ब्रज के भक्त भाग 2 · अध्याय 45

श्रीनित्यानन्ददास बाबाजी

श्रीनित्यानन्ददास बाबाजी की प्रेरक हिंदी कथा। जानिए उनके जीवन, भक्ति और साधना से जुड़े महत्वपूर्ण प्रसंग।

श्रीनित्यानन्ददास बाबाजी
श्रीनित्यानन्ददास बाबाजी — ब्रज के भक्त भाग 2

श्रीनित्यानन्ददास बाबाजी का यह भक्त-चरित्र ब्रज की साधना, श्रद्धा और जीवन से जुड़े प्रसंगों को सामने लाता है। नीचे कथा को अलग-अलग विषयों में व्यवस्थित किया गया है।

जन्म, परिवार और प्रारम्भिक जीवन

[ नन्दग्राम ]

श्रीनित्यानन्ददास बाबाका जन्म आजसे लगभग १०० वर्ष पूर्व उड़ीसामें उड़िया महाभारतके लेखक, राजा श्रीकृष्णसिंहके वंशज, धराकोटके राजाके घर हुआ। उनके जन्मते ही स्थिर हो गया कि वे पारिकुदके राजाकी गोद जायेंगे और कालान्तरमें वहाँका राजपाट सम्हालेंगे।

पर, उनके ऊपर केवल पारिकुदके राजाकी ही दृष्टि न थी, राजाओंके राजा महाराजाधिराज श्रीकृष्णकी भी उनपर पूर्ण दृष्टि थी। वे उन्हें इस लोकका कोई क्षणभंगुर राज्य नहीं, परलोककी सैन्य-सामग्री और उसका कोई विशेष कार्यभार सौंपकर जन-जनके हृदयमें उनका एकक्षत्र राज्य स्थापित करनेको उत्सुक थे। उनकी योजनाके आगे क्या इस लोकके किसी राजा-महाराजकी योजना टिक सकती थी ? जिसके ऊपर उनकी दृष्टि हो उसे क्या इस संसारकी कोई वस्तु उनके दृष्टि-पथसे खींचकर अपने निकट ले आनेकी सामर्थ्य रखती है ? वह प्रभु द्वारा निर्दिष्ट पथको छोड़ संसारकी भूलभुलैयामें फँसा ही कब तक रह सकता है ?

एक दिन धराकोटके एक स्कूलके दसवें दरजेके अध्यापक किसी पदका अर्थ समझाते हुए कह रहे थे- 'पुष्पराज कमलका जन्म कीचड़से होता है, पर

हमसे ही वह न तो कीचडकी ओर देखता है और न ही अपने चारों ओर किसी को। वह संसारसे आँख मींचकर रहता है और प्रतीक्षा करता रहता है अपने के एक मात्र विषय सूर्यदेवके उदय होने की। उनके उदय होते ही वह नेत्र बोलता है और उनके छिप जानेपर बन्दकर लेता है। इसी प्रकार मनुष्योंमें जो श्रेष्ठ वे संसारकी ओरसे आँख मींचकर रहते हैं और एक मात्र श्रीभगवानके दर्शन, तन और उनकी लीला-कथाओंके श्रवण-कीर्तनमें संलग्न रहकर अपने जीवनको क करते हैं।'

कथाके सभी विद्यार्थियोंने यह बात सुनी। पर, किसीके हृदयको इसने वैसा अपने किसी विशेष कार्यका दायित्व सौंपना था। वह उसी क्षण संसारसे मुँह मोडकर पर्श नहीं किया जैसा उस बालकको जिसे नित्यानन्ददास बाबाके रूपमें प्रभुको बाल पड़ा परमार्थक उस पथपर, जिसपर पदार्पण करते ही प्रभु स्वयं उसके -पीछे रहकर उसका मार्ग प्रशस्त करते हैं और उसे अपने बाहुपाशमें भर बेनेको व्याकुल रहते हैं।

वह पहले आलालनाथ गया। वहाँ उस शिलाके दर्शन किये, जो महाप्रभुके करको साष्टांग दण्डवत् करते समय उनके शरीरके स्पर्शसे पिघल गयी थी और सपर उनके सर्वाङ्ग-चिह्न आज भी देखकर भक्त प्रेमाविष्ट हो जाते हैं। उसके दर्शन करते ही उसे प्रेम-मूर्छा आ गयी।

आलालनाथसे जगन्नाथपुरी और जगन्नाथपुरीसे नवद्वीप होते हुए वह वृन्दावन पहुँचा। उसने महाप्रभुके पार्षद श्रीगदाधर पण्डितकी परम्पराके श्रीमधुसूदन गोस्वामीसे दीक्षा और श्रीगोपालगुरुकी परम्पराके श्रीश्यामचरण बाबाजीसे वेश लिया।

कौमारवयसके श्रीनित्यानन्ददास बाबा कौपीन, कंथासे, सुसज्जित हो रजका करुआ हाथमें ले भजन करनेके उद्देश्यसे व्रजके गाँवोंकी तरफ चल पड़े। वे एक दिन एक गाँवमें रहते, दूसरे दिन दूसरे गाँवमें। उन्हें भय था कि कहीं उनके माता-पिता उनका पता ठिकाना पाकर उन्हें घर लौटा ले जानेके लिए न आ जायें। इसलिए बहुत दिनों तक वे इसी प्रकार व्रजमें भ्रमण करते रहे। वे मधुकरी भांगकर खा लेते और वृक्षके तले सो लेते। जिह्वापर पूरा नियन्त्रण रखते। मधुकरीमें जो चुपड़ी मिलती उन्हें दूसरोंको दे देते। जो रूखी-सूखी मिलतीं उन्हें स्वयं खा लेते। सोते वे बहुत कम। निद्रा अधिक न आये, इसलिए वृक्षसे पीठ टेककर बैठे-बैठे ही सोनेकी चेष्टा करते। कुछ ही दिनोंमें उन्होंने निद्राको इतना वशमें कर लिया कि केवल दो-तीन घण्टे सोकर ही काम चला लेते।

उन्हें बैठे-बैठे सोते देख कभी कोई कहता 'बाबा, इस तरह आपकी टाँगें रह जायेंगी। टाँगें सीधी करके

सोया कीजिये।' तब वे कहते- 'मैं टाँग पसारकर सोने आया हूँ. या भजन करने ?'

कभी-कभी जाडेमें रात्रिके समय भजन पूरा होनेसे पूर्व निद्रा घेरने लगती, तो वे गुदड़ी समेत कुण्डमें डूबकर निद्रासे दो-दो हाथकर लेते और फिर भजनमें बैठ संकल्प किया। निद्रादेवीसे लिखकर प्रार्थना की 'तीन दिन यहाँ कृपा न करना' जाते। एक बार उन्होंने तीन दिन और तीन रात अकेले अखण्ड कीर्तन करनेका और कागज ठाकुरजीके चरणोंके नीचे रख दिया, जैसे निद्रादेवीको ठाकुरके चरणोंमें सुला दिया। तब तीन दिन बिना पलक मारे अकेले कीर्तन किया। इस बीच मधुकरीको भी नहीं गये। उनके एक साथी बाबाजी मधुकरी माँग लाते और केवल उतनी देर डन्हें मधुकरी पाने और शौच जानेमें लगती वह बाबाजी कीर्तन करते।

