ब्रज के भक्त भाग 2 · अध्याय 7
श्रीनारायण स्वामीजी
श्रीनारायण स्वामीजी की प्रेरक हिंदी कथा। जानिए उनके जीवन, भक्ति और साधना से जुड़े महत्वपूर्ण प्रसंग।

श्रीनारायण स्वामीजी का यह भक्त-चरित्र ब्रज की साधना, श्रद्धा और जीवन से जुड़े प्रसंगों को सामने लाता है। नीचे कथा को अलग-अलग विषयों में व्यवस्थित किया गया है।
जन्म, परिवार और प्रारम्भिक जीवन
[ वृन्दावन ]
आपका यदि वजसे कुछ भी सम्बन्ध रहा है. या आपने व्रजकी रासमण्डिलयोंकी लीलाएँ देखी हैं तो आप नारायण स्वामीके नामसे अवश्य रास-लीलाओंको इतना मधुर और आकर्षक बनानेमें बहुत बड़ा हाथ रहा है। आप परिचित होंगे, जिनके पद रास लीलाओंमें आज भी गाये जाते हैं और जिनका उनके विषयमें विशेष कुछ जाननेको भी उत्सुक अवश्य होंगे। यदि आपने रास-लीला कभी नहीं देखी है और स्वामीजीके मार्मिक पदोंको नहीं सुना है, तो आप पहले उनके कुछ पदोंका आस्वादन कर लें। उनका आस्वादन करनेके पश्चात् उनके विषयमें आपकी जिज्ञासा अवश्य जागेगी और आप जानना चाहेंगे कि वे कौन थे, कहाँसे आये थे और कैसे थे?
यह हैं उनकी उराहना-लीलाके कुछ पद, जिनमें व्रज-गोपियाँ यशोदा माँको उराहना दे रही हैं-
व्रजमें कैसे बसें री माई ।
जहाँ नित प्रति उत्पाद करत है, तेरो कुँवर कन्हाई ।। भोर ही में सोवत अँगनामें, अचकहि आय जगाई ।
उठ री सखि तोहि द्वारे पै, टेरत कोई लुगाई ।।
मैं तो द्वार पै देखिबे निकसी, को है कहाँ ते आई ।
पीछे ते इन घर भीतर सों, साँकर तुरत लगाई ।।
मैं बाहर ये भवनहिं, मन-मानत धूम मचाई ।
बासन फोरि तोरि सब छींके, दधि गोरस ढरकाई ।।
यह कौतुक सुनिके व्रज-वनिता, निरखन को सब धाई ।
हँस-हँसके मिलि बूझत मासों, कहा लीला फैलाई ।।
भाँति-भाँतिकी बोली बोलत, जो जाके मन भाई ।
मैं अपने मन कहूँ नारायण, यह कहा कुमति कमाई ।।
यशुमति तेरी भली बनि आई ।
पूत सपूत प्रगट भयो जाको नित उठ करत कमाई ।।
भूषण चीर चुराय हमारे, मानत अधिक बड़ाई ।
घरमें लाय तोहि पहरावत, भलौ कुँवर सुखदाई ।।
घाट बाट नित माँगत डोले, निज कुल रीति मिटाई ।
नारायण सोई करै कोतुक, जो तै पट्टी पढ़ाई ।।
सखियोंका उराहना सुन लालजी माँसे कहते हैं -
जननी तू इनकी मति मानै ।
जा बिध तू होवै रिस मोपै, सो यह कौतुक ठाने ।।
धोखे सों मोहि निकट बोलकै, उर लगाये लियो याने ।
जबही अचक आये पीछे तें, मुख चूमन कियो वाने ।।
खंजन दृग चंचल चपला-सी, अबहुँ कुटिल भौं ताने ।
नारायण जैसो वे आप हैं, तैसो और को जाने ।।
यह है कुछ वंशी-लीलाके पद। गोपियाँ वंशीकी ध्वनि सुन सुध-बुध बैठी हैं और लोकलाज खो श्यामसे मिलनेको आतुर हो रही हैं -
मोहन बसि गये मेरे मनमें ।
लोक लाज कुल-कानि छूटि गई, इनकी लगन-लगनमें ।।
जित देखूँ तितही यही दीखें, घर बाहर आँगनमें
अंग-अंग अति रोम-रोम में, छाय रहे सब तन में ।।
कुण्डल झलक कपोलन सोहै, बाजूबंद भुवन में।
कंकन कलित ललित मणि माला, नूपुर धुनि चरनन में ।।
चपल नयन भृकुटी वर बाँकी, ठाढ़े सघन लतन में ।
