ब्रज के भक्त भाग 2 · अध्याय 18
श्रीकृष्ण-चैतन्यदास बाबा [ चन्द्र सरोवर ]
श्रीकृष्ण-चैतन्यदास बाबा [ चन्द्र सरोवर ] की प्रेरक हिंदी कथा। जानिए उनके जीवन, भक्ति और साधना से जुड़े महत्वपूर्ण प्रसंग।
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श्रीकृष्ण-चैतन्यदास बाबा [ चन्द्र सरोवर ] का यह भक्त-चरित्र ब्रज की साधना, श्रद्धा और जीवन से जुड़े प्रसंगों को सामने लाता है। नीचे कथा को अलग-अलग विषयों में व्यवस्थित किया गया है।
जन्म, परिवार और प्रारम्भिक जीवन
सन् १८६१ में बंगदेशके चन्दन नगरमें श्रीअश्विनीकुमारका जन्म हुआ तभीसे कलकत्तेमें उनके पिता श्रीव्रजकुमार नन्दीके कारबारमें आशातीत वृद्धि हो लगी। जब श्री अश्विनीकुमारने एण्ट्रेंसकी परीक्षा पास कर ली, पिताने उन्हें निका बुलाकर कहा- 'मेरा कारोबार बहुत बड़ा होता जा रहा है। मुझमें साहब लोगों बात करने और उनसे पत्र-व्यवहार करनेकी योग्यता है नहीं। यह सब कार्य अस तुम्हींको करना है।' अश्विनीकुमार पिताजीकी आज्ञा शिरोधार्यकर कारोबारले उनकी सहायता करने लगे। कुछ ही दिनोंमें कलकत्तेमें एक बड़े ठेकेदारके रूपये उनकी ख्याति हो गयी।
श्रीकृष्ण-चैतन्यदास बाबा
हुगली जिलेके अन्तर्गत पुइनान निवासी श्रीकेदारनाथ सेठको कन्या श्रीमती गिरिबालासे उनका विवाह हो गया। उससे पाँच पुत्र और पुत्रियोंका जन्म हुआ। अश्विनीकुमार पर इस प्रकार द्रुतगतिसे मायाने अपना जाल चारों ओरसे बिछा दिया।
पर, उनके जीवनकी एक दूसरी दिशा भी थी। भक्तिका स्रोत भी उनके जीवनमें आरम्भसे उमडने लगा था। अब एक विशाल और बेगवती स्रोतस्विनीका रूप धारण कर वह अविलम्ब समुद्रसे जा मिलनेके लिए व्यग्र हो उठा।
बाल्यावस्थासे ही उनका अन्यमनस्क भाव देख माता-पिताको उनके भावी जीवनके विषयमें चिन्ता होने लगी थी। एक दिन माँको मालाके साथ हरिनाम जप करते देख उन्होंने उनसे नाम-जपकी विधि सिखानेका आग्रह किया। उनका अतिशय आग्रह देख माँको उन्हें कानमें महामन्त्र सुना देना पड़ा। तभीसे उनका नाम-जप नियमित रूपसे चलने लगा। कुछ दिन बाद उन्होंने कुलगुरुसे विधिवत दीक्षा भी ले ली। विविध कार्योंमें व्यस्त रहते हुए भी उनका गंगा-स्नान, नियमित जप, आन्हिक पाठ और नाम-संकीर्तन सुचारु रूपसे चलता रहा। परिणामस्वरूप उनका भक्ति-भाव अब इतना प्रबल हो गया कि उन्होंने मायाकी सभी ग्रन्थियोंको छिन्न-भिन्न कर वैराग्यवेश ग्रहण करनेका निश्चय कर लिया।
एक दिन रातको पिताकी चरण-सेवा करते समय उन्होंने कहा- 'पिताजी, यदि आपकी अनुमति हो, तो मैं रथयात्राके अवसरपर जगन्नाथजीके दर्शन कर आऊँ।'
'किसीके साथ जाओगे या अकेले ?' पिताजीने चिन्तित हो पूछा।
'अकेले नहीं पिताजी, मेरे साथी बकू और कृष्णानन्द ब्रह्मचारी भी जायेंगे' अश्विनीकुमारने कहा।
पिताने उनका संग उपयुक्त जान आज्ञा दे दी। जाते समय १००) खर्चको देना चाहा, पर अश्विनीकुमारने यह कहकर उन्हें अस्वीकार कर दिया कि मार्गमें अधिक रुपये रखना ठीक नहीं। केवल उतने ही लिये जितने रेलके किराये और दो-चार दिन जगन्नाथपुरीमें रहनेके लिए पर्याप्त हों। पिताने उतने रुपये देकर कहा- 'पुरी पहुँचकर और जितनेकी आवश्यकता हो माँग लेना।'
जगन्नाथपुरीमें रथयात्रापर जगन्नाथजीके दर्शनकर बकू और ब्रह्मानंद ब्रहाचारी कलकत्ते लौट गये, पर अश्विनीकुमारजी वहीं रह गये। माता-पिता उनके
भक्ति-भावके कारण उनकी ओरसे पहले ही सशंकित थे। उनके साथियोंक साध घर न लौटनेपर उन्हें चिन्ता होने लगी। बकूसे पता पूछकर उन्होंने तारसे उन्हें स भेजे और घर शीघ्र लौट आनेका अनुरोध किया। तार लौट आया। साथ अश्विनीकुमारका एक पत्र आया, जिसमें उन्होंने घर कभी न लौटनेका निश्चयका परमार्थ-पथका पथिक हो रामेश्वरकी ओर चल पडनेकी बात लिखी थी और आने निर्णयके लिए क्षमा माँगते हुए आशीर्वादकी प्रार्थना की थी।
अश्विनीकुमार साथियोंके घर लौटते ही तीर्थ-भ्रमणके उद्देश्यसे दक्षिणको पद यात्रापर चल पड़े थे। भ्रमणकालमें नियमोंकी रक्षा करना कठिन होता है, पर अश्विनीकुमारके नियम अटल थे। उनके व्यतिक्रम होनेका कोई प्रश्न ही न था। वे नित्य नाम करते-करते १० कोस पैदल चलते। जब तक नाम-संख्या पूर्ण न होने कहीं विश्राम न करते। जिस स्थानपर भी पहुँचते नित्य-कृत्य समापन कर भिक्षाको निकलते। कभी-कभी नित्य-कृत्य समापन करते सन्ध्या हो जाती, तो भी नियमा व्यतिक्रम न होने देते। भिक्षाके लिए केवल सात घरोंमें जाते। उसीमें जो मिल जाता उसे ग्रहणकर सन्तुष्ट रहते। कभी-कभी दो-तीन दिन लगातार कुछ भी आहार जुटता, तो जल पीकर ही रह जाते। कभी भिक्षाकी जगह दुत्कार मिलती, तो उसे भी चुपचाप सहन कर लेते।
श्रीधामपुरीसे वे गोदावरी, शिवकाञ्ची, विष्णुकाञ्ची, बालाजी, श्रीरंगम और पञ्चतीर्थ होते हुए रामेश्वर पहुँचे। वहाँसे नासिक होते हुए द्वारकाकी ओर वस पड़े। फिर पुष्कर, जयपुर, करोली आदि स्थानोंमें पर्यटन करते हुए तीन वर्षकी कठिन पदयात्रा समाप्तकर श्रीधाम वृन्दावन पहुँचे।
वृन्दावनमें भिक्षावृत्ति अवलम्बन कर भजन करते। दिन आनन्दपूर्वक बीले लगे। एक दिन रात्रिमें स्वप्नमें किसी दिव्यकान्तियुक्त मूर्तिने उनसे कहा- 'तुम्हारा अभी वृदावनवासका समय नहीं हुआ है। बहुत काम बाकी है।'
निद्रा भंग होनेपर स्वप्नकी बात यादकर वे कुछ चिन्तामें पड गये। पर, वे घर लौट जानेके लिए तो वृन्दावन आये नहीं थे। उन्होंने उसपर विशेष ध्यान नहीं दिया। दूसरे और तीसरे दिन फिर उन्होंने वही स्वप्न देखा। उनके अन्तरमें प्रबल अन्तईन छिड गया- इस दिव्य आदेशका पालन करूं या न करूँ ? अन्तमें प्रभकी इच्छा जान उन्होंने वृन्दावन छोड दिया और उत्तराखण्डकी यात्रापर चल दिये। कुरुक्षेत्र हरिद्वार, केदारनाथ और बद्रीनाथकी यात्राकर लौटते समय रानीखेतमें रात्रिमें स्वप्न श्रीकृष्ण-चैतन्यदास बाबा
देखा कि उनकी बडी लडकी उनसे कह रही है- 'बाबा, मैं क्या तुम्हारे दर्शन नहीं कर पाऊँगी ? तुम कब तक ऐसे डोलते-फिरते रहोगे ?'
