ब्रज के भक्त भाग 2 · अध्याय 39

श्रीसाधु माँ

श्रीसाधु माँ की प्रेरक हिंदी कथा। जानिए उनके जीवन, भक्ति और साधना से जुड़े महत्वपूर्ण प्रसंग।

श्रीसाधु माँ
श्रीसाधु माँ — ब्रज के भक्त भाग 2

श्रीसाधु माँ का यह भक्त-चरित्र ब्रज की साधना, श्रद्धा और जीवन से जुड़े प्रसंगों को सामने लाता है। नीचे कथा को अलग-अलग विषयों में व्यवस्थित किया गया है।

जन्म, परिवार और प्रारम्भिक जीवन

[ वृन्दावन ]

परम साध्वी, विदूषी, तेजोमयी और वैभवशालिनी साधु माँको सब 'साधु माँ' ही कहते। उनका सिद्धेश्वरी देवी नाम तो कोई बिरला ही जानता, क्योंकि वे सभी प्रकारसे साधु-मात्रकी माँके समान थीं। वे उनकी जागतिक और पारमार्थिक सभी प्रकारकी समस्याओंका हल करनेमें सदा तत्पर रहतीं। उनकी शंकाओंका समाधान करतीं, भजन-साधन सम्बन्धी उनकी गुत्थियाँ सुलझातीं, भाँति-भाँतिसे आश्वासन देकर उन्हें भजनमें उत्साहित करतीं, भोजन और वस्त्रादि देकर उनकी सांसारिक आवश्यकताओंकी पूर्ति करतीं। वृन्दावनमें रंगजीके बगीचेके पीछे एक सुरम्य १४६ ]

सम्प्रदायोंके साधू वहाँ जाकर उनसे अपने भजन-साधनकी बात कहते और न उद्यानमें उनका आश्रम वृन्दावनके साधुओंका मातृस्थान बना हुआ था। स लाभ करते। सख्य-भाव-सिद्ध सन्त श्रीग्वारिया बाबा तो अक्सर उनके पास जाय अपने 'यार' श्रीकृष्णकी शिकायत किया करते।

एक बार जब माँके आश्रममें कथा हो रही थी. सभीने देखा कि ग्वारिया चाल एक लम्बा चोंगा और पगडी पहने, हाथमें डण्डा और गेंद लिए सहसा भागते आहे और बोले- 'मइया री ! यार पकड़बे आय रह्यौ है। मोएँ छिपाय लै।'

मइयाने कहा- 'ऊपर कमरेमें जाकर छिप जाओ।' ग्वारिया बाबा कया गम्भीर वातावरणको चीरते हुए ऊपर जाकर छिप गये। कथाके पश्चात् मौके पूछनेपर बोले- 'मइया ! बा दिन यार मेरो दाँव दिये बिना भज गयो। आज मैं भज आयो गेंद लैके बिना दाँव दिये।'

माँने उन्हें माखन-मिसरी, खीरसा आदि खानेको दिया। खा-पीकर वे फिर कहींको रम गये।

गोस्वामीजीकी कन्याके रूपमें शारदीय दुर्गाष्टमीकी पावन बेलामें हुआ साधु माँका जन्म अद्वैतचार्य प्रभुके वंशज प्रभुपाद श्रीगोविन्दचर श्रीगोविन्दचन्द्रजीको उनके जन्मके पहले ही आभास हो गया था कि जो उन्नी कन्या रूपमें आविर्भूत होने जा रही हैं, वे साधारण बालिका नहीं, बल्कि सक्षत योगमाया हैं।

बाल्यकालसे ही पिताजीसे दीक्षा लेकर वे ठाकुर-सेवा, पूजा औ हरिनाम-कीर्तन आदिमें निमग्न रहतीं। कभी-कभी स्वतः अलौकिक वार्तालाप करते सुनाई पड़तीं।

उन्होंने पिताजीसे शास्त्राध्ययन बड़े मनोयोगके साथ किया औ षड्गोस्वामियोंके ग्रन्थोंका विशेषरूपसे अनुशीलन कर वैष्णव-सिद्धांतकी परम्पराने वेश ग्रहणकर वे श्रीमन्महाप्रभुके पदचिह्नोंका अनुसरण करते हुए तीर्थ-भ्रमणको निकल पड़ीं। उनकी उम्रकी महिलाके लिए यह एक साहसी कार्य था। पर, अं विश्वास था कि स्वयं महाप्रभु उनके साथ हैं और वे उनके आनुगत्यमें ही यात्रा कर रही हैं, इसलिए उन्हें किसी प्रकारका भय नहीं था।

