ब्रज के भक्त भाग 2 · अध्याय 50

श्रीप्राणकृष्णदास बाबाजी

श्रीप्राणकृष्णदास बाबाजी की प्रेरक हिंदी कथा। जानिए उनके जीवन, भक्ति और साधना से जुड़े महत्वपूर्ण प्रसंग।

श्रीप्राणकृष्णदास बाबाजी
श्रीप्राणकृष्णदास बाबाजी — ब्रज के भक्त भाग 2

श्रीप्राणकृष्णदास बाबाजी का यह भक्त-चरित्र ब्रज की साधना, श्रद्धा और जीवन से जुड़े प्रसंगों को सामने लाता है। नीचे कथा को अलग-अलग विषयों में व्यवस्थित किया गया है।

जन्म, परिवार और प्रारम्भिक जीवन

[ कालीदह, वृन्दावन ]

यह वृन्दावनका परिक्रमा मार्ग है, जहाँ बीच-बीचमें भिखमंगे बैठे हैं। जो यात्री इधरसे निकलते हैं. उनसे यह पैसे माँगते हैं। कोई-कोई उनके पीछे पड़ जाते और जब तक कुछ ले नहीं लेते उनका पीछा नहीं छोडते। यह एक सौ वर्षसे अधिक उम्रवाले वृद्ध बाबाजी भी कालीदहके निकट अपनी कुटियासे निकलकर भिखमंगे जिस तरह यात्रियोंसे कुछ लेनेको उनके पीछे पड़ जाते हैं ये उन्हें कुछ यहाँ बैठे हैं। ये यात्रियोंसे कुछ लेनेके लिए नहीं, उन्हें कुछ देनेके लिए यहाँ बैठे हैं। देनेको उनके पीछे पड़ जाते हैं। पर इनका पीछे पडनेका तरीका दूसरा है। ये किससे यात्रीको आता देख स्त्री हो या पुरुष, वृद्ध हो या बालक, उसे दण्डवत् करते हैं और कुछ प्रसाद ले जानेको कहते हैं। प्रसादको मना कौन करता है ?

जब वह प्रसाद लेने निकट आता है, तो उसे प्रसादका कणिका देते हुए और छलछलाते नेत्रोंसे उसकी और प्रेमसे देखते हुए विनयपूर्वक कहते हैं— 'कृष्ण-कथा सुनोगे ?' उस समयको उनकी भाव-भंगी ऐसी होती है कि उसे कृष्ण-कथामें रुचि न होते हुए भी कहना पड़ता है- 'सुनेंगे।' फिर ये उसे श्रीकृष्णकी कोई मधुर कथा सुनाकर उनकी ऐसी छबि प्रस्तुत करते हैं, जो जीवनभरके लिए उसके हृदयमें अँककर रह जाती है।

कौन हैं यह वृद्ध बाबाजी और इन्हें रास्ता चलते लोगोंको कृष्ण-कथा सुनानेकी ऐसी क्यों पड़ी रहती है ? यह कालीदहके श्रीप्राणकृष्णदास बाबा है। कृष्ण-कथामें इनके प्राण बसते हैं। यह कृष्ण-कथा कहे या सुने बिना रह ही नहीं सकते। यह पढ़े-लिखे बहुत नहीं हैं पर श्रीप्राणकृष्णदास कविराजका गोविन्दलीलामृत इन्हें पूरा कण्ठस्थ है। उसके अनुसार श्रीकृष्णकी अष्टकालोन लीलाका चिन्तन करते-करते ये इतने बूढ़े हो गये हैं, फिर भी कृष्ण-कथाका चिन्तन करनेकी, उसे कहने सुननेकी इनकी स्पृहा नहीं मिटी है। ये केवल पढ़ी-सुनी कथाएँ ही लोगोंसे नहीं कहते, देखी हुई भी कहते हैं। इतने दिनोंसे कृष्ण-लीलाका

