ब्रज के भक्त भाग 2 · अध्याय 46
श्रीप्रेममाधुरी बाईजी
श्रीप्रेममाधुरी बाईजी की प्रेरक हिंदी कथा। जानिए उनके जीवन, भक्ति और साधना से जुड़े महत्वपूर्ण प्रसंग।

श्रीप्रेममाधुरी बाईजी का यह भक्त-चरित्र ब्रज की साधना, श्रद्धा और जीवन से जुड़े प्रसंगों को सामने लाता है। नीचे कथा को अलग-अलग विषयों में व्यवस्थित किया गया है।
जन्म, परिवार और प्रारम्भिक जीवन
[ वृन्दावन ]
डॉक्टर नारायणदास परवाल (महेश्वरी) जयपुर दरबारके पारिवारिक चिकित्सक थे। जयपुरमें उनका बड़ा सम्मान था। उनके एक पुत्र और तीन कन्याओंने जन्म लिया। मझली कन्या धनवन्ती बाईका जन्म सम्वत् १९५६, चैत्र शुक्ला सप्तमीको हुआ। डॉ० नारायणदास कट्टर आर्यसमाजी थे। घरमें उनका बड़ा शासन था। आर्यसमाजी पद्धतिसे होमादि नित्य होता था, पर मन्दिरमें या श्रीमद्भावतादिकी कथामें जानेकी परिवारके सभी लोगोंको मनाही थी। धनवन्तीबाई
इसी वातावरणमें पलीं। शिक्षा भी उन्हें आर्यसमाजके ही एक स्कूलमें दी गयी, जिससे उनके आर्यसमाजी संस्कार और भी दृढ़ हो गये।
अल्पावस्थामें उनका विवाह हो गया। जब वे १६ वर्षकी ही थीं, उनके पतिका स्वर्गवास हो गया। वे मायके जाकर रहने लगीं। उनके मनमें सदा उदासी छायी रहती। संसार सूना और उजड़ा-उजड़ा-सा लगता।
एक दिन वे अपने घरकी छतपर टहल रही थीं। घरके सामने 'डिग्गी नोहरा' में वृन्दावनकी एक रासमण्डली कृष्ण सुदामा लीला कर रही थी। लीला छतसे दिखायी दे रही, थी।
धनवन्तीबाई मण्डलीके श्रीकृष्ण-स्वरूपकी अनुपम रूप-माधुरी, वेश-भूषा, और उनका अनोखा नृत्य-गीत और हाव-भाव देख मुग्ध हो गयीं। सुदामाके प्रति उनका भक्त-वात्सल्य, दैन्य और प्रेम-वैवश्य देख उन्हें ऐसा लगा कि उन्हें एक नयी दिशा मिल गयी, उनके मृत देहमें नये प्राणोंका संचार हो गया। उनके हृदयाकाशसे विषादके बादल सहसा छँटने लगे और आशाकी नयी किरणें फूटने लगीं। वे सोचने लगीं- 'मैं भगवान्को केवल सृष्टिका रचयिता, त्रिलोकीका अधिपति और शासक जानती थी। पर वे तो भक्तोंके सुहृद, सखा और बन्धु भी हैं। मैं उन्हें केवल आप्तकाम, आत्माराम, निर्मोही और निस्पृह जानती थी, पर वे लीलामय, करुणामय, भक्त-वत्सल और भक्त पराधीन भी हैं।
जो उन्हें सुदामाकी तरह अपना भाई-बन्धु कुछ मान लेता है, वे भी उसे अपने भक्त वात्सल्यके कारण उससे वैसा ही सम्बन्ध माननेको और उसके प्रति वैसा ही व्यवहार करनेको बाध्य हैं। ऐसे परमकरुण भगवान्के होते शोक और विषादका क्या कारण ? मैं भी क्यों न उन्हें अपना मान उनसे प्रेमका सम्बन्ध जोड़ और उनके प्रति आत्मसमर्पण कर अपना जीवन सार्थक करूँ ?'
