ब्रज के भक्त भाग 2 · अध्याय 36
श्रीव्रजकिशोरदास बाबाजी [ भातरोल, सिन्दुरक ]
श्रीव्रजकिशोरदास बाबाजी [ भातरोल, सिन्दुरक ] की प्रेरक हिंदी कथा। जानिए उनके जीवन, भक्ति और साधना से जुड़े महत्वपूर्ण प्रसंग।
![श्रीव्रजकिशोरदास बाबाजी [ भातरोल, सिन्दुरक ]](/bhajpart2/36.jpg)
श्रीव्रजकिशोरदास बाबाजी [ भातरोल, सिन्दुरक ] का यह भक्त-चरित्र ब्रज की साधना, श्रद्धा और जीवन से जुड़े प्रसंगों को सामने लाता है। नीचे कथा को अलग-अलग विषयों में व्यवस्थित किया गया है।
व्रजभूमि और तीर्थ से जुड़ी घटनाएँ
श्रीव्रजकिशोरदास बाबाजी सिद्ध श्रीनित्यानन्ददास बाबाके अनेकों शिष्योंमें सबसे अधिक प्रसिद्ध थे। दैन्य, वैराग्य और भक्तिमें वे सिद्ध बाबाकी ही प्रतिमूर्ति थे। वे किसी कुटीमें कभी नहीं रहे। भातरोल ग्राममें एक घर 'भूतोंका घर'के नामसे प्रसिद्ध था। उसीमें अधिक रहे। श्रीहरिचरणदास बाबाजी
एक बार उस घर में रहनेवाले भूतोंमें से एक उनका तेज देख बहुत भयभीत (आ। उन्हें देख उस जीवके भयभीत होनेसे उन्हें अपराध होगा, इस विचारसे उन्होंने वह घर छोड दिया और एक प्राचीन पुलके नीचे जाकर रहने लगे, जो सिन्दुरक शामके निकट वृन्दावनसे सिन्दूरक जानेके मार्गपर था। उनका अवशिष्ट जोवन वहीं
भक्तों के साथ मिलन और सत्संग
कोई उन्हें देखकर दण्डवत् न करे इस उद्देश्यसे वे अलक्षित भावसे रहते। वे अपनेको दीन, हीन और अस्पृश्य जान किसी मन्दिरके भीतर जाकर ठाकुरके दर्शन करते. जिससे किसीको उनका स्पर्श हो जानेका अपराध उनसे न बने।
भजन-साधना और नाम-स्मरण के प्रसंग
एक करुआ और एक गुदडीमें ही उन्होंने अपना सारा जीवन व्यतीत किया। उन्हें सारा गोविन्द-लीलामृत कण्ठस्थ था। इससे लगता है कि वे अष्टकालीन तौला-स्मरण किया करते थे। श्रीनित्यानन्द प्रभुके वंशज श्रृंगारवटके श्रीप्रेमानन्द भुने उन्होंसे भजन-शिक्षा ग्रहण की थी।
गुरु और साधना — जीवन-संदेश
गुरु के प्रति श्रद्धा और साधना में निरंतरता भक्ति-परंपरा के प्रमुख विषय हैं। इस चरित्र को पढ़ते समय यह देखना उपयोगी है कि सीख और आचरण किस तरह एक-दूसरे से जुड़ते हैं।
कथा का सार
श्रीव्रजकिशोरदास बाबाजी [ भातरोल, सिन्दुरक ] की कथा भक्ति, विनम्रता और साधना पर मनन करने का अवसर देती है। इस संग्रह में अन्य भक्तों के जीवन-प्रसंग भी पढ़ें।