इस प्रकार व्रजमें भ्रमण करते हुए जब बहुत दिन बीत गये, तब वे नन्दगाँवमें कदम्बखण्डीमें रहकर भजन करने लगे। कदम्बखण्डीमें उन्होंने एक बार महामन्त्रका पुरश्चरण किया। पुरश्चरणके फलस्वरूप उन्हें मन्त्रसिद्धि हुई। तभीसे अलौकिक शक्तियाँ उनके चरणोंमें लोटने लगीं और एक महात्यागी सिद्ध महात्माके रूपमें उनकी ख्याति चारों ओर फैलने लगी। वृन्दावनके कुम्भ मेलेमें उन्हें चार-सम्प्रदायके महन्थके पदपर नियुक्त किया गया। बहुत-से शिष्य-सेवकोंने उनका आश्रय ग्रहण किया। जिस साम्राज्यका अधिपति प्रभुने उन्हें बनाना चाहा था, उसका तेजीसे विस्तार होने लगा। प्रभुका अपना इसमें कितना सक्रिय सहयोग था, दो-एक घटनाओंसे स्पष्ट होगा।

उड़ीसाके संभ्रानत परिवारके एक संस्कारी बालकको भजनकी छटपटी लगी। वह एक योग्य गुरुकी प्राप्तिके लिए चेष्टा करने लगा। बहुत चेष्टा करनेपर भी जब गुरु न मिले तो पुरीमें जगन्नाथजीके मन्दिरमें जाकर उनसे प्रार्थना की- 'प्रभु, आप जगत्‌के नाथ हैं। मैं भी इस जगत्‌का एक तुच्छ जीव हूँ। आपकी जीवोंपर अहैतुकी कृपाकी मैने बहुत-सी कथाएँ सुनी है। क्या मेरे ऊपर भी कभी कृपा-दृष्टि करेंगे ? सुना है कि गुरुकी कृपाके बिना आपको प्राप्त करना सम्भव नहीं। पर, गुरुदेव भी तो आपकी कृपासे प्राप्त हो सकेंगे। दया करो नाथ, जिससे गुरुदेवको प्राप्तकर शीघ्र उस पथका पथिक बन सकूँ, जिसपर चलकर आपके चरण-कमलोंकी त्रितापहारी सुशीतल छाया तक पहुँच सकता हूँ।' एक

वह जगन्नाथजीसे प्रार्थना कर रहा था और उसका वक्षस्थल प्रेमाश्रुओंसे सिक्त हो रहा था। उस समय उसके सामनेसे बलभद्र और सुभद्राकी मूर्तियाँ अदृश्य हो

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जिसके दोनों नेत्रोंसे अश्रुओंकी दो मोटी धाराएँ बह रही थीं। गयी। बेदीपर दीखने लगा केवल जगन्नाथनीका गोलाकार विशाल मुखारविन्द,

अबोध बालकने समझा कि उसके किसी अपराधके कारण जगन्नाथजी दुःखी है. इसीलिए रो रहे हैं। वह क्या जानता था कि जिस प्रकार वह उनके प्रेममें रो रहा श्रीजगन्नाथजी उसे प्राप्त करनेको वैसे ही अधीर हो रहे हैं जैसे वह उन्हें प्राप्त है उसी प्रकार वे भी उसके प्रेममें विह्वल हो अश्व विसर्जन कर रहे हैं ! प्रेमकी मूर्ति करनेको !

दुःखी हो वह विमला देवीके मन्दिरमें गया। वहाँ भी उसी प्रकार प्रार्थना करनेके पश्चात् उसने देखा कि विमलाकी मूर्तिका एक हाथ हिल रहा है। शायद हाथ हिलाकर वे भी उसे आशीर्वाद दे रहीं थीं। पर, उनका यह संकेत भी उसकी समझमें न आया।

तब वह करुणावतार श्रीगौरांग महाप्रभुके दर्शन करने नवद्वीप गया। वहाँ भी उनके मन्दिरमें जाकर उनसे प्रार्थना की। वहाँ उसे श्रीमन्महाप्रभुके श्रीविग्रहमें सिनेमाके चित्रोंकी तरह एकके बाद एक पहले श्रीकृष्णके फिर श्रीराधाके और फिर एक नील वर्णकी सखीके दर्शन हुए। सखीके दर्शनके साथ महाप्रभुके भोगका समय हो आया और सामने परदा आ गया। श्रीमन्महाप्रभुके श्रीविग्रहमें श्रीकृष्ण, श्रीराधा और उस सखीके दर्शनकर वह चमत्कृत हुआ। पर इसका भी रहस्य उस समय उसकी समझमें न आया।

गुरुकी खोजमें वह वृन्दावनके लिए चल पड़ा। वृन्दावन स्टेशनपर उतरते ही जब वह स्टेशनके बाहर ढालसे नीचे उतर रहा था, उसने देखा नित्यानन्ददास बाबाको उधरसे आते हुए। एक बार पहले उसने पुरीमें बाबाके दर्शन किये थे। वे देखते ही उनहें पहचान गये। और अपने साथ गोवर्धन ले गये। उनके कुछ ही दिनोंके सत्संगसे उसे बोध होने लगा जैसे उसके गुरु वे ही हैं। उनसे दीक्षा लेकर वह निश्चिन्त हुआ।

उसकी इच्छा हुई अपने गुरु महाराजका एक चित्र अपने साथ रखने की। चित्रके लिए उसने गुरु महाराजसे प्रार्थना की। उन्होंने फोटोग्राफरको बुलानेका आदेश दिया। वह वृन्दावन जाकर गोपीनाथ बाजारके फोटोग्राफर श्रीकालीबाबूको बुला लाया। कालीबाबूने जब कैमरा सेट कर लिया और फोटो लेनेको हुए तब बाबाने उससे कहा- 'तुम जरा जाकर कैमरेमें देखो तो फोकस ठीक हुआ, या

नहीं। उसने फोटोग्राफरकी अनुमति ले कैमरेके ऊपरका काला कपड़ा अपने सिरपर डाला और लेन्समें से बाबाकी तरफ देखा। 'हैं! यह क्या ? यहाँ तो बाबाके स्थानपर वह सखी बैठी है, जिसको मैने नवद्वीपमें महाप्रभुके श्रीविग्रहमें दर्शन किये थे ?' उसने कपड़ा हटाकर बाहर देखा तो बाबा ही दीखे। सखीरूपमें फिर उनके दर्शन करनेके लिए जब उसने कैमरे में-से फिर झाँका, तो भी बाबा ही दीखे।

उसे समझनेमें देर न लगी कि स्वरूपसे उसके गुरुदेव राधारानीकी सखी है और नवद्वीपमें श्रीमन्महाप्रभुने अपने स्वरूपमें श्रीकृष्ण, श्रीराधा और गुरुरूपा सखीके दर्शन देकर उन्हें बताया था कि राधा और कृष्ण उनसे अभिन्न हैं और उनकी गुरुरूपा सखी भी राधारानीका ही अभिन्न प्रकाश है। उसे यह भी समझनेमें देर न लगी कि उन्होंने ही उसे वृन्दावन जानेकी प्रेरणा देकर और गुरुदेवको स्टेशन पहुँचनेकी प्रेरणा देकर उसकी गुरु-प्राप्तिका मार्ग प्रशस्त किया था।

इसी प्रकार श्रीश्यामसुन्दरदासजी, श्रीव्रजसुन्दरदासजी, श्रीगोपीनाथदासजी और श्रीगौरगोविन्ददासजी जैसे और भी बहुत-से परम त्यागी और होनहार शिष्य एक-एककर प्रभुकी प्रेरणासे उनके परिवारमें सम्मिलित होते गये।

बहुत-से गृहस्थ भक्तोंने भी बाबाका आश्रय ग्रहण किया, जिनमें से मथुराके श्रीगिरिराजधरणजीका नाम विशेष रूपसे उल्लेखनीय है।