बिन्तन करते-करते ये कृष्ण लीला देखने ल लग गये हैं। हैं। ये कृष्ण-कथा कहने, घुले उसका चिन्तन करनेके सिवा और कुछ करते ही नहीं। रात्रिमें भी ये अपनी आवाज सुनायी देती है. कभी हँसनेकी, कभी किसीसे बातें करने की। कृष्ण-कटियाके भीतर यही सब करते रहते हैं। कुटियाके बाहर कभी इनके रोनेकी कथा कहकर अपनेको हलका करनेके लिए किसी श्रोताको खोजने लगते हैं। कोई नीलामृतका पान करते-करते जब इनका हृदय लबालब भर जाता है. तो ये कृष्ण-मिलता तो परिक्रमा मार्गपर जा बैठते हैं। प्रसादका लोभ देकर लोगोंको पास बुलाते हैं, फिर कृष्ण-कथामृतका इंजेक्शन ठोक देते हैं। इंजेक्शन ऐसा प्रभावशाली होता है कि उसके हृदयमें वह प्रक्रिया तत्काल आरम्भ हो जाती है, जो उसे भवरोगसे मुक्त करके रहती है।

पर, इसमें बाबाका अपना कर्तव्य कुछ नहीं है। कृष्ण-कथा वस्तु ही ऐसी है। जिसे इसका चस्का एक बार लग जाता है. वह इसके प्रेमी व्यक्तियोंकी खोजमें निरन्तर लगा रहता है, जिससे अधिकाधिक इसे कहने सुननेका सुयोग उसे मिलता रहे। और तो और स्वयं श्रीकृष्ण अपनी लीलाकथा सुनकर कभी नहीं अघाते। उहाँ-कहीं उनके भक्त इसका गान करते हैं. वहाँ प्रत्यक्ष रूपसे हो, या परोक्ष रूपसे, अपने-आप जाकर अपना आसन जमा लेते हैं। उन्हें न तो वैकुण्ठ इतना प्रिय है. और न ही और कोई स्थान, जितना अपनी कथा कहने-सुननेवाले भक्तका सात्रिध्य प्रिय है-

सेवा, प्रसाद और समर्पण की घटनाएँ

नाहं बसामि बैकुण्ठे योगिनां हृदये न च । मद्भक्ता यत्र गायन्ति तत्र तिष्ठामि नारद ।।

(भा० १३-१-१३)

इतना ही नहीं, जो उनकी कथा कहता सुनता है, उसके हृदयमें वे घुस पड़ते

शृणवतः श्रद्धया नित्यं गृणश्च स्वचेष्टियम् । कालेन नातिदीर्घाण भगवान् विशते हृदि ।।

(भा० २-८-४)

वहाँ बैठे रहकर उसे कथा कहनेकी प्रेरणा देते रहते हैं। भीतर बैठकर कथा कहनेकी प्रेरणा देते हैं, बाहर बैठकर सुनते हैं।

कृष्ण-कथाके एकान्त प्रेमी इन वयोवृद्ध बाबाका जन्म सन् १८०२ में वर्द्धमान जिलेके कालनाके निकट बागनापाडामें हुआ। माँ जाह्नवाकी परम्परामें

भिले वही दर्श

तक कालनाके सिद्ध भगवानदास बाबाके आश्रयमें रहकर भजन करते रहे। फि नित्यानन्द परिवारके बागनापाडाके श्रीयदुनन्दन गोस्वामीसे दीक्षा लेकर ये बहुत दि वृन्दावन आकर कालीदहपर रहने लगे। कालीदहके सिद्ध जगदीशदास बाबा आदर्श स्थापित किया, वह साधक मात्रके लिए अनुकरणीय है। ये दोनों महात्मा हर सिद्ध दयालदास बाबाकी सेवा करने लगे। इनकी सेवाकर इन्होंने सन्त-सेवाका जो समय कृष्ण लीलाका चिंतन करते हुए तन-मनकी सुध खोकर भाव-समुद्रमें वे रहते। श्रीप्राणकृष्णदास बाबा इनके आहारकी व्यवस्था करते, इनके कर-चरणादि सम्वाहन करते, इनका मल-मूत्र परिष्कार करते और मानसिक स्थितिके अनुसार इनके बदलते हुए भावोंको जानकर बड़ी निपुणतासे इनकी समयोचित भावानुकूल सेवा करते। इन दोनों सिद्ध महात्माओंकी सेवा करते-करते ये भी सिद्ध हो गये।