सुदामाको आलिंगन कर श्रीकृष्णके प्रेमाश्रु बह निकले थे। उनका रोना देख धनवन्तीबाईको भी रोना आ गया था। उनका दुःखी, असहाय सुदामासे भावतादात्म्य हो गया था। उन्हें लगा था कि जैसे श्रीकृष्ण स्वयं उन्हें आलिंगन कर, उनके हृदयकी जन्म-जन्मान्तरकी पीड़ा दूर कर, और उसे एक अनिर्वचनीय शान्तिसे परिपूरित कर अन्तर्धान हो गये हैं।
धनवन्तीवाई रोई तो पहले भी बहुत थीं। पर यह रोना वैसा नहीं था, जैसा उन्हें पहले आया करता था। पहलेका रोना पतिसे बिछुड़नेके कारण था, यह रोना
भावनामें श्रीकृष्णको पाकर उनसे बिछडनेके कारण था। पहलेका रोना दुःखमय था। यह रोना विषामृत-मिलन जैसा दुःखमय होते हुए भी अपूर्व सुखमय था। पहलेका रोना मायाका परिणाम था। यह रोना योगमायाका वरदान था। पहलेका रोना मिध्या श्रा, कालकी गतिके साथ शनैः शनैः कालके गर्भमें विलीन हो जानेवाला था। उसका विराम था। पर इस रोनेका विराम नहीं था, यह निरन्तर वर्धनशील था। इसका विराम केवल श्रीकृष्ण-पाद-पद्मकी अविचल प्राप्तिमें था।
बहुत दिन तक घरके लोग धनवन्तीबाईको संसारसे उदासीन, अनमनी और शेती-धोती देख उनके वैधव्यको ही इसका कारण समझते रहे। पर उनके मौसेरे भाई शुक-सम्प्रदायके सन्त श्रीरूपमाधूरीजीको समझते देर न लगी कि उनकी अथाका वास्तविक स्वरूप क्या था। उन्होंने उन्हें सान्त्वना दी. उपदेश दिया, शुक-सम्प्रदायकी रस-साधनासे अवगत कराया और अपने गुरुदेव बोसरसमाधीजीसे दीक्षा दिलवाकर साधनपथपर आरुढ़ किया।
जन्म-जन्मान्तरसे भूली-भटकी प्रेममाधुरीबाईको पथ मिल गया और मिल गया एक परम अनुभवी और सिद्ध महापुरुषका पारमार्थिक बल वेव्या व्यावहारिक जगत्को पीठ दिखाकर सिंहनीकी तरह द्रुत गतिसे उसपर चल पड़ी।
उनका दीवानापन उनके माता-पिताको अच्छा न लगा। वे जब कभी गुरुदेवके सत्संगमें चली जाया करतीं। यह भी उन्हें अच्छा न लगता। उन्हें उनकी खरी-खोटी सुननी पड़ती। एक बार वे बहुत बीमार हो गयीं। चारपाईसे उठनेकी भी सामर्थ्य न रही। उसी अवस्थामें एक दिन वे गुरुदेवके दर्शनके लिए बहुत व्याकुल होकर उनका चिन्तन करने लगीं। गुरुदेव उस समय अपने स्थानपर भक्त मण्डलीके बीच बैठे सत्संग कर रहे थे। एकाएक उठ बैठे। भक्तोंसे बोले- 'मुझे धनवन्ती याद कर रही है। चलो उसे देख आयें।'
उन्हें सहसा बिना निमन्त्रण आया देख घरवाले अस्त-व्यस्त हो उनकी आवभगतके लिए तत्पर हुए। धनवन्तीने उठकर उन्हें प्रणाम्करनेकी चेष्टा की। वे उन्हें उठनेके लिए निषेध करते हुए उनके सिरहाने जा बैठे। उनके मस्तकपर हाथ फेरते हुए आँख मींचकर कुछ देर बैठे रहे। फिर बोले- 'शुकदेवजीकी कृपासे यह ठीक हो जायेगी। इसका वृन्दावनवास होगा और बहुत-से लोगोंका इसके द्वारा कल्याण होगा।'
