ब्रज के भक्त भाग 2 · अध्याय 9

श्रीप्रेमदास बाबाजी

श्रीप्रेमदास बाबाजी की प्रेरक हिंदी कथा। जानिए उनके जीवन, भक्ति और साधना से जुड़े महत्वपूर्ण प्रसंग।

श्रीप्रेमदास बाबाजी
श्रीप्रेमदास बाबाजी — ब्रज के भक्त भाग 2

श्रीप्रेमदास बाबाजी का यह भक्त-चरित्र ब्रज की साधना, श्रद्धा और जीवन से जुड़े प्रसंगों को सामने लाता है। नीचे कथा को अलग-अलग विषयों में व्यवस्थित किया गया है।

व्रजभूमि और तीर्थ से जुड़ी घटनाएँ

[ वृन्दावन ]

लगभग १०० वर्ष पूर्वकी बात है। उस समय भारतमें अँग्रेजोंका राज्य था। मथुरा जिलेका कलेक्टर एक अँग्रेज था। बड़ा खूंखार था वह । सभी लोग उससे भयभीत रहते। शिकारका उसे बडा शौक था। व्रजके वनोंमें वह अक्सर शिकारको डेरा डाला। जब वह एक हिरनको मारनेके लिए निशाना साध रहा था, पीछेसे एक जाया करता। एक बार उसने शिकारके उद्देश्यसे नन्दगाँवसे कुछ दूर उद्धवक्यारीचे दीर्घकाय, गौर कान्तियुक्त बाबाजीने आकर उसकी बन्दूक पकड़ ली और कहा- Pray do not do this in this holy land of Krishna. (कृपाकर श्रीकृष्णकी इस पवित्र भूमिमें यह न करें ।)

उसी क्षण कलेक्टरके सिपाही बाबापर दौड़ पड़े। कलेक्टरने भी टेढ़ी नजरसे उनकी ओर देखा। पर, उसे समझते देर न लगी कि यह कोई साधारण बाबा नहीं है। जिसने उसकी बन्दूक पकड़नेका साहस किया है। बाबाका लम्बा चौड़ा शरीर था। और गौरवर्ण। वह निर्भयतासे कलेक्टरकी ओर देख रहे थे। उनके नेत्रोंमें प्रेम और विनयपूर्ण आग्रहका भाव था। वे सिपाहियोंकी धर-पकड़ और कलेक्टरकी टेढो नजरसे जरा भी विचलित नहीं हुए थे। उनकी अँग्रेजी भाषा बता रही थी कि वे एक शिक्षित व्यक्ति हैं। दृष्टि भंगीसे ऐसा बिलकुल नहीं लग रहा था कि वे विक्षिप्त है। कलेक्टरने अपनी नजरके टेढ़ेपनको कुछ कम करते हुए पूछा- Who are you to prevent me ? (तुम मुझे रोकनेवाले कौन हो ?)'

I am your humble servant. It is my duty to advise that you should not kill animals here, unless you want to invite the wrath of Gods. Even

preventing everybody else from doing so. (मैं आपका तुच्छ दास है। मेरा the Moghuls did not do any shooting in these forests and issued orders शिकार नहीं बनना चाहते, तो यहाँ किसीका शिकार न करें। मुगलोंने भी ऐसा नहीं कर्तव्य है आपको यह सत् परामर्श देनेका कि यदि आप स्वयं देवताओंके कोपका किया और अपने फरमान द्वारा सभी को ऐसा करनेसे

वर्जित किया।)' कलेक्टर बाबाकी निर्भीकता. विनम्रता और उनके तेजपूर्ण व्यक्तित्वसे प्रभावित हुआ। उन्हें अपने डेरेमें ले जाकर उनसे बहुत-सी बातें की। अन्तमें उसने उजमें शिकार न खेलनेका वचन दिया और यह हुक्म जारी किया कि भविष्यमें कोई भी व्रजके किसी जीवका हनन न करें ।

