ब्रज के भक्त भाग 2 · अध्याय 11

माध्वगौड़ेश्वराचार्य श्रीमधुसूदन गोस्वामीपाद सार्वभौम

माध्वगौड़ेश्वराचार्य श्रीमधुसूदन गोस्वामीपाद सार्वभौम की प्रेरक हिंदी कथा। जानिए उनके जीवन, भक्ति और साधना से जुड़े महत्वपूर्ण प्रसंग।

माध्वगौड़ेश्वराचार्य श्रीमधुसूदन गोस्वामीपाद सार्वभौम
माध्वगौड़ेश्वराचार्य श्रीमधुसूदन गोस्वामीपाद सार्वभौम — ब्रज के भक्त भाग 2

माध्वगौड़ेश्वराचार्य श्रीमधुसूदन गोस्वामीपाद सार्वभौम का यह भक्त-चरित्र ब्रज की साधना, श्रद्धा और जीवन से जुड़े प्रसंगों को सामने लाता है। नीचे कथा को अलग-अलग विषयों में व्यवस्थित किया गया है।

जन्म, परिवार और प्रारम्भिक जीवन

श्रीमधुसूदन गोस्वामीपादका जन्म पौष कृष्णपक्ष षष्ठी, सम्वत् १९१४ को श्रीराधारमणदेवके सेवाधिकारी माध्वगौडेश्वर सम्प्रदायाचार्य गोस्वामी श्रीतत्त्वारामजी महाराजकी धर्मपत्नी श्रीमुक्तादेवीके गर्भसे हुआ। अल्पावस्थामें ही उन्होंने अपने कुशाग्रबुद्धि और तीव्र मेधाशक्तिका परिचय दिया। काव्य, कोष और व्याकरणादिका इतना अच्छा अभ्यास कर लिया कि १० वर्षकी आयमें जब उनका उपनयन संस्कार हुआ, वे मन्त्रोंका स्वयं उच्चारणकर उनका उपनयन संस्कार हुआ, वे मन्त्रोंका स्वयं उच्चारणकर उनका अर्थ कर सके। उनकी मेधाशक्ति इतनी विलक्षण थी कि वे ३०० श्लोक तक एक ही दिनमें कण्ठ कर लेते थे।

उनका विद्याध्ययन सुचारु रूपसे चल रहा था। पर, एक दुर्घटनाके कारण उसमें बाधा पड़ गयी, उनके अग्रज गोस्वामी श्रीसुन्दरलालका असमय देहान्त हो गया। भोली-भाली वात्सल्यमयी माँके मनमें यह धारण बन गयी कि विद्याध्ययनमें विशेष परिश्रम करनेके कारण उनका शरीर जाता रहा। उन्होंने एक दिन मधुसूदन गोस्वामीको अपनी गोदमें बिठाकर कहा- 'बेटा, अब पढ़ना-लिखना बन्द कर दे। तुझे मेरी शपथ।'

मधुसूदन गोस्वामीको लगा कि माँने अनजाने उनके ऊपर बज्रघात किया है। वे क्या जानती थीं कि उनका आविर्भाव संसारको अपने ज्ञानके प्रकाशसे आलोकित करनेको हुआ था, स्वयं अन्धकारमें पड़े रहनेको नहीं! उनके लिए तो विद्या है जीवन था, अविद्या मृत्यु थी।

१. स्थानाभावके कारण हम उस कथाका भी उल्लेख नहीं कर रहे हैं।

२. श्रीमधुसूदन गोस्वामीपादके पौत्र श्रीविश्वम्भर गोस्वामीजी महाराजके सौजन्यसे प्राप्त

उनकी डायरीपर आधारित । माध्वगौडेश्वराचार्य श्रीमधुसूदन गोस्वामीपाद सार्वभौम

उन्होंने माँसे कुछ नहीं कहा। बाहर जाकर सोचने लगे- 'माँकी आज्ञाका पडना-लिखना बन्द कर दिया, पर प्रभुसे मन-ही-मन प्रार्थना करते रहे, जिससे पालन करूंगा या विद्यादेवीका अनुसरण करूँ।' उन्होंने माँकी आज्ञाका पालन कर उनका मोहान्धकार दूर हो और वे विद्याध्ययनके लिए अनुमति प्रदान करनेमें समर्थ हों।