घरके वातावरणसे ऊबकर धनवन्तीबाई ससुराल चली गयीं। यद्यपि वहाँ उनकी सेवा-पूजामें कोई रोक न थी, वहाँ भी वह हर समय उसमें लगे रहनेके
कारण भार-स्वरूप समझी जाने लगीं। वहाँका वातावरण भी उन्हें दुःखदाई प्रत्तीन लिए ससुराल और मायकेको छोड़ दूसरा स्थान ही और कौन-सा था, जहाँ वह होने लगा। पर वे कर ही क्या सकती थीं ? संभ्रांत परिवारकी उस विधवा युवतीले शरण ले सकती ? वह फिर मायके चली गयी।
पर, उसका मन अब वृन्दावन जानेको छटपट करने लगा। एक दिन उसने देखा कि उसके घरके सामनेसे पुलिस पकड़कर लिये जा रही है एक युवतीको जो अवैध रूपसे एक साथ रहनेके दोषी पाये गये थे। * मार्गमें लोग पुलिससे कह रहे थे- 'भाई, यह दोनों अबोध हैं। नासमझीके कारण कुछ गलती कर बैठे हैं। यदि यह पश्चाताप करें और एक-दूसरेका संग छोडनेको राजी हों, तो इन्हें छोड़ दो।'
पर वे तीनों कह रहे थे- 'पुलिस हमें छोड, जेलमें ठूंसे, या फाँसी दे, हम एक-दूसरेको नहीं छोड़ सकते। हमने प्रेम किया है, खिलवाड़ नहीं।'
धनवन्तीबाईको उस युवतीसे प्रेरणा मिली। वे सोचने लगीं- 'यदि एक युवती एक साधारण पुरुषके प्रेमपर अपना तन-मन न्यौछावर कर सकती है, लोक-लाजको तिलाञ्जलि दे सकती है और निर्भयतापूर्वक शासन तकको चुनौती दे सकती है, तो मैं अपने प्रभुके लिए ऐसा क्यों नहीं कर सकती ?' उन्होंने संसारको तिलाञ्जलि दे वृन्दावन जानेका निश्चय कर लिया।
एक बार वे वृन्दावन दर्शन करनेके बहाने वहाँ गयीं और वहीं रह गयीं। जुगल घाटपर मुकुटवालोंके मकानमें रहकर भजन करने लगीं। श्रीरूपमाधुरीजी पहले ही वृन्दावन पहुँच चुके थे और वैराग्य-वेष ग्रहणकर जुगल घाटपर रह रहे थे। उन्हींसे कुछ दिन बाद उन्होंने भी वेश ले लिया। नाम हुआ श्रीप्रेममाधुरीबाई।
प्रेममाधुरीबाईने वृन्दावन आनेसे पूर्व वृन्दावनमें अपने निर्वाहके लिए कोई व्यवस्था नहीं की थी। वे अपने साथ भी कुछ नहीं लाई थीं। उनके विधवा होनेके बाद उनकी ननदने सोनेकी चूड़ियाँ उन्हें पहना दी थीं। पूर्वाश्रमकी उस स्मृतिको भी वे अपने पास क्यों रखतीं ? उन्होंने उन्हें बेचकर वैष्णव-सेवाके किसी कार्यमें लगा देनेका निश्चय किया। वृन्दावनमें उनके गुरुभाई और गुरुबहिनें अकसर आया करते थे। उनके ठहरनेके लिए कोई उपयुक्त स्थान नहीं था। उन्होंने चूड़ियाँ बेचकर एक जमीन दोसायत मोहल्लेमें खरीदी। दूसरे लोगोंने उसपर एक-एक कर कई कमरे बनावा दिये। वही स्थान आज 'शुक-भवन' के नामसे प्रसिद्ध है और वृन्दावनमें
व्रजभूमि और तीर्थ से जुड़ी घटनाएँ
* उस समय जयपुरमें राजा माधोसिंहका राज्य था, जिसमें ऐसे लोगोंको कठिन दण्ड
दिया जाता था।
। उसीमें एक कमरेमें वे स्वयं रहने लगीं।
शुक-सम्प्रदायका प्रमुख स्थान है इस प्रकार उनके रहनेकी तो व्यवस्था हो गयी। पर जीविका निर्वाहके के लिए
