ब्रज के भक्त भाग 2 · अध्याय 3

स्वामी श्रीगोविन्ददासजी

स्वामी श्रीगोविन्ददासजी की प्रेरक हिंदी कथा। जानिए उनके जीवन, भक्ति और साधना से जुड़े महत्वपूर्ण प्रसंग।

स्वामी श्रीगोविन्ददासजी
स्वामी श्रीगोविन्ददासजी — ब्रज के भक्त भाग 2

स्वामी श्रीगोविन्ददासजी का यह भक्त-चरित्र ब्रज की साधना, श्रद्धा और जीवन से जुड़े प्रसंगों को सामने लाता है। नीचे कथा को अलग-अलग विषयों में व्यवस्थित किया गया है।

सेवा, प्रसाद और समर्पण की घटनाएँ

[ वृन्दावन ]

वृन्दावनके किशोरवनमें स्वामी गोविन्ददासजी रहते थे। वे शुक-सम्प्रदायके उनकी छठी पीढ़ीमें श्रीखूबदासजीसे दीक्षित थे और शुक-सम्प्रदायके रसिक सन्त संस्थापक आचार्य श्रीश्यामचरणदासजी महाराजके शिष्य श्रीगुरुछोनाजीकी परम्परामें दिल्ली के श्रीमदनमोहनदासजीसे विशेष रूपसे प्रभावित थे। बड़े विरक्त महात्मा थे। हे माँगते किसीसे कुछ नहीं थे। मधुकरी-भिक्षाको भी नहीं जाते थे। आकाशवृत्तिसे रहते थे। सम्पत्तिके नामपर उनकी जीर्ण कटीमें केवल रजका करुआ और दो ग्रन्थ थे. जिन्हें वे हृदयसे लगाकर रखते थे। वे थे-

(१) शुक-सम्प्रदायके आचार्य श्रीश्यामचरणदासजी कृत 'भक्ति सागर' और

(२) शुक-सम्प्रदायके ही श्रीरामसखीजीकृत 'भक्ति-रस-मञ्जरी'।

वे शुद्ध सहचरी भावसे युगलकी उपासना करते थे और 'भक्तिरसमञ्जरी' के अनुसार राधा-कृष्णकी लीलाओंकी भावना करते थे। संसारसे उदासीन रहकर नाम-जप और ध्यानमें सदा लीन रहते थे। वृन्दावन छोड़कर कहीं नहीं जाते थे। एक कविने उनके सम्बन्धमें लिखा है-

तृणवत् त्यागे जगत् सुख, दृढ़ व्रत् विपिन निवास । नाम-भजन-रसमें पगे, गुणनिधि गोविन्ददास ।।

(श्रीजगदीशदास राठौर)

सन्त उनके प्राण थे। जप और ध्यानमें लगे रहते हुए भी वे सन्त-सेवाका कोई अवसर हाथसे नहीं जाने देते थे। सरसमाधुरीजीने उन्हें 'साधुसेवा-धर्म जहाज' कहा है-

श्रीगोविन्ददास महाराजा, साधु-सेवा-धर्म जहाजा ।

की है श्रीरूपमाधुरीशरणजीने भी उनकी साधु-सेवा और नाम-निष्ठाकी सराहना

साधु-सेवामें सरनाम, चाहे नहीं धनधाम, रहे सबसे निष्काम, गौर श्यामको उपासी है।

मुख बोले मीठी बानी प्रेम भक्ति रस-सानी, नाम जापी अरु ध्यानी रहे जगसों उदासी है ।।

नामके सम्बन्धमें वे श्रीश्यामचरणदासजीके ये दोहे बहुत गाया करते थे कई बार जो यज्ञ करि, योग करे चित लाय ।

चरणदास कहै नाम बिन सभी अफल हो जाय ।।

नामहि ले जल पीजिये, नामहि लेकर खाह ।

नामहि लेकरि बैठिये नामहि ले चल राह ।।

चन्द्रमुखी बहु नार । हाथी घोड़े धन घना,

परीक्षा, धैर्य और वैराग्य का प्रसंग

नाम बिना यमलोकमें, पावे दुःख अपार ।।

सकल शिरोमणि नाम है, सब धर्मन के माहिं । अनन्य भक्ति वहि जानिये, सुमरिन भूले नाहिं ।।

(भक्ति-सागर)

एक दिन जब गोविन्ददासजी भावनामें बैठे तो लीला स्फूर्ति न हुई। वे बहत व्यथित और चिन्तित हुए। बहुत सोचनेपर भी उनकी समझमें न आया कि इसका क्या कारण है। तब किसी सिद्ध महात्माके पास जाकर उन्होंने उनसे इसका कारण पूछा। उन्होंने कहा- 'तुमसे किसी वैष्णवके प्रति अपराध हुआ है।'

'अपराध तो किसीके प्रति नहीं हुआ।' उन्होंने सोचते-सोचते उत्तर दिया।

'अच्छा, यह बताओ कि पिछले दो-तीन दिनोंमें तुम किस-किस वैष्णव-से मिले और किससे क्या-क्या बात हुई?'