बाबा अपने को बहुत छिपाकर रखते थे। पर, स्वयं प्रभु जिसका देश-विदेशमें प्रचार करते फिरें वह कब तक छिपा रह सकता है ? सुदूर अमृतसरमें बाबाको कोई नहीं जानता था। वहाँ भी प्रभुकी प्रेरणासे उनकी कीर्ति फैलनेमें देर न लगी। वहाँ एक ब्राह्मण राधा-श्यामसुन्दरके श्रीविग्रहको सेवा किया करता था। उससे एक रात उन्होंने स्वप्नमें कहा- 'हमें नन्दग्राम में नित्यानन्ददास बाबाके निकट पहुँचा दो। हम अब उनकी सेवा ग्रहण करेंगे।'

उनका आदेश प्राप्तकर ब्राह्मण उन्हें साथ ले नन्दग्रामकी ओर चल पड़ा। वहाँ पहुँचकर पूछते-पूछते नित्यानन्ददास बाबाके पास पहुँचा। उनसे अपने स्वप्नकी बात कह राधा-श्यामसुन्दरको उन्हें सौंप दिया। बाबा विग्रह सेवाको भक्तिका प्रधान अंग मानते हुए भी उसे इतना महत्त्व नहीं देते थे, जितना नाम-कीर्तनको। वे कभी-कभी विनोदमें कहा करते थे- 'विग्रह क्या है ? गल-ग्रह है!' आशय होता था कि त्यागी बाबाजीके लिए 'विग्रह-सेवा उतना अनुकूल नहीं जितना नाम-कीर्तन। विग्रह-सेवाके लिए उसे तरह-तरहकी सेवाकी सामग्री जुटानी पड़ती है, जिससे

भजनमें विक्षेप होता है। इसलिए उन्होंने कभी विग्रह-सेवा नहीं रखी, पर अब बीवग्रिह आ ही गये तो क्या करते ? उन्होंने ब्राह्मणसे कहा- 'भाई, मैं तो नंगा बाबाजी हूँ। रूखी-सुखी खाकर पड़ा रहता हैं। विग्रह-सेवा मेरे बसकी नहीं, पर इनकी इच्छा है मेरी सेवा लेनेकी तो छोड जाओ।'

राधा श्यामसुन्दरके प्रति बाबाके उपेक्षाभरे शब्द सुन ब्राह्मणको दुःख हुआ। पर राधा-श्यामसुन्दरपर उसका कोई असर नहीं। दूसरा कोई मेहमान होता तो तुरन्त लौट जाता, पर ये दोनों मेहमान लौट जानेको तो आये थे नहीं। ये क्या जानते नहीं थे कि बिना बुलाए मेहमानका आदर नहीं होता, और खरी-खोटी भी कभी-कभी सुननी पड़ती है उसे ? जानते थे, पर जानकर भी आये थे। खरी-खोटी सुननेको ही आये थे। ये ऐसे अनोखे मेहमान थे, जिन्हें वेद-स्तुति भी उतनी अच्छी नहीं लगती, जितनी अपने प्रिय संभ्रम-संकोचरहित भक्तोंकी खरी-खोटी अच्छी लगती है। उनकी सेवा-पूजा भी उतनी अच्छी नहीं लगती, जितनी उनकी प्रीतिभरी उपेक्षा अच्छी लगती है!

बाबाने नन्दग्राममें मुखशोधनकुण्डके पास कुञ्जकुटीमें राधा-श्यामसुन्दरके रहनेकी व्यवस्था कर दी। यह स्थान ही अब बाबाका छोटा-सा आश्रम बन गया। शिष्य-सेवक राधा-श्यामसुन्दरकी सेवामें नियुक्त कर दिये गये। पर, उनकी सेवाकी कोई विशेष व्यवस्था नहीं की गयी। जो सहज रूपमें मधुकरीमें रूखा-सूखा मिल जाता उसीका उन्हें भोग लगा दिया जाता। शिष्य कभी कहते उन्हें कुछ विशेष भोग लगानेको, तो बाबा कह देते- 'हम कोई इनके लिए अपना स्वरूप थोड़े ही बिगाड़ेंगे। हम जो फक्कड़ बाबाजी हैं, वही रहेंगे। इन्हें ही अपना स्वरूप बदलना होगा। बाबाजीके साथ बाबाजीकी तरह रहना होगा। कभी मालपुए आदिको मन चले, तो पास ही तो हैं नन्दबाबा। उनके पास जाकर जीम आया करेंगे।

मन्त्र-सिद्धिके कुछ दिन बाद प्रभुने नित्यानन्ददास बाबाको प्रेरणा दी नाम-कीर्तनका प्रचार करने की। उन्होंने नाम-कीर्तनके प्रचारका बीड़ा उठाया। श्रीगिरिराजधरणजी और उनके कुटुम्बके सहयोगसे उन्होंने 'भक्तिप्रचारिणी-सभा'की स्थापना की और मथुराको प्रचारका केन्द्र बनाया। वृन्दावन, अलीगढ़, हाथरस, दिल्ली, अमृतसर, जयपुर, जगन्नाथपुरी आदि अनेक स्थानोंमें कहीं एक महीने, कहीं दो महीने और कहीं एक साल तक का अखण्ड हरिनाम संकीर्तन-यज्ञ किया। रथयात्रापर जगन्नाथपुरीमें और कुम्भके अवसरपर प्रयाग और हरिद्वार आदि स्थानोंमें भी वे प्रति बार जाकर एक महीनेका अखण्ड हरिनाम-कीर्तन करने लगे।

बाबाने अपना शेष-जीवन सर्वत्र हरिनाम संकीर्तनका प्रचार करनेमें ही व्यतीत किया। वे कहा करते कि भक्तिके चौंसठ अह्नोंमें पाँच अङ्ग सर्वश्रेष्ठ

भजन-साधना और नाम-स्मरण के प्रसंग

हैं-नाम-कीर्तन, श्रीमूर्ति-सेवा, साधु-संग, व्रजवास और भागवतश्रवण । इनमें से किसी

एकाका याजन करनेसे प्रेमकी प्राप्ति होती है, पर इनमें भी नाम संकीर्तन सर्वश्रेष्ठ है। नाम-कीर्तनके अतिरिक्त नामके श्रवण करने, जप करने, नामके लिखने और

लिखे हुए नामके दर्शन करनेसे भी फलकी प्राप्ति होती है।

वे कहते कि नामके साधक दो प्रकारके हैं- नामाग्रही और नामाश्रयी। नामाग्रह नाम-साधनाकी पहली अवस्था है। इससे साधकका नाम-जप या नाम-संकीर्तनमें आग्रह मात्र होता है। नामाश्रय नाम-साधनाकी दूसरी अवस्था है। इसमें साधक पूर्ण रूपसे नामका आश्रय ले लेता है। वह अपने आपको पूर्ण रूपसे नामको समर्पित कर देता है। नामके सिवा और कुछ जानता ही नहीं। इस अवस्थामें नाम-नामीको साधकके पास खींचकर ले आता है।

अष्टयाम लीला-चिन्तनका व्रजके साधकोंमें बहुत प्रचलन है। बाबा भी इसके समर्थक थे, पर वे नाम-साधनाको इससे भी ऊँचा स्थान देते थे। उनका कहना था कि नाम कल्पतरु है। इसके द्वारा साधक सभी कुछ प्राप्त कर लेता है। नाम-कल्पतरुको प्रेमसे सींचते रहनेसे इसमें अंकुर फूट आते हैं और लीला-स्फूर्ति रूपी पल्लव उसमें अपने-आप विकसित हो जाते हैं। साधककी प्रारम्भिक अवस्थामें वे लीला-चिन्तनका निषेध करते थे। कहते थे कि लीला-चिन्तन कोई हँसी-खेल नहीं। लीला-चिन्तनमें साधक जुगलकी कोई सेवा लेकर रहता है, जो उसे तत्परतासे श्रद्धापूर्वक करनी होती है। एक बार उन्होंने बताया कि एक बाबाजी लीला-चिन्तनमें सेवाकुञ्जमें जुगलकी पिकदानीकी सेवा करते थे। एक दिन वे समयानुसार चिन्तनमें सेवा न कर सके।