स्वप्न देख अश्विनी कुमारका चित्त चंचल हो गया। वृन्दावनके स्वप्नकी भी उन्हें याद आ गयी। उसी क्षण घर चिट्ठी लिखी 'मैं अमुक दिन, अमुक गाडीसे घर आ रहा हूँ। किरायेके लिए पैसे भेज दो।' पैसे आनेपर वे गाडीपर बैठ लिये।
कलकत्ता स्टेशनपर उनके भ्रातागण हरिचरन नामके अपने वृद्ध कर्मचारीके साथ उनके आगमनकी प्रतीक्षा कर रहे थे। गाडी आ गयी, पर बहुत खोज करनेपर आयी- 'हरिचरन, हरिचरन!' सबने पीछे मुड़कर देखा कि भिखारी वेशमें भी वे न दीखे। हताश हो सब घर लौटने लगे. उसी समय पीछेसे आवाज अश्विनीकुमार उनकी ओर अग्रसर हो रहे हैं। उनके आनन्दकी सीमा न रही। आनन्दाश्रु विसर्जन करते हुए वे अश्विनी दादासे लिपट गये।
घर पहुँचकर जब अश्विनीकुमारने माता-पिताको प्रणाम् किया, उन्होंने उन्हें हृदयसे लगाकर अपने अश्रुजलसे अभिषिक्त किया। दूर खड़ी साध्वी पत्नी भी यह दृश्य देख अश्रूविसर्जन करने लगीं। पुत्र, कन्या, भाई-बन्ध और कर्मचारीगण सभी अश्रुविसर्जन करते हुए एक अनिवर्चनीय आनन्द-समुद्रमें गोते खाने लगे।
घर लौटकर कारोबारमें मनोनिवेश करते हुए भी अश्विनीकुमारकी नियम-निष्ठा और भजन-साधन पूर्ववत् चलते रहे। वे नित्य रात्रि ९ बजे सो जाते और १ बजे शैय्या त्यागकर भजनमें बैठ जाते। गंगा-स्नान और आन्हिक कर एक बारमें पकाया हुआ स्वपाकित भोजन करते। नाम-जप, पाठ, कीर्तन, सेवा-पूजा आदि सब पूर्ववत् ही करते। उनकी पत्नी उनके साथ सहयोग करतीं और इस बातका ध्यान रखतीं कि उनके नियम-पालनमें किसी प्रकारका व्याघात न हो। इस अनुकूल परिस्थितिमें उनके दिन आनन्दपूर्वक कटने लगे।
पर, उनका हृदय एक अन्तर्वेदनाके कारण व्यथित होता रहा। वृन्दावनमें रहते समय उनका चित्त श्रीश्रीनिताई-गौर और श्रीश्रीराधागोविन्दके दो चित्रोंके प्रति विशेषरूपसे आकृष्ट हो गया था। परन्तु, उनका वे संग्रह नहीं कर सके थे। किस प्रकार उन चित्रोंका संग्रह हो यह चिन्ता उन्हें दिन-रात सताती रहती थी। एक रात उन्होंने स्वप्न देखा कि चितपुर रोडपर एक दुकानमें उन्हें वे चित्र मिल गये हैं।
दूसरे दिन प्रातः वे चितपुर रोड गये। स्वप्नमें देखी दुकानके सदृश ही एक दुकान देख वे आश्चर्य और आनन्दसे अभिभूत हो गये। दुकानके भीतर जाकर देखने पर उन्हें ठीक वैसा ही निताई-गौरका चित्र प्राप्त हुआ। पर राधागोविन्दका चित्र
नहीं मिला। अकस्मात उनकी दृष्टि एक आलमारी पर पडी। स्वप्नमें उस आलमारीमें से राधागोविन्दका चित्र निकालकर दुकानदारने उन्हें दिया था। उन्होंने दुकानदारसे कहा- 'इस आलमारीको तो देखिये।'
आलमारीमें और तरह-तरहकी चीजें भरी थीं, चित्र कोई नहीं था। दुकानदार कहा- 'उसमें कोई चित्र नहीं है।'
यह सुन अश्विनीकुमार हताश हो गये। नेत्रोंसे जलबिन्दु टपकने लगे। हठात दुकानदारको याद आया कि कल चित्रोंका जो नया बण्डल आया है. वह उस अलमारीमें रखा है। उसने हाथ बढ़ाकर बण्डल निकाला। खोलते ही श्रीश्रीराधागोविन्दजीका ठीक वैसा ही चित्र, जैसा उन्होंने वृन्दावनमें देखा था, दीख पड़ा। उसे देख अश्विनीकुमार उछल पडे, जैसे उन्हें विश्वकी सबसे बड़ी सम्पत्ति मिल गयी हो, जैसे राधागोविन्द स्वयं कृपाकर चित्रके रूपमें उनके सामने प्रकट हो गये हों!
