ब्रज के भक्त भाग 2 · अध्याय 35
श्रीरामदास बाबाजी
श्रीरामदास बाबाजी की प्रेरक हिंदी कथा। जानिए उनके जीवन, भक्ति और साधना से जुड़े महत्वपूर्ण प्रसंग।

श्रीरामदास बाबाजी का यह भक्त-चरित्र ब्रज की साधना, श्रद्धा और जीवन से जुड़े प्रसंगों को सामने लाता है। नीचे कथा को अलग-अलग विषयों में व्यवस्थित किया गया है।
भजन-साधना और नाम-स्मरण के प्रसंग
[ बरसाना, लोटनकुञ्ज ]
श्रीरामदास बाबाजी श्रीअभिरामगोपालकी परम्परामें दीक्षित हो सम्यरसकी उपासनामें संलग्न थे। व्रजमण्डलमें आनेके पश्चात् सिद्ध श्रीजगन्नाथदास बाबाजी महाराजके संग और उनकी कृपासे श्रीरूपानुगजनमें प्रवृत्त हुए। बरसानेमें रहकर भजन करने लगे। थोडे ही दिनोंमें उनके भजनकी ख्याति चारों ओर फैल गयी। उनकी सेवाका कुछ भी अवसर प्राप्त कर लोग अपनेको धन्य मानने लगे। वे खुले आकाशके नीचे भजन करते थे, यह देख ताड़ासकी रानीने उनके लिए भानुकुण्डके तटपर एक कुटिया बनवा दी। वे उसमें रहकर भजन करने लगे।
कुटियापर दर्शनार्थियोंकी भीड़ लगने लगी। पण्डोंमें चर्चा चल पड़ी कि बाबाके पास बहुत-सा धन है। इससे बाबाके भजनमें विघ्न पड़ने लगा। तब वे लोअनकुञ्जमें डॉक्टर विपिनबिहारीदास द्वारा बनवायी कुटियामें चले गये और अन्त तक वहीं रहकर करते रहे।
बाबा जातरति साधक थे। श्रीकृष्णकी उनपर विशेष कृपा थी। वे अपनी डायरी लिखा करते थे। डायरीमें एक जगह लिखा था-
'स्वयं महाभगवान् श्रीकृष्णचन्द्रने श्रीमुखसे मुझसे कहा - सुदुर्जय परम शत्रु मन देहमें वास करता है। उसे चौबीस घण्टे झाड़ मारकर अपने वशमें रखना, नहीं तो वह तुम्हारा भजन-साधन नष्टकर तुम्हें रौरव नरकमें ले जायेगा। सब प्रकारसे मनको निग्रहकर ताड़ना भर्त्सना द्वारा लीलामें नियुक्त रखना। जब वह असत् पथपर जाने लगे श्रीमन्महाप्रभु और श्रीनित्यानन्द प्रभुको एकाग्रचित्तसे पुकारना।'
साधना और महत्वपूर्ण घटनाएँ
संभवतः तभीसे वे मनको निग्रह करनेके लिए अपने तकियेके नीचे एक छुरी रखते। एक बार 'गौड़ीय-वैष्णव-जीवन' के लेखक, प्रातः स्मरणीय श्रीहरिदास दास बाबाजी महाराजने छरी देखकर उनसे उसका रहस्य पूछा। तब उन्होंने कहा- 'यह बदमाश मनको वशमें रखनेके लिए है। जिस दिन यह श्रीमन्महाप्रभु द्वारा निर्दिष्ट
भजन-पथसे मुझे विच्युत करेगा, या उसमें शिथिलता उत्पन्न करनेकी चेष्टा करेगा. उसी दिन इस चुरीसे अपना गला काटकर उसकी अन्त्येष्ठि कर दूँगा।'
इस सम्बन्धमें वे कितना दृढ प्रतिज्ञ थे, इसका भी उनकी डायरीसे पता चलता है। उसमें श्रीहरिदासदासजीने यह लिखा देखा था-
'यदि कोई व्यक्ति, चाहे वह कोई भी हो, मुझे अकारण जूता मारे, मेरे मुखमें पेशाब करे, शरीरपर विष्ठा डाले, सिरपर विषसे भरी लाठीसे प्रहार करे, काँटों द्वारा शरीर बिद्ध करे, गाली भरी दुरुक्तियों द्वारा मेरे मनको वेदना पहुँचाये या मेरा मस्तक छेदन करे तो भी मैं न शस्त्र चलाऊँगा, न वाक्य-वाण। आज बंगाब्द १३३८, माघ मासकी अष्टमी तिथि को २ बजे मैंने यह दृढ़ प्रतिज्ञा की। यदि मैं इस दृढ़ प्रतिज्ञाको भंग करूँ, तो २७८६० युगों तक नरक भोगूँ। भगवान् श्रीकृष्ण मेरी इस प्रतिज्ञाके साक्षी रहें। जब भी इस प्रतिज्ञाको भंग करनेकी इच्छा होगी, इस छुरीसे अपना गला काट लूँगा।'
व्रजभूमि और तीर्थ से जुड़ी घटनाएँ
अंनकी इस प्रतिज्ञांका श्रीहरिदासवासनीने 'गौड़ीय वैष्णव-जीवन में उल्लेख कियां है। एक और प्रतिज्ञा जिसका उन्होंने उनकी डायरीसे उल्लेख कियां है, इस प्रकार है-
'व्रजकी स्त्रियोंके प्रति लक्ष्मीके समान और पुरुषोंके प्रति विष्णुके समान भक्ति करनी है। अतएव हे मन! सावधान! सावधान! स्त्री हो या पुरुष, सबके समक्ष गल-वस्त्र दे हाथ जोड़कर रहना है। यह नियम जीवन-पर्यन्त पालन करना है। यह प्रतिज्ञा-पत्र बंगाब्द १३४७, भाद्र मासकी १७ तारीखको १२ बजे लिखा।'
श्रीरामदास बाबाने इन दोनों प्रतिज्ञाओंका सारा जीवन अक्षरशः पालन किया।
नाम-स्मरण और एकाग्रता — जीवन-संदेश
नाम-स्मरण, भजन और एकाग्रता के प्रसंग साधना की निरंतरता की याद दिलाते हैं। यहाँ वर्णित जीवन-अनुभवों से पाठक अपनी साधना के लिए प्रेरणा ले सकते हैं।
कथा का सार
श्रीरामदास बाबाजी की कथा भक्ति, विनम्रता और साधना पर मनन करने का अवसर देती है। इस संग्रह में अन्य भक्तों के जीवन-प्रसंग भी पढ़ें।