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ये कालीदहमें चारों ओर दूर-दूर तक नित्य झाड़ लगाया करते और मानसी-सेवामें मञ्जरी रूपसे निकुञ्जमें झाड़ लगानेकी भावना किया करते। झाड़ लगाते-लगाते बालक-वृद्ध जो भी उनके सामने आ जाता उसे झाड़ रखकर दण्डवत् किया करते।

त्याग और वैराग्यमें ये सिद्ध जगदीशदास बाबाकी ही प्रतिमूर्ति थे। यह इन दोनोंसे सम्बन्धित एक दिनकी एक विशेष घटनासे प्रकट है।

जगदीशदास बाबाके पास जो भेंट-पूजाकी सामग्री कोई दे जाता, उसे वे स्वयं स्पर्श न करते। श्रीप्राणकृष्णदास बाबाको उनकी आज्ञा थी उसका संग्रहकर समयोचित ठाकुर-वैष्णव-सेवामें उसे लगा देने की। एक बार एक सज्जन एक लोटा-बाल्टी और दस रुपये भेंट कर गये। श्रीप्राणकृष्णदास बाबाने उसे उठाकर रख लिया। निकटमें एक लोभी बाबाजी रहते थे। उन्होंने जगदीशदास बाबासे कहा- 'बाबा, यह सामान मुझे दे दें।' बाबाने सोचा श्रीप्राणकृष्णदास बाबासे कहकर उन्हें दिलवा देंगे, पर वे भूल गये। दो-तीन दिन बाद उस बाबाने कुद्ध होकर उनकी तरफ एक ईंट फेंकी। बाबाको लगी नहीं, पर उन्हें उस बातकी याद आ गयी। उन्होंने श्रीप्राणकृष्ण दासको बुलाकर कहा- 'एक अपराध हो गया उन जटाधारी महात्माके प्रति।

उन्हें मैंने वह लोटा-बाल्टी और रुपये देने कहा था, जो एक सज्जन उस दिन दे गये थे, पर मैं भूल गया। उन्होंने कृपा-दण्ड देते हुए ईंट फेंककर उसकी याद दिलायी है। उन्हें वह सब दे देना चाहिये।'

श्रीप्राणकृष्णदास बाबाने कहा - 'दे तो देना ही चाहिए। उनसे कुछ और भी अपनी कृपाका विस्तार करनेकी प्रार्थना करनी चाहिए। जो भेंट यहाँ आती है, उसे

मिले, हमें तो मधुकरीके सिवा और किसी चीजकी आवश्यकता है नहीं और वहीं ले लिया करें तो उनकी बड़ी कृपा हो। हमें मायाके स्पर्शसे अनायास मुक्ति दर्शनार्थी भेंट दिये बिना मानते नहीं।'

जगदीश बाबा उनके उत्तरसे प्रसन्न हुए। दोनों महात्माओंने विचार कर एक युक्ति की। दूसरे दिन उन महात्माका निमन्त्रण किया। प्रचुर प्रमाणमें संदेश, रसगुल्ले और रबडी आदिका भोग लगाकर उन्हें खिलाया। जगदीश बाबा प्रेमसे आलाप करते हुए उन्हें परसते गये, श्रीप्राणकृष्ण बाबा पंखा करते गये।

भजन-साधना और नाम-स्मरण के प्रसंग

जगदीश बाबा प्रेमालाप करते-करते बोले- 'महाराज, मुझसे भूल हो गयी, उसके लिए क्षमा करें। मुझे लोटा-बाल्टी और रुपये उसी दिन पहुँचा देने थे। पर आप जानते हैं मैं व्यवहारमें कितना अकुशल हूँ। इन बार्ताका ध्यान मुझे बिलकुल नहीं रहता।'

उसी समय श्रीप्राणकृष्ण बाबाने लोटा-बाल्टी और रुपये लाकर महात्माके सामने रख दिये।

जगदीशदास बाबाने हाथ जोड़कर आगे कहा- 'एक प्रार्थना और है। हम वृद्ध हैं तो भी आपके बालक हैं। आप हमारे पिता हैं। हम आप ही के संरक्षणमें रहकर यहाँ भजन करते हैं। हम इतने दुर्बल हैं कि किसी समय मायाके चपेटमें आ सकते हैं। आप सामर्थ्यवान हैं। मायाको अपने कमंडलुमें रखकर सुखकी नींद सो सकते हैं। आप कमण्डलु यहाँ रख दिया करें। दर्शनार्थी अपनी भेंट इस कमण्डलुमें डाल दिया करेंगे। आप नित्य रात्रिमें उसे उठा लिया करें। इस प्रकार हमें मायाका स्पर्श न होगा और ऐसी भूल भी हमसे होनेकी संभावना न रहेगी। जिसके लिए आपको दण्ड देना पड़े।'