कलेक्टरकी बन्दूक पकड़नेवाले बाबा पूर्वाश्रममें कश्मीरमें डिप्टी मजिस्ट्रेट थे। एक बार उनकी अदालतमें एक मुकदमा आया, जिसमें उन्हींके भाँजेको सजा होनी थी। भाँजा निर्दोष था। पर गवाहोंके बयानके अनुसार कानून उसे दोषी ठहरानेको मजबूर था। वे अपने निर्दोष भाँजेको सजा भी नहीं देना चाहते थे और कानूनके विरुद्ध भी कोई कार्य नहीं करना चाहते थे। उन्होंने नौकरीसे इस्तीफा देनेका निश्चय किया। इस्तीफा देकर वे वृन्दावन चले गये।

सेवा, प्रसाद और समर्पण की घटनाएँ

वे पहलेसे ही भक्तिभाव-सम्पन्न और वृन्दावनके प्रति निष्ठावन थे। वृन्दावन जाकर भजन करनेका स्वप्न भी देखा करते थे। प्रभुकी इच्छासे यह घटना उनके स्वप्नको सत्य करनेमें सहायक हुई।

डिप्टी मजिस्ट्रेट साहब रासके प्रेमी थे। उनकी धारणा थी कि रासमें साक्षात् श्रीकृष्ण रासमण्डलीके ठाकुरके रूपमें लीला करते हैं, पर उन्होंने इस बातकी परीक्षा करना चाहा। एक दिन वे वंशीवटपर रास देखने गये। अपने साथ एक थैलेमें कुछ पेड़े ले गये। सोचा कि यदि ठाकुरजी सच्चे हैं, तो स्वयं पेड़े माँगकर ले लेंगे। जब रास समाप्त होनेको हुआ, ठाकुर छमछम करते उनके निकट आये और बोले- 'गोझामें पेड़ा छिपाय राखे हैं, दे नाँय' और थैला छीनकर ले गये।

श्रीकृष्णमें और अपने प्रति उनकी कृपामें डिप्टी मजिस्ट्रेट साहबका विश्वास पहलेसे भी अधिक दृढ़ हो गया। उन्होंने श्रीकृष्णका साक्षात्कार प्राप्त करनेके उद्देश्यसे भिक्षावृत्तिसे वृन्दावनमें रहकर भजन करनेका संकल्प कर लिया, पर उन्हें अभी वृन्दावनकी रीति-नीति और आचार-विचारका तो कुछ ज्ञान था नहीं। वे भिक्षा करने जाते पीले रंगका एक ढीला-ढाला रेशमी वस्त्र पहनकर। उनका ब्राह्मण शरीर था। कदाचित् अपने जन्म-जात संस्कारोंके कारण रेशमी वस्त्रको पवित्र जानकर वे ऐसा करते थे।

श्रीअवधदास बाबाके आश्रम जा पहुँचे। अवधदास बाबाको उनके दीप्तिमान तेजपुंज-कलेवर और वेशभूषाको देख समझते देर न लगी कि वे किसी सम्मान एक दिन वे भिक्षाके लिए छीपीगलीमें माध्वगौडीय-वैष्णव सम्प्रदायक आवश्यकता है। उन्होंने सेवकसे उन्हें भिक्षा देनेको कहा। फिर अपनी करुणामद परिवारके व्यक्ति हैं, जिन्हें संसारसे वैराग्य हो गया है, पर जिन्हें पथ-प्रदर्शनकी दृष्टि उनपर डालते हुए बोले- 'वत्स, तुम्हें इस वेशमें भिक्षा करना शोभा सी बहुत कुछ जानना है। सन्ध्या-समय यहाँ श्रीमद्भागवतकी कथा होती है। उसे सुन देता। ऐसा लगता है कि तुमने इस पथपर अभी पदार्पण मात्र किया है। अभी तुम करो। तुम्हारा कल्याण होगा।'

डिप्टी मजिस्ट्रेट साहबने अपने रेशमी वस्त्र उतार दिये और दूसरे दिनसे नित्य कथासे वे इतने प्रभावित हुए कि उनके चरणोंमें पूर्ण आत्मसमर्पण करनेको बाध्य अवधदास बाबाकी कथा सुनने जाने लगे। उनकी अष्ट-सात्विक-भावपूर्ण रसमयी हुए। उन्होंने उनसे विधिवत् दीक्षा और वेश ग्रहण किया।