व्रजभूमि और तीर्थ से जुड़ी घटनाएँ

यात्राके बीच में एकचक्रामें नित्यानन्दप्रभु और वक्रेश्वर महादेवके दर्शन करते हुए प्रसिद्ध तन्त्रपीठ तारापीठ पहुँची। वहाँ तारादेवीके दर्शन किये। उस समय श्रीसाधु माँ

उन्होंने अनुभव किया कि साक्षात् योगमाया उन्हें दर्शन देने पधारी हैं। उन्होंने मन्दिरके प्रांगणमें प्रसिद्ध तन्त्र-सिद्ध महात्मा वामाखेपा विराजमान थे। माँको देख पुष्पाञ्जलि उनके चरणोंमें अर्पित की और प्रणाम् किया। मनि उन्हें प्रतिप्रणाम किया। बहुत देर तक दोनोंमें गुप्त वार्तालाप हुआ। चलते समय माँने कहा- 'मैं महाप्रभु और राधागोविन्दके लीला-समुद्रमें डूबी रहकर भजन करना चाहती हूँ। कृपाकर आदेश करें कौन-से स्थानपर रहकर करूँ।' महात्माने कुछ दिन बेलूरमें गंगा-तटपर और पीछे वृन्दावनमें रहकर भजन करनेका संकेत किया।

माँ बेलूर जाकर गंगा-तटपर एक निर्जन स्थलमें कठोर साधनामें लग गयीं। उनके अन्तरंग परिकरोंमें श्रीकिशोरानन्द ठाकुर उनकी परिचर्यामें रहने लगे।

कुछ दिन पश्चात् वे वृन्दावन जाकर वंशीवटके निकट बड़े कुञ्जमें रहने लगीं। धीरे-धीरे रंगजीके बगीचेके पास उनके विशाल आश्रमका निर्माण हुआ और उसमें एक सुन्दर मन्दिरमें श्रीश्रीराधा कुञ्जकिशोरजीके श्रीविग्रहकी प्रतिष्ठा हुई। उसी समय एकके बाद एक बेलूर, भुवनेश्वर, पुरी और गोवर्धन आदि स्थानोंमें आश्रमों और मन्दिरोंका निर्माण हुआ। बेलूरमें श्रीप्रेमकिशोरजी, भुवनेश्वरमें श्रीजगन्नाथजी, श्रीबलभद्रजी, श्रीसुभद्राजी श्रीगोपालजी, गोवर्धनमें श्रीगिरधारीजी और पुरीमें चक्रतीर्थपर रसराज और महाभावके मिलित विग्रह श्रीश्रीगौरकिशोरजी (प्रसिद्ध श्रीसोनार गौरांग) की प्रतिष्ठा हुई।

इन सभी मन्दिरोंमें 'हरिभक्ति विलास' के अनुसार बड़े लाड़-चाव और विधि-विधानसे ठाकुर-सेवाकी जाती। श्रीकृष्ण जन्माष्टमी, राधाष्टमी और गौरपूर्णिमापर विशेष उत्सव मनाये जाते और ठाकुरके विधिपूर्वक अभिषेकके पश्चात् हवनादि किये जाते। एक बार वृन्दावनमें कृष्ण जन्माष्टमीके दिन उसी प्रकार उत्सव मनाया गया। सन्ध्या-समय माँ मन्दिरके पीछे तुलसीके बगीचेके निकट बैठी जप कर रही थीं। उसी समय एक व्रजयुवतीने उनके सम्मुख आकर कहा- 'तुम मेरा शरीर क्यों दग्ध करती हो ? वृन्दावनमें हवनका प्रयोजन ? यहाँ नाम-यज्ञसे ही सब यज्ञ हो जाते हैं।'

माँ भौंचक्की-सी उस परम सुन्दरी तेजोमयी व्रजयुवतीकी ओर देखती रह गयीं। उसकी बात उनकी समझमें न आयी। उन्होंने पूछा- 'तुम कौन हो माँ ?'