नारायण बिन मोल बिकी मैं, इनके नेक हँसन में ।।
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खलो री आज व्रजराज मुख निरखिये,
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जगतकी लाज सों काज नहिं सुरैगो ।
बहुत कोई कहैगो श्यामके ढिंग गई,
याहू ते अधिक पुनि और कहाँ करैगो ।।
नाचिबे लगीं तो फेरि घुँगट कहा,
सुरत चढ़े पै कोन सो डरैगो ।।
बेगि निज प्यारे ते मिलो नारायण,
बहुरि ऐसो सखी दाँव कब परैगो ।।
और यह हिंडोरा लीलाका एक गीत राग मल्हार में आज दोउ झूलत मृदु मुसक्यावत ।
औरह बात लखी तै सजनी, सैनन माँहि कछु बतरावत ।।
मेल कपोल अधर घर बंशी, एक संग पूनि दोउ बजावत ।
बजति नहीं झगरत दोउ आपसमें, निरखि सखी अतिशय सुख पावत ।।
निज प्रतिबिम्ब देखि दरपन में, भानु-लली मनमें सकुचावत ।
बूझत पियसों यह को झूलत, जो निज छबिसों हमें लज वत ।।
हँसत श्याम प्रियकूँ लख भोरीं, कण्ठ लगाये बहुत समझावत ।
नारायण हठ तजत नहिं जब, सन्मुख ते सखि काँच हटावत ।।
इन गीतोंका आस्वादनकर आप यह समझे बिना न रहेंगे कि इनके रचयिता व्रजकी भूमिमें जन्मे और यहाँकी संस्कृतिमें रचे-पचे यहींक किसी वैष्णव परिवारके सदस्य रहे होंगे। पर, आपको यह जानकर आश्चर्य होगा कि वे न तो व्रजवासी थे और न ही वैष्णव। वे पंजाबके एक अद्वैतवादी संन्यासी थे, जो यहाँ आकर व्रज-भक्तिके रंगमें नखसे शिर तक रँग गये थे उनका जन्म वि० सं० १८८५ के लगभग पंजाबके रावलपिण्डी जिलेमें सारस्वत ब्राह्मण परिवारमें हुआ था। संभवतः काशीमें शिक्षा ग्रहणकर उन्होंने वहीं मुकुन्द स्वामी * नामके किसी संन्यासीसे संन्यास-दीक्षा ले ली थी। उनके गुरु ज्ञानी होते हुए भी परम भक्त थे, और उन्हींको प्रेरणासे वे वृन्दावन आये थे, जैसा कि उनके ग्रन्थ 'व्रज-बिहार' के मंगलाचरणके पदसे जान पड़ता है। पद इस प्रकार है-
* 'ब्रज विहार' नामका उनके पदोंका एक ग्रन्थ है। उसके छटे संस्करणके मुख पृष्ठपर
उनके नामके पूर्व 'श्रीयुत महाराज मुकुन्द स्वामीजीके चरण-कमल सेवी' छपा है।
CIDER-MAN
बन्दौ श्रीगुरु चरण कमलवर ।
जिनको नाम सकल मंगलनिधि ध्यान धरत अघ रहत न पलभर ।।
परम उदार सार निगमागम भक्ति जानकी खान मनोहर ।
नारायण मोहि दीन जानिके वास दियो वृन्दावन गहि कर ।।
सम्वत् १९१६ के लगभग वे वृन्दावन आ गये थे। केसीघाटके निकट पाटिया घेरेमें एक छतरीमें रहते थे। सम्भवतः भिक्षावृत्ति उन्हें अच्छी नहीं लगती ॥ इसलिए लालाबाबूके मन्दिरमें नौकरी कर जीविका चलाते थे।
वृन्दावन आकर वे भक्तिके रंगमें कितना रंग गये, यह उनके एक प्रसिद्ध वित्तसे स्पष्ट है, जिसमें उन्होंने ज्ञान-मार्गका तिरस्कार करते हुए कहा है-
चाहे व योग कर भृकुटी मध्य ध्यान धर, चाहे नाम-रूप मिथ्या जानिकै निहारि लै ।
निरगुन, निरथै, निराकार ज्योति व्याप रह्यो, ऐसो तत्त्व-ज्ञान निज मनमें तू धारि लै ।।
दिव्य अनुभूति और कृपा के प्रसंग
नारायण अपने को आंपू ही बखान करि.