एक दिन अश्विनीकुमार किसी कार्यसे जैसे ही घरसे निकले, डाकियेने एक पत्र दिया। वृद्ध पिताजी पास थे। उन्होंने पत्र पढनेको कहा। पत्र पढ़ते-पढते उन्हें ऐसा भावावेश हुआ कि वे उसे सम्हाल न सके। तुरन्त किसी प्रकार पत्र शेषकर डटेनगार्डेन चले गये। वहाँ एक वृक्षके नीचे बैठकर फूट-फूटकर रोते हुए उच्च-स्वरसे विलाप करने लगे - 'हा श्यामसुन्दर ! वृन्दावनेश्वरी ! मेरे किस अपराधके कारण मुझे वृन्दावनसे ठेल दिया है तुमने ? मुझे अब कौन-सा ऐसा कार्य करना बाकी है, जिसके कारण संसार भोगना पड़ रहा है ? अब कब कृपा करोगी स्वामिनी ?
पत्र एक सम्बन्धीका था। उन्होंने वृन्दावनमें पत्थरपुरामें अपने नवनिर्मित मन्दिरमें श्यामसुन्दरकी प्रतिष्ठााके अवसरपर नन्दी महाशयको सपरिवार आमन्त्रित किया था। पत्र पढ़ते ही अश्विनीकुमारकी विरहाग्नि धधक उठी थी।
कई दिन तक उनका विरहोन्माद बना रहा। उसे शान्त करनेके लिए और चन्द्रनाथका कृपा-आशीर्वाद ग्रहण करनेके लिए उन्होंने एक विशेष तिथिपर चन्द्रनाथकी पैदल यात्रा की। चन्द्रनाथके दर्शन करनेके उद्देश्यसे वे द्रुतगतिसे चले जा रहे थे। रास्तेमें एक दुकानदारसे पूछा- 'अभी चन्द्रनाथ कितनी दूर है ?'
उसने कहा- 'अभी बहुत दूर है। आज आप किसी प्रकार वहाँ पहुँच नहीं सकेंगे। इसलिए रात्रिमें यहीं मेरे घर विश्राम करिये। कल चन्द्रनाथके दर्शन करिये।' श्रीकृष्ण-चैतन्यदास बाबा
पर, उन्हें तो उसी तिथिमें उनके दर्शन करने थे। वे चलते गये, चलते गये चन्द्रनाथका स्मरण करते हुए। मार्गमें जल तक ग्रहण नहीं किया, इस भयसे कि कहीं विलम्ब न हो जाय और मन्दिरका द्वार बन्द मिले। भूखे-प्यासे जब वे देर रात्रिमें मन्दिर पहुंचे, मन्दिरका दरवाजा बन्द और चारों ओर सन्नाटा छाया देख उनके प्राण सूख गये। थके-हारे वे मन्दिरके दरवाजेपर ही लेट गये।
अकस्मात् मन्दिरसे कुछ दूर उन्होंने देखा अग्निके सामने ध्यानमग्न बैठे एक जटाजूटधारी संन्यासीको । वे उसके निकट जाकर बैठ गये। ध्यान भंग होनेपर उसने आँखें खोलीं। बोला- 'तुम कौन हो ? इतनी रातमें यहाँ अकेले कैसे बैठे हो ?'
अश्विनीकुमारने कहा- 'मैं चन्द्रनाथके दर्शन करने आया था, परंतु मन्दिर बन्द हो जानेके कारण दर्शन नहीं कर सका।'
संन्यासीने कहा- 'पुजारीने भीड़ कम करनेके उद्देश्यसे बाहरका दरवाजा बन्द कर दिया है। भीतरका खुला है। चलो मैं तुम्हें दर्शन करा लाऊँ।'
अश्विनीकुमारके मृत देहमें फिरसे प्राणोंका संचार हुआ। उनके अन्तःस्थलसे 'धन्य चन्द्रनाथ, धन्य चन्द्रनाथ!' की ध्वनि गूँज गयी। संन्यासीका अनुगमन कर वे फिर मन्दिरके दरवाजेपर गये। संन्यासी उन्हें वहाँ बैठाकर कुछ देरको फिर कहीं चले गये। थोड़ी देरमें दरवाजा खुला। अश्विनीकुमारने भीतर प्रवेशकर चन्द्रनाथके दर्शन किये। उनसे वृन्दावनका वास दिलानेकी प्रार्थना की। दर्शनकर लौटे तो संन्यासीने पूछा- 'मार्गमें तुमने कुछ आहार भी किया या नहीं ?'
अश्विनीकुमारने कहा- 'दर्शनके लिए विलम्ब हो जानेके भयसे मैं एक साँस भागा चला आया। आहारादि कुछ नहीं किया।'
'तो बाबाके दर्शनकर उपवासी चले जाओगे, यह ठीक नहीं। बाबाका प्रसाद लेते जाओ।' इतना कह संन्यासीने उन्हें केला, सन्तरा आदि बहुत-से फल लाकर दिये।
दूसरे दिन प्रातः जब वे कलकत्ते लौट रहे थे, मार्गमें एक ब्राह्मणसे भेंट हुई। उसने पूछा- 'इतने तड़के बाबा चन्द्रनाथके दर्शन किये बिना कहाँ जा रहे हो ?'