प्रभूने उनका सुन ली। सुनते क्यों नहीं ? उनकी प्रार्थना प्रभुकी अपनी ही योजनाके अनुकूल जो थी। मधुसूदन गोस्वामीको एक विद्वान और प्रभावशाली वैष्णवाचार्यक रूपमें खड़ा कर वैष्णव समाजका बहुत-सा काम जो कराना था उन्हें। विश्वविख्यात विद्वान गोस्वामी सखालालाजीकी उनपर पूर्ण दृष्टि थी। उन्हें जब पता चला कि माँके मोहके कारण उनका पढना-लिखना बन्द हो गया है. उन्होंने उनसे कहला भेजा- 'तुम्हारा बड़ा लड़का खाता था, पीता था, सोता था, जागता था और उसका तुमने विवाह आदि किया था। वह मर गया। इसलिए, अपने ओटे लड़केको तुम वह कोई काम न करने देना, जो वह करता था। तुम्हारी मति मारी गयी है। कहीं विद्याध्ययनका फल मृत्यु होता है ? तुम्हारा अपने होनहार बालकके भविष्यसे खिलवाड़ करना उचित नहीं।'

गोस्वामीजीके वाक्योंसे माँका भ्रम जाता रहा और उन्होंने मधुसूदनजीको पढ़नेकी अनुमति दे दी। न्याय, व्याकारणादिका पाठ समाप्तकर वे भक्ति-शास्त्रोंके अध्ययन-अध्यापनमें जुट गये। थोड़े ही समयमें उन्होंने एक विद्वान और असाधारण प्रतिभा-सम्पन्न धर्मोपदेशकके रूपमें ख्याति प्राप्त कर ली। आचार्य पदपर तो वे १७ वर्षकी आयुमें ही प्रतिष्ठित हो गये थे, जब उनका विवाह हुआ था। उनकी बारातकी शोभा बढ़ानेमें उनके १५-२० विद्यार्थियोंका भी योग था।

मधुसूदन गोस्वामीके माता-पिता इस बातसे चिन्तित रहा करते थे कि उनकी आयुकी रेखा बहुत कम थी। पर, एक सिद्ध महापुरुष श्रीदयालदास बाबाजीकी उनपर विशेष कृपा थी। एक बार भूटान प्रदेशके योगिराज श्रीधर्मदासजी वृन्दावन आये हुए थे। दयालदासजीसे उनका स्नेह था। दयालदासजी मधुसूदन गोस्वामीको उनके पास ले गये और उनका दाहिना हाथ उनके आगे बढ़ाकर कहा- 'इसे देखिये और इसके लिए कुछ कीजिये।'

हाथ देखते ही वे गम्भीर हो गये। थोडी देर चुप रहकर बोले- 'बात चिन्ताजनक है, पर मैं इसमें क्या कर सकता हूँ ? आप सामर्थ्यवान हैं, जो चाहें कर सकते हैं।'

'दैन्यसे काम नहीं चलेगा। आपको कुछ करना ही होगा। आप देख रहे हैं कि इसके और सभी लक्षण महापुरुषों जैसे हैं। इसके द्वारा जगत्का कितना कार्य सकता है। आप इसके लिए जो कुछ करेंगे उससे इसका ही नहीं, जगत्का भी कल्याण होगा।'

तब योगिराजने अपने दाहिने अँगूठेके नाखूनसे मधुसूदन गोस्वामीके दाहिने हाथकी आयुकी रेखा आगे तक खींच दी और दयालदासजीसे बोले 'लीजिये मैंने आपकी आज्ञाका पालन कर दिया। कार्य तो आपके शुभ संकल्पके फलस्वरूप आप ही होगा, पर दैन्यवश निमित्त मुझे बनाना चाहते हैं तो ठीक है। जैसी आपकी

इच्छा।' सम्वत् १९३७ में जब मधुसूदन गोस्वामीकी आयु २३ वर्षकी थी, उन्हें सान्निपातिक ज्वर हुआ। त्रिदोषके सब लक्षण दीखने लगे। नाडी भी छूटने लगी। घरके लोग उनके जीवनकी आशा छोड़ बैठे। उसी समय मूच्छित अवस्थामें उन्होंने देखा कि कोई दो पुरुष उनके निकट आकर खडे हो गये। एक सिरहानेकी ओर

दूसरा पैरोंकी ओर। एकने कहा-'क्या देखते हो ?'

दूसरेने कहा - 'समय निकट आ रहा है।'

फिर पहलेने कहा- 'नहीं, इसका तो समय बढ़ा दिया है।'

तुम दूसरेने कहा-'अच्छा, तो लो।' इतना कहते ही उसने हाथ पकड़े, दूसरेने पैर पकड़े और एक ऐसा झटका दिया कि वे चारपाईसे उछल पड़े। यह देख सब आश्चर्य चकित हो एकटक उनकी ओर देखते रहे। किसीने कहा- 'लाला !'

उन्होंने धीरेसे उत्तर दिया- 'हाँ!'