मोतें वह भिन्न नहीं या विधि पुकारि लै ।
जौ लौं तोहि नन्दको कुमार नहिं दृष्टि परै,
तौ लौं तू भले बैठि ब्रह्मको विचारि लै ।।
यहाँ आकर वे अपना ज्ञान-ध्यान, देह-गेह सब कुछ भूल गये और अनश्यामके दर्शनकी लगनमें बाबरेसे इधर-उधर डोला किये। यहाँ आकर उनकी हे मनोदशा हो गयी उसका उन्होंने इन शब्दोंमें वर्णन किया है-
मनमें लागी चटपटी, कब निरखूँ घनश्याम ।
नारायण भूल्यो सभी, खान पान विश्राम ।।
सुनत न काहू की कही, कहै न अपनी बात ।
नारायण वा रूपमें मगन रहें दिन रात ।।
धरत कहूँ पग परत कित, सुरति नहीं इक ठौर ।
नारायण प्रीतम बिना, दीखत नहिं कछु और ।।
भयो बावरो प्रेम में, डोलत गलियन माहिं ।
नारायण हरि लगनमें, यह कछु अचरज नाहि ।।
कहाँ चहै कछु कहत कछु, नयन नीर सुरभंग ।
नारायण बौरी भयो, लग्यो प्रेम को रङ्ग ।।
जो घनश्यामके प्रेममें ऐसा दीवाना हो रहा हो, जिसके मनमें उसकी मुसकान बस रही हो, उसे क्या ज्ञानकी बात कभी लग सकती है ?
जाके मन में बस रही, मोहनकी मुसिक्यान । नारायण ताके हिये और न लागत ज्ञान ।
मोहनके रूप सागरमें डूबते तो बहतोंको देखा है, पर उबरते आज तक किसीको नहीं देखा -
नारायण व्रजचन्द्रके, डूबत बहुतै-एक जन, रूप पयोनिधि माहिं । उछरत एकौ नाहिं ।।
यह हो सकता है कि नारायण स्वामीने कृष्ण-भक्तिका रङ्ग चढनेपर किसी वैष्णव सम्प्रदायमें दीक्षा ले ली हो और पूर्वाभयासके कारण लोग उन्हें नारायण स्वामी ही पुकारते रहे हों। पर, यथोचित प्रमाणके अभाव में इस सम्बन्धमें निश्चित रूपसे कुछ नहीं कहा जा सकता।
नारायण स्वामीकी उपासना मुख्य रूपसे कृष्ण-लीलाके माध्यमसे होती थी। कृष्ण-लीलाओंका चिन्तन, उनसे सम्बधित पद-पदावलियोंको रचना और रासमण्डलियोंके अभिनयमें योग देना ही था उनका साधन और भजन।
लालाबाबूके मन्दिर में नौकरी करते समय वे दिनमें कुछ समय तो वहाँ काम करते, बाकी समय रास-लीलाओंके चिन्तन और अभिनयादिमें व्यतीत करते। टिकारीवाले मन्दिरमें नित्य किसी मण्डलीकी रासलीला हुआ करती थी। उसके लिए वे स्वयं नयी-नयी लीलाओं और नये-नये गीतोंकी रचना करते, रासके स्वरूपोंको शिक्षण देते और कभी-कभी स्वयं भी उनके साथ अभिनय और नृत्य करते। उनके समयके वृन्दावनके सुप्रसिद्ध विद्वान और लेखक श्रीराधाचरण गोस्वामीजीने अपने नव-भक्तमालमें उनके सम्बन्धमें एक छप्पय लिखा है, जो इस प्रकार है-
अक्षर अर्थ अनूप अलकारन सु अलंकृत । भाव हृदय गम्भीर अनुप्रासन गुन गुंफित ।।
मन मोहै । राग नवीन नवीन प्रवीनन कौ