सेवा, प्रसाद और समर्पण की घटनाएँ
अश्विनीकुमारने कहा- 'दर्शन मैं रातको ही कर चुका। एक संन्यासीने मन्दिरका दरवाजा खोलकर दर्शन कराये और यह प्रसाद दिया।'
ब्राह्मण यह सुनकर विस्मयपूर्वक बोला- 'यह तुम क्या कह रहे हो ? मैं ही तो मंदिरका पुजारी है। सन्ध्या समय मन्दिर बन्दकर आया था। अब जाकर
खोलूँगा। चाबी मेरे पास है। और फल तो वहाँ एक भी नहीं था। निश्चय ही तुम्हारे ऊपर चन्द्रनाथकी कृपा हुई है। उन्होंने तुम्हें दो बार दो रूपमें दर्शन देकर कृतार्थ किया है।'
बाबा चन्द्रनाथकी कृपासे शीघ्र अश्विनीकुमारके वृन्दावन प्रत्यागमन-की संभावना प्रकट होने लगी। कुछ ही दिन पूर्व उन्होंने पत्नीके आभूषण बेचकर अपना स्वतन्त्र कारोबार आरम्भ किया था। कारोबार आशातीत रूपसे सफलतापूर्वक चलने लगा। लडके भी सक्षम हो गये। उन्हें विश्वास हो गया कि उनके बिना ही वे अपना पोषण ठीकसे कर सकेंगे। बन्दावनसे आनेके चार साल बाद वे फिर लड़कोंपर कारो-बारका सारा भार छोड़ वृन्दावन चले गये।
वृन्दावन आनेके कुछ ही दिनों बाद अश्विनीकुमारको स्वप्नादेश द्वारा श्रीश्रीगोपीजनवल्लभकी जुगलमूर्ति प्राप्त हई। अपने कारोबारके लाभांशमें से कुछ धन मंगवाकर उन्होंने एक मन्दिरका निर्माण किया। एक पुजारी और एक टहलुआ द्वारा ठाकुर-सेवाकी व्यवस्था की। स्वयं भी सेवा-कार्यमें सहायता करने लगे।
मन्दिरकी प्रतिष्ठाके समय उनकी माँ वृन्दावन आयीं। नियम-सेवाके पश्चात् हठात् बीमार पड़ गयीं। चिकित्साके लिए उन्हें कलकत्ते ले जाया गया। अश्विनीकुमारने पिताकी अनुमति प्राप्तकर श्रीमद्भागवत पाठ और कीर्तनकी व्यवस्था की। पाठ समाप्त होते ही माँने आग्रह किया उन्हें गंगातटपर ले जानेके लिए। उन्हें गंगातटपर ले जाकर उनके आदेशानुसार गंगाका जल-स्पर्श करते हुए लिटाया गया। गंगा-स्पर्श होते ही उनके प्राण पखेरू साधनोचित धामको उड़ गये।
कुछ दिन बाद वृद्ध नन्दीमहाशय वृन्दावन गये। मन्दिरमें सेवा आदिकी व्यवस्था देख बहुत प्रसन्न हुए। उन्होंने अपनी ओरसे वहाँ नित्य २० मूर्तियोंकी अतिथि-सेवा और एक दातव्य चिकित्सालयकी व्यवस्था की। अश्विनीकुमारने स्वयं अभावग्रस्त वैष्णवोंके अनुपान और पथ्यकी व्यवस्था की। वे नित्य वैष्णव-सेवाके स्थानको अपने हाथसे परिष्कार करते। वैष्णव-सेवामें उनका इतना अभिनिवेश था कि प्लेगके दिनोंमें भी वैष्णव-सेवा छोड़कर कहीं नहीं गये।
इस बीच उन्होंने सिद्ध श्रीतोतारामदास बाबाजीके अनुगत श्रीरूपदास नाबाजीसे भजन-प्रणाली सीखी और उसीके अनुसार भजन करने लगे।
थोडे दिन बाद उनके पिताका भी देहान्त हो गया। उस समय उन्हें कलकत्ते जाना पड़ा। पारिवारिक धन-सम्पत्तिकी समुचित व्यवस्था कर वे वृन्दावन लौट श्रीकृष्ण-चैतन्यदास बाबा
आये। प्रथम बार वृन्दावन आनेके समय जिस सब कार्यके लिए घर लौट जानेका उन्हें स्वप्नादेश हुआ था। वह पूरा हो गया। वृन्दावन लौटकर उन्होंने श्रीगौरशिरोमणि महाराजके कृपापात्र श्रीहरिचरणदास बाबाजीसे वेष ग्रहण किया। नाम हुआ श्रीकृष्ण चैतन्यदास। वेश लेनेके पश्चात् उन्होंने कुछ दिन कुसुमसरोवरपर भजन किया। फिर राधाकुण्ड जाकर रहने लगे।
श्रीकृष्ण चैतन्यदास बाबाके वेशाश्रयके पश्चात् उनके पुत्र गौरबाबूके हृदयमें श्री श्रीधाम वृन्दावन-वास करनेकी इच्छा जागी। वे वृन्दावन जाकर अपने श्रीगोपीजन-बल्लभकी सेवामें रहने लगे।
राधाकुण्डमें रहते समय श्रीकृष्ण चैतन्य बाबाको श्रीगोपीजन-वल्लभकी सेवाकी पूरी चिन्ता रहती। यदि सेवामें कोई त्रुटि होती, तो बिना किसीके बताये ही उन्हें पता चल जाता। एक बार उन्होंने गौरबाबूको वृन्दावनसे बुलाया और कहा- 'तुम श्रीगोपीजन-वल्लभकी सेवा करते हो, पर किसी बातका ध्यान नहीं रखते। एक दिन भोगमें बाल पड़ जानेके कारण भोग नष्ट हो गया, और एक दिन भोगके थालमें जूठन लगी रह गयी, इसलिए भोग नहीं लगा। ठाकुर-ठाकुरानीको उपवासी रहना पड़ा।
'देखो, ठाकुरको मानो, तो वे उसी रूपसे हमारी सेवा ग्रहणकर प्रसन्न होते हैं, न मानो तो कुछ नहीं। तुम्हें एक प्रत्यक्ष घटना सुनाऊँ। तड़ास स्टेटके राजर्षि बनमाली बहादुरके ठाकुर श्रीराधाविनोदजी जब राधाकुण्ड रहते थे, तो गरमीके दिनोंमें उन्हें २४ घण्टे पंखा करनेके लिए टहलुए रखे जाते थे। एक भक्त, जिसे दृढ़ विश्वास था कि ठाकुर इस सेवासे सुखी होते हैं नित्य रात्रिमें मन्दिरका ताला लगनेसे पूर्व मन्दिरमें जाता और बीच-बीचमें स्वयं पंखा खींचकर टहलुओंको विश्राम देता। एक दिन मध्य रात्रिमें पंखा खींचते खींचते उसे नींद आ गयी। स्वप्नमें उसने देखा कि विनोदजी उसका हाथ स्पर्श कर कह रहे हैं- 'तुम सो रहे हो। मुझे बड़ा गरम लग रहा है। मुझे कुण्डके किनारे ले चलो।' वह विनोदजीको कन्धेपर बिठाकर कुण्डपर ले जाने लगा।
उसके कन्धेपर एक रसौली थी। विनोदजीने कहा- 'तेरे कन्धेपर यह क्या है, जो मुझे गड़ रहा है ?' कहते हुए उन्होंने बैठनेका स्थान अपने हाथसे साफ कर दिया। भक्तने उन्हें कुण्डके तीरपर ले जाकर एक स्थानपर बैठा दिया। स्वयं वहीं सो गया। उसी समय उसकी नींद भंग हो गयी। उसने देखा कि वह कुण्डके किनारे लेटा है। यह देखकर वह अवाक् ! उठकर
मन्दिरपर गया तो देखा ताला पूर्ववत् बन्द है। और भी आश्चर्यकी बात यह कि उसका दाहिना कन्धा, जिसपर वह विनोदजीको लाया था, उनके स्पर्शसे शीतल है रहा है। उसपर हाथ फेरा तो देखा कि रसौली गायब है।'
राधाकुण्डमें बाबाने एक पुरश्चरण किया। उसके पश्चात् वे चन्द्रसरोवर चले गये। वहाँ एक और पुरश्चरण किया।
चन्द्रसरोवर रहते समय वे नित्य प्रातः ३ बजेसे गोवर्धन-परिक्रमा करते। एक दिन परिक्रमा करते समय जोरकी वर्षा होने लगी। उन्होंने एक वृक्षको शरण ली।