घरके लोग कुछ आश्वस्त हुए। वैद्यको बुलाया। उसने देखकर कहा- 'अब नाड़ी ठीक चल रही है।' कोई चिन्ताकी बात नहीं है।'

धीरे-धीरे शरीर स्वस्थ और सबल होने लगा। दो-तीन दिन बाद उन्होंने देखा कि उनकी हथेलीपर योगिराजने जो कल्पित रेखा खींची थी, वह अब स्पष्ट बढ़ी हुई दीख रही है।

उस समय स्वामी दयानन्दजी विद्यमान थे। आर्यसमाजका प्रचार जोरोंसे चल रहा था। सनातन धर्मपर प्रहार किये जा रहे थे। मधुसूदन गोस्वामीसे यह न देखा गया। उन्होंने इसके विरुद्ध अभियान छेड़ दिया। भारतके विभिन्न प्रान्तोंमें भ्रमणकर अपने पाण्डित्यपूर्ण ओजस्वी भाषणोंसे इसकी रोकथाम की और सनातन धर्मके माध्वगौडेश्वराचार्य श्रीमधुसूदन गोस्वामीपाद सार्वभौम

प्रति लोगोंकी आस्थाको धक्का लगनेसे बचाया। सामयिक पत्रोंमें अपने लेख आदि पुस्तकें लिखकर सनातन धर्मकी नींवको सुदृढ़ किया। भेजकर और 'प्रतिमा तत्त्व', 'उपासना तत्त्व', 'आत्मविद्या', 'आर्यसमाजीय रहस्य'

भारत धर्म महामण्डलकी स्थापना भी गोस्वामीजीके सहयोगसे ही की गयी। उनके अथक प्रयाससे उसकी जो उपलब्धियाँ हई उनके लिए उन्होंने दिल्लीमें सम्वत् १९४८ में और वाराणसीमें सम्वत् १९५७ में अभिनन्दन और स्वर्णपदक द्वारा सार्वजनिक रूपसे सम्मानित किया गया।

श्रीगौरांगमहाप्रभुके प्रेम-धर्मके प्रचारके उद्देश्यसे गोस्वामीजीने श्रीगौरांग प्रेम-धर्म करनेमें महत्त्वपूर्ण योगदान किया। एक बार गौडीय वैष्णव समाजमें महाप्रभुके सभाकी भी स्थापना की। उसके द्वारा उन्होंने गौडीय-वैष्णव समाजको सुसंगठित मनको लेकर विवाद चल पड़ा। समाज दो विरोधी गुटोंमें बँट गया। गोस्वामीजीने रसिकमोहन विद्याभूषण आदि सम्प्रदायके विद्वानोंको श्रीगौरांग प्रेमधर्म सभाके मंच पर उस समय महात्मा शिशिरकुमार घोष, श्रीकेदाररनाथ भक्तिविनोद, पण्डित एकत्र किया। उनके सहयोगसे उन्होंने व्रजमण्डल और गौड़मण्डलमें इस विवादको समाप्त किया।

इस सम्बन्धमें उन्होंने अपने पाण्डित्य और शास्त्रज्ञानके बलसे जिस प्रकार विरोधी पक्षको परास्त किया उससे प्रभावित हो नवद्वीपके पण्डितोंने एक सभामें उन्हें 'सार्वभौम' की उपाधिसे सम्मानित किया।

इसके पश्चात वैष्णव जगत्में सिद्धान्त या आचार-विचारसे सम्बन्धित जब शोई समस्या उठ खड़ी होती, तो उसके समाधानके लिए लोग उन्हींका आश्रय लेते।

यूँ तो सार्वभौमपादने भारत-धर्म महामण्डलके तत्त्वावधानमें सनातन धर्मका प्रचार उत्तर भारतमें सर्वत्र किया, पर उनका कार्य-क्षेत्र व्रजमण्डल और गौड़मण्डलमें विशेषरूपसे रहा। इन दोनों क्षेत्रोंमें उनका प्रभाव भी सर्वाधिक था। कलकत्तेके बड़े-बड़े थियेटर हॉलोंमें जब उनकी वक्तृताका आयोजन होता तो हाल उसाठस भरे होते। गौड़में वे जहाँ-कहीं जाते उनका प्राचीन ऋषियोंकी तरह सम्मान हेोता। पालकीमें बैठकर जब वे गाँव-गाँवमें जाकर प्रचार करते तो मार्गमें दर्शनार्थियोंकी भीड़ और उनके दण्डवत्प्रणाम के कारण कहारोंको पालकी ले जानेमें मुसीबतका सामना करना पड़ता।

भक्तों के साथ मिलन और सत्संग

सार्वभौमपाद वक्ता तो अच्छे थे ही, वे श्रीमद्भागवत महापुराणकी कथा भी बड़े प्रभावशाली ढंगसे कहते थे। उनकी भागवत कथामें श्रोताओंकी अपार भीड होती थी और जहाँ-कहीं कथा होती थी वहाँ उसके लिए विराट आयोजन करना।