दूसरे दिन प्रातः जब वे सेवाकुञ्ज गये, तो देखा कि जगह-जगह पानकी पीकें पड़ी हैं। चिन्तनमें जो सेवा की जाती है उसे प्रभु अङ्गीकार करते हैं। उसे पूरी श्रद्धा और विश्वासके साथ नियमित रूपसे न करनेसे अपराध होता है।

बाबाकी साधु-सेवामें भी बड़ी निष्ठा थी। नाम-प्रचारके लिए वे जहाँ भी जाते वहाँ साधु-सेवा भी ऐसी करते कि लोग चमत्कृत रह जाते। आश्चर्यकी बात यह है कि वे जाते खाली हाथ और लौटते भी खाली हाथ। पैसा कभी हाथसे स्पर्श भी न करते। पर जहाँ जिस पैमानेकी वैष्णव-सेवाका संकल्प करते, उसके लिए धन-जन न जाने कहाँसे खिंचे चले आते। कभी-कभी वे किसी व्यापारीसे कहते- 'मुझे

नाम-यज्ञ करना है और यज्ञके लिए सामग्री दे दो। जो भेंट आयेगी उससे तुम्हारा सब पैसा चुका दूंगा। यदि उससे न चुका, तो किसी और अवसरपर व्याज सहित लूंगा।' व्यापारी जानते थे कि बाबाके किसी काममें पैसेकी कमी तो कभी होती चुका दूंगा। इस बीच यदि मर गया तो तुम्हारा कर्ज चुकानेके लिए फिरसे जन्म नहीं। साक्षात् लक्ष्मी उनकी सेवाके लिए प्रस्तुत रहती हैं, इसलिए वे बिना सोचे-विचारे उन्हें जितनी भी सामग्रीकी आवश्यकता होती दे देते।

एक बार उन्होंने बन्दावनमें कुम्भके अवसरपर नाम-यज्ञ किया। सेठ हरगुलालने आकर कहा- 'बाबा, मेरे लिए कुछ सेवा हो तो आज्ञा करें !

'करोगे ? बाबाने ऊँचे स्वरमें पूछा।

'क्यों नहीं बाबा, आप आज्ञा करें।'

'१०० टीन घी भेज देना।'

'१०० टीन घीका क्या करेंगे बाबा ?'

'तुम देखोगे क्या करूँगा।'

सेठजीकी समझमें १०० टीन घीकी बात फिर भी न आयी। उन्होंने १० टीन घी भेज दिया, पर बाबाका इतने घीसे क्या बनना था ?

उसी दिन रातमें कानपुरके एक सेठको राधा-कृष्णने स्वप्नादेश दिया- 'वृन्दावनके कुम्भ-मेलेमें महन्त नित्यानन्ददास बाबा नाम-यज्ञ कर रहे हैं। उन्हें १०० टीन घी और उसी परिमाणमें आटा, चीनी, मैदा और सूजी आदि पहुँचा दो।' दूसरे दिन ट्रकोंमें सामान लदकर चला आया। सेठजी साथ आये। बाबाका डेरा पूछते-पूछते उनके पास आकर बोले- 'बाबा, आप ही हैं महन्थ नित्यानन्ददास बाबा ? मुझे राधा-कृष्णने स्वप्नमें आपके भण्डारेके लिए यह सब सामान पहुँचानेकी आज्ञा दी है। कृपाकर स्वीकार करें।'

'मैं महन्थ-अहन्त कुछ नहीं। भण्डारेकी बात भी मैं नहीं जानता। महन्थ और महन्थी तो वे हैं, जिन्होंने तुम्हें भेजा है। वे भण्डारा करेंगे, मैं देखूँगा। सामान छोड़ जाओ।'

नाम-यज्ञके शेष दिन बाबाने कुम्भमें आये सभी सम्प्रदायके साधुओंका जैसा भण्डारा किया, वैसा पहले कभी वृन्दावनके कुम्भमें नहीं हुआ था। उस आयोजनकी विशालताका अनुमान इस बातसे लगाया जा सकता है कि उसमें २०० हलुवाई कामपर लगे थे।

ऐसे ही एक सालभरके कीर्तन और विशाल उत्सवका आयोजन बाबाने हाथरसमें किया। हाथरसके उत्सवकी विशेषता यह थी कि उसमें वृन्दावनके बडे महाप्रभुके मन्दिरके श्रीविग्रह और श्रीगौरांगदास बाबाजी महाराज भी पधारे थे। महाप्रभुको हाथरस ले जाते समय एक विचित्र लीला घटी। पहले तो जब बाबासे हाथरसके भक्तोंने बड़े महाप्रभुको हाथरस ले चलनेको कहा, उन्होंने उत्तर दिया- 'यह कैसे हो सकता है ? सेवाके विग्रहको एक स्थानसे उठाकर दूसरे स्थानपर ले जाना ठीक नहीं। किसी आपत्तिके समय ही ऐसा किया जा सकता है। हाथरस तक महाप्रभुको ले जानेमें कितना कष्ट होगा। उन्हें, तुम नहीं जानते ? यदि तुम लोग महाप्रभुको ले जाओगे तो मैं नहीं जाऊँगा।' पर, हाथरसके भक्तोंका प्रेम और आग्रह देख महाप्रभु स्वयं मचल पड़े।

उन्होंने साक्षात् हो या स्वप्नमें, नित्यानन्ददास बाबासे कहा- 'मैं हाथरस जाऊँगा।' तब बाबाने एकाएक उल्टा हठ पकड़ लिया - 'महाप्रभु हाथरस जायेंगे तभी मैं जाऊँगा।' महाप्रभुके सेवाइत श्रीकृष्णचैतन्य गोस्वामीजी बड़े धर्म-संकटमें पड़े। महाप्रभुको इतनी दूर ले जानेकी अनुमति भी नहीं दे सकते और एक महापुरुषके आग्रहको टाल भी नहीं सकते। उन्होंने हाथरसवालोंसे कहा- 'भाई मैं क्या जानूँ। तुम जानो और तुम्हारे महाप्रभु। महाप्रभुके सामने चिट्टी लिखकर देख लो। यदि वे राजी हों, तो ले जाओ।' उनके सामने दो चिट्ठियाँ डाली गयीं। एकमें लिखा था, 'मैं हाथरस जाऊँगा,' दूसरीमें 'मैं हाथरस नहीं जाऊँगा।' एक छोटे बालकसे चि‌ट्ठी उठवायी गयी। पहली चिट्ठी निकल आयी। भक्तोंने हर्ष-ध्वनिके साथ महाप्रभुकी जय-जयकार की।

बड़े यत्नसे उन्हें हाथरस ले गये।

वहाँ उत्सवमें नित्य कीर्तन और कथा होती। कथा पहले नित्यानन्ददास बाबा कहते, पीछे गौरांगदास बाबाजी। नित्यानन्ददास बाबा साधनकी बात अधिक कहते, श्रीगौरांगदास बाबा रसकी। दोनों कथाओंकी विवेचना करते हुए नित्यानन्ददास बाबा कहते- 'मेरी कथा तुम्हारे हृदयके मलको धोती है, गौरांगदासजीकी उसे रंगकर आकर्षक और प्रभुके लिए लोभनीय बनाती है।'