भजन-साधना और नाम-स्मरण के प्रसंग

श्रीगुरु और गोविन्द दोनोंकी कृपा मिल जानेके पश्चात् उन्होंने घर चि‌ट्ठी लिख दी - 'मुझे अपने सच्चे सम्बन्धी अब मिल गये हैं। संसारसे मेरा सम्बन्ध नहीं। रहा। मैं घर लौटकर नहीं आऊँगा। तुम लोग मेरी चिन्ता न करना। चिन्ता केवस भगवानकी करना, जिससे तुम्हारा भी कल्याण होगा।'

गुरुदेवकी आज्ञासे वे नन्दगाँवके निकट ललिताकुण्डपर एक प्राचीन मन्दिरसे रहकर भजन करने लगे। वे प्रातः तीन बजेसे अपराह्न तीन बजे तक नाम-जप और कीर्तन करते। कीर्तन उच्च स्वरसे करते। बीच-बीचमें ऐसी हुंकार भरते कि नन्दगाँव तक उसकी गूंज सुनायी पड़ती। उसे सुन मोर भी बोलने लगते। ३ बजे नन्दगाँवसे पैदल चलकर जंगलके रास्तेसे नाम-जप करते हुए लगभग ७ बने वृन्दावन पहुँचते। वृन्दावनमें मधुकरी कर गुरुदेवकी चरण-सेवा करते और उपासनाके विषयोंके सम्बन्धमें उनसे पूछताछ करते। रात्रिमें वहीं विश्रामकर प्रातः ३ बजे उठ जाते और नाम-जप करते हुए पैदल नन्दगाँव लौट आते।

कुछ दिन यह क्रम चलता रहा। इस बीच ललिता-कुण्डपर प्रेतोंका उपद्रव होने लगा। प्रेमदास बाबाने गुरुदेवसे प्रार्थना की उनका उद्धार करने की। उनको प्रार्थनापर अवधदास बाबाने ललिताकुण्डपर श्रीमद्भागवतका सप्ताह किया। परिणामस्वरूप प्रेतोंका उद्धार हुआ और ललिताकुण्डपर उनकी स्थितिका कोई चिह्न न रहा। श्रीगिरिजादेवी

श्रीमद्भागवतकी कथा कहना प्रारम्भ किया। इसके पश्चात् गुरुदेवकी आज्ञासे प्रेमदास बाबाने स्वयं नित्य सन्ध्या समय

जिस भागवतका वे पाठ करते. उसे उन्होंने स्वयं सुन्दर अक्षरोंमें लिखा था। उसके पृष्ठ तैरते हुए ऊपर आये। सूचना पाते ही वे ललिताकुण्डपर दौड़े गये। उसे एक बार चोर चुरा ले गये। उन्हें बड़ा दुःख हुआ। तीन दिन तक वे बिना अब-जल ग्रहण किये पड़े रहे। चौथे दिन चोर भागवत ललिताकुण्डमें डाल गये। अमुवी भागवत बिना किसी क्षतिके वापस प्राप्तकर उनके आनन्दकी सीमा न रही।

गोसेवामें उनकी प्रबल निष्ठा थी। उनकी कुटियाके निकट कई सुन्दर और मोटी-ताजी गायें रहतीं, जिनकी वे तन-मनसे सेवा किया करते। उन्हें ग्रामवासियोंको ओरसे पूरी छूट थी। वे चाहे जिसके खेतमें जाकर चरतीं। उनसे कोई कुछ न कहता। उन्हें बाबा नाम ले-लेकर पुकारते तो उनके पास भागी चली आतीं। उनका

दूध नन्दलालकी सेवामें लगता। जो बचता वह साधु-वैष्णवोंकी सेवाके काम आता। वे लगभग १०० वर्षकी अवस्थामें गुरुदेवके जीवनकालमें ही नाम करते-करते धाम पधारे। ललिताकुण्डपर उनकी समाधि है।

प्रेम और भक्ति — जीवन-संदेश

ईश्वर-प्रेम की अनुभूति भक्त-साहित्य का एक महत्त्वपूर्ण विषय है। इन प्रसंगों को श्रद्धा, संवेदनशीलता और समर्पण के संदर्भ में पढ़ा जा सकता है।

कथा का सार

श्रीप्रेमदास बाबाजी की कथा भक्ति, विनम्रता और साधना पर मनन करने का अवसर देती है। इस संग्रह में अन्य भक्तों के जीवन-प्रसंग भी पढ़ें।