ब्रज के भक्त भाग 2 · अध्याय 25

श्रीकृष्णप्रसाददास बाबाजी

श्रीकृष्णप्रसाददास बाबाजी की प्रेरक हिंदी कथा। जानिए उनके जीवन, भक्ति और साधना से जुड़े महत्वपूर्ण प्रसंग।

श्रीकृष्णप्रसाददास बाबाजी
श्रीकृष्णप्रसाददास बाबाजी — ब्रज के भक्त भाग 2

श्रीकृष्णप्रसाददास बाबाजी का यह भक्त-चरित्र ब्रज की साधना, श्रद्धा और जीवन से जुड़े प्रसंगों को सामने लाता है। नीचे कथा को अलग-अलग विषयों में व्यवस्थित किया गया है।

जन्म, परिवार और प्रारम्भिक जीवन

[ पूछरी, काम्यवन ]

श्रीकृष्णप्रसाददास बाबाजीने वृन्दावनकी मदनमोहन ठौरके श्रीनित्यानन्ददास बाबाजीसे वेष-दीक्षा लेनेके पश्चात् उनसे कहा- 'कृपाकर उपदेश करें, अब मुझे क्या करना है ?'

नित्यानन्ददास बाबाने कहा- 'तू तो है नितान्त मूर्ख । शास्त्र-पाठ, ग्रन्थालोचना, रस-विचारादि तो तेरे बसका है नहीं। यदि कुछ महत्-सेवाकर सके तो ठीक है। बता कर सकेगा ?'

गुरु-वाक्य सुन कृष्णप्रसादासने विनयपूर्वक कहा - 'प्रभु ! कृपाकर आदेश करें। कहाँ, किसकी सेवाकर कृतार्थ हो सकूँगा ?'

सिद्ध बाबाने कहा- 'तू राधारमण मन्दिरके सेवाइत श्रीगल्लूजी महाराजकी सेवाकर। उनकी सेवा करनेसे तुझे अभीष्ट फलकी प्राप्ति होगी।'

गल्लूजी महाराज आचार्य श्रीराधाचरण गोस्वामीजी महाराजके पिता थे। वे बड़े भजनशील और उदारचेता थे। कृष्णप्रसाद उनके चरणोंमें जा गिरे। उसी दिनसे केवल उनकी नहीं, उनके परिवारके बालक-बालिका, दास-दासी और पशु-पक्षी आदि तककी सेवामें जुट गये। उन्हें उनकी सेवासे इतना भी अवकाश न मिलता कि वे आधे घण्टा बैठकर आह्निक-भजनादि कर सकते। वे खड़े-खड़े केवल दस श्रीकामिनीकुमार घोष

भजन-साधना और नाम-स्मरण के प्रसंग

धार नामस्मरण कर लिया करते। उनकी गोदमें सब समय कोई वालक-बालिका देवी, जिसका मल-मूत्र तक स्वयं परिष्कार करते।

बीस वर्ष तक इस बडी निष्ठा और भक्तिसे उन्होंने गुरु-आज्ञाका पालन किया। तुजी महाराजके लीलामें प्रवेश करनेपर वे भी मुक्त पक्षीकी भाँति घरसे बाहर हो लिये। गोस्वामीगणके विशेष अनुरोधसे दो-तीन वर्ष राधारमणजीके मन्दिरके सामने एस-चबूतरेके सन्निकट गोपालजीके मन्दिरमें रहे और मधुकरी द्वारा जीवन-निर्वाह करते रहे। इसके पश्चात् वे गोवर्धनमें गोविन्दकुण्डके निकट पूछरीमें रहकर भजन काने लगे। अन्तमें उन्होंने काम्यवनमें आसन जमाया और जीवनके शेष क्षण तक वहीं भजन किया।

सेवा, प्रसाद और समर्पण की घटनाएँ

इसमें सन्देह नहीं कि गुरु-आज्ञाके पालन और महत् पुरुषकी सेवाके फलस्वरूप उन्हें अभीष्ट-प्राप्ति हई। अभीष्ट-सिद्धिका सबसे बड़ा लक्षण है दैन्य। कष्णाप्रसाद बाबाका दैन्य अतुलनीय था। वे मार्गमें चलते समय अपने बाएँ कन्धेपर ८-१० किलोकी गुदड़ी रखते थे, जिसका एक सिरा उनके पीछे झाडू देता चलता छ। उद्देश्य था कि उनके चरण-चिह्न पृथ्वीपर न रहें और कोई उनकी चरण-धूलि न ने सके। उनकी चरण-धूलि लेनेको लोग लालायित रहते थे, क्योंकि वे उन्हें एक नहत्‌के रूपमें जानने लगे थे। चरणधूलि तो दूर, उन्हें पहले दण्डवत् करना भी कसीके लिए सम्भव न था।

वैष्णव मात्रको देखते ही वे स्वयं उसे साष्टांगदण्डवत् करते हुए पृथ्वीपर पड़ जाते थे और तब तक पड़े रहते थे, जब तक वह आँखसे ओझल नहीं हो जाता था, या उन्हें अपने हाथसे उठा नहीं देता था।

सेवा और समर्पण — जीवन-संदेश

सेवा का मूल्य केवल बाहरी कार्य में नहीं, बल्कि उसके पीछे के निष्कपट भाव में भी होता है। इस चरित्र के प्रसंगों को पढ़ते समय सेवा के इसी भाव पर विचार किया जा सकता है।

कथा का सार

श्रीकृष्णप्रसाददास बाबाजी की कथा भक्ति, विनम्रता और साधना पर मनन करने का अवसर देती है। इस संग्रह में अन्य भक्तों के जीवन-प्रसंग भी पढ़ें।