श्रीनित्यानन्ददास बाबाके आनुगत्यमें और महाप्रभु और गौरांगदास बाबाके सान्निध्यमें उस उत्सवमें जो रसकी वर्षा हुई, उसका वर्णन करते हुए आज भी हाथरसके भक्त रोमाञ्चित हो जाते हैं। उनका कण्ठ भर आता है और नेत्र सजल हो जाते हैं।

उत्सवमें जो अखण्ड दीप जलाया गगया वह आज भी वैसे ही जल रहा है। देवगण सहित अलक्षित रूपसे कीर्तन चलाते रहेंगे। तुम लोग नित्य दो घण्टे उसमें बाबाने आज्ञाकी थी- 'यह अखण्ड दीप निरन्तर जलता रहे। अग्निदेव स्वयं अन्य सहयोग दे दिया करना।' हाथरसके भक्त बाबाकी आज्ञाका प्रेमसे पालन करते आ रहे हैं।

हाथरसके पश्चात् बाबाने अलीगढमें भी वैसे ही सालभरके कीर्तनका आयोजन किया, जिसमें सहस्रों नर-नारियोंने भाग लिया। दिनमें स्त्रियाँ भाग लेतीं, उत्सवकी व्यवस्थाकी गयी। उस समय अलीगढमें दफा १४४ लगी थी, पर रात्रिमें पुरुष । कीर्तनकी समाप्तिपर १०८ ब्राह्मणों द्वारा विष्णु-यज्ञ और एक बड़े कलेक्टरको कुछ अनुभव हुआ, जिसके कारण उसे दफा १४४ में भी उत्सवकी इजाजत देनी पड़ी। मुसलमानोंने भी उत्सवमें सहयोग किया।

यज्ञमें घीकी कमी पड़ गयी। बाबाने माताओंसे एक-एक तोला घी घरसे लानेको कहा। इतना घी एकत्र हो गया कि उसे शेष करना मुश्किल हो गया। केलेके पेड़के छिलकोंकी नालीसे बहाकर घीकी मोटी-मोटी धारे अग्निकुण्डमें उड़ेली गयीं। अन्तिम दिन साधु-सेवाके पश्चात् सामान इतना बचा कि अलीगढ़के लगभग सभी हिन्दुओंके घर एक-एक पैकेट मिठाई भेजी जा सकी। जो भेंट आती रही बाबाने एक सत्संग-भवनके निर्माणके लिए अलीगढ़के भक्तोंको सौंप दी। सत्संग भवन और उसके ऊपर एक गीता-भवनका निर्माण बाबाके सामने उत्सव समाप्तिके पूर्व ही हो गया। सत्संग भवनमें नित्य कीर्तनकी व्यवस्था कर दी गयी।

अलीगढ़में लोगोंने बाबाकी आसन-सिद्धिकी बात विशेष रूपसे नोट की। वे दिनभर भजन-कीर्तनमें संलग्न रहते। शाम ६ बजे प्रसाद पाकर ८ बजे तक विश्राम करते। फिर ८ बजेसे प्रातः ४ बजे तक एक आसनपर बैठे रहकर हरिनाम करते।

अलीगढ़के उत्सवके सम्बन्धमें एक और उल्लेखनीय बात यह है कि गीता-भवनमें किसी विशेष आयोजनके अवसरपर श्रीदुर्गासरण एडवोकेटने बाबासे प्रवचन करनेकी प्रार्थना की। उसमें बहुत-से अँग्रेजी पढ़े-लिखे लोगोंको आमन्त्रित किया गया था। बाबाने कहा- 'मैं अँग्रेजी पढ़े-लिखे लोगोंकी सभामें क्या बोलूंगा ? 'खगकी भाषा खग ही जाने।' तुम गोपीनाथको ले आओ।'

गोपीनाथदास बाबा अँग्रेजीके प्रोफेसर रह चुके थे, इसलिए उन्होंने उन्हें इस कार्यके लिए उपयुक्त समझा। सभामें एक विद्वान संन्यासीको भी बोलने के लिए।

आमन्त्रित किया गया था। उन्होंने अद्वैत सिद्धान्त पर बड़ा प्रभावशाली भाषण दिया। उनके पहले और कई विद्वान बोल चुके थे। पर, उनके भाषणके बाद ऐसा

लगा कि उस दिनका सेहरा उन्हींके सिर बंधेगा। पर, उसके बाद गोपीनाथदास बाबासे बोलनेको कहा गया। उन्होंने उससे भी कहीं अधिक प्रभावशाली ढंगसे उन सभी ताँको काटकर रख दिया, जो संन्यासीजीने अद्वैतमतकी

पुष्टिमें प्रस्तुत किये थे। उन्हें लगा कि बाबाकी कृपासे उनके मन-मानसमें ऐसे विचारोंका अजस्र स्रोत उमड़ा

चला आ रहा है. जिसकी उन्होंने कभी कल्पना भी नहीं की थी। वे केवल यन्त्रवत् अँग्रेजी भाषामें उन्हें श्रोताओंके समक्ष प्रस्तुत करते जाते थे।

गोपीनाथदास बाबाको तनिक भी सन्देह नहीं था कि बाबाकी अपनी शक्ति हो उनके माध्यमसे कार्य कर रही थी। पर, जब लोगोंने उनके भाषणकी बाबासे प्रशंसा की, तो उन्होंने उनसे कहा- 'अब तुम कहीं भाषण मत करना। जो दूसरे कहें उसे केवल सुन लेना। किसीका खण्डन-मण्डन करना ठीक नहीं।'

उड़ीसामें भी बाबाने गाँव-गाँवमें जाकर नाम-संकीर्तनका बहुत प्रचार किया। उत्तरी भारतके श्रीमद्भागवत सप्ताहकी तरह वहाँ उन्होंने नामसप्ताहकी प्रथा चलायी, जिसमें भक्त-मण्डलियाँ सात दिन तक बारी-बारीसे नृत्यके साथ अखण्ड नाम-संकीर्तन करती हैं।

साधारण लोगोंकी बाबाके सम्बन्धमें धारणा थी कि वे नाम-संकीर्तनके प्रचारके उद्देश्यसे अपनी अलौकिक शक्तिका प्रयोग कर इतने विशाल आयोजनोंके लिए अपार सामग्री एकत्र करनेमें समर्थ होते हैं। भिक्षा माँगनेकी बात तो केवल उसपर ढक्कन डालनेके लिए होती है। पर जो भी हो, वे अपनी अलौकिक शक्तिका प्रयोग भगवत् कार्यके लिए ही करते थे, किसीके सांसारिक कार्यके लिए नहीं।

जब हाथरसमें अखण्ड हरिनाम संकीर्तन चल रहा था बाबा श्रीलक्ष्मीनारायणजीके यहाँ ठहरे थे। किसी व्यक्तिका एकलौता लड़का असाध्य बीमारीसे पीड़ित था। उसने कातर स्वरसे बाबासे उसके लिए कुछ करनेकी प्रार्थना की, पर बाबाने सीधे-सहज भावसे अपनी असमर्थता प्रकट कर दी। लक्ष्मीनारायणजी बाबाके अन्तरंग भक्तोंमें से थे। उसके चले जानेपर उन्होंने उनसे कहा- 'बाबा, वह विचारा कितना दुःखी था। आप झूठ ही कुछ कह देते, तो उसे अभी तो शान्ति मिल जाती। पीछे जो होना होता होता।'

बाबाने कड़ककर कहा- 'अरे मुर्ख ! मैं झूठ भी कह देता. तो लड़का बच जाता। पर, उससे क्या उसका मंगल होता ? साला जिस कीचडमें फँसा है, उसमें और फँस जाता। हम कीचडसे निकालनेवाला बाबा है, फँसानेवाला नहीं।'