जहाँ वे बैठे थे एक बिलके भीतरसे साँपके फुफकारनेका शब्द हुआ। फिर भी वे बैठे नाम जप करते रहे। उन्हें विश्वास था कि व्रजका कोई जीवन उन्हें किसी प्रकारकी हानि नहीं पहुँचा सकता। उसी समय कहीं दूरसे किसीने एक कम्बल फेंका और कहा- 'बाबा तोको स्याँपको भय नाँय। भाग जा, काट खायेगो।' कण्ठ-स्वर किसी महिलाका था। पर बाबाको कोई दीख नहीं रहा था। उन्हेंने कम्बलको प्रसादी जान मस्तकसे लगाया और उसे ओढ़कर परिक्रमा पथपर चल दिये। वृष्टि भी क्रमशः कम हो गयी।
चन्द्रसरोवरपर बाबा एक बुर्जकि ऊपर बनी कुटियामें भजन किया करते थे।
वहाँ उनका भजनमें अभिनिवेश इतना बढ़ गया कि वे घण्टों बाह्यज्ञानशून्य है कुटियामें पड़े रहते। एक बार उनके गुरुदेव श्रीहरिचरण बाबा श्रीसनातनदास बाबाको साथ ले उनकी कुटियापर पधारे। कुटियाका दरवाजा भीतरसे बन्द था। 'राधे, राधे' कहकर कई बार आवाज दी, पर कोई नहीं बोला। दस-पन्द्रह मिनट रुककर फिर 'राधे', 'राधे' कहकर जोरसे पुकारा। फिर भी कोई उत्तर नहीं। सनातनदास बाबाको श्रीकृष्ण-चैतन्य बाबाके सम्बन्धमें चिन्ता होने लगी, पर हरिचरण बाबाने कहा- 'चिन्ताकी कोई बात नहीं। वह अकसर लीला-चिन्तनमें डूब जाता है, तो उसे घण्टों तक बाह्यज्ञान नहीं रहता। चलो, फिर आयेंगे।
एक बार बाबाने गौरको बुलाकर कहा-'देखो, ११ दिनका एक बड़ा उत्सव करना है। नित्य कीर्तन और रासलीला होगी। भागवत-सप्ताह होगा। बहुत से वैष्णवोंको उत्सवमें आमन्त्रित करना होगा। उनके आवास और प्रसादको व्यवस्था करनी होगी। कीर्तनके लिए कीर्तनिया श्रीभक्तिचरणदास बाबाजीको आमन्त्रित करना होगा और भागवत सप्ताहके लिए श्रीमद्भागवतपाठक श्रीमधुसूदन भट्टजीको।'
श्रीकृष्ण-चैतन्यदास बाबा
तदनुसार उत्सवकी व्यवस्था की गयी। गाँव-गाँवसे लोग आने लगे। बन्द्रसरोवरपर ११ दिन तक मेला-सा लगा रहा। दसवें दिन ७ कोस तकके सभी बजवासियों और महात्माओंको प्रसादके लिए आमन्त्रित किया गया। कई दिनसे इस विशाल आयोजनके लिए व्यवस्था की जा रही थी, पर उस दिन प्रातःकाल हठात् बाबाका बोल बन्द हो गया। एकाएक चारों ओर अन्धकार छा गया। आनन्द और उल्लासका वातावरण विषादमें परिणत हो गया। विपन्न मनसे सबने देर तक शरीरमें किसी प्रकारका स्पन्दन होनेकी प्रतीक्षा की, पर उन्हें निराश होना पड़ा। अन्तमें बाध्य हो अन्तिम संस्कारकी तैयारी की जाने लगी। कीर्तनके साथ सरोवरकी परिक्रमा कर उन्हें श्मशान ले जाया गया। श्मशानके निकट पहुँचते ही अति-क्षीण कण्ठसे उनकी आवाज सुनायी पड़ी- 'मुझे कहाँ लिये जा रहे हो ? मैं जहाँ था वहीं ले चलो।'
यह सुन सब लोग चमकृत हो गये। उच्च स्वरसे हरि-ध्वनि करते हुए उन्हें उत्सबके स्थानपर ले गये। विषादके बादल जैसे एकाएक आये थे, वैसे ही छंट गये। आकाश-बतास फिर आनन्दसे परिपूर्ण हो गये। गीतापाठ और प्रसाद वितरणके पश्चात् उत्सव निर्विघ्न सम्पन्न हुआ।
कहते हैं कि बाबाने इस अवसरपर स्वेच्छासे गोलोकधाममें अपने इष्ट श्रीश्रीगोपीजन-वल्लभके निकट जानेका निश्चय किया था। उसी उपलक्ष्यमें श्रीमद्भागवत-पाठ और कीर्तनादिके पश्चात् वैष्णव-सेवाका आयोजन किया था। अपने निश्चयके अनुसार ही वैष्णव-सेवाकी पूरी तैयारी हो जानेपर उसके ठीक पूर्व उन्होंने प्रयाण किया था। पर, स्वयं राधारानीके अनुरोधपर उनके किसी उद्देश्यको पृर्तिके लिए वे कुछ दिनोंको इस जगत्में लौट आनेको विवश हुए थे।
एक बार किसी भक्तके पूछनेपर- 'क्या काल भजनशील व्यक्तिपर भी आक्रमण करता है जिस तरह साधारण लोगोंपर ?' उन्होंने कहा था-
'ठीक उसी प्रकार नहीं। साधारण व्यक्तिका जीवनकाल पूरा होनेपर काल तत्काल उसे ले जाता है. उसकी स्थिति उस समय चाहे जैसी हो। पर, भक्तका समय पूरा होनेपर वह उसके सम्मुख जाकर हाथ जोडकर इसकी सूचना भर दे देता है। उसकी इच्छा होती है तो चला जाता है, इच्छा नहीं होती और कुछ दिन इस जगतम रहकर भजन करना चाहता है. तो नहीं जाता। काल अभक्तका शत्रु होता है. भक्तका सेवक । बिल्ली जिस मुखसे चूहेको ले जाती है, उसीसे अपने बच्चेको
भी ले जाती है। वह चूहेके लिए कालरूप होती है. बच्चेके लिए माँ। चूहेको खा जाती है. बच्चेको सुरक्षित और सुखमय स्थानपर ले जाकर रख देती है।'
इस घटना के बादसे श्रीकृष्ण-चैतन्यदास बाबाकी ख्याति और भी बढ़ गयी। भजनके उद्देश्यसे शेषशायी चले गये। कुछ दिन बाद वहाँ भी लोगोंने उन्हें घेरना बुर्जीपर दर्शनार्थियोंकी भीड़ लगने लगी। घबड़ाकर वे एक दिन रातमें एकान्त. शुरू किया, तो वांशो नामक ग्राममें चले गये।
इसी बीच बहत-से लोग दीक्षा देनेके लिए उनसे आग्रह करने लगे। वे किसी प्रकार दीक्षा देनेको राजी न हुए। पर गुरुदेवके आदेशसे उन्हें श्यामापद नामके एक व्यक्ति और उनकी बहिन राधादासीको दीक्षा देनी पडी। उसके पश्चात् उन्होंने गोवर्धनके स्पेशल मैजिस्ट्रेट श्रीकुमारसाहब, गोवर्धनके ही श्रीकुमार सज्जनप्रसाद सिंह आदि कई और लोगोंको दीक्षा दी।
जिस दिन श्रीसज्जनप्रसाद सिंह और उनके कई साथियोंको दीक्षा दी, उसी दिन रातमें कुटीमें विशेष कुछ प्राप्त करनेके लोभसे चोरोंने प्रवेश किया। बाबाने उनकी आहट पाकर समझा कि ग्रामवासी आये हैं। उनसे चरणामृत लेनेको कहा। चरणामृत लेते ही उनकी बुद्धि पलट गयी और वे दिशाहारा हो गये। जूता-लाठी छोड़कर किसी प्रकार कुटियासे भाग निकले।
चन्द्रसरोवरपर श्रीश्यामापद और श्रीकुमारसाहबने अपने व्ययसे बाबाके आश्रमके रूपमें कुछ कुटियोंका निर्माण किया। बाबा वहाँ रहने लगे। वहाँ रहते समय वे नित्य गोवर्धन परिक्रमा करते। एक दिन जब वे नाम जप करते-करते धीरे-धीरे परिक्रमा पथपर जा रहे थे, तीन अल्पवयस्का रमणियाँ उनके पीछे-पीछे जा रही थीं। उनमें से एकने कहा- 'डोकरा हटे नाँय रस्ता ते।' उसी समय दूसरीने कहा- अरी जान दे बाबाको। कायकूँ बासे ऐसे कहे ?'