निश्चित व्यवस्था नहीं थी। उनके बहनोई मुन्शी नानकराम जौहर जयपुर-स्टेटमें मन्त्री थे। उन्होंने घरकी सम्पत्तिमें से उनका अपना हिस्सा दिलवाकर इसकी जीविका का प्रबन्ध करवा देनेकी बात कही, तो उन्होंने उसी स्वीकार नहीं किया। जब संसार छोड ही दिया. तो फिर सहारेके लिए उसकी ओर क्या ताकना। जिसके भरोसे वृन्दावन आयी थीं उसकी कृपापर उन्हें पूरा विश्वास था। उसने कभी उन्हें भूखा नहीं रहने दिया। इतना ही नहीं, वे आचार्योंकी तिथिपर उत्सव और
व-सेवाका आयोजन भी करतीं। उसके लिए भी उन्हें कोई अभाव न रहता। प्रेममाधुरीबाई नित्य यमुना-स्नान करतीं। अपने हाथसे चक्की पीसतीं और बड़ी शुचितासे रसोई तैयार कर ठाकुरको भोग लगातीं।
उनके गुरुभाई मास्टर मूलचन्दजी बी० ए० भी वृन्दावनमें रहकर भजन किया करते। वे बाईजीसे बहुत प्रभावित थे। बाईजीने उन्हें भी वेष ले लेनेका परामर्श दिया। उन्होंने कहा- 'मैं वेष लूँगा तो आपसे ही, अन्य किसीसे नहीं।'
दैन्यकी मूर्ति बाईजी तो किसीको दीक्षा या वेष देती नहीं थीं। उन्होंने उनसे भी वेष देनेको मना कर दिया, पर स्वप्नमें श्रीसरसमाधुरीजी-ने उन्हें आज्ञा की, तब विवश हो उन्हें वेष देना पड़ा। उनका नाम रखा श्रीमतीशरणजी।
श्रीमतीशरणजीको वेष देनेके पश्चात् जब उन्होंने उन्हें पीले वस्त्रोंमें देखा, तो उन्हें उनके स्वरूपमें श्रीश्यामचरणदासजीके साक्षात् दर्शन हुए। यह उनके भावके अनुकूल ही था। गुरुदेवमें उनका अनन्य भाव था। वे प्राणिमात्रमें गुरुदेवका अधिष्ठान जान उसे अपना पूज्य समझती थीं। उस दृष्टिसे शिष्य होनेके पश्चात् भी अन्य प्राणियोंकी भाँति श्रीमतीशरणजी भी उनके पूज्य रहे ही। कदाचित् उनके इस भावकी पुष्टि करनेके लिए ही श्रीश्यामचरणदासजीने उन्हें उनके स्वरूपमें दर्शन दिये। उन्होंने उस समय उन्हें साष्टांग दण्डवत् प्रणाम् किया।
प्रेममाधुरीबाईको एक बार इसी प्रकार शुकदेवजीने भी साक्षात् दर्शन देनेकी कृपा की। वे श्रीमतीशरणजी और शुक-सम्प्रदायके कई अन्य लोगोंको साथ ले शुक्रतार (शुकताल) दर्शन करने गयी थीं, जहाँ श्रीशुकदेवजीने श्रीश्यामचरणदास महाराजको दर्शन देकर दीक्षा दी थी और जहाँ श्रीशुकदेवजीका मन्दिर और शुक-सम्प्रदायका गुरुद्वारा है। शुकदेवजीकी श्रीमूर्तिक दर्शन कर जब वे लौट रही थीं, ब्हें और श्रीमतीशरणजीको मार्गमें एक साथ शुकदेवजीके साक्षात् दर्शन हुए। दोनों
भाव-विभोर अवस्थामें कुछ क्षण उन्हें खडे देखते रहे। दूसरे लोग जो उनके साथ थे उन दोनोंको उस अवस्था में चकित देखते रहे। उन्हें किसी प्रकारके दर्शन नहीं हुए। श्रीमतीशरणजी अब बाईजीकी सेवामें रहने लगे थे। वे ठाकुरके लिए
