ब्रज के भक्त भाग 2 · अध्याय 2
श्रीगोपालदास बाबाजी 'उत्सवी'
श्रीगोपालदास बाबाजी 'उत्सवी' की प्रेरक हिंदी कथा। जानिए उनके जीवन, भक्ति और साधना से जुड़े महत्वपूर्ण प्रसंग।

श्रीगोपालदास बाबाजी 'उत्सवी' का यह भक्त-चरित्र ब्रज की साधना, श्रद्धा और जीवन से जुड़े प्रसंगों को सामने लाता है। नीचे कथा को अलग-अलग विषयों में व्यवस्थित किया गया है।
जन्म, परिवार और प्रारम्भिक जीवन
[ वृन्दावन ]
गङ्गा-तटपर एक निर्जन स्थानमें श्रीमद्भागवतकी कथा बैठी है। वक्ता हैं एक महात्मा, जिनके शरीरपर एक लंगोटीके सिवा और कुछ नहीं है। श्रोता हैं स्वयं गङ्गा महारानी। महात्मा तन्मय हो गङ्गा माताको लक्ष्य-कर उच्च स्वरसे कथा कह रहे हैं। गङ्गा कल-कल करती हुँकार भर रही हैं। और कोई श्रोता वहाँ नहीं है। किसीको निमन्त्रण भी नहीं है।
पर भ्रमर निमन्त्रणकी प्रतीक्षा कब करता है ? जहाँ भी पुष्प खिलता है, वहाँ पहुँच जाता है। पुष्पके सौरभको पवन दिक्-विदिक् ले जाता है। उसीको भ्रमर निमन्त्रण मान लेता है। श्रीमद्भागवतकी कथामें भी कुछ ऐसा ही दिव्य आकर्षण है। कथाकी स्वर-लहरीसे स्पन्दित आकाशके अणु-परमाणुओंने जाकर स्पर्श किया कहीं दूर ध्यानमग्न बैठे परमहंस वृत्तिके एक महात्माको। वे वहाँ आ विराजे कथाके दूसरे श्रोताके रूपमें।
तीसरे श्रोता स्वयं श्रीनन्दनन्दन तो अलक्षित रूपसे वहाँ रहे होंगे ही। उन्होंने
जो है- 'मद्भक्ता यत्र गायन्ति तत्र तिष्ठामि नारद-हे नारद! मेरे भक्त जहाँ मेरा गुणगान करते हैं. मेरी लीला-कथा कहते हैं, वहाँ मैं जा बैठता हूँ।' उन्हींको लक्ष्यकर परमहंसजीने कहा- 'जिनकी कथा हो रही है. उनके लिए कुछ भोग तो (खा नहीं। उन्हें माखन-मिश्री बहुत प्रिय है।'
उसी समय शुभ्र वस्त्र धारण किये एक वृद्धा माखन-मिश्री लेकर वहाँ आयीं। अदनन्दनको माखन-मिश्रीका भोग लगाया गया। कथाके पश्चात् दोनों महात्माओंने उसका सेवन किया। उसके अलौकिक स्वाद और गंधसे दोनों चमत्कृत हो गये। उसे ग्रहण करनेके पश्चात् सात दिन तक उन्हें भूख नहीं लगी। एक दिव्य मस्ती बराबर छायी रही। दोनोंने समझ लिया कि माखन-मिश्री लानेवाली वृद्धा स्वयं गङ्गा महारानी ही थीं, अन्य कोई नहीं।
गङ्गा महारानीमें इतनी निष्ठा रखनेवाले और उन्हें श्रीमद्भागवतकी कथा स्नानेवाले यह महात्मा थे निम्बार्क सम्प्रदायके श्रीमत् स्वभूरामदेवाचार्यकी परम्परामें नागढ़के गोदाबाव स्थानके महन्त श्रीमत्सेवादासजी महाराजके शिष्य गोपालदासजी। टीकमगढ़के निकट किसी ग्राममें गौड़ ब्राह्मणकुलमें सम्बत् १८६८ में उनका प्रादुर्भाव हुआ। बाल्यकालमें ही जूनागढ़के श्रीसेवादासजी रहराजसे दीक्षा ले वे चारों धामकी यात्राको निकल पड़े। यात्रा समाप्तकर व्रजके अन्तर्गत कामवनमें रहने लगे। परसरामद्वारे के पण्डित रघुवरदासजीसे श्रीमद्भागवतादि ग्रन्थोंका अध्ययन किया। भगवत्कथादिमें आसक्तिके साथ-साथ अका वैराग्य दिन-पर-दिन बढ़ता गया। कुछ दिन बाद वे केवल एक लँगोटी लगाये, बगलमें श्रीमद्भागवत दबाये गंगा-तटपर चले गये।
व्रजभूमि और तीर्थ से जुड़ी घटनाएँ
गङ्गाके किनारे-किनारे गाँ-तहाँ विचरते रहे और गङ्गाजीको श्रीमद्भागवत सुनाते रहे। गंगा महारानीका आशीर्वाद ले व्रज लौट आये और वृन्दावनमें रहने लगे।