युवतीका अश्रुतपूर्व करुणा-मिश्रित अपार्थिव स्वर सुन बाबा अभिभूत हो गये। भावावेशसे विह्वल हो वे मार्गके एक ओर जा खड़े हुए। एक अपार्थिव आनन्दसे उनके मन-प्राण भर गये। कुछ ही क्षण बाद प्रकृतिस्थ हो जब उन्होंने सामने देखा, तो तीनों रमणियाँ अन्तर्धान हो चुकी थीं।
जीवन के अंतिम प्रसंग और स्मृतियाँ
सन् १९३० के फाल्गुन मासमें बँगदेशके श्रीराखालदास कुंडू उनके पास आकर बोले-'ऐसा कोई गर्हित कर्म नहीं, जो मैंने अपने जीवनमें न किया हो। अब कुछ भी करनेकी सामर्थ्य नहीं रही, पर कालकी चिन्ता हर समय सताती रहती श्रीकृष्ण-चैतन्यदास बाबा
उपदेश करनेकी कृपा कीजिये। है। न जाने मेरी क्या गति होगी। मुझे क्या करना चाहिए ? जिसमें मेरा हित हो ऐसा
बाबाने पूछा- आपकी लौटकर देश जानेकी इच्छा है क्या ?'
'नहीं, बिलकुल नहीं, पर मेरे जैसे अपराधी व्यक्तिपर धामकी कृपा हो सकती क्या?
'क्यों नहीं? आपको इस उम्र में और कुछ करनेकी आवश्यकता नहीं। श्रीमद्भागवत महापुराणका एक पारायण सुन लें और श्रद्धापूर्वक नाम जप करते हुए धाममें पड़े रहें। व्रजधाममें श्रद्धाकर पड़े रहना ही एक बड़ा साधन है। ब्रह्माने उजवासको सर्वोच्च साधन जानकर ही व्रज-बासकी प्रार्थना की थी। उद्धव, बृहस्पतिके शिष्य, श्रीकृष्णके सखा और मन्त्री जिनकी श्रीमद्भागवतके तीन श्रेष्ठ बरदासोंमें गिनती की गयी है. उन्होंने भी ब्रज-वासकी प्रार्थना की थी। इसलिए आप निश्चिन्त हो व्रज-वास करें। राधारानी अवश्य आपपर कृपा करेंगी।'
कुडू महाशय सफल मनोरथ हो वृन्दावन जाकर निष्ठा सहित नामजप करते हुए वहाँ रहने लगे। ज्येष्ठ पुत्रको कलकत्तेसे बुलाकर श्रीमद्भागवत-परा काय ते अवस्था की। भगवत्कृपासे सप्ताह निर्विघ्न समाप्त हुआ। उसके कुछ ही दिन बाद स्वस्थ और सज्ञान अवस्थामें नाम-जप करते-करते उन्हें नित्य-धामकी प्राप्ति हुई।
सन् १९३१ में गौरबाबूने वृन्दावनमें गोपीनाथ बागमें एक अति मनोरम मन्दिरका निर्माण किया। श्रीगोपीजन-वल्लभको उसमें विराजमान कराया। उसके उपलक्ष्यमें एक उत्सव किया। बाबा भी उत्सवमें सम्मिलित हुए। तदुपरान्त उन्होंने गिरिराजकी दण्डवती परिक्रमा करनेका अभिप्राय प्रकट किया। ३-४ सेवकों और तम्बू आदिको व्यवस्था की गयी। परिक्रमा सम्पन्न होनेपर बाबा हॉर्निया रोगसे आक्रान्त हो शेषशायी चले गये।
शेषशायीमें उनका नाथू नामका एक शिष्य रहता था। पुसल काटनेसे सम्बन्धित एक झगड़ेमें उसके आदमियोंसे एक व्यक्तिकी हत्या हो गयी। नाथूको बेल जाना पड़ा। जमानतपर छूटनेपर वह बाबाजी महाराजके चरणोंमें लोट गया। बाबाने रहा- 'मैं क्या करूँ ? कर्मका फल तो भोगना ही होगा, पर फाँसी नहीं होगी।'
मुकदमा चला। अन्तमें उसे आजीवन कारावासकी सजा सुना दी गयी। भवाको सम्वाद मिला, तो उन्होंने कहा- 'चिन्ताकी कोई बात नहीं। वह मुक्त हो बाएमा ।' कुछ दिन बाद किसी राजकीय खुशीके उपलक्ष्यमें वह मुक्त हो गया।
सज्जनप्रसाद सिंहने एक बार गोवर्धनमें नाम-यजके पश्चात् नगरकीर्तन और बार-बार अनुरोध किया। बाबाने कहा- 'उत्सवके लिए तो आग्रह करो नहीं, पर वैष्णव-सेवाका बड़ा आयोजन किया और बाबासे उत्सवमें योगदान करनेका अपराह्न ४ बजे वहाँ पहुंचकर नगर कीर्तनमें मैं अवश्य सम्मिलित हो जाऊंगा।'
नगर-कीर्तनके समय वे वहाँ पहुँच गये। कीर्तन जब मानस-गंगाके निकट पहुँचा, आकाशमण्डल कीर्तनकी इस ध्वनिसे परिपूर्ण हो गया -
निताई-गौर सीतानाथ एई बार आमाय दया कर हे ।
आमार गौरांगेर गुने बनेर पशु-पाखी झुरे ।।
इस मर्मस्पर्शी ध्वनिको सुन बाबाके धैर्यका बाँध टूट गया। वे भावविभोर हो उद्दण्ड नृत्य करने लगे। आधेघण्टे तक लगातार नृत्यमें दो-दो हाथ ऊपर उछलते रहे। यह देख सबको चिन्ता हई। हॉर्निया रोगके कारण उनका इतना परिश्रम करना खतरेसे खाली नहीं था। उन्हें बैठा देनेकी बहुत चेष्टा की गयी, पर उसका कोई असर न हुआ। नगर-कीर्तन समाप्त कर जब वे प्रकृतिस्थ हुए, उन्हें गाड़ीसे चन्द्रसरोवर पहुँचा दिया गया।