"मिला भी किसीसे नहीं। बस कल एक महात्मा मेरी कुटियापर आये थे मुझे अपने गुरु महाराजकी तिथिपर प्रसाद ग्रहण करनेके लिए कहने। मैंने उनसे कहा-कहीं प्रसाद पाने नहीं जाता। मुझे लगा कि वे कुछ खिन्न होकर चले गये।"

तो उन्हींक प्रति तुम्हारा अपराध हुआ है।'

'वह कैसे ? मैं सचमुच कहीं निमन्त्रणपर नहीं जाता। यह मेरा नियम है। क्या मैं उनके खातिर अपना नियम छोड़ देता ? यदि ऐसा करता तो दूसरे भण्डारोंमें भी मुझे जाना पड़ता। भण्डारोंमें पता नहीं किसका कैसा पैसा लगता है। प्रायः भण्डारोंका अन्न बहुत शुद्ध नहीं हुआ करता। उसे खानेसे चित्तके चंचल हो जानेका भय रहता है। मैंने बहुत-से भजन-निष्ठ महात्माओंको ऐसा कहते सुना है।'

है। पर, तुम्हारा निमन्त्रण अस्वीकार करनेका ढंग कुछ ऐसा रहा होगा, जिससे 'तुम ठीक कहते हो। तुम्हारा नियम भक्ति-पथके अनुकूल और प्रशंसनीय करना भी तो ठीक नहीं। तुम भले ही प्रसाद न पाते, पर उसकी एक कणिका भी नाको दुःख हुआ। फिर किसी महात्माके भण्डारेके महाप्रसादकी एकदम अवज्ञा लेकर उसका असम्मान करना ठीक नहीं था। तुम्हें चाहिये कि उन महात्मासे क्षमा मांगो और उनसे कहो कि कोई भगवत्प्रसाद अपने गुरुदेवको अर्पणकर तुम्हें

है। तुम उसका सेवन करो। ऐसा करनेसे उस अपराधसे मुक्त हो जाओगे।' गोविन्ददासजीने ऐसा ही किया। तब उन्हें लीला-स्फूर्ति पूर्ववत् होने लगी।

भक्तों के साथ मिलन और सत्संग

भीसे वे साधु-वैष्णव-सेवाकी बात जहाँ सुन पाते वहाँ निमन्त्रण न भी होता तो पहुंच जाते। सेवामें योगदान करते। उसके उपरान्त सेवामें लगे बर्तनोंको धोकर उनका जल पी लेते और उन्हें माँज-धोकर रख देते। इस प्रकार वे किसी भण्डारेका अशन खानेके अपने नियमका भी पालन करते और प्रसादका असम्मान न करनेके सिद्धान्तका भी।

गोविन्ददासजी प्रत्यक्षमें जुगलबिहारी नामके अपने ठाकुरकी सेवा करते और सकी दिव्यलीलाओंका चिंतन करते। किशोरवनमें व्यास-समाधिके निकट जो मंदिर है वह उन्हींका बनवाया उन्हींके जुगलबिहारीका मन्दिर है।

चिन्तन करते-करते गोविन्ददासजीको बहुत समय बीत गया। वे सोचने लगे, अभी तक ठाकुरने प्रत्यक्षमें कोई कृपा नहीं की। एक दिन वे ठाकुरके भोगके लिए सोई बना रहे थे। उन्होंने देखा कि एक बालक और बालिका कुटियामें घुसे और एक-एक रोटी थालीमें-से ले किशोरवनके मन्दिरकी ओर भाग गये।

बाबा चीखते रहे- अरे क्या करते हो ? अमनिया* है, अमनियाँ !'

यह कहते वे भी मन्दिरकी ओर भागे। वहाँ जाकर देखा कि बालकोंमें-से कोई नहीं है, पर मन्दिर में राधा और कृष्णकी मूर्तियोंके हाथमें एक-एक रोटी है। वे विस्फारित नेत्रोंसे यह देखते रह गये और कुछ ही पलोंमें मूर्छित हो भूमिपर गिर पडे। वाञ्छाकल्पतरु जुगलकी अपने ऊपर इतनी कृपा देख उनका भाव-समुद्र उमड़ पड़ा और वे कई दिन तक उसमें डूबते-उतराते रहे।

गोविन्ददासजीकी श्रीसरसमाधुरीजीपर विशेष कृपा थी। वे जब वृन्दावन आते तो उन्हेंकि साथ रहते।

* अमनियाँ - ठाकूरके भोगके लिए प्रस्तुत किया हुआ द्रव्य, जिसका अभी भोग न लगा हो। *

उनके शिष्योंमें श्रीधर्ममित्रजी (श्रीकिशोरीलाल भार्गव) और श्रीअलबेलीशरणजी (मुंशी हीरालालजी भार्गव) का नाम विशेषरूपसे उल्लेखनीय है, जिन्होंने शुक-सम्प्रदायकी बहुत सेवा की।

आजसे लगभग पैंसठ-सत्तर वर्ष पूर्व उन्हें निकुञ्ज-प्राप्ति हुई

सेवा और समर्पण — जीवन-संदेश

सेवा का मूल्य केवल बाहरी कार्य में नहीं, बल्कि उसके पीछे के निष्कपट भाव में भी होता है। इस चरित्र के प्रसंगों को पढ़ते समय सेवा के इसी भाव पर विचार किया जा सकता है।

कथा का सार

स्वामी श्रीगोविन्ददासजी की कथा भक्ति, विनम्रता और साधना पर मनन करने का अवसर देती है। इस संग्रह में अन्य भक्तों के जीवन-प्रसंग भी पढ़ें।