नृत्य करत गति भरत रासमण्डल अति सोहै ।।
देश-विदेश प्रचार अति श्रीवृन्दावन विश्राम ।
श्रीनारायण स्वामी नवल (पद) रचना ललित ललाम ।।
इस छप्पयसे ऐसा प्रतीत होता है कि वे श्रीकृष्ण-भक्ति प्रचारके हेतु वृन्दावनके बाहर भी रासमण्डलियोंको लेकर जाया करते ।
रास-लीलाओंसे उनका प्रेम केवल नृत्य-गीत और नाट्य-कला-विकास आदिमें उनकी अभिरुचि तक ही सीमित न था, यह उनके एक मित्रके साथ घटी घटनासे स्पष्ट है। उनके जन्म स्थानके ही उनके एक पुराने साथी, जो अब किसी उबै सरकारी पदपर कार्य करते थे, एक बार वृन्दावन आये। उन्हें खोजते-खोजते उनके स्थानपर पहुँचे। उनसे बातें करते-करते बहुत देर हो गयी। रासका समय हो रया। टिकारीवाले मन्दिरसे एक आकर बोला- महाराज लीलाका समय हो गया है। स्वरूप भी आ गये हैं। आप शीघ्र पधारें ।'
स्वामीजी लीलामें जानेको हुए, तो उनके मित्रने कहा- 'यह लीला और सरूपोंका क्या चक्कर है ? आप तो वेदान्ती हैं। वृन्दावन आकर इन छोकरोंके साथ नाच-गान करनेमें कैसे जुट गये ? यह आपको शोभा नहीं देता।'
'ऐसे न कहो। ऐसा कहनेसे अपराध होता है। लीलाके स्वरूप लीलाके समय साधारण बालक नहीं रहते। उनमें भगवत्-आवेश हुआ करता है।' स्वामीजीने भावविष्ट होकर कहा ।
'मैं तो इसे आपकी कोरी भावुकता ही मानता हूँ। मुझे विश्वास तो तब हो जब स्वरूप मुझे अपने उस स्वरूपका परिचय कुछ दें ।'
'कैसा परिचय चाहते हैं आप ?'
'यदि स्वरूपोंमें सचमुच भगवत्-आवेश होता है, तो वे लीलाके समय अपनी प्रसादी पानकी बीड़ी मुझे दें ।'
'यदि आपकी भावना सच्ची और निष्कपट है, तो प्रभु अवश्य इस प्रकार आपको परिचय देंगे, आप मेरे साथ चलें ।'
'मैं इस शर्तपर चलूँगा कि आप अपनी आँखोंमें पट्टी बाँध लें। कहीं आपने
स्वरूपोंको आँखसे इशारा कर दिया तो ?'
'तो आप स्वयं ही मेरी आँखमें पट्टी बाँध दें.' स्वामीजीने हँसते हुए कहा।
उन्होंने पट्टी बाँध दी और उनके साथ लीला-स्थलीकी ओर चल दिये। वहाँ लोगोंने स्वामीजीकी आँखमें पट्टी बंधी देख समझा कि आज उनकी आँखमें कुछ पहुंचे तब तक स्थान दर्शकोंसे खचाखच भर गया था। दोनों पीछे ही कहीं बैठ गये। हो गया है, इसीलिए पीछे बैठ गये हैं।
रासलीला प्रारम्भ होनेके पहले परदा देकर स्वरूपोंको भोग अर्पित किया गया। भोग आरोगनेके पश्चात् श्रीकृष्णने एक पानकी बीडी मुँहमें डाल ली और एक हाथमें ले ली। परदा जैसे ही खुला वे भीडको काटते. छम-छम करते स्वामीजीके पास जा पहुँचे और उनके निकट बैठे उनके मित्रके मुखमें बीड़ी देते हुए बोले- 'ले, बीड़ी खायगो ?'