वृन्दावनमें वे उदरपूर्ति मधुकरी द्वारा करते और आत्मपूर्ति भगवान्को लीला-कथाओं द्वारा। राधा-कृष्णकी दिव्य लीलाओंके मनन और कीर्तनमें ही उनका सारा समय व्यतीत होता। उनकी श्रीमद्भागवतकी कथा वृन्दावनमें कहीं-न-कहीं होती रहती। कथा बडी रसमय होती। शुक-सम्प्रदायके रसिक सन्त श्रीसरसमाधुरीजी भी कथामें आया करते।
वैष्णव सेवामें उनकी बडी निष्ठा थी। कथाओंमें जो भेंट आती, उससे महावनके निकट दाऊजीके मन्दिरमें जाकर वैष्णव-सेवा कर दिया करते। एक बार
वृन्दावनमें सेवा करने लगे। दाऊजीने स्वप्नमें वृन्दावनमें ही वैष्णव-सेवा करते रहनेका आदेश दिया। तबसे वे
उन्हें प्रेरणा हुई श्रीनिम्बार्काचार्यका जन्मोत्सव मनानेकी। उन्होंने इस उत्सवी और ब्राह्मण-वैष्णव-भोजन आदिकी व्यवस्था करते। बड़ी धूमधामसे सारा उत्सव जन्म-तिथिपर विशाल शोभायात्रा, श्रीमद्भागवत सप्ताह, रासलीला, समाज-गार प्रथा डाली, जो आज तक चली आ रही है। प्रतिवर्ष वे श्रीनिम्बार्काचार्यको मनाते। उसके लिए उनके प्रभावसे धन भी पर्याप्त मात्रामें आ जाता। उसका एक एक पाई खर्चकर अन्तमें अपनी लँगोटी और करुआ ले किनारे हो जाते। संचग एक पैसा भी न करते।
दिव्य अनुभूति और कृपा के प्रसंग
पाठकी व्यवस्था की, पर उन्हें ज्वर हो आया। अर्थकी समुचित व्यवस्था न हो एक बार इस उत्सवके अवसर पर उन्होंने २०० ब्राह्मणों द्वारा श्रीमद्भागवत जायगी। तब प्रियाजीने स्वप्नमें दर्शन दे ढाढ़स बंधाया। दूसरे दिन एक परदेसी सकी। पाठ आरम्भ हो गया। वे चिन्तामें पड गये कि ब्राह्मणोंको दक्षिणा कहाँसे दी साहूकार आया। उसने उत्सवका सारा भार अपने ऊपर ले लिया। कई दिन तक कथा-कीर्तन, रास और वैष्णव-भोजनादिका दौर आन्नदपूर्वक चलता रहा। अन्तमे साहूकारने श्रीमोहरोंकी दक्षिणा दे ब्राह्मणोंको तृप्त किया। इन उत्सवोंके कारण ही श्रीगोपालदासजीका नाम 'उत्सवीजी' पड़ गया।
श्रीगोपालदासजी भक्तमालकी कथा भी बहुत सुन्दर कहते। जिस शैलीमें भक्तमालकी कथाका आज प्रचलन है, उसका सूत्रपात्र उन्हींसे हुआ। उन्हींसे प्रसिद्ध भक्तमाली टेपीकुञ्जके श्रीमाधवदास बाबाजीने भक्तमालका अध्ययन किया।
उनकी जैसी कथनी थी, वैसी ही करनी थी। इसलिए उनकी वाणीमें ओज था। उसका लोगोंपर स्थायी और गंभीर प्रभाव पड़ता था। बहुत से लोगोंमें उससे चमत्कारी परिवर्तन हुआ। बहुत-से उनसे मन्त्र-दीक्षा ग्रहणकर भक्ति-पथके पथिक बने।
उनके शिष्योंमें प्रधान थे बाबा हंसदासजी, बाबा श्यामदासजी, बाबा कारे कृष्णदासजी, बाबा किशोरीदासजी, बाबा राधिकादासजी, राजा भवानीसिंहजी और श्रीमती गोपाली बाई। इनके अतिरिक्त श्रीसुदर्शनदासजी (ललित प्रियाजी) जैसे बहुत-से रसिक महानुभावोंने उनसे भजन-प्रणालीकी शिक्षा ग्रहण की।
सम्वत् १९५२ में उन्हें निकुञ्ज-प्राप्ति हुई।
सेवा और समर्पण — जीवन-संदेश
सेवा का मूल्य केवल बाहरी कार्य में नहीं, बल्कि उसके पीछे के निष्कपट भाव में भी होता है। इस चरित्र के प्रसंगों को पढ़ते समय सेवा के इसी भाव पर विचार किया जा सकता है।
कथा का सार
श्रीगोपालदास बाबाजी 'उत्सवी' की कथा भक्ति, विनम्रता और साधना पर मनन करने का अवसर देती है। इस संग्रह में अन्य भक्तों के जीवन-प्रसंग भी पढ़ें।