर्तनादिकी व्यवस्था करने लगे।
उसी समय करुणामय स्वामिनी स्वर्णके थालमें विभिन्न प्रकारके प्रसाद लेकर आयीं और बोलीं- 'लो यह प्रसाद ग्रहण करो। उपवास छोड़ दो।'
सखीचरण बाबाने कहा- 'स्वामिनी! मैं अब इस अपराधी शरीरको नहीं रखना चाहता। मुझे अपने चरणोंमें लेनेकी कृपा करो।
'नहीं, अभी नहीं। अभी भजन करो' स्वामिनीने कहा, और उन्हें भोजन करा अन्तर्धान हो गयीं।
स्वामिनीकी आज्ञासे बाबाने अनशन छोड़ दिया और पूर्ववत् भजन करने लगे। एक वर्ष पीछे शिक्षा-गुरुओंकी विरह-तिथिपर उन्हें फिर गुरु-विरह-तापने जर्जरित किया। उससे निस्तार पाना उनके लिए असम्भव हो गया। उन्होंने फिर अनशन द्वारा प्राण त्यागकर उनके निकट जानेका दृढ़ संकल्प किया। अनशन करते लगभग एक मास बीत गया। मरणासन्न अवस्था प्राप्त होनेपर उन्होंने सहसा देखा दिव्य वृन्दावनका रमणीय दृश्य और राधारानीको सोनेके थालमें प्रसादके साथ उनकी ओर मन्द, मनोहर गतिसे आते हुए। उन्होंने कहा- 'बाबा लो, प्रसाद ग्रहण करो। अभी कुछ दिन और भजन करो, तब तुम्हें ले जाऊँगी।'
बाबाने कहा- 'स्वामिनी! मैं कितना अशक्त हो गया है। इस देहको लेकर रहना कितना मुश्किल हो गया है मेरे लिए। सेवक भी मेरे पास कोई नहीं है। कुएँगे जल तक मुझे स्वयं ही लाना पड़ता है। ऐसी दशामें मैं अब यहाँ नहीं रहना चाहता।
मुझे अपने चरणोंमें अंगीकार कर लो।'
'चिन्ता न करो। तुम्हें कोई असुविधा न होगी। एक सेवक तुम्हारे पास आ जायगा। एक कुआँ भी तुम अपनी कुटियाके सामने खुदवा लेना।'
'कुएँके लिए मेरे पास पैसे कहाँ हैं ?'
'उसकी भी चिन्ता न करो। वह धूम्रराय करवा देगा।' इतना कह स्वामिनीने बाबाको प्यारसे भोजन कराया और अन्तर्धान हो गयी।
धूम्रराय सखीचरण बाबाके भानजे थे। वे रेलवे कमिश्नर थे। उन्हेंनि बहुत दिनोंसे मामाके दर्शन नहीं किये थे। उनके दर्शनकी उत्कण्ठा ले वे वृन्दावन आये।
बाबाको पानीका कष्ट देख उन्होंने एक कुआँ उनकी कुटियाके सामने खुदवा दिया।
राधारानीकी कृपासे कुएँका जल भी मीठा निकला, जबकि आसपासके कुओंको देखते हुए उसका जल मीठा निकलनेकी कोई सम्भावना ही न थी।
एक सेवक भी इसी बीच बाबाके पास आ गया। अब उन्हें किसी प्रकारको असुविधा न रही। उनका भजन-साधन सुचारु रूपसे चलने लगा।
पर, भजनमें तृप्ति कहाँ ? साधक भजनमें जितनी प्रगति करता है, उतनी है