अमंनियाँ तैयार करते, बाईजी भोग लगातीं। भोग लगाते समय वे भावना करती। यदि अमनियाँमें कोई कमी रह जाती, तो वे भावनामें जान जातीं। कभी वे श्रीमतीशरणजीसे कहतीं- 'आज खीरमें चीनी नहीं पडी', कभी कहती 'सागमें नमक बहुत हो गया, श्रीजीने नहीं पाया।' भोग लगनेके पश्चात् जब प्रसाद चखा जाता, तो वैसा ही निकलता। कभी-कभी भोग लगाते-लगाते ही वे किसी त्रुटिका अनुभव करतीं, तो फिरसे अमनियाँ बनानेको कहतीं। उन्होंने वृन्दावन आनेपर एक बार गोपालमन्त्रका विधिपूर्वक अनुष्ठान किया था। तभीसे उनका भावनामें अभिनिवेश बढ़ गया था और उन्हें इस प्रकारके अनुभव होने लगे थे।
सन्तोंकी अपनी दुनिया अलग हुआ करती है। उन्हें एक-दूसरेसे सम्पर्क करनेके लिए टेलीफोन या वायरलेसकी आवश्यकता नहीं होती। उन्हें बिना किसी उपकरणके ही एक-दूसरेका पता चल जाता और वे एक-दूसरेके निकट खिंचते चले आते हैं। वृन्दावनके सख्यरस-सिद्ध सन्त श्रीग्वारिया बाबाको प्रेममाधुरीबाईका पता चला और वे उनके पास आने लगे। एक बार प्रेममाधुरीबाई द्वारा आयोजित शरदपूर्णिमाके उत्सवमें वे पधारे। उस समय भोगकी सामग्री ठाकुरके सामने रखी जा रही थी। भोग अभी नहीं लगा था। उन्होंने थालमें से एक लड्डू उठाकर मुँहमें रख लिया और ठाकुरको अँगूठा दिखाकर चल दिये।
सिद्ध श्रीगौरांगदास बाबा भी उनसे बहुत स्नेह करते। वे उनकी कथामें बराबर जाया करतीं। जब कहीं उनकी कथा न होती, तो रमणरेतीमें उनके स्थानपर जाकर उनका सत्संग करतीं।
एक बार गौरांगदास बाबाके आश्रमपर किसी उत्सवमें प्रेममाधुरीबाई और श्रीमतीशरणजी आमन्त्रित थे। उत्सवके पश्चात् किसीने वैष्णव-अधरामृत बाबाको लाकर दिया। बाबाने थोड़ा स्वयं लिया और थोड़ा इन दोनोंको दिया। दोनोंने उसे पा लिया। थोड़ी देर बाद जब वे आश्रमसे लौट रहे थे उन्हें एक आनन्दमयी मस्तीका अपूर्व अनुभव हुआ। दूसरे दिन जब इन लोगोंने बाबासे इसका वर्णन किया, तो वे बोले-
'देखो, एक होता है प्रसाद, जो ठाकुरके सामने भोग रख दिया जाता है, दूसरा होता है महाप्रसाद, जो भाव और प्रेमसे अर्पित किया जाता है और जिसे
कुर प्रेमसे आरोगते हैं. तीसरा होता है सीतप्रसाद, अर्थात् सन्तोंका पाया हुआ प्रसाद, जिसे पा लेनेसे ऐसे अलौकिक अनुभव हुआ करते हैं।' श्रीगौरांगदास बाबा भी कभी-कभी घूमते-फिरते शुकभवन पहुँच जाते। उनकी
जिसमें श्रोता सराबोर हुए बिना न रखते। मनुष्योंकी कौन कहे स्थावरजङ्गम भी कथा भी कभी-कभी वहाँ हुआ करती। आँगनमें एक नीमका वृक्ष था, जिसके नीचे बैठकर वे कथा कहते। उनकी कथामें एक अपूर्व अप्राकृत रसकी वर्षा होती, उसे सुननेके लिए लालायित रहते। दाऊजीकी बगीचीमें पण्डित रामकृष्णदास माबाके सान्निध्यमें उनकी कथामें नित्य एक अजगरके ठीक कथाके समय आने और कथाके बाद चले जानेकी कथा प्रसिद्ध हो चुकी थी। उसी प्रकार शुक-भवनमें इनकी कथामें नित्य एक मोर आया करता। कथाके मंगलाचरणके समय वह वक्ता और श्रोताओंकी परिक्रमा करता। जो लोग दीवारसे पीठ लगाकर बैठे होते उनसे बाको थोडा आगे सरककर बैठनेको कहना पड़ता, जिससे वह परिक्रमा कर के। परिक्रमाकर वह बाबाके मुखके सामनेवाली आँगनकी दीवारपर जा बैठता।