महात्मा चुपचाप सुनते रहे। लज्जासे उनका सिर नीचा हो गया। पश्चातापको अग्नि उनके हृदयमें धू-धूकर जलने लगी। नेत्रोंसे अश्रु टपकाकर उन्होंने बाबाकी प्रार्थना का उत्तर दिया। मुखसे कुछ भी न कह सके। लोटा, बाल्टी और रुपये छोडकर सिर नीचा किये अपनी कुटियाको चले गये। उस दिन रातको उन्हें नींद नहीं पड़ी। दूसरे दिनसे वे. वे न रहे। सदाके लिए दोनों बाबाओंके सच्चे सेवक और संरक्षक बन गये।

श्रीप्राणकृष्णदास बाबाके संबंधमें श्रीहरिदास दासजीने 'गौडीय-वैष्णवजीवन' में लिखा है- 'रागानुगा भजनका उनका प्राणोंकी आहुति भरा उपदेश सर्वसाधारणके

हृदयको स्पर्श किये बिना न रहता। रागानुगा भजनकी बात सब कहना उचित नहीं समझते। सबमें उसे कहनेकी शक्ति भी नहीं होती, पर वे सभीको श्रीगुरु-प्रणाली और श्रीगुरुरूपा सखीके अनुगत भजन करनेका उपदेश देते और रहे-लीला तकका स्मरण करनेकी बात कहते।'

उनके समकालीन शुक-सम्प्रदायके रसिक सन्त श्रीरूपमाधुरीजीने अपने वाणी-ग्रन्थमें उनके ऊपर एक कविता लिखा है, जो इस प्रकार है-

करै वृन्दावन वास, घाट कालीदहके पास, सन्त श्रीप्राणकृष्णदास, बँगदेशको वासी है।

जाकी उम्र बड़ि भारी, वर्ष शत ऊपर चारि, बसे उस पिया प्यारी, बोले बानी रसरासी है।

गौरहरि नित गाबे, संग किये सुख पाबे, मन प्रेम छक जाबे, राधा नामको उपासी है।

करै राधानाम जाप, नशे तिहुँ विधि ताप, भयो दम्पति मिलाप, भाषै रूप चरणदासी है।

(श्रीरूपमाधुरीजीकी वाणी, ३-१९)

स्पष्ट है कि जिस समय यह कवित्त लिखा गया उस समय श्रीप्राणकृष्णदास बाबाकी उम्र १०४ वर्षकी थी। उस समय भी उनकी वाणीमें ओज था और लोग उनका सत्संग पाकर अपार सुखका अनुभव करते थे। पर, इसके पश्चात् ३२ वर्ष और जीवित रहकर वे रागानुगा भजनका लोगोंको उपदेश करते रहे और सन् १९३८ में १३६ वर्षकी अवस्थामें नित्य-धाम को पधारे। कालीदहमें सिद्ध जगदीशदास बाबाकी समाधिके निकट उनकी अपनी भजनकुटीके सामने उनकी समाधि है। भजन-कुटीमें उनका एक चित्र विराजमान है, जिसे देख उनके प्रति भक्ति-भाव सहज ही उमड़ पड़ता है।

सेवा और समर्पण — जीवन-संदेश

सेवा का मूल्य केवल बाहरी कार्य में नहीं, बल्कि उसके पीछे के निष्कपट भाव में भी होता है। इस चरित्र के प्रसंगों को पढ़ते समय सेवा के इसी भाव पर विचार किया जा सकता है।

कथा का सार

श्रीप्राणकृष्णदास बाबाजी की कथा भक्ति, विनम्रता और साधना पर मनन करने का अवसर देती है। इस संग्रह में अन्य भक्तों के जीवन-प्रसंग भी पढ़ें।