दिव्य अनुभूति और कृपा के प्रसंग

'मैं रजरानी हूँ, युवतीने उत्तर दिया और उसी समय अंतर्धान हो गयी।

तब वे सब कुछ समझ गयीं। सेवकोंको बुलाकर आज्ञाकी 'वृन्दावनमें

हवन कभी न करना।' तभीसे वृन्दावनमें उनके मन्दिरमें अभिषेकके पश्चात हवनकी प्रथा बन्द कर दी गयी. यद्यपि अन्य स्थानोंमें उनके मन्दिरोंमें हवन आज भी किया जाता है।

माँके अनेक शिष्य हुए, जिनमें प्रधान थे श्रीरामानन्द दादा, जो श्रीरामपुरमे मैजिस्टेट थे और जिन्होंने माँके आश्रममें सन्त-सेवा और गो-सेवाकी सुष्ठु व्यवस्था बनाया, श्रीअनन्तदासजी, जो उनकी अंतरंग सेवक थे और श्रीवीरा दीदी, जो उनके की, श्रीकृष्णानन्द ब्रह्मचारी और श्रीराम दादा, जिन्हें माँने वैष्णव शास्त्रोंमें पारदर्शी पंजाबी शिष्योंमें प्रधान थी। वीरा दीदीने बन्दावनमें उनके आश्रममें १०० वर्षसे भी अधिककी उम्र तक रहकर भजन किया।

माँके पंजाबी शिष्य बहुत थे। उनपर उनकी विशेष कृपा थी। उनके सम्बन्धमें वे अपने सेवकोंसे कहा करतीं 'इनके आचार-विचारपर ध्यान न देना। इनके सरल हृदय और भाव-भक्तिके कारण गौरकिशोर तथा राधाकुञ्ज किशोर सदा उनके हृदयमें विराजमान रहेंगे।'

रसराज श्रीकृष्ण और महाभावस्वरूपिणी श्रीराधाके मिलित स्वरूप श्रीगौरांगमहाप्रभुकी उपासिका होते हुए भी माँकी राधारानीमें अनन्य निष्ठा थी। महाप्रभुके संन्यास रूपके तो वे न दर्शन कर सकती थीं, न उनकी कथा सुन सकती थीं। एक बार बेलूरमें उनके आश्रममें एक भक्त निमाइ-संन्यासका कीर्तन कर रहे थे। माँ जैसे ही अपने कक्षसे निकलीं कीर्तनियाँके यह शब्द उनके कानमें पड़े-

'नदिया छाड़िया गोरा संन्यास करिला।'

उसी समय वे मूर्छित हो गयीं। बहुत देर तक उसी अवस्थामें पड़ी रहीं। जब मूर्छा भंग हुई तो बोलीं- 'प्राण गौरकिशोरको मस्तक-मुण्डित वेशमें मैं नहीं देख सकती। उस वेशका कीर्तन भी में नहीं सुन सकती।'

माँको रासलीला बहुत अच्छी लगती। उनके आश्रममें रासलीलाका आयोजन अकसर होता रहता। वे रासलीला देखते-देखते भाव विभोर हो जातीं। इसलिए, रासलीला वे आश्रमकी दूसरी मन्जिलपर ऐसे स्थानपर बैठकर देखतीं, जहाँ उनपर किसीकी दृष्टि न पड़े। रासलीलाके स्वामी और स्वरूप कहा करते कि वहाँसे रासलीलाके दर्शन करते हुए वे उनमें कुछ ऐसी शक्तिका संचार करतीं, जिससे उन्हें लगता कि वे आविष्ट हो यन्त्रके समान लीला कर रहे हों।

सम्वत् २००० वैशाख, शुक्लपक्ष सप्तमीको माँने नित्य-लीलामें प्रवेश किया।

नाम-स्मरण और एकाग्रता — जीवन-संदेश

नाम-स्मरण, भजन और एकाग्रता के प्रसंग साधना की निरंतरता की याद दिलाते हैं। यहाँ वर्णित जीवन-अनुभवों से पाठक अपनी साधना के लिए प्रेरणा ले सकते हैं।

कथा का सार

श्रीसाधु माँ की कथा भक्ति, विनम्रता और साधना पर मनन करने का अवसर देती है। इस संग्रह में अन्य भक्तों के जीवन-प्रसंग भी पढ़ें।