उहाँ बैठकर कथा सुनता और कथाके समाप्त होते ही उड़ जाता।
एक बार बाबा शुक-भवनमें वृन्दावन-महिमामृतकी कथा कह रहे थे। होलीके कारण कुछ दिनोंके लिए कथाको विश्राम देना पड़ा। उस समय बाईजीकी छोटी बहिन विद्यावती और बड़ी बहिनकी लड़की दयाबाई उनके पास ठहरी हुई थीं। उन्हें और श्रीमतीशरणको साथ ले वे गिरिराजकी परिक्रमा मार्गपर जतीपुरामें कुछ देर एक व्रजवासीके घर रुकीं।
वहाँके व्रजवासियोंमें प्रथा है कि होलीसे पूर्व वहाँके सभी घरोंके व्रजवासी एकत्र होकर गिरिराजजीकी तरहटीमें जाते हैं। वहाँ समाज-गान करते हैं। उसके पश्चात् गिरिराजको होली खेलनेका निमन्त्रण दे घर लौट आते हैं। उस दिन जब यह लोग वहाँ पहुँचे, तब वे सब लोग गिरिराजकी तरहटीमें जानेको प्रस्तुत थे। यह में उनके साथ हो लिए। समाज-गानके पश्चात् गिरिराजको निमन्त्रण दे सबके साथ म लौट आये। लौटते समय प्रेममाधुरीबाईने कहा- 'चलो, इस बहाने गिरिराजजीके दर्शन हो गये। कोई गिरिराज होली खेलने थोड़े ही आते हैं।'
जीवन के अंतिम प्रसंग और स्मृतियाँ
थोड़ी देर बाद यह लोग परिक्रमा मार्गपर आगे चल दिये। कुछ दूर जाकर बईजीने देखा कि एक सात-आठ वर्षका बालक मोर-मुकूट-पीताम्बर और बहुमूल्य आभूषण धारण किये हाथमें छडी लिये विपरीत दिशामें चला जा रहा है। उसकी चमचमाती हई जरीकी पोशाक और हीरे मोतीके गहनोंपर निगाह नहीं टिक
रही है। वे बोलीं- 'देखो, यह किसका बालक है ? इतने बहुमूल्य आभूषण धारण किये अकेला यहाँ विचर रहा है। कोई इसका अनिष्ट न कर दे।'
साथियोंने कहा- 'कहाँ ? हमें तो कोई नहीं दीख रहा।'
'अरे, अभी-अभी तो हमारे पाससे निकलकर गया है' कह वे उसकी पोशाक और आभूषणोंका वर्णन करने लगीं।
जब गोवर्धन पहुँची तो देखा गिरिराज ठीक वैसे ही वस्त्र और आभूषण धारण किये हैं। यह देख उनके शरीरमें कम्पन होने लगा और नेत्रोंसे अश्रु प्रवाहित होने खेलने भी जाते हैं। बालरूपमें गिरिराजकी वह छवि उनके हृदयमें समाकर रह लगे। वे समझ गयीं कि गिरिराज गमनागमन करते हैं और भक्तोंके निमन्त्रणपर होली गयी।
उस दिन रातको वे गोवर्धनमें रह गयीं। दूसरे दिन बरसाने चली गयीं। दो-तीन दिन वहाँ रहकर और वहाँकी रंगीली होली देखकर वृन्दावन लौट गयीं। इस बीच बराबर गिरिराजकी वह छवि उनके नेत्रोंके सामने घूमती रही। वे कुछ खोई-खोई रहीं और उनके नेत्र अनवरत अश्रुओंसे सिक्त रहे।
जिस दिन वे वृन्दावन पहुंची श्रीगौरांगदास बाबाकी कथाके विश्रामकी अवधि समाप्त हो चुकी थी। वे कथाके समयसे कुछ पूर्व ही शुकभवन आ विराजे थे। प्रेममाधुरीबाईको देख वे बोले - 'कहाँ, कहाँ दर्शन किये ?'