भगवान् और भगवान्नाममें लोगोंकी श्रद्धा दृढ़ करनेके लिए बाबा अपनी शक्तिका प्रयोग अक्सर करते। एक बार उनके शिष्य श्रीगोपीनाथदासजीने कहा- 'बाबा, गुरुदेवके 'अभयकर' की बात जो कही जाती है, उसका ठीक-ठीक अर्थ क्या है मैंने नहीं समझा।'

बाबाने कहा- 'देखो, अभयकर इसे कहते हैं और उन्होंने अपना दाहिना हाथ उनके सिरपर उससे डेढ बालिस्त ऊपर फैला दिया। उसके साथ ही उन्हें लगा कि जैसे एक करेंटने उनके भीतर प्रवेश किया और एक सुशीतल, आनन्दमय अनुभूति उन्हें होने लगी। साथ ही ऐसा कम्प होने लगा कि वे उसे सम्हाल न सके।

बाबा और उनके एक साथी कदम्बखण्डीमें एक शुष्क कदम्बके नीचे हरिनाम संकीर्तन किया करते थे। उनके साथीने कहा- 'मैंने हरिनामके प्रभावसे 'शुष्कतरु पल्लवे' की बात कहीं पढी है। पर, इस तरुके नीचे हमलोग इतने दिनसे नाम-संकीर्तन कर रहे हैं। इसमें तो पल्लव आये नहीं।'

बाबाने कहा- 'नाम-प्रभु कृपा करें तो आ जायें।' कुछ ही दिन बाद उसमें अंकुर फूटने लगे और वृक्ष पत्तोंसे हरा-भरा हो गया।

बाबा एक बार जब रथ-यात्रापर पुरी गये, बरहमपुरके ट्रेनिंग कॉलेज के गोपीनाथदास बाबाके पूर्वाश्रमके एक सहयोगीने उनसे कहा- 'मैं आस्तिक भावका व्यक्ति हूँ। भक्ति-साहित्यका मैने अध्ययन भी अच्छा किया है। फिर भी मुझे वैसा विश्वास नहीं, जैसा होना चाहिये। इसलिए मैं भजन-साधन कुछ नहीं कर पाता। यदि आप मुझे कुछ प्रत्यक्ष अनुभव करा दें, जिससे मैं भजनमें प्रवृत्त हो सकूँ तो बड़ी कृपा होगी।'

बाबाने कहा- 'अच्छा, ऐसे बैठो।' पद्मासनसे उन्हें बैठाकर अपने अँगूठेसे उन्हें स्पर्श कर दिया। स्पर्श करते ही उन्हें कुछ अलौकिक अनुभव हुआ। वे उठकर इधर-उधर भागने लगे। लोगोंने समझा वे पागल हो गये। उन्हें पकड़कर बैठाना चाहा। बाबाने कहा - 'छोड़ दो। अभी ठीक हो जायेगा।'

जीवन के अंतिम प्रसंग और स्मृतियाँ

थोड़ी देर बाद जब वे प्रकृतिस्थ हुए, उन्होंने बताया कि उन्हें लगा कि जैसे कृष्ण उनके साथ लुका-छिपी खेल रहे हैं, और वे उनके पीछे-पीछे भाग रहे हैं। उसी दिन उन्होंने बाबाका आश्रय ग्रहण किया और भजन-साधनमें लग गये।

बाबाने उन्हें अधिकारी समझकर ही उनके ऊपर यह कृपाकी होगी। पर वैसे भी की हो तो कोई आश्चर्य नहीं। भागवत्-कृपाके सदृश उनके भक्तोंकी कृपा भी पूर्ण स्वतन्त्र और निरपेक्ष है। जब जिसपर चाहे बरस जाये।

नन्दगाँवमें बाबाकी एक शिष्या रहती थी। बडी भजननिष्ठ और भोले स्वभाव की थी वह। उसने एक दिन बाबासे रोकर कहा- 'मैं इतने दिनसे भजन कर रही है। जैसे आपने कहा वैसे ही कर रही हैं। तो भी मुझे अभी तक जुगलके दर्शन नहीं हुए। ऐसे भजनसे क्या लाभ ? सब कहते हैं बाबा चाहें तो दर्शन करा दें। तो आप क्यों नहीं करा देते ?'

बाबाने कहा- 'तू चिन्ता न कर। तुझे दर्शन होंगे।' फिर कज्जलकुंडके पास एक कदम्बके वृक्षकी ओर संकेत करते हुए बोले- 'देख, उस वृक्षके पास बैठकर भजन किया कर।'

तबसे वह उस कदम्बके पास बैठकर भजन करने लगी। कुछ दिन बाद उसे जुगलके दर्शन हुए, श्रीकृष्णके कदम्बके ऊपर और राधारानीके नीचे। दर्शन करते ही उसकी मानसिक स्थिति न जाने कैसी हो गयी। वह दिन-रात उस कदम्बके पास ही बैठी रहती। घरवाले लेने आते तो जानेको मनाकर देती। कोई कुछ खानेको देता तो उसे भी अस्वीकार कर देती। भूख लगती तो कुण्डकी कीचड़ खाकर रह

जाती। नौ महीने बाद वह कुछ प्रकृतिस्थ हुई, तो घर जाकर रहने लगी। उससे किसीने पूछा- 'तू इतने दिन कीचड़ खाकर कैसे रही ?'

उसने उत्तर दिया- 'मैंने कीचड़ कब खायी ? मैं खीरसा * खाती थी।'

गुरु-भक्तिपर बाबा बहुत अधिक बल दिया करते। वे कहते कि गुरुपूजा भगवत्-पूजासे भी बड़ी है-

'जार प्रति गुरुदेव हन परसन्न, कोनो विघ्ने शेह नाई हय अवसन्न ।

कृष्ण रुष्ट हले गुरु राखिवारे पारे, गुरु रुष्ट कृष्ण राखिवारे नारे ।।

- सनातन गोस्वामी

- जिससे गुरुदेव प्रसन्न हों, उसपर किसी प्रकारकी विघ्न-बाधा नहीं आती। कृष्ण यदि उससे रुष्ट हों, तो भी गुरु रक्षा कर सकता है, पर यदि गुरु रुष्ट हों तो कृष्ण रक्षा नहीं कर सकते।'

* दूधकी बनी एक मिठाई जो कुलियामें भरी हुई व्रजमें मिलती है। * श्रीनित्यानन्ददास बाबाजी

गुरुभक्तिके आदर्श रूपमें उन्होंने अपने शिष्य श्रीगिरिराजधरनके सुपुत्र नाथजीको तैयार किया था। गुरुगत प्राण श्रीनाथजीने गुरुदेवको पूर्ण आत्मसमर्पण कर रखा था। वे गुरुदेवको छोड और कुछ जानते ही न थे। उनके पुत्रका अस्पतालमें ऑपरेशन हुआ। मात्रासे अधिक क्लोरोफॉर्म दिये जानेके कारण उसे पॉपरेशनके बाद भी बहुत देर तक होश न आया। ऐसी स्थितिमें जब उसके प्राण अधर में लटके हए थे, श्रीनाथजी अपनी बगीचीमें गुरु-सेवामें लगे थे। थोडी देर बाद जब उसके प्राण निकल गये, उस समय वे गुरुदेवको भोग अर्पण कर रहे थे। अन्तरयामी गुरुदेवको पता था कि उस समय अस्पतालमें बालकके प्राण निकल चुके थे।

उन्होंने अपने निकट बैठे कुछ भक्तोंसे कहा- 'नवद्वीपमें श्रीवास पण्डितके घर एक ओर उनका पुत्र मरा पड़ा था, दूसरी ओर घरमें ही वे महाप्रभु और उनके भक्तोंके साथ नृत्य-संकीर्तन कर रहे थे। वैसे ही यहाँ अस्पतालमें श्रीनाथका पुत्र मरा पड़ा है और यह गुरुसेवामें लगा है।' श्रीनाथजीने भी यह बात सुनी, पर इससे उनकी गुरुसेवामें कोई अन्तर न पड़ा। उन्होंने घरमें भी सब लोगोंसे शान्त रहनेको कहा, जिससे गुरु-सेवामें किसी प्रकारका विक्षेप न हो।