मण्डल और बाबू उपेन्द्र मोहन मण्डलके स्थानपर दो महीने भागवतकी कथा गई। पड़ता था। एक बार मैमनसिंह डिस्टिक्टमें विष्णुपुरके जमींदार बाबू व्रजेन्द्रकुमार कथामें इतनी भीड़ हुई कि उसकी समाप्तिपर जो वैष्णव भोजनका विराट आयोजन किया गया, उसके लिए बरतनोंकी जगह खाद्य सामग्री रखनेकी एक नयी प्रकारकी व्यवस्था करनी पड़ी। भातके बड़े-बड़े स्तूप बनाये गये। पृथ्वीमें बड़े-बड़े गहते खोदकर, उनमें चटाई और उसके ऊपर केलेके पत्ते बिछाकर साग-सब्जी रखनेकी व्यवस्था की गयी। दाल, दही और खीर रखनेके लिए नदीमें-से छोटी-छोटी नावे निकालकर काम में लायी गयीं।

गोस्वामीपादकी एक विशेषता यह थी कि वे जहाँ-कहीं प्रचार या कथाके लिए आमन्त्रित किये जाते वहाँसे किसी प्रकारकी भेंट-पूजा स्वीकार न करते। एक बार श्रीधाम पुरीमें गंभीरा' के महन्त श्रीराधाकृष्णदासजी महाराजके आग्रहपर उन्होंने गंभीरामें २ महीने श्रीमदभागवतकी कथा कही। कथाके अन्तिम दिन महन्तजीने उन्ने वस्त्र, अलंकार और स्वर्ण मुद्राएँ भेंट कीं। उन्होंने हाथ जोडकर सारी भेंट लौटाते हुए कहा- 'यदि आपको भेंट देनी ही है, तो ऐसी दें जिससे मेरा जन्म-जन्मका अभाव मिट जाय।'

'बताइये ऐसी कौन-सी भेंट मैं दे सकता हूँ आपको ?' महन्तजीने पूछा।

गोस्वामीजीने कहा - 'गंभीरामें जो श्रीमन्महाप्रभु द्वारा व्यवहार किया गया कथा सुरक्षित है, उसका यदि एक टूक देनेकी कृपा करें, तो उसकी सेवा-पूजाकर मैं धन्य हो सकूँगा।'

महाप्रभुके प्रसादी कथामें से किसीको टूक देनेका कोई प्रश्न ही नहीं था, पर महन्तजीने प्रसन्नतापूर्वक गोस्वामीजीको उसमें से एक टूक दे दिया। आज तक उनके परिवारमें उसकी सेवा की जाती है।

समाज-सेवाके क्षेत्रमें भी सार्वभौमपादने महत्त्वपूर्ण कार्य किया। उन्होंने आचार्यकुल नामक एक संस्था की स्थापना की, जिसके अन्तर्गत वृन्दावनमें पटनीमलवाली कुञ्ज में विद्यार्थियोंके लिए निःशुल्क आवास, भोजन और शिक्षा आदिकी व्यवस्था की। शाहजीके मन्दिरके अग्रभागमें वैष्णव विद्यालयकी स्थापना की, जिसमें छात्रोंको योग्य शिक्षकों द्वारा वैष्णव साहित्य पढ़ाये जाने की व्यवस्था थी। वे स्वयं भी अपने आवासपर नियमित रूपसे श्रीरूप, श्रीसनातन और श्रीजीवादि गोस्वामियोंके ग्रन्थोंका अध्यापन किया करते थे। वृन्दावनके प्रेम महाविद्यालय, गुरुकुल और रामकृष्ण मिशन सेवाश्रमकी स्थापनामें भी उनका हाथ था।

१. वह स्थान जहाँ श्रीमन्महाप्रभु रहा करते थे। माध्वगौड़ेश्वराचार्य श्रीमधुसूदन गोस्वामीपाद सार्वभौम

पर वे कोरे धर्म-उपदेष्टा, समाज-सुधारक और प्रचारक ही नहीं थे। उनका जैसा प्रचार था. वैसा ही आचार भी। प्रचार-कार्य में संलग्न रहते हुए भी उनकी अपने-आपको उन्नत किया था, उससे बाह्य जगत्के कार्यकलापोंक कारण विच्युत आन्तरिक साधना निर्विघ्न चलती रहती। साधनाके जिस स्तरपर उन्होंने परिस्थितियोंमें भी उनकी अविचल स्थिति बनी रहती। होनेका कोई प्रश्न नहीं था। एक बडे धीर-गम्भीर साधकके समान कठिन-से-कठिन

सम्वत् १९४० में उनकी धर्मपत्नीका देहान्त हुआ। १९४२ में गुरुजनोंके अनुरोधसे उन्होंने दूसरा विवाह किया। संवत् १९५२ में दूसरी पत्नीका भी परलोकवास हो गया। १९७४ में उनके सुयोग्य ज्येष्ठ पुत्र श्रीराधाकृष्ण गोस्वामीका असमय गोलोकवास हो गया। पर, इन सारी परिस्थितियोंमें उनकी प्रभुके चरणोंमें स्थिति बनी रहीं।

