ब्रज के भक्त भाग 2 · अध्याय 31
श्रीविश्वरूपदास बाबाजी
श्रीविश्वरूपदास बाबाजी की प्रेरक हिंदी कथा। जानिए उनके जीवन, भक्ति और साधना से जुड़े महत्वपूर्ण प्रसंग।

श्रीविश्वरूपदास बाबाजी का यह भक्त-चरित्र ब्रज की साधना, श्रद्धा और जीवन से जुड़े प्रसंगों को सामने लाता है। नीचे कथा को अलग-अलग विषयों में व्यवस्थित किया गया है।
व्रजभूमि और तीर्थ से जुड़ी घटनाएँ
आश्विनकी १७ ता० को कामिनीबाबू वृन्दावन लौट आये। भौमिकजीको प्रणाम् करने गये तो वे बोले- 'आ गये, ठीक किया।' चार-पाँच दिन पीछे सामान्य ज्चरके पश्चात् कार्तिक कृष्णपक्ष एकादशीके दिन ६५ वर्षकी अवस्थामें वे नित्य-धाम को पधार गए।
[ वृन्दावन ]
परम पण्डित, वैराग्यमान और मितभाषी श्रीविश्वरूपदास बाबाजी वृन्दावनके सिद्ध तोतारामदास बाबाके आश्रमके अधिकारी रूपमें भजन करते थे। उस समय राधाकुण्डके वैष्णवोंकी पंचायतकी ओरसे श्रीश्यामकुण्डके पंकोद्धारकी योजना बनायी गयी। उन्होंने श्यामकुण्डका जल तो जैसे-तैसे सब निकलवा दिया, पर अर्थभावके कारण पंकोद्धारका कार्य न करा सके। उसी समय विश्वरूपदास बाबा एक दिन राधाकुण्ड गये। श्यामकुण्डकी अवस्था देख उन्हें रोना आ गया। उन्होंने उसका संस्कार करानेका संकल्प किया।
भजन-साधना और नाम-स्मरण के प्रसंग
कार्य सहज नहीं था, क्योंकि कुण्डकी अवस्था बहुत ही खसब थी। एक बार श्रीरघुनाथदास गोस्वामीके समय उसका संस्कार हुआ था। उसके पश्चात् फिर कभी संस्कार नहीं हुआ। राधारानीका स्मरण कर और उनकी कृपाका भरोसा रख विश्वरूपदास बाबाने इसे करानेका बीड़ा उठा लिया।
राजर्षि बनमालीराय बहादुर उन दिनों राधाकुण्डमें अपनी राजबाड़ीमें रहकर भजन करते थे। उनसे उन्होंने कहा- 'इस कार्यका समाधान आपको करना होगा। मैं जगह-जगह जाकर भिक्षा करूंगा। जो धन प्राप्त होगा आपके पास लाकर जमा कर दूँगा। पर आपको इस कार्यको करानेकी बाकी व्यवस्था करनी होगी।'
सेवा, प्रसाद और समर्पण की घटनाएँ
राजर्षिजी सहमत हुए। उन्होंने स्वयं पाँच हजार रुपये दिये। बाकी धन विश्वरूपदास बाबाने स्वयं जुटाया। इसके लिए उन्हें दो-तीन वर्ष तक लगातार बहुत परिश्रम करना पड़ा। दूर-दूर जाकर भिक्षाटन करनी पड़ी। उन्हें जो भी भिक्षा मिलती राजर्षिजीके पास लाकर जमा कर देते। यातायातमें जो खर्च होता उसे अन्य प्रकारसे अलगसे जुटाते। कुण्डके संस्कारके लिए पत्र-व्यवहार तकमें उसके लिए
प्राप्त भिक्षामें-से खर्च न करते। उनके उद्योगसे २-३ सालमें यह कार्यसम्प हुआ। फलस्वरूप उन्होंने कुण्डवासी सब वैष्णवोंका तो कृपा-आशीर्वाद प्राप्त कि ही, श्रीराधा-श्यामसुन्दरकी भी विशेष कृपा प्राप्त की।
प्रेम और भक्ति — जीवन-संदेश
ईश्वर-प्रेम की अनुभूति भक्त-साहित्य का एक महत्त्वपूर्ण विषय है। इन प्रसंगों को श्रद्धा, संवेदनशीलता और समर्पण के संदर्भ में पढ़ा जा सकता है।
कथा का सार
श्रीविश्वरूपदास बाबाजी की कथा भक्ति, विनम्रता और साधना पर मनन करने का अवसर देती है। इस संग्रह में अन्य भक्तों के जीवन-प्रसंग भी पढ़ें।