स्वामीजी एकदम उछल पडे और उच्चस्वरमें बोले- 'नन्दके लालाकी जय! वाञ्छाकल्पतरु व्रजके कन्हैयाकी जय !' उनके सर-में-सर मिलाकर दर्शक भी जय-जयकार करने लगे। स्वामीजीके मित्र चित्रलिखितसे नन्दलालकी ओर देखते रह गये। उनके नेत्रोंसे अश्रुधार बहने लगी। वे अपनी सुध-बुध खो बैठे। उस एक ही क्षणमें उनके मन-बुद्धि और अन्तःकरणमें अभूतपूर्व परिवर्तन हो गया। वे सदाके लिए नन्दलाल और उनके भक्त स्वामीजीके हाथ बिक गये। कुछ दिन बाद स्वामीजीसे दीक्षा ले वे भी उस पथका अनुसरण करने लगे, जिसे वे ज्ञानियों और स्वस्थ बुद्धिके साधकोंके लिए त्याज्य समझा करते थे।
भक्ति-प्रेम और विरह की अनुभूति
जब तक सम्भव था स्वामीजी लालाबाबूके मन्दिर में नौकरी कर अपना निर्वाह करते रहे। नौकरीके बदले वे मन्दिरसे वेतन न लेकर प्रसाद मात्र ग्रहण करते । पैसा हाथसे स्पर्श भी न करते। उनके वैराग्य और भक्तिभावकी प्रशंसा शुक-सम्प्रदायके श्रीरूपमाधुरीजीने, जो स्वयं परम विरक्त और रसिक सन्त थे, अपने एक कवित्तमें इस प्रकार की है-
श्रीनारायण स्वामी, श्रीवृन्दावन नामी,
रहै सदा निष्कामी, सन्त कलिमें सूर है।
जाको त्याग है विचित्र, तन मनसे पवित्र,
अखे कोपीन मात्र वस्त्र, रहे फैसन से दूर है ।।
नैन प्रेम रंगमाते, हरि दर्शन पाये जाते,
रटना नामकी लगाते, रहे रसमें जु चूर है।
भासैं रूपमाधुरीदास, आयो प्रभुमें बिस्वास, त्यागो सम्पत्ति विलास , मन-मस्त भरपूर है ।।
श्रीरूपमाधुरीजीने इन थोडे से शब्दोंमें स्वामीजीके साधक और सिद्ध दोनों का वर्णन किया है- 'नैनप्रेम रंगमाते, हरि दर्शन पाये जात, रटना नामकी हरिके दर्शन सुलभ होते हैं। व्रजका ठाकुर साधकको रुलाता तो बहुत है, पर यात, रहे रसमें जू चूर है।' नाम-निष्ट साधकको प्रेमाञ्जन द्वारा रंगे नेत्रोंसे ही इसके एक-एक ऑसकी कीमत भी भरपूर चुकाना जानता है। वह उसे दर्शन दिये बिना नहीं रह सकता। स्वामीजीको उसने न जाने कितनी बार किस-किस रूपमें वर्शन दिये होंगे, पर उन्हें दर्शन देनेके सम्बन्धमें एक घटना बहुत प्रसिद्ध है।
सं० १९५५ में अपने शेष जीवनमें स्वामीजी जन-कोलाहलसे ऊबकर उनके पीछे दौडते वे गोवर्द्धन तक चले गये, पर वे हाथ न आये। हारकर एक वर्धन चले गये थे। एक दिन उन्हें कुसुमसरोवरपर जुगल-सरकारके दर्शन हुए। -इमलीके पेड़के नीचे बैठ गये। थोडी देरमें उन्होंने उन्हें फिर देखा गोवर्द्धनसे लौटते हुए। तब वे उनकी पीछे भागते-भागते कुसुमसरोवर तक गये। फिर भी वे हाथ न काये। उनकी पीछे दौड़-भाग करते थक जाने के कारण उन्हें विश्राम चाहिये था। दार उन्हें विश्राम कहाँ ? वे कभी सिसकियाँ भर-भर रोते, कभी मूर्छित हो गिर पडते। सिसकियाँ भरना और मूच्छित हो जाना, यही तो है प्रेम-पथके पथिकका विश्राम-
नारायण घाटी कठिन, जहाँ नेहको धाम । बिकल मूर्छा सिसकिबौ, यह मगमें विश्राम ।।
