ब्रज के भक्त भाग 2 · अध्याय 23
श्रीमौनी बाबाजी
श्रीमौनी बाबाजी की प्रेरक हिंदी कथा। जानिए उनके जीवन, भक्ति और साधना से जुड़े महत्वपूर्ण प्रसंग।

श्रीमौनी बाबाजी का यह भक्त-चरित्र ब्रज की साधना, श्रद्धा और जीवन से जुड़े प्रसंगों को सामने लाता है। नीचे कथा को अलग-अलग विषयों में व्यवस्थित किया गया है।
गुरु-सान्निध्य और आध्यात्मिक शिक्षा
[ दोमिल वन ]
मौनी बाबा माध्वगौडीय सम्प्रदायके उडिया संत थे। उनके असली नामका पता नहीं, पर जिस घटनाके बाद वे मौनी बाबा कहलाने लगे, वह इस प्रकार है-
नन्दग्राममें नन्दसरोवरपर दण्डी संन्यासी श्रीअमृतानन्द सरस्वती रहते थे। वे प्रकाण्ड विद्वान थे। पण्डित श्यामसुन्दरजी और श्रीकालूराम शास्त्री जैसे विद्वानोंने उनसे शिक्षा पायी थी। उन्हींके पास मौनी बाबाभी पढने जाया करते थे। वे वाचाल बहत थे। पढ़ते समय भी बहुत बोलते थे। एक दिन जब वे पढते-पढते व्यर्थ बोल पडे, गुरुदेवने फटकार कर कहा- 'चुप रह !' उसी समयसे वे मौन हो गये और मौनी बाबा कहलाने लगे।
वे बड़े भजन-निष्ठ थे। दोमिल-वनमें एक ऊँची अटरिया बनाकर उसमें भजन करते थे। उनकी विलक्षणता यह थी कि वे संख्या खाते और दूध पीते थे। दूधके अतिरिक्त और कुछ नहीं लेते थे। उन्होंने बहुत-सी सुन्दर गायें पाल रखी थीं। उनकी वे सेवा करते थे। उनका दूध स्वयं पीते थे ? और साधु-महात्माओंको पिलाते थे। छोटी अवस्थामें प्रियाशरण बाबा भी उनके पास जाया करते थे। उनसे उपदेश तो मिलता ही था, दूध और खीर भी मिला करती थी।
चूँकि उनके प्रति व्रजवासी बड़ी श्रद्धा रखते थे इसलिए उनकी गायोंको उन्होंने पूरी छूट दे रखी थी। वे जिस खेतमें चाहतीं चरने लग जातीं। उनके लिए किसी खेतमें किसी प्रकारकी रोक-टोक न थी।
मौनी बाबाने नृसिंहदेवकी उपासना कर नृसिंहदेवके मन्त्रकी सिद्धि प्राप्त की थी। वे नित्य प्रातः नन्दगाँवमें नन्दलालके दर्शन करते और संध्या समय बरसाने जाकर किशोरीजीके दर्शन करते।
भजन-साधना और नाम-स्मरण के प्रसंग
एक दिन जब वे बरसाने जा रहे थे उस समय कालूरामजी शास्त्री अपनी पाठशाला में विद्यार्थियोंको पढ़ा रहे थे। कालूरामजी बड़े पण्डित तो थे ही, बड़े भजन-निष्ठ भी थे। पर, लगता है कि उन्हें अपने पाण्डित्य और भजनका कुछ अभिमान था। वे किसी साधुके आगे जल्दी माथा नहीं झुकाते थे। किसी साधुपर कटाक्ष करनेमें भी संकोच नहीं करते थे। मौनी बाबाको सामनेसे जाते देख उन्होंने विद्यार्थियोंसे कहा- 'देखो, रंगा सियार जा रहा है।।
रात्रिमें कालूरामजी और उनके विद्यार्थियोंको, जो उनके साथ रहते थे, घरके भीतर सिंहके दहाडनेकी आवाज सुनायी दी। आवाज सुनते ही वे थर-थर काँपने लगे। चारों और देखनेपर दीखा कुछ नहीं, पर दहाडनेकी आवाज निकट आती जार पडी। कालुरामजी समझ गये कि यह नृसिंहदेवकी आवाज है जिनके भक्तका उन्होंने अपमानकर आपके चरणोंमें अपराध किया है। प्रभु क्षमा- क्षमा।'
धीरे-धीरे दहाड़ बन्द हो गयी, पर कालूरामजीके हृदयकी धड़कन बन्द न हुई। साष्टांग दण्डवत्कर उनसे क्षमा माँगी। मौनी बाबाने लिखकर उनसे कहा- 'मैंने तो उन्हें रातभर नींद नहीं आयी। सवेरा होते ही वे मौनी बाबाकी अटरियापर गये। उन्हें तुम्हारी बातका बुरा नहीं माना। पर, मेरे ऊपर जो हैं उन्हें यह बात अच्छी नहीं लगी। तुम्हें चाहिये कि किसी सन्तकी अवज्ञा न किया करो। प्रभु अपना अपमान सह लेते हैं, पर अपने भक्तका अपमान उनसे सहन नहीं होता।'
व्रजभूमि और तीर्थ से जुड़ी घटनाएँ
बाबा सभी सम्प्रदायों और जातियोंमें समदृष्टि रखते थे। सभी सम्प्रदायों और जातियोंके लोग भी उनके प्रति अटूट श्रद्धा रखते थे। कितनी श्रद्धा रखते थे यह एक घटनासे स्पष्ट है।
एक बार बाबाको विष्णु-यज्ञ करनेकी इच्छा हुई। उन्होंने केवल व्रजवासियेकि पैसेसे यज्ञकी योजना बनायी। चारों ओर से व्रजवासी यज्ञकी सामग्री लाने लगे। बारह गाँवके मेयो जातिके मुसलमानोंने भी यज्ञमें सहयोग किया। घी, दूध, लकड़ी आदिसे यज्ञ-स्थलीको पाट दिया। द्रव्यसे भी प्रचुर परिमाणमें सहायता की। इतना ही नहीं, यज्ञमें जो कीर्तन हुआ उसमें भी उन्होंने वैसे ही जोशके साथ भाग लिया, जैसे और किसीने।
श्रीरूपमाधुरीशरणजीके निम्न कवित्तसे ज्ञात होता है कि उन्होंने बारह वर्ष तक गुप्त रहकर, केवल वनके पत्ते खाकर गोपाल-मन्त्रका जप किया और उसमें सिद्धि प्राप्त की-
दोऊँमिलके निवासी, बाबा मौनी सुखरासी, जाने सब व्रजवासी, मन्त्रराज जप कीनो है।
गुप्त बारह वर्ष रहिया, कछु काहूसे न कहिया, पत्ते वृक्षके जु खड्या, सन्त हरी रंग भीनो है ।।
भये व्रजमें प्रसिद्ध, उन्हें जानो पूरो सिद्ध, जाके ठाड़ी ऋद्धि सिद्धि, सुख जीवनको दीनो है ।
नाम-स्मरण और एकाग्रता — जीवन-संदेश
नाम-स्मरण, भजन और एकाग्रता के प्रसंग साधना की निरंतरता की याद दिलाते हैं। यहाँ वर्णित जीवन-अनुभवों से पाठक अपनी साधना के लिए प्रेरणा ले सकते हैं।
कथा का सार
श्रीमौनी बाबाजी की कथा भक्ति, विनम्रता और साधना पर मनन करने का अवसर देती है। इस संग्रह में अन्य भक्तों के जीवन-प्रसंग भी पढ़ें।