यशोहर निवासी श्रीव्रजमोहनदासजी वेशाश्रयके पश्चात् चन्द्रसरोवरमें बाबाकी कुटियाके समीप दूसरी कुटियामें रहकर उनकी सेवा करने लगे। एक दिन उन्होंने बाबासे स्मरण-मननके विषयमें जानना चाहा। बाबाने उत्तरमें इस सम्बन्धमें दो महापुरुषोंके विचार प्रकट करते हुए कहा- 'बहुत दिनोंकी बात है। उस समय पण्डित रामकृष्णदास बाबा गोवर्धनमें ग्वाल पोखरामें भजन करते थे। एक दिन मैंने उनके निकट जाकर अष्टकालीन स्मरणके विषयमें शिक्षा देनेकी प्रार्थना की। उन्होंने कहा- 'यदि और कोई मुझसे अष्टकालीन स्मरणकी शिक्षा माँगता तो मुझे उसके गालपर चाँटा मारनेमें संकोच न होता। उनका अभिप्राय समझकर मैं उनसे और कुछ कहनेका साहस न कर सका। स्मरण-मनन कोई सहज बात नहीं।
एक बार कालीदहके सिद्ध श्रीजगदीशदास बाबाके निकट जाकर दो व्यक्तियोंने अष्टकालीन स्मरणकी शिक्षाके लिए निवेदन किया। बाबा मौन रहे। मौनको स्म्मतिका लक्षण जान वे नित्य उनके पास जाने लगे। नित्य भक्ति-विषयक नाना प्राकरकी आलोचना होती, पर अष्टकालीन लीला-स्मरणके विषयमें बाबा कुछ न कहते। इसलिए वे अभीष्ट विषयकी शिक्षाके लिए अन्यत्र जाने लगे। एक-दो दिन छोड़कर बाबाके पास भी जाते। एक दिन उन्होंने अति मृदुस्वरमें उनसे पूछा- 'बाबा, स्मरण-मनन किस प्रकार चल रहा है ?' श्रीकृष्ण-चैतन्यदास बाबा
यह सुन उन्हें आश्चर्य हुआ। यह जानकर कि उनसे कुछ छिपा तो है नहीं, उन्होंने इस बातको स्वीकार करते हुए कहा- 'आपकी कृपासे कुछ-कुछ हो रहा
7? दो-चार दिन बाद फिर उन्होंने पूछा- 'क्यों स्मरण-मनन खूब चल रहा है
उन्होंने उत्तर दिया- 'आपकी कृपासे चल तो रहा है पर कुछ ऐसे ही।'
उनकी स्पष्टोक्ति सुन वे प्रसन्न होकर बोले- 'बाबा, मरण बिना स्मरण कहाँ? जब तक इस जगत्का सब कुछ भूल नहीं जाता और देहस्मृतिका लोप रहीं हो जाता तब तक क्या उस जगत्का स्मरण सम्भव है ?'
बाबा अब वृद्ध हो गये थे। फिर भी उनकी नियम-निष्ठामें कोई अंतर नहीं पड़ा था। अब भी वे पहलेकी तरह चाहे कितनी ठण्ड पड़ रही हो रात दो बजे उठकर चन्द्रसरोवरमें स्नान करते थे और कुटियाका दरवाजा बन्दकर भजनमें बैठ जाते थे। पर, अब जैसे-जैसे दिन बीत रहे थे उनकी विरहाग्नि प्रबल होती जा रही थे। वे एक बार नित्य-धाम जाकर लौट आये थे। तबसे उन्हें राधारानीके दर्शन शायद फिर नहीं हुए थे। वे उनके दर्शनके बिना इतना अधीर हो उठे थे कि उन्हें ऊंना भी दुष्कर लग रहा था।
उन दिनों एक व्रजवासी ब्राह्मण, जो उनका शिष्य था, नित्य ब्रह्ममुहूर्तमें च्द्रसरोवरमें स्नान कर जाया करता। स्नानके पश्चात् उनकी कुटियाके सामने स्डवत्कर 'जय राधे!' कहा करता। बाबा भी कुटियाके भीतरसे 'जय राधे!' कह उसकी दण्डवत् स्वीकार करते। एक दिन जब उसने दण्डवत्कर 'जय राधे!' कहा, तो उसे कोई उत्तर न मिला। बार-बार 'जय राधे!' कहनेपर भी जब उसे जर न मिला, तो उसे चिंता होने लगी। निकट ही कुटियामें एक और महात्मा भजन करते थे। उनके पास जाकर उसने अपनी चिन्ता व्यक्त की। उन्होंने कहा- 'श्रीकृष्ण चैतन्यदास बाबाके लिए यह कोई असाधारण बात नहीं। वे अकसर लीलामें डूब जाते हैं और ज्ञान-शून्य अवस्थामें घण्टों पडे रहते हैं। पर इस बार एक असाधारण बात यह है कि रात मैने उनकी कुटियासे एक प्रकाश विकीर्ण होते देखा।
न जाने वह कैसा प्रकाश था। मैंने उनकी कटियामें कभी दीपक बलते तो देखा नहीं। रोज जब वे चन्द्रसरोवरमें स्नान करने जाते, तो उनकी दुरियाका दरवाजा खोलने और बन्द करनेकी आवाज सुनायी पड़ती। आज मैने द भी नहीं सुनी, इसलिये थोडी चिन्ता होती है।
दोनोंने परस्पर विचार करनेके पश्चात् कुछ देर प्रतीक्षा करनेका निश्चय किया, पर नहत देर तक प्रतीक्षा करनेके पश्चात् बार-बार 'जय राधे' करनेपर भी बुलाकर किसी प्रकार कुटियाका दरवाजा खोला तो देखा कि वे स्पन्दनहीन जब कोई उत्तर न मिला, तो उनकी चिन्ता बहुत बढ़ गयी। उन्होंने गाँववालोंको अवस्थामें अचेत पड़े हैं, पर श्वास धीरे-धीरे चल रहा है।
सबने मिलकर कीर्तन आरम्भ किया। सन्ध्या तक कीर्तन चलता रहा। फिर भी बाबाकी अवस्थामें कोई परिवर्तन होता न दीखा। उसी समय पानकी बीड़ी हाथमें एक भागता आया। उसने पूछा- 'बेंगाली लिए बरसानेके गोस्वामीका एक बालक बाबा, जिनके प्राण निकसबेको है रहे हों, कहाँ हैं ?'