यूँ तो गोस्वामीजी एक योगाभ्यासी साधक थे, पर योगमें उनकी रुचि आनुशंगिक ही थी। मुख्य रूपसे वे भक्त थे। महाप्रभुमें और भगवन्नाममें उनकी अनन्य निष्ठा थी। महात्मा शिशिरकुमार घोष द्वारा लिखित 'अमिय निमाई चरित' नामके महाप्रभुके जीवन-चरित्रका उन्होंने हिन्दीमें अनुवाद किया। अपने शिष्य वजीराबाद निवासी दीवान श्रीकृष्णगोपाल दुग्गलसे उन्होंने उर्दू में महाप्रभुका चरित्र लिखवाया, जिसका उर्दू भाषी लोगोंमें बहुत प्रचार हुआ। अपने शिष्योंके द्वारा जगह-जगह महाप्रभुके श्रीविग्रहकी स्थापना करवायी।

वृन्दावनमें गोपीनाथ बाजार में 'बड़े महाप्रभु' के नामसे प्रसिद्ध जिन महाप्रभुका मन्दिर है, उनकी प्रतिष्ठा भी उन्होंने ही अपने शिष्य श्रीराधागोविन्द गोस्वामीके घर कलकत्तेमें की थी, पर उनके गोलोकवासके पश्चात् वे उनकी इच्छानुसार वृन्दावन ले आये गये थे।

सार्वभौमजीका जीवन महाप्रभुको पूर्णरूपसे समर्पित था। वे जो कुछ भी करते थे, उनकी कृपका भरोसा लेकर उनके निमित्त करते थे। महाप्रभु भी उनके ऊपर पूरी कृपा रखते थे, कठिन परिस्थितियोंमें उनकी सहायता करते थे और यदि उनके मनमें परमार्थ सम्बन्धी कभी कोई शंका उत्पन्न होती थी, तो उसका समाधान करते थे। इस सम्बन्धमें दो उदाहरण उपयुक्त होंगे।

बरेलीमें वैष्णव-धर्म प्रचारिणी सभाका अधिवेशन था। कई दिनसे आर्य समाजियोंसे वाद-विवाद चल रहा था। वैष्णव-धर्मकी प्रतिष्ठा और उसके साथ मधुसूदन गोस्वामीपादकी प्रतिष्ठा दाँवपर लगी हुई थी। सनातन धर्मावलम्बी लोगोंको

* इनका वास्तविक नाम 'श्रीअमिय निमाई गौरांग महाप्रभु' है।

अपने बुद्धि-बलका नहीं, महाप्रभुकी कृपाका भरोसा था। वे रातको महाप्रभुसे प्रार्थना गोस्वामीपादके पाण्डित्य और उनकी तीक्ष्ण बुद्धिका भरोसा था, पर गोस्वामीजीको करके सोये- 'प्रभु, कल मेरा भाषण है। वाद-विवादका अन्तिम दिन है। लज्जा आपके हाथ है।'

रात्रिमें उन्होंने स्वप्न देखा कि बरेलीमें महाप्रभु का एक मन्दिर है। वे दर्शन देख रहे हैं, प्रतिद्वन्द्वियोंकी ओर तीक्ष्ण दृष्टिसे और उन्होंने अपने गलेकी माला करने गये हैं। उनके प्रतिद्वन्द्वी भी उनके साथ हैं। महाप्रभु उनकी ओर कृपादृष्टिसे उतारकर उन्हें पहना दी है।

दूसरे दिन महाप्रभुकी कृपासे वैष्णव-धर्मकी विजय हुई, आर्यसमाजकी पराजय। विजयका सेहरा गोस्वामीजीके सिरसे बाँधा गया।

एक बार बंगालमें भ्रमण करते समय गोस्वामीपाद रामकेलि गये। वहाँ उस बन्दीशालाके दर्शन किये, जिसमें सुलतान हुसेनशाने सनातन गोस्वामीको बन्दी बनाकर रखा था। क्षण भरके लिए उनके मनमें शंका जागी कि क्या सनातन गोस्वामीको बन्दी बनानेकी घटना सत्य है ? सनातन गोस्वामीने कोई अपराध तो किया नहीं था, जिसके कारण उन्हें यह दण्ड दिया जाता। उन्होंने तो प्रधानमन्त्रीकी हैसियतसे सुचारु रूपसे राजकार्य चलाकर सुलतानकी सेवा ही की थी और सुलतान, इसलिए उनसे बहुत प्रसन्न भी था। महाप्रभुके रामकेलिमें दर्शन करनेके पश्चात् उनका मन संसारसे फिर गया था और प्रधानमन्त्रीका दायित्व निभाना उनके लिए असम्भव हो गया था, इसलिए उन्होंने प्रधानमन्त्री पद त्याग दिया था। इससे भी राज्यके प्रति उनका सद्भाव ही सिद्ध होता था।