बाबाने ऐतिहासिक दृष्टिसे दो बड़े महत्त्वपूर्ण कार्य किये, जिनके पीछे उनका द्वाथ होनेके बारेमें बहुत कम लोग जानते हैं। भारतके विभाजनके समय नदिया जिलेके पूर्वी-पाकिस्तानमें जानेकी बात लगभग तय थी। बाबा को जब इसका पता चला, वे रो पड़े। उन्होंने कहा- 'कलिपावनावतार श्रीमन्महाप्रभुकी पवित्र जन्मभूमि पाकिस्तानमें चली जाय, यह मैं अपने जीते-जी नहीं देख सकता। मैं सत्याग्रह करूँगा। मेरे प्राण भले ही चले जायें, पर नदियाको नहीं जाने दूंगा।'

उन्होंने इसके विरुद्ध अपील करनेको लाखों लोगोंसे हस्ताक्षर कराये और सत्याग्रहकी तैयारीमें लग गये। यह था उनके आन्दोलनका बाहरी रूप, पर उनके अन्तरमें एक और आन्दोलन चल रहा था। वहाँ देशके नेताओंसे नहीं, स्वयं श्रीनदियाबिहारीसे अपीलकी जा रही थी। नदियाबिहारी अपने भक्तकी पुकार न सुनते, यह कब सम्भव था ? उन्होंने उन्हें आश्वस्त किया कि नदिया भारतका ही अङ्ग रहेगा। तब बाबाने निश्चिन्त हो आन्दोलन को बढ़ानेका विचार छोड़ दिया। कुछ ही दिनों बाद यह समाचार अखबार में छप गया कि नदिया पाकिस्तानके नक्शेसे निकाल दिया गया।

बाबने राधाकुण्ड भी उद्धार किया। व्रजमें राधाकुण्ड और श्यामकुण्ड नामके दो विशाल कुण्ड हैं. जिनका निर्माण श्रीराधा और श्रीकृष्णने किया था। वराह आदि

पुराणोंमें इनके निर्माणका वर्णन है। इन दोनों कुण्डोंमें राधाकुण्डकी महिमा विशेष है। श्रीकृष्णने राधासे कहा था- 'प्रियतमे, तुम्हारे इस कुण्डकी महिमा मेरे कुण्डसे भी अधिक होगी। इसमें मैं नित्य स्नान और जल-केलि किया करूंगा।' कहा जाता है कि श्रीकृष्ण स्वयं इस कुण्डके मार्गपर झाडू लगाया करते हैं-

महारानी श्रीराधिका अष्टसखिनके झुण्ड । डगर बुहारत साँवरो जय जय राधाकुण्ड ।।

श्रीचैतन्य-चरितामृतमें इस कुण्डकी महिमाका वर्णन इस प्रकार है-

सेई कुण्डे जेई एकबार करे स्नान । तारे राधासम प्रेम कृष्ण करे दान ।।

- जो उस कुण्डमें एक बार स्नान कर लेता है, उसे श्रीकृष्ण राधाके समान प्रेम दान करते हैं।

परमकरुणामयी श्रीराधारानीने जीवोंके प्रति करुणा कर श्रीकृष्णसे परिहास करनेके छलसे इन दोनों कुण्डोंको प्रकट किया था। कालान्तरमें ये लुप्त हो गये थे। राधा भाव-विभावित श्रीकृष्णचैतन्य महाप्रभुने इन्हें फिरसे प्रकट किया। पर, तबसे अब बहुत दिन बीत चुके थे। राधाकुण्डका जल इतना गन्दा हो गया था कि भक्तोंको इसका सेवन करनेमें और इसमें स्नान करनेमें बड़ा कष्ट होता था। श्रद्धालु भक्त उस कष्टको सहन करके भी उसके जलका सेवन करते थे। यह देख नित्यानन्ददास बाबाने इस परमपावन सरोवरका पंकोद्धार करानेका संकल्प किया। कार्य बहुत व्यय-साध्य था। इस विशाल कुण्डका जल और कीचड़ निकालकर बाहर फेंकनेके लिए लाखों रुपयेकी आवश्यकता थी। बाबा किसके पास जाते धन माँगने ?

उन्होंने राधारानीको स्मरणकर राधाकुण्डके तीरपर अखण्ड नाम-संकीर्तन आरम्भ किया। राधारानीने कलकत्तेके एक धनाढ्य भक्त श्रीप्रियानाथ पालको प्रेरणा दी। उनके अर्थ-व्ययसे संकीर्तनकी ध्वनिके बीच यह सारा कार्य लगभग एक वर्षमें समपन्न हुआ।

बहुत समयसे नन्दग्राममें रहते-रहते बाबा नन्दग्रामके अभिन्न अङ्ग बन गये थे। नन्दग्रामके व्रजवासी, बालक-बूढ़े सब उनसे स्नेह करते थे। वे सब जैसे एक बड़े परिवारके सदस्य थे, जिसके बाबा मुखिया थे। वे अपने दुःख-सुख और भाव-अभावकी बात उनसे कहते और वे अपने भक्तोंकी सहायतासे उनके अभावकी पूर्ति करनेकी चेष्टा करते। नन्दलाला भी अपने सुख-सुविधाके लिए बहुत कुछ

उन्हींपर निर्भर रहते। कभी-कभी मन्दिरमें धनके अभावके कारण नन्दलालाकी सेवाको व्यवस्था बिगड़ जाती, तो बाबा श्रीमद्भागवतकी एक सप्ताहकी कथा कहते। जो चढ़ावा आता मन्दिरको भेंट कर देते।

एक बार जब वे नाम-प्रचारार्थ अमृतसर गये हुए थे, नन्दलालाका अङ्गराग हुआ। पर, उनके नये कपड़े न बनाये जा सके। नन्दलालाने अमृतसरमें बाबासे शिकायत की। उन्होंने अपने एक भक्तसे सुन्दर मखमलकी पोशाक बनवाकर और उसपर जरीका काम करवाकर भेज दी। आज भी वह पोशाक नन्दलाला विशेष-विशेष उत्सवोंपर बड़े प्रेमसे धारण करते हैं।

नन्दलालाको जरीकी पोशाक बन गयी, तो उन्हें मुकुट, लकुट और वंशी भी सोनेकी चाहिये थी। बाबाने उसका भी प्रबन्ध कर दिया। दिल्लीके एक बड़े व्यापारीकी पत्नी बीमार पडी। उसके जीवनकी कोई आशा न रही। जब सभी डॉक्टरोंने जवाब दे दिया. तो वह उसे नन्दगाँव ले आया और बाबाके चरणोंमें डाल दिया। बाबाकी कृपासे वह स्वस्थ हो गयी। तब उसने २०० साधुओंको व्रजसे ले जाकर दिल्लीमें अखण्ड कीर्तन और एक बड़ा उत्सव किया। उत्सवके पश्चात् उसने बाबासे कुछ सेवा स्वीकार करनेका आग्रह किया। बाबाने कहा- 'मुझे कुछ नहीं चाहिये। यदि तुम्हारी सेवा करनेकी इच्छा ही है, तो नन्दलालाकी करो। उनके लिए सोनेका मुकुट, लकुट और वंशी बनवा दो।' व्यापारी बहुत सुख हुआ। उसने नन्दलालाके लिए बहुत सुन्दर रत्नजटित सोनेके मुकुट, लकुट और वंशी बनवा दिये।