बाईजीने राधाकुण्ड, बरसाना और गोवर्धनादिके दर्शनकी बात कही। तब बाबाने कहा - 'परिक्रमा मार्गपर गिरिराजके दर्शनकी बात तो तूने कही नहीं।'
बाबाके मुखसे यह सुनते ही उनके धैर्यका बाँध टूट गया। आँसुओंका ढेऊ, जिसे वे कई दिनसे रोकनेकी चेष्टाकर रही थीं, सहसा उमड़ पड़ा। बाबाके चरणोंमें सिर रख वे फूट-फूटकर रोने लगीं। बाबाके नेत्रोंसे भी अश्रुधार बह निकली। उन्होंने उनके सिरपर हाथ रखा और कहा - 'लाली, तू धन्य है !'
थोड़ी देर बाद प्रकृतिस्थ हो वे बोले- 'यह कोई अनहोनी बात नहीं। प्रिया-प्रियतमकी अप्राकृत लीलाओंकी भावना करते-करते साधकके मन-प्राण अप्राकृत हो जाते हैं, वैसे-ही-जैसे अग्निमें डाला हुआ लोहा अग्नि हो जाता है। तब अप्राकृत नेत्रोंसे उसे उन अप्राकृत लीलाओंके दर्शन होने लगते हैं।'
प्रेममाधुरीबाईकी एक विशेषता यह थी कि वे सभी सम्प्रदायोंके महात्माओं और ग्रन्थोंका आदर करतीं। इसलिए बाबा गौरांगदासजी ग्वारिया बाबा, बाबा
हंसदासजी, बाबा बालगोविन्ददासजी आदि सभी समप्रदायोंके सन्त उनके पास आया करते। उनके संग और सभी सम्प्रदायोंके सन्त उनके पास आया करते। उनके संग अनन्य निष्ठा हो गयी और वे विशुद्ध सहचरी भावसे मानसिक और दैहिक सेवामें और सभी सम्प्रदायोंके वाणी-ग्रन्थोंके अध्ययनके प्रभावसे राधारानीके प्रति उनकी संलग्न रहने लगीं। वे आचार्य श्रीश्यामचरणदासजीके इस पदको अक्सर दोहराया करती-
श्रीस्वामी हरिदासजी, रसिक महा हरिब्यास ।
कृष्णदास अरु हित अली इन मारग सुखरास ।।
सोई मेरो मार्ग है महामोद की खाना ।
उन्नत परम निकुञ्ज रस तिन वाणी परमान ।।
(भत्तुिरस-मञ्जरी)
प्रेममाधुरीबाईने सोचा कि प्रेमसरोवरका एकान्त और रमणीक वातावरण सहबरी भावकी मानसिक सेवाके लिए अधिक उपयुक्त होगा। इसलिए, वे कुछ दिन वहाँ रहकर भजन करनेके उद्देश्यसे श्रीमतीशरणजीको साथ ले वहाँ चली गयीं। रामगढ़के श्रीनारायणप्रसाद पोद्दारके आग्रहसे उनके गोपालजीके मन्दिरके सामनेवाले हिस्सेमें ठहरों। वहाँका परिवेश उन्हें अपने भजनके बहुत अनुकूल प्रतीत हुआ। वे ११ वर्ष तक वहीं रहकर भजन करती रहीं। उस समय श्रीप्रियाशरण बाबा वहाँ रहते थे। उनका सत्संग भी वे करती रहीं।
वहाँ उनका शुद्ध सहचरी भावके अपने भजनमें अभिनिवेश और अधिक बढ़ गया। श्रीजीकी कृपा भी उनके ऊपर पहलेसे अधिक होने लगी। उन्हें उनकी दिव्य-लीलाओंकी कभी कोई छटा दीख जाती, कभी कोई। एक बार प्रातः जब वे प्रेमसरोवरपर स्नान करने गयीं, उन्होंने देखा कि सरोवर-के उस पार दिव्य प्रकाश हो रहा है और मोर नृत्य कर रहा है। वे श्रीमतीशरणजीको लेकर उस पार गयीं तो कुछ नहीं।
रात्रिमें सरोवरके निकट वैसा ही प्रकाश उन्हें एक बार फिर दिखाई दिया। सुन्दर रागके साथ रास-नृत्यकी-सी आवाज भी सुनायी पड़ी। पर दिखाई कुछ भी नहीं दिया। वे उनके अन्वेषणमें देर तक जंगलमें भटकती रहीं। फिर भी दीखा कुछ नहीं। वे राधारानीके प्रति आक्षेप करती हुई दुःख प्रकट करने लगीं- 'स्वामिनी, जब इतनी कृपा करती हो, तो दीखती क्यों नहीं ? तुम्हें क्या अच्छी लगती है यह आँख-मिचौनी ? तुम क्या नहीं जानतीं इससे मेरे ऊपर क्या बीतती है ?