कोई ऐसा कारण नहीं जान पड़ता था, जो सुलतानको उन्हें दण्ड देनेके लिए बाध्य करता। पर, चैतन्य-चरितामृतमें सुलतान द्वारा सनातन गोस्वामीको कैद किये जानेका स्पष्ट उल्लेख है। उनकी लेखनीपर भी अविश्वास नहीं किया जा सकता था। बात कुछ समझमें नहीं आ रही थी।

दूसरे दिन गोस्वामीजी मालदा गये। एक भक्तके घर ठहरे। रात्रिमें १२ बजे एक पुलिस इन्सपेक्टर कुछ सिपाहियोंको लेकर आया और उन्हें गिरफ्तारकर थाने ले गया। प्रातः होते ही खबर सारे शहर में फैल गयी। मालदाके गणमान्य व्यक्ति थानेकी तरफ भाग पडे। थानेमें भीड लग गयी। सब गोस्वामीजीके लिए बेहद चिन्तित, पर गोस्वामीजीके मुखपर चिन्ताका कोई चिह्न नहीं। वे कीर्तन कर रहे थे माध्वगौडेश्वराचार्य श्रीमधुसूदन गोस्वामीपाद सार्वभौम

और मन-ही-मन महाप्रभूकी करुणाका ध्यान कर प्रसन्न हो रहे थे। वे जान रहे थे कि महाप्रभूने उन्हें यह हृदयंगम करानेके लिए एक विनोदभरी लीला की है कि गोस्वामीके कैद किये जानेकी घटना सत्य है। इस प्रकार उन्होंने कविराज राज्य द्वारा किसी निरापराध व्यक्तिको भी कैद किया जा सकता है और सनातन गोस्वामीकी लेखनीपर अविश्वास करनेके अपराधकी सम्भावना से उन्हें बचा लिया है।

जीवन के अंतिम प्रसंग और स्मृतियाँ

मालदाकी पुलिसको एक ऐसे धर्मगुरुकी खोज थी, जिसने कोई न्याय विरुद्ध कार्य किया था। गोस्वामीजीकी वेश-भूषा और आकृतिमें उससे कुछ साम्य होनेके कारण उनके वही व्यक्ति होनेके सन्देहमें उन्हें अँग्रेज कलेक्टर और एस०पी० के हक्मसे गिरफ्तार कर लिया गया था। पर जैसे ही उन्हें पता चला कि वे एक संभ्रान्त परिवारके हिन्दुओंके अतिसम्मानित धर्मगुरु हैं, उन्हें मुक्त कर दिया गया।

महाप्रभु और भगवान्नाममें श्रीमधुसूदन गोस्वामीपादकी असाधारण निष्ठाका कारण कदाचित् उनके पिताकी अपनी निष्ठा और उनका अन्तिम उपदेश था। उनके जीवनका अन्त सिद्ध पुरुषोंकी तरह एक अलौकिक रीतिसे स्वेच्छापूर्वक हुआ था। तीन दिनसे वे स्वस्थ होते हुए भी केवल दूध पीकर रह रहे थे। अपने हाथसे रसोई बनाकर मधुसूदन गोस्वामीको खिला रहे थे, पर स्वयं दूध पीकर रह रहे थे। तीसरे दिन भी उन्होंने रसोई स्वयं बनायी। १० बजेके लगभग मधुसूदन गोस्वामीसे कहा- 'तुम स्नान-आहार कर मेरे पास आ जाओ।' 0

वे आहारादि कर आये तो कहा- 'आज मेरे जीवनका अन्तिम दिन है। जैसे मैं कहूँ, वैसी व्यवस्था करो।'

यह सुनते ही मधुसूदन गोस्वामी घबरा गये। सैंधे हुए स्वरमें उन्होंने कहा- 'पिताजी, यह आप क्या कह रहे हैं? आप तो बिलकुल ठीक हैं।'

'नहीं, तुम मेरी नाड़ी देखो,' पिताजीने कहा। नाड़ी देखी तो उसका कहीं पता नथा। मधुसूदन गोस्वामी हक्का-बक्का रह गये। उनका मुख सूख गया।

उन्हें देख पिताजीने फिर कहा- 'घबराओ नहीं। मैं जा रहा हूँ तो क्या, महाप्रभु तो हैं। उनपर पूरा विश्वास रखना और हरिनाम लेते रहना। तुम्हारा सब प्रकारसे मंगल होगा। अब विलम्ब न करो। नीचे रज बिछा दो मुझे उसपर लेट जाने दो। ऐसी व्यवस्था करो कि कोई मेरे निकट न आये, न मुझसे कुछ कहे-सुने। हरिनामके सिवा और कोई शब्द मेरे कानमें न पड़े। तुम भी अब मुझसे न कुछ कहना, न पूछना। मुझे जो कहना था, तुमसे कह दिया। उसे न भूलना।'