उसकी उत्कण्ठा और बढ़ती जाती है उसका एक पल भी यदि भजनके बिना जाता है, तो उसे असह्य दुःख होता है। बाबाने पहले ही अपना आहार और निद्रा बहुत कम कर रखे थे, जिससे वे अधिक-से-अधिक समय भजन कर सकें। वे केवल सात घरोंसे भिक्षा करते थे। उसीमें जितने टूक रोटीके मिलते उन्हें खाकर पानी पी लेते थे। दिन-रात भजन करते थे। केवल रात ११ बजेसे २ बजे तकका समय निद्रामें अतिवाहित करते थे। उन्होंने अब निद्राका समय और भी कम करना चाहा। निद्रा और आहारमें घना सम्बन्ध है। आहार जितना अधिक होता है, उतनी ही निद्रा अधिक होती है। इसलिए उन्होंने अब मधुकरी और भी कम कर दी। सात घरोके
बजाय केवल पाँचमें मधुकरी को जाने लगे। कुछ दिनों बाद मधुकरी और भो घटाकर केवल तीन घरों तक सीमित कर दी। तीन घरोंमें से भी कभी-कभी किसी घरसे मधुकरी न मिलती, तो एक या दो घरोंसे प्राप्त रोटीके एक या दो ट्रक खाकर
[९ खाली लौटना पड़ता। तब राधाकुण्डका जल पीकर ही रह जाते। जब ऐसा होता रह जाते। कभी ऐसा भी होता कि तीनों घरोंसे, जहाँ वे मधुकरीके लिए जाते, केवल राधाकुण्डका जल पीकर रह जाते, तब उन्हें भजनमें और अधिक स्फूर्ति तब वे किसी प्रकारका दुःख न मानकर उलटे सुख ही मानते, क्योंकि जब वे होती। ऐसा वे अपने शिष्योंसे पीछे कहा करते।
एक दिन जब बाबा किसी व्रजवासीके घर मधुकरीको गये तो उसने कहा- 'बाबा, आज रोटी अभी तक बनी नहीं है। थोडी देरमें फिर आनेकी कृपा करें। एक ही घरमें दो बार मधुकरीके लिए जानेका बाबाका नियम नहीं था। वे उस घरमें फिर नहीं गये। दूसरे घरमें भी उन्हें मधुकरी नहीं मिली, क्योंकि वहाँ अशौच था। तीसरे घरमें किसी महोत्सवका आयोजन चल रहा था। भोग अभी नहीं लगा था। व्रजवासीने कहा- 'बाबा, आज मेरा अनुरोध मानना होगा। थोडी देरमें भोजन करके जाना होगा।'
जीवन के अंतिम प्रसंग और स्मृतियाँ
'तुम तो जानते हो।' मैं भोजन कहीं नहीं करता, बाबाने कहा।
'तो बाबा प्रसाद ही लेकर जायें। अभी थोड़ी देरमें भोग लग जायेगा।'
'नहीं, मुझे विलम्ब हो रहा है। अभी मैंने मध्याह्न-नियम नहीं किया है। आज रहने दो। फिर किसी दिन मधुकरी ले जाऊँगा।'
'ऐसा नहीं हो सकता बाबा। इतनी-सी बात तो मेरी माननी ही होगी। मैं बिना प्रसाद लिये नहीं जाने दूँगा।'
बाबाको उसका अनुरोध मानना पड़ा। प्रसाद लेकर जब वे कुटियाको लौटे, तब विलम्ब बहुत हो गया था। भूख बहुत लग आयी थी। पर प्रसाद ग्रहण करनेके पूर्व मध्याह्न-नियम तो करना ही था। वे नियम करने बैठे, तब उनका मन प्रसादी पुओंके लिए चंचल हो उठा। मनका भजनकी अपेक्षा पुओंमें अभिनिवेश अधिक देख उन्हें उसपर क्रोध आया। उन्होंने पुए झोलेसे निकाल कुटियाके बाहर बन्दरोंको डाल दिये। मनसे बोले- 'अब खा, क्या खायेगा ?'