मीठे हैं ? बालिकाने उनके निकट आकर उन्हें पीलूके फल देते हुए कहा- 'देखो, ये क इस प्रकार आक्षेपसहित रोदन करते उन्हें सारी रात बीत गयी। प्रातः एक
छद्म वेशमें राधारानीकी कृपा प्राप्तकर वे कृत-कृत्य हो गयीं। फल देकर वह जाने लगी और देखते-देखते अन्तर्धान हो गयी। इस प्रकार
जाकर रहने लगीं। जाते ही उन्होंने श्रीमद्भागवत सप्ताहका आयोजन किया। पाठके ग्यारह वर्ष पश्चात् वे फिर गुरुभाई-बहिनोंके आग्रहसे वृन्दावनमें शुकभवनमें अन्तिम दिन लगभग १०० वैष्णवोंको जिमानेकी व्यवस्था की। भोग लगाते-लगाते घबराये हुए उनके पास जाकर बोले- 'अब क्या होगा ? प्रसाद थोडा खानेवाले १०० वैष्णव नन्दग्राम, वरसाना और जयपुरसे और आ पहुँचे। श्रीमतीशरणजी बहुत हैं।'
उन्होंने डाँटते हुए कहा- 'तुम्हारी जड़बुद्धि अभी तक नहीं गयी। भगवत-प्रसाद भगवानकी ही तरह चिन्मय और विभु है। चिन्ता क्या है ?'
सचमुच, सभी लोगोंने भरपेट प्रसाद पाया, फिर भी कुछ बच रहा।
प्रेममाधुरीबाई मान-प्रतिष्ठासे दूर रहतीं। उन्होंने कभी किसीको अपना फोटो लेनेकी अनुमति नहीं दी। राजस्थानके भक्त श्रीजगदीशदास राठौरने शुक-सम्प्रदायके सन्तोंके जन्मोत्सवके उपलक्ष्यमें गाये जानेके लिए बधाईके पदोंकी रचना की थी। उनके मनमें विचार आया कि बाईजीके जन्मोत्सवके उपलक्ष्यमें भी वे बधाईक पदकी रचना करें। बाईजीसे उन्होंने इस सम्बन्धमें कोई चरचा नहीं की। फिर भी उन्होंने इनका मनोभाव जानकर उनसे कहा- 'मेरे जीवित रहते मेरे विषयमें कुछ न लिखना।'
संवत् २०३३, आश्विन मासमें वे अस्वस्थ हुई। श्रीमतीशरणजी उनकी सेवामें थे। आश्विन, शुक्लपक्ष चतुर्दशीको उन्होंने उनसे कहा- 'मुझे श्रीजीके सामने ले चलो।' उन्हें उस कमरेमें ले जाया गया, जहाँ श्रीजी विराजमान थीं। श्रीजीके दर्शन कर वे अपने कमरेमें चली गयीं। उस समय उनके मुखारविन्दपर अपूर्व तेज था। वह खिल हुए कमलके समान प्रफुल्लित दीख रहा था। वे भावनामें अपने सहचरी-स्वरूपमें स्थित हो चुकी थीं। कुछ ही देर बाद उसी स्वरूपसे वे श्रीजीके निकट निकुञ्जमें पहुँच गयीं।
प्रेम और भक्ति — जीवन-संदेश
ईश्वर-प्रेम की अनुभूति भक्त-साहित्य का एक महत्त्वपूर्ण विषय है। इन प्रसंगों को श्रद्धा, संवेदनशीलता और समर्पण के संदर्भ में पढ़ा जा सकता है।
कथा का सार
श्रीप्रेममाधुरी बाईजी की कथा भक्ति, विनम्रता और साधना पर मनन करने का अवसर देती है। इस संग्रह में अन्य भक्तों के जीवन-प्रसंग भी पढ़ें।