तुरन्त वैसी ही व्यवस्था की गयी। रजमें लेटनेके १५-२० मिनट पश्चात् ही गौर नामका कीर्तन करते-करते उन्होंने नित्य-धाम में प्रवेश किया। पिताजी उपदेश मधुसूदन गोस्वामीने याद रखा। उनकी नाममें वैसी ही निष्ठा

थी. जैसी उनके पिताजीकी। उनकी नाम-निष्ठाका पता चलता है एक विशेष लिए डॉक्टर और वैद्य बुलाये गये। पर उन्होंने किसीकी औषधि लेना स्वीकार नहीं घटनासे। सम्वत् १९४४ में उनपर कॉलराका भयंकर आक्रमण हुआ। चिकित्साके मुझपर कृपाकर उच्च स्वरसे नाम-संकीर्तन करें। वही परम औषधि है।' वैसा ही किया। जब बहुत आग्रह किया गया, तो आँखों में आँसू भरकर बोले- 'आप लोग किया गया और नामकी कृपासे वे पूर्ण स्वस्थ हो गये। नामकी पूर्ण कृपा उन्होंपर होती है, जिनका उसपर पूरा विश्वास होता है।

मधुसूदन गोस्वामी दूसरे लोगोंको भी हर प्रकारकी परिस्थितिमें केवल नामका ही सहारा लेनेका उपदेश करते। एक बार उन्होंने राधाकंजरिया नामकी प्रसिद्ध एकैतकी एक बडी विपत्तिसे नामकी सहायतासे रक्षा कर उसका सारा जीवन बदल दिया था।

राधाकंजरिया और उसका लड़का राधाकुण्डमें रहते थे। दोनों कुख्यात डकैत थे। एक बार राधाका लड़का किसी डकैतीमें पकड़ा गया, जिसमें उसने कुछ लोगोंको जानसे मार दिया था। उसपर मुकदमा चल रहा था और फाँसीकी सजा दिये जानेकी आशंका थी। राधाकंजरिया भी कुछ अपराधोंके कारण छिपकर रहती थी। वह अपने लड़केको फाँसीकी सजा दिये जानेकी आशंकासे बहुत दुःखी थी। मुकदमा आगराके जिला-जज राय बहादुर बैजनाथजीकी अदालतमें था, जो मधुसूदन गोस्वामीके शिष्य थे।

राधाकंजरिया एक दिन रातको १२-१ बजेके लगभग न जाने कैसे मधुसूदन गोस्वामीकी पुरानी हबेलीपर चढ़कर छतपर पहुँच गयी, जहाँ वे सो रहे थे और उनके चरणोंपर सिर रख रो-रोकर कहने लगी- 'गुसाईंजी, मेरी रक्षा करो।'

मधुसूदन गोस्वामी चौंककर उठ बैठे। वे कुछ कहें, उसके पहले ही वह बोली- 'गुसाईंजी, आप कुछ और न समझें। मैं आपकी दासी राधाकंजरिया हूँ। आपकी कृपाका भरोसा लेकर आपकी शरणमें आयी हूँ।'

राधाकंजरियाका नाम मधुसूदन गोस्वामीने सुना था। पर वे सहसा उत्पन्न वर्तमान स्थितिको समझनेका प्रयास कर रहे थे। शायद वे पूछना चाहते थे-तू कैसे आयी और क्यों आयी ? पर, कंजरियाने उन्हें कुछ कहनेका अवसर न दिया। माध्वगौडेश्वराचार्य श्रीमधुसूदन गोस्वामीपाद सार्वभौम

वह बोली- 'महाराज, मेरे लडकेपर फांसीका मुकदमा है। आगराके जज साहब आपके शिष्य हैं। आप कृपाकर उनसे सिफारिश कर दें तो वह छूट जायेगा। मैं वचन देती हूँ कि उसके बाद मैं और मेरा लड़का चोरी-डकैती फिर कभी नहीं करेंगे।'

कुछ और बातचीतके पश्चात् गोस्वामीजीने कहा- 'मैं जज साहबसे तो कुछ नहीं कह सकता। पर, लडकेको छुडानेका एक और उपाय बता सकता हूँ।'

'तो बताइये प्रभु' कंजरियाने उत्सुकतासे पूछा।

'तू और तेरा लड़का यदि सचमुच पश्चाताप करें और फिर कभी चोरी, डकैती न करनेका संकल्प कर कलसे ही नित्य निष्ठापूर्वक तीन लाख नाम जप करने लगे, तो तेरा लड़का छूट सकता है।'

कंजरियाने यह स्वीकार किया। वह और उसका लड़का नित्य तीन लाख नाम-जप करने लगे। मुकदमा खारिज हो गया। राधाकंजरिया भी अपने अपराधोंसे मुक्त हो गयी। दोनों नाम-जपके साथ सात्विक जीवन व्यतीत करने लगे।