मन सीधा हो गया। उसकी चंचलता जाती रही। शान्त मनसे मध्याह्न-भजनका नियम पूरा करनेके पश्चात् वे राधाकुण्डका जल पानकर तृप्त हुए।
कुछ दिन बाद कार्तिक मासकी नियम-सेवाके उद्देश्यसे कलकत्तेके श्रीसत्यनारायण पालका राधाकुण्ड आना हुआ। वे बाबाके दर्शनकर बहुत प्रभावित हुए। उन्हें बाबाका कृश शरीर और अति सूक्ष्म आहार देखकर चिन्ता हई। उन्होंने
सोचा कि वे केवल तीन घरोंसे मधुकरीका अपना नियम तो छोड़ेंगे नहीं। मधुकरीके अतिरिक्त कुछ दूध भी ले लिया करें तो अच्छा हो। उन्होंने बाबासे दोप लेनेका आग्रह किया और स्वयं दूधके लिए खर्चचैकी व्यवस्था कर देनेका वचन दिया। बाबाने उनका आग्रह स्वीकार कर लिया, पर बाबाके सोचनेकी दिशा दूसरी थी। उन्होंने सोचा कि वे दूध लेना आरम्भ कर देंगे और मधुकरीको जाना बन्दकर देंगे। इस प्रकार उन्हें भजनके लिए और अधिक समय मिल जाया करेगा।
चले गये। बाबाका दुग्धपान आरम्भ हुआ। साथ ही मधुकरीको जाना बन्द हो गया। पाल महाशय बाबाके लिए गायके आधा सेर दधको व्यवस्था कर कलकते वे पावभर दूध मध्याह्न भजनके पश्चात् दिनमें लेते तथा पावभर रात १० बजे। तीन-चार दिनमें एक बार शौचको जाते। यह व्यवस्था उनके भजनके लिए बहुत अनुकूल सिद्ध हुई और अन्त तक चलती रही।
पर, दूधमें ग्वाला कभी-कभी पानी मिला देता, जिसके कारण उनके भजनमें विध्न पड़ता। उन्हें भजन करते-करते कई बार उठकर लघुशंकाको जाना पड़ता उनके चरणोंमें आत्मसमर्पणकर उनसे कुछ सेवा बतानेका आग्रह किया था। बाबाने यह समस्या भी आसानीसे हल हो गयी। कुछ ही दिन पूर्व श्रीमदनमोहनदास बाबाने उन्हें अपने सामने वाले ग्वालेके घरसे दूध दुहा लानेकी सेवा सौंप दी।
इस प्रकार आहार और निद्रापर पूर्ण नियन्त्रणके साथ बाबाका अष्टकालेर लीला-स्मरण सुचारु रूपसे चलने लगा। कालान्तरमें उन्हें लीलास्मरणमें सिद्धि प्रात हुई। लोग उनके पास अष्टकालीन-लीला-स्मरणकी शिक्षा-दीक्षाके लिए आने लगे। श्रीअच्युतदास बाबा, श्रीव्रजमोहनदास बाबा, श्रीमदनमोहनदास बाबा, पण्डित श्रीकृष्णचरणदास बाबा और श्रीकृष्णदास बाबा उनके प्रधान शिष्य हुए।
एक दिन बाबाने मदनमोहनदास बाबाको पास बुलाकर कहा- 'तुमसे एक गोपनीय बात कहूँ, किसीसे कहना नहीं। मैं अब शीघ्र स्वामिनी के पास जाऊँगा। तुम दुःख न करना। तुम्हें भजनके विषयमें सब कुछ बता दिया है। एकान्त चित्तसे सुखपूर्वक भजन करना। गुटिकामें जो त्रुटियाँ अब भी रह गयी हैं, उनका मेरे बताये अनुसार संशोधन कर लेना।'
मदनमोहनदास बाबाके पैरोंके नीचेसे धरती खिसक गयी। एकाएक बाबाने मुखसे उनके प्रयाणकी बात सुन उन्हें लगा कि जैसे उनके प्राण भी अब नहीं रहेंगे। शरबिद्ध पक्षीकी भांति उनके प्राण छटपट करने लगे। अश्रूविसर्जन करते हुए ने उनके चरणोंमें गिर पडे और कातर स्वरसे बोले- 'बाबा ! यदि इस समय मुझे
उन-पद्धतिकी रूप-रेखा मात्र जानी है। भजन करते-करते अवश्य कुछ शंकाएँ ड़कर चले जायेंगे तो मेरी क्या गति होगी। मैंने तो अभी दीक्षा भर ली है। लेंगी। उनका समाधान कैसे होगा ? आप और कुछ दिन रहकर मुझे जन-पद्धतिमें परिपक्व करनेकी कृपा करें।'