जिन्हें वे आज भी विशेष अवसरोंपर धारण करते हैं।

बाबाके एक भक्त श्रीबिहारीलाल पोद्दारके लड़केका विवाह हुआ। उन्होंने बाबासे बारातमें चलनेका आग्रह किया। बाबाने कहा, 'चलेंगे। पर हमारे सखा-सखी भी हमारे साथ चलेंगे।' उनके कहे अनुसार पोद्दारजीने आठ गोस्वामी बालकों और आठ गोस्वामी बालिकाओंको भी आमन्त्रित कर दिया। वे सब गये ताँगोंमें बैठकर कीर्तन करते हुए, बाबा और उनके सेवक गये पैदल कीर्तन करते हुए। गोस्वामी-बालक और बालिकाओंकी बारातियोंमें सबसे अधिक सेवा की गयी। रमणगोस्वामी नामके एक उदंड प्रकृतिके गोस्वामीको जब इसका पता चला, तो उन्होंने बाबाके पास जाकर उन्हें गालियाँ सुनायी और थप्पड़ मारकर कहा- मुझे क्यों नहीं ले गया ?' बाबाने गोस्वामीजीको दण्डवत् कर उनसे क्षमा-प्रार्थना की। पर, नन्दलालासे बाबाको यह अपमान न देखा गया।

कुछ दिन बाद गोस्वामीजी मन्दिरकी छतसे गिरे और मर गये।

नन्दलाला बाबासे कम सहनशील थे क्या ? उनके बराबर सहनशील और कौन हो सकता है, जिन्होंने भृगुका पदाघात सहन करके भी उनसे क्षमा प्रार्थना की थी, पर उनसे अपने भक्तका अपमान सहन नहीं हुआ। यह सर्वशक्ति और सर्वगुणसम्पन्न नन्दके उस लालाकी सबसे बडी लाचारी है कि वह अपने प्रिय भक्तोंका अपमान सहन नहीं कर सकता।

बाबा अकसर कहा करते- 'रे मथुरा, मरे वृन्दावन, जरे नन्दगाँव।' उनका तात्पर्य होता-मथुरा सारा जीवन मेरे प्रचारका केन्द्र रहा। वहाँ मैं स्वस्थ रहा। अब मरूँगा वृन्दावन जाकर, और जलाया जाऊँगा नन्दगाँवमें ।' एक दिन उन्होंने नन्दगाँवकी उस महिलाको, जिसे उनकी कृपासे कदम्बके निकट भजन करते हुए जुगलके दर्शन हुए थे, बुलाया और एक स्थानको दिखाते हुए कहा- 'यहाँ नन्दगाँवकी गइयोंके गोबरसे लीपना, दीपक और अगरबत्ती जलाना और नित्य सुबह-शाम महामन्त्रका जप करना।' नन्दगाँवके व्रजवासियोंसे कहा- 'जब मेरा शरीर वृन्दावनसे यहाँ आये, इस स्थानपर मेरा संस्कार करना। नन्दगाँवकी गइयोंक गोबरके कण्डे सब व्रजवासी मेरे ऊपर दो-दो डालना। जब शरीर जल जाये, उसकी भस्म नन्दगाँवमें सब जगह बिखेर देना, जिससे नन्दलालाके चरण उसपर पड़ा करें।

वह महिला उसी दिनसे बाबाके संस्कारके लिए भूमि तैयार करनेमें जुट गयी। बाबा विनोदमें उसे श्मशान देवी कहकर पुकारने लगे।

शरीर छोड़नेके एक वर्ष पूर्व वे वृन्दावन चले गये। वहाँ अपने गुरुस्थान 'गोपाल गुरु' में रहकर भजन करने लगे। सारा दिन और रात नामजप करते। बाहर कहीं न जाते। किसीसे बात भी विशेष न करते। कोई उनके पास आता तो कहते - '५ मिनट नाम-संकीर्तनकी भिक्षा दो।' यह ५ मिनट नाम-संकीर्तन सुनाता और चला जाता। उनके सामने आगे-पीछे बड़े-बड़े अक्षरोंमें हरिनाम महामन्त्र लिखा रहता। महाप्रभुकी अर्धाङ्गिनी श्रीविष्णुप्रियाकी तरह वे चावलके दानोंकी सहायतासे हरिनामकी गणना करते। इस प्रकार उन्होंने हरिनामका दर्शन, हरिनामका श्रवण और हरिनामका ही कीर्तन करते हुए एक वर्ष अपने गुरु-स्थानपर व्यतीत किया। हरिनाम-श्रवण-कीर्तनके साथ-साथ उनका लीला-चिन्तन बराबर चलता रहा।

सन् १९६४ द्वादशीके दिनसे उनका शरीर कुछ अस्वस्थ लगने लगा। फाल्गुनी शुक्ला एकादशीको वे दिन भर नेत्र बन्द किये पड़े रहे। चारों ओर शोक श्रीप्रेममाधुरी बाईजी

और विषाद छा या। सबने समझा कि यह उनका शेष दिन है. पर रात १० बजे नेत्र खोले। विषादके वातावरणमें आशाकी एक किरण फूट निकली। 'जय वाई की हर्ष ध्वनिसे आकाश गूंज गया। उस ध्वनिके साथ ही रात्रिमें १० बजे, अष्टयाम लीलामें रासका समय है. बाबाने रासलीलामें प्रवेश किया।

उनका पार्थिव शरीर उनके पर्वनिर्देशके अनुसार नन्दगाँव ले जाया गया। उसी स्थानपर जिसे श्मशान देवीने ठीक कर रखा था उनका अन्तिम संस्कार हुआ। न्दगाँवके स्त्री, पुरुष, बालक और वृद्ध सभी व्रजवासियोंने अपने-अपने घरसे कडे लाकर बाबाकी चितापर डाले। क्रन्दन और कीर्तनके साथ उनका ह-संस्कार किया। उनकी भस्म नन्दगाँवमें सर्वत्र बिखेरी और अपने-अपने माथेपर बढ़ाई।

कई स्थानोंपर नाम-कीर्तन और साधु-सेवाका जो कार्यक्रम बाबाने प्रारम्भकिया था उनके भक्त उनकी स्मृतिमें आज भी चला रहे हैं। उन्होंने एक बार श्रीनाथजीसे १००८ नाम सप्ताह यज्ञकी बात चलायी थी। उनके धाम पधारनेके पश्चात् श्रीनाथजीने अपनी बगीचीमें इसका शुभारम्भ किया। आज भी वह विधिवत् चल रहा है। सन् १९८४ में इसकी समाप्ति होनेको है।

नन्दगाँवमें बाबाके प्रधान शिष्य श्रीराधेश्यामदास बाबाजी महाराजके प्रयाससे उम-सेवा और वैष्णव-सेवा उसी रीतिसे होती चली आ रही है, जिस रीतिसे बाबा किया करते थे। जनमाष्टमी, होली और दोनों व्रज परिक्रमाओंके अवसरपर बाबा स्दगाँवमें आये सभी साधु-वैष्णवोंकी पंगत किया करते थे, जो आज भी हो रही है।

नाम-स्मरण और एकाग्रता — जीवन-संदेश

नाम-स्मरण, भजन और एकाग्रता के प्रसंग साधना की निरंतरता की याद दिलाते हैं। यहाँ वर्णित जीवन-अनुभवों से पाठक अपनी साधना के लिए प्रेरणा ले सकते हैं।

कथा का सार

श्रीनित्यानन्ददास बाबाजी की कथा भक्ति, विनम्रता और साधना पर मनन करने का अवसर देती है। इस संग्रह में अन्य भक्तों के जीवन-प्रसंग भी पढ़ें।