'बाबा भीतर कुटियामें हैं', बाहर खड़े कुछ लोगोंने कहा।
वह कुटियामें जाते ही बोला- 'जा पानकी बीड़ी बाबाकूँ खवाय देओ। श्रीजीने पठाई है। कल रात बिनने स्वप्नमें मोंते कही 'चन्द्रसरोवर बारो बँगाली बाबा मेरो दर्शन सहन नाँय कर सक्यौ। बाके प्राण जायबेको हैं। बाको मेरी प्रसादी बीड़ी खावाए देओ, तौ जी उठैगो।'
पानकी बीड़ी जैसे ही बाबाके मुखसे स्पर्श करायी गयी, वे 'जय राधे!' कहते हुए उठ बैठे।
पर कई महीने तक बाबा अप्रकृतिस्थ रहे। दिव्योन्मादकी-सी अवस्थामें वे कभी हँसते, कभी रोते, कभी मूर्छा खा गिर पड़ते। लोग उसे मानसिक व्याधि समझ उन्हें कुसुमसरोवरपर ग्वालियरवाले मन्दिर ले गये, वहाँ उन्हें रखकर कुछ दिन राधाकुण्डके किसी वैद्यसे इलाज करानेके उद्देश्यसे। मन्दिरमें ग्वालियरके राजाके भाईकी ओरसे साधु-सेवाकी व्यवस्था थी। वहाँ पहुँचते ही बाबा चीख उठे- 'में राजाका अन्न नहीं खाऊँगा। मुझे यहाँसे ले चलो।'
विवश हो उन्हें चन्द्रसरोवरपर लौटा लाया गया। धीरे-धीरे उनका दिव्योन्माद जाता रहा। कदाचित् उनके विरहानलको शान्त करनेके लिए राधारानीने उन्हें दर्शन दिये थे, पर अभी भी अपने किसी उद्देश्यकी पूर्तिके लिए उन्हें कुछ दिन और भू-लोकमें रखना चाहा था।
कुछ दिन और बीते बाबाको भजन करते और अपने आचरणसे लोगोंको भजनकी शिक्षा देते। आखिर वह समय निकट आ गया जब राधारानीको उन्हें अपनी सेवामें ले लेना था। बाबाको इसका संकेत मिल गया।
श्रीकृष्ण-चैतन्यदास बाबा
इसलिए अब साल भरसे वे केवल दूध पीकर रह रहे थे। कथाप्रसंगमें कहा करते थे- 'अब और अधिक इस शरीरका भार वहन करना ठीक नहीं।' उन्होंने सोचा एक बार जहाँ-जहाँ उनके प्रेमीजन हैं वहाँ हो आयें। वे शेषशायी, बांशो ग्रामादि जाकर और कहीं दो महीने, कहीं चार महीने, रहकर लौट आये। वजमोहनदाससे बोले - 'इस बार सबसे अन्तिम विदा लेकर आया हूँ। विदा होते समय सब बहुत संतप्त थे. पर मैं क्या करता ?'
सन् १९४० के श्रावण मासमें श्रीश्यामापद अपनी पत्नी गोविन्ददासीके साथ चन्द्रसरोवर आये। बाबाने कहा- 'अच्छा किया जो आ गए और गोविन्ददासीको भी ले आये। बस समझो कि यह हमारा अन्तिम मिलन है।' नियम-सेवाके कुछ पहले एक दिन श्रीव्रजमोहनदासजीसे बोले- 'व्रजमोहन, न जाने इस बार नियम-सेवा पूरी होगी कि नहीं। विशेष कुछ नियम करनेकी मेरी सामर्थ्य नहीं। तुम फूल-तुलसी ले आना। बैठे-बैठे फूल-तुलसी अर्पण किया करूँगा। इस देहसे अब गिरिराज-परिक्रमा तो सम्भव है नहीं। हो सके तो किसी एक आदमीको ठीककर लेना। वह तुम्हारे साथ परिक्रमा कर आया करेगा। उसकी यथासम्भव सेवा कर दी जायेगी। एक भागवत् सप्ताह भी सुन लूँगा। भागवत्-सप्ताहमें आगेसे ही मेरा न जाने कैसा एक दृढ़ विश्वास है।
उसकी फल-श्रुतिमें जो भी लिखा है उसका एक-एक अक्षर सत्य लगता है।'
पीछे एक दिन व्रजमोहनदासको निकट बुलाकर उन्हें एक डोर-कौपीन देते हुए बोले- 'इसे मेरे आशीर्वाद स्वरूप श्यामापदको देना। मेरा दूसरा कौपीन यदि गौर आग्रह करे तो उसे दे देना। मेरे शेष समयपर एक बात मत भूलना। वृन्दावनके सातों देवालयोंका चरणामृत और व्रजके विभिन्न स्थानोंकी रज अवश्य देना।'
यह सुन ब्रजमोहनदास अत्यन्त चिन्तित हुए। नियम-सेवाके कुछ ही दिनों बाद एक दिन सन्ध्या समय बाबाको ज्वर हुआ। दूसरे दिन प्रातः वृन्दावन संवाद भेजा गया। वहाँसे गौरबाब और अन्य लोग आ गये। बाबाने सबके सिरपर हाथ रखकर उन्हें आशीर्वाद दिया और वृन्दावन लौट जानेको कहा। पर सब वहीं रह गये। बाबाकी अवस्था खराब होती गयी। कार्तिक कृष्णपक्ष सप्तमीको सन्ध्या समय कीर्तन आरम्भ हुआ। दूसरे दिन सन् १९४० की अरिष्टाष्टमीको प्रातःक्षीण स्वरसे नामोच्चारण करते-करते उन्होंने नित्य-लीलामें प्रवेश किया।
उस समय श्रीगौरांगदास बाबाजी महाराज वृन्दावनमें राधारमणको बगीचीमे भजन कर रहे थे। उन्होंने देखा एक दिव्य ज्योतिको आकाशमें जाते हुए।
सेवा और समर्पण — जीवन-संदेश
सेवा का मूल्य केवल बाहरी कार्य में नहीं, बल्कि उसके पीछे के निष्कपट भाव में भी होता है। इस चरित्र के प्रसंगों को पढ़ते समय सेवा के इसी भाव पर विचार किया जा सकता है।
कथा का सार
श्रीकृष्ण-चैतन्यदास बाबा [ चन्द्र सरोवर ] की कथा भक्ति, विनम्रता और साधना पर मनन करने का अवसर देती है। इस संग्रह में अन्य भक्तों के जीवन-प्रसंग भी पढ़ें।