'स्वामिनीकी कपासे तुम्हारा सब समाधान हो जायेगा। चिन्ता न करो। मुझे जमिनीके निकट जाने दो।' बाबाने आग्रह सहित कहा।
मदनमोहनदास बाबाने तब हाथ जोडकर निवेदन किया- 'यदि आप जायेंगे है, तो मुझे यह बतानेकी कृपा करें कि आपके पीछे किनका संग करूँ, जिससे मेरे जनमें उन्नति हो ? शंकाएँ होनेपर किनके पास जाकर उनका
समाधान करूँ ?' कुछ देर चिन्ताकर बाबा बोले- 'किसको बताऊँ ? कोई तो मनोमत दीखता
'तब तो बाबा आपको रहना ही होगा। नहीं तो यह दास भी आपका अनुसरण होगा।' मदनमोहनदास बाबाने व्याकुल भावसे आग्रह किया।
'अच्छा, तो मैं दो वर्ष और रहूँगा। इस बीच तुम सब समाधान कर लेना।' हबाने मदनमोहनदास बाबाको आश्वस्त करते हुए कहा।
दो वर्ष सखीचरण बाबाने राधारानीके विरहमें जैसे-तैसे व्यतीत किये। उनकी विरह-ज्वाला निरन्तर बढ़ती गयी। लोगोंसे मिलना-जुलना उन्होंने बन्द कर दिया। कुटियाका ताला भीतरसे बन्दकर रहने लगे, जिससे सेवक भी उसे खोल न सके।
दो वर्ष व्यतीत होनेपर उन्होंने मदनमोहनदास बाबासे कहा- 'अब मैं जाऊँगा।'
मदनमोहनदास बाबाने कहा- 'कुछ दिन और रुक जायें बाबा।'
पर, बाबा मौन रहे। दूसरे दिनसे वे दूधकी मात्रा कम करने लगे। एक महीनेमें सुखकर अस्थियोंका पिंजर जैसे हो गये। बाह्यज्ञान-शून्य अवस्थामें वे शैय्यापर लेटे रहते। पर, उनका भजन ठीक चलता रहता। उस समय उनके शिष्य श्रीगोपालदासजी डागा भी उनकी सेवामें थे। वे जब उनके कानमें मुँह लगाकर छते- 'बाबा, इस समय कौन-सी लीला चल रही है, तो वे समयोचित लीलाका बैंक संकेत कर देते।
बीच-बीचमें कहने लगते- 'जले गेलौ, जले गलौ,' अर्थात् 'शरीर जला जा रहा है. जला जा रहा है.' जिससे पता चलता कि उनका विरहताप कितना बढ़ता जा रहा है।
कर दिया। उस समय मध्याह्न था। मध्याह्न-लीलामें बाबाका विशेष आवेश रहा एक दिन अन्त समय निकट जान लोगोंने उनके निकट नाम-संकीर्तन आरम्भकरता था। उस समय वे समाधिस्थ अवस्थामें देख रहे थे कि सखियाँ उन्हें दिव्य कीर्तनकारी भक्तोंसे कहा- 'मुझे सखियाँ राधाकुण्ड ले जानेको सजा रही थीं। तुम राधाकुण्डमें ले जानेके लिए मञ्जरीरूपमें मजा रही हैं। बाह्यज्ञान होनेपर उन्होंन लोगोंने शब्द करके मुझे यहाँ बुला लिया। तुम अभी कीर्तन न करो। अभी मेरा लीला-स्मरण ठीक चल रहा है। कीर्तनके शब्दसे लीला-आवेश भंग हो जाता है। जब लीला-स्मरण बन्द हो जाय, तब नाम-संकीर्तन आरम्भ करना।
दूसरे दिन, सम्वत् २०२२, आषाढ़ शुक्ल प्रतिपदाको प्रातःकाल उन्होंने कहा- 'मुझे रजपर लिटा दो।'
समाधिस्थ अवस्थामें रजपर लेटे-लेटे कीर्तन-ध्वनिके बीच उन्होंने मध्याह्न १ बजे राधाकृष्णकी मध्याह्न-लीलामें प्रवेश किया।
नाम-स्मरण और एकाग्रता — जीवन-संदेश
नाम-स्मरण, भजन और एकाग्रता के प्रसंग साधना की निरंतरता की याद दिलाते हैं। यहाँ वर्णित जीवन-अनुभवों से पाठक अपनी साधना के लिए प्रेरणा ले सकते हैं।
कथा का सार
श्रीसखीचरणदास बाबाजी की कथा भक्ति, विनम्रता और साधना पर मनन करने का अवसर देती है। इस संग्रह में अन्य भक्तों के जीवन-प्रसंग भी पढ़ें।