प्रियतमकी प्राप्तिके पश्चात् भी प्रेमके पन्थमें रोना, सिसकना और मूच्छित हो बाना तो लगा ही रहता है। यह इस पन्थका दूषण नहीं, भूषण है, पर मुख्य बात यह है कि प्रियतमकी प्राप्ति इसके पथिकको जितनी सुलभ है, उतनी अन्य किसी पन्थके विकको नहीं। यह सर्टिफिकेट स्वामीजी इस पन्थको दिये बिना न रह सके-
है न्यारो सब पन्थ ते, प्रेम पन्थ अभिराम । नारायण यामें चलत, वेगि मिलै पियधाम ।।
उनका यह सर्टिफिकेट इस पथके पथिकोको सदा उत्साहित करता रहेगा। जो
लोग अभी इसके पथिक नहीं बने हैं, जो संसारके माया-मोह और भोग-विलासमें
लिप्त से रहे हैं, और जिन्हें इसके लिए अभी सुभीता नहीं दीख रहा है, उन्हें उनके चेतावनी भरे ये दोहे इसे अविलम्ब अपना लेनेके लिए प्रेरित करते रहेंगे-
बहुत गई थोरी रही, नारायण अब चेत । काल चिरैया चुग रही, निशिदिन आयु खेत ।। नारायण हरि भजन में तू जिन देर लगाय । का जाने या देर में स्वास रहे के जाय ।। नारायण जब अन्त में यम पकरेंगे बाँह । तिनहू सों कहियो हमें, अभी सोफतो नाँह ।।
जबसे स्वामीजीको कुसुम सरोवरपर जुगलके दर्शन हए, वे उसके पास उद्धवकुण्डपर एक चौबारेमें रहने लगे। वहीं सं० १९५७ की फाल्गुन कृष्णपक्ष एकादशी को उन्होंने शरीर त्यागा। वहीं उनकी समाधि है ।
नारायण स्वामीकी अधिकांश रचनाएँ. 'व्रज-विहार' नामक ग्रन्थमें संकलित है जिसका प्रकाशन हो चुका है, इसमें वे ४३ रास लीलाएँ भी हैं, जो उनके द्वारा रचित कही जाती हैं।
उन रासलीलाओंकी सूची इस प्रकार है-
१. श्रीकृष्ण-जन्मकी बधाई, २. श्रीराधाजीका जन्मोत्सव, ३. श्रीकृष्णजीको बाललीला, ४. महादेव लीला, ५. यमलार्जुन लीला, ६. माखनचोरी लीला, ७. पनघट लीला, ८. मगरोकन लीला, ९. उराहनौ लीला, १०. मनिहारी लीला, ११. गोरे ग्वाल लीला, १२. मुदरिया लीला, १३. मालिन लीला, १४. अनुराग लीला, १५. बिसातिन लीला, १६. मान लीला, १७. खण्डिता मान, १८. बेनी मुंथन, १९. ब्रह्मचारी लीला, २०. खेवट लीला, २१. वंशी लीला, २२. वंशीवट लीला, २३. अवधूतिन लीला, २४. प्रीति परीक्षा, २५. चन्द्रावलि लीला २६. गेंद लीला, २७. चीर लीला, २८. श्याम सखी लीला, २९. नाग लीला ३०. हिंडोरा लीला, ३१. सांझी लीला, ३२. मतरोड लीला, ३३. गोवर्धन लीला, ३४. होली लीला, ३५. दधि लीला, ३६. दान लीला, ३७. वेणु गीत ३८. पूर्णमासी लीला, ३९. वैद्य लीला, ४०. कंस लीला, ४१. धनुष भंज लीला, ४२. कुवलियावध लीला, और ४३. उद्धव लीला।
प्रेम और भक्ति — जीवन-संदेश
ईश्वर-प्रेम की अनुभूति भक्त-साहित्य का एक महत्त्वपूर्ण विषय है। इन प्रसंगों को श्रद्धा, संवेदनशीलता और समर्पण के संदर्भ में पढ़ा जा सकता है।
कथा का सार
श्रीनारायण स्वामीजी की कथा भक्ति, विनम्रता और साधना पर मनन करने का अवसर देती है। इस संग्रह में अन्य भक्तों के जीवन-प्रसंग भी पढ़ें।