सार्वभौमपादकी एक अच्छे लेखकके रूपमें भी धर्मजगत्‌में विशेष ख्याति थी। * उन्होंने बहुतसे ग्रन्थोंकी रचना की, जिनकी सूची इस प्रकार है-

★ लेखक रूपमें सार्वभौमपादकी योग्यता एक अलौकिक घटनासे भी प्रमाणित होती जिसका उल्लेख 'श्रीमन्महाप्रभुकी नवद्वीप-लीला' नामक विशाल ग्रन्थके सुयोग्य लेखक भुपाद हरिदास गोस्वामीने अपने ग्रन्थके प्रारम्भमें ही किया है। ग्रन्थके प्रारम्भ में उनका एक वाक्य इस प्रकार है- 'जो लोग श्रीगौरांगप्रभुके अवतार-तत्त्वका शास्त्रीय प्रमाण चाहते हैं, अके लिए यह ग्रन्थ निर्मित नहीं हुआ है।' 'निर्मित' शब्दपर उन्होंने जो पाद-टिप्पणी दी है, उसमें उन्होंने सार्वभौमपादका उल्लेख इस प्रकार किया है

"यहाँ 'ग्रन्थ-निर्माण' की कुछ व्याख्या प्रयोजनीय है। श्रीधाम वृन्दावनवासी पूजनीय श्रीगौड़माध्वेश्वराचार्य प्रभुपाद श्रीमधुसूदन गोस्वामी सार्वभौम महाशयने अपने एक बँगला उन्थको भाषा संशोधन करनेका भार मुझे दिया था। इस ग्रन्थमें उन्होंने एक स्थानपर प्रनिर्माण' शब्दका प्रयोग किया था। मैंने उसे काटकर उसकी जगह 'ग्रन्थरचना' लिख दिया था और कहा था कि 'निर्माण' शब्दका प्रयोग गन्धोंके सम्बन्धमें नहीं किया जाता। गृह, यन, काष्ठासन आदि मनुष्य निर्माण करता है. गुन्धकी रचना करता है। पर श्रीगोस्वामी प्रभुने मुझे समझाया था कि ग्रन्थका भी निर्माण किया जाता है। इस ग्रन्थकी हस्तलिखित मूल प्रतिमें इस स्थानपर 'लिखित' शब्द था। पूफमें देखा कि वह आश्चर्यजनक रीतिसे 'निर्मित' शब्दमें बदल गया है।

इससे मेरी समझ में आ गया कि गोस्वामी प्रभुका उपदेश मेरे लिए दयालु प्रभुकी कृपाकी अनुभूतिसे मेरा हृदय आनन्दसे भर गया। प्रभुपाद गोस्वामीजीके शर्यकारक नहीं हुआ, इसीलिए प्रेसके माध्यमसे प्रभने मुझे यह उत्तम शिक्षा दी है। यह देख उपदेशामृतकी स्मृति चिरस्थायी करनेके लिए मैंने भक्तिपूर्वक इस कृपानुभूतिका उल्लेख यहाँ कर दिया।"

(१) संस्कार तत्त्व (नागरी) (२) संस्कार तत्त्व (गुजराती), (३) गुरु तत्त्व, (४) वासन्तिक कुसुम, (५) ऊर्ध्व पुण्ड्र, (६) ज्ञानेर विकृति (बँगला), (७) आर्य समाज रहस्य, (८) मेरे विचार, (९) गायत्री परिणय (नाटक), (१०) श्रीरूपगोस्वामी द्वारा रचित 'उपदेशामृत' की टीका, (११) श्रीराधारमण प्राकट्य (१२) श्रीरूपगोस्वामीके स्मरण मगल स्तोत्रका पद्यानुवाद, (१३) अमिय निमाइ चरितका हिन्दी अनुवाद, (१४) वेद भाष्य, (१५) अन्य अप्रकाशित ग्रन्थ।

और भक्ति-ग्रन्थ प्रणयनमें अपना सारा समय व्यतीत करते हुए सम्वत् १९८५, गोस्वामीपादने अन्त समय तक नाम-संकीर्तन, भक्तिशास्त्र अध्ययन-अध्यापन ज्येष्ठ कृष्णपक्ष षष्ठी को नित्यधाममें प्रवेश किया।

प्रेम और भक्ति — जीवन-संदेश

ईश्वर-प्रेम की अनुभूति भक्त-साहित्य का एक महत्त्वपूर्ण विषय है। इन प्रसंगों को श्रद्धा, संवेदनशीलता और समर्पण के संदर्भ में पढ़ा जा सकता है।

कथा का सार

माध्वगौड़ेश्वराचार्य श्रीमधुसूदन गोस्वामीपाद सार्वभौम की कथा भक्ति, विनम्रता और साधना पर मनन करने का अवसर देती है। इस संग्रह में अन्य भक्तों के जीवन-प्